---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

आर.वी.सिंह का व्यंग्य - शहर में भैंस

साझा करें:

व्यंग्य शहर में भैंस डॉ.आर.वी.सिंह भैंस और शहर का रिश्ता बहुत पुराना है। इधर पश्चिमी तर्ज़ के पब्लिक स्कूलों में पढ़े-लिखे नौकरशाहों को यह ...

व्यंग्य

शहर में भैंस

डॉ.आर.वी.सिंह

भैंस और शहर का रिश्ता बहुत पुराना है। इधर पश्चिमी तर्ज़ के पब्लिक स्कूलों में पढ़े-लिखे नौकरशाहों को यह ऐतिहासिक तथ्य कभी-कभी विस्मृत हो जाता है, तो वे अपनी झख में आदेश जारी कर देते हैं कि इन भैंसों को शहर से निकाल बाहर करो। लेकिन शुक्र है कि अपने नेताओं को भैंस से बड़ा प्यार है। उनमें से अधिकतर का डील-डौल भी भैंसों जैसा ही होता है और वे जानते हैं कि शहर और भैंस का नाता बहुत गहरा है। इसलिए शहर में अब भी भैंसें कायम हैं, पूरी शान-ओ-शौकत के साथ।

हिन्दी में कहावत मशहूर है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। अब आप सोचिए कि यदि शहर में भैंस न हो तो दबंग लोग अपनी लाठी का इस्तेमाल कहाँ और किस पर करेंगे? जिसके पास लाठी हो, उसके आस-पास हाँकने के लिए भैंस तो होनी ही चाहिए। यदि मौके पर भैंस नहीं मिली और लाठी वाले के मन में हाँकने का विचार आ गया तो भले आदमियों की तो शामत ही समझिए। इसलिए बेहतर है कि जब तक लाठी कायम है तब तक भैंस को भी कायम रहने दें। इधर सुनने में आता है कि अमुक-अमुक जगह पर पुलिस वालों ने लोगों की भीड़ पर लाठियाँ बरसाईं। यही तो परेशानी है कि शहर में सही मौके पर भैंसें नहीं उपलब्ध होती हैं तो पुलिस वाले आम जनता को ही भैंस की तरह धुनने लगते हैं। इसका एक ही उपाय है कि पुलिस थानों के बगल में भैंसों की खटाल बनाई जाएँ और जब-जब पुलिस वालों को डंडा भांजने का मन करे वे भैंसों पर अपनी भड़ास निकाल लिया करें।

वैसे बताते चलें कि अपने अधिसंख्य पुलिस सिपाही जब भर्ती होते हैं तो छैल-छबीले, बांके जवान होते हैं। लेकिन धीरे-धीरे इतनी चर्बी चढ़ा लेते हैं कि मोटापे में उनकी प्रतिस्पर्धा केवल भैंस से ही हो सकती है। अभी हाल में उत्तर प्रदेश में सिपाहियों की दीवान के रूप में पदोन्नति के लिए शर्त रखी गई- जो सिपाही नब्बे मिनट में दस किलोमीटर की दौड़ पूरी करेगा, उसी को पदोन्नति मिलेगी। सच कहें तो नब्बे मिनट में दस किलोमीटर का फासला तय करने के लिए दौड़ने की जरूरत ही नहीं है। कुछ तेज कदम बढ़ाकर चलने से भी यह काम पूरा हो जाएगा। और मोटी से मोटी भैंस भी इसे अंजाम दे सकती है। लेकिन जिन पुलिस वालों का काम ही अपराधियों के पीछे दौड़ना है, वे यह शर्त पूरी नहीं कर पाए। दो लोग तो इस कोशिश में जान से ही हाथ गंवा बैठे। अपने यमराज भी भैंसे की सवारी करते हैं। अब आप सोचें कि मिथकीय दृष्टि से भी भैंस का कितना महत्त्व है। लिहाजा भैंस की स्पृहणीयता में कोई कमी नहीं है।

अब दिक्कत यह है कि भैंस जैसे भारी-भरकम जानवर को रखा कहाँ जाए। शहरों में आदमियों के रहने के लिए ही जगह कम पड़ने लगी है। नगरों के विकास प्राधिकरण और निजी बिल्डर, दोनों अब प्लॉट और स्वतंत्र मकान बेचने के बजाय फ्लैट बनाकर बेचने में अधिक रुचि लेने लगे हैं। ऐसे में हम अपनी भैंस को कहाँ रखेंगे? उसे लिफ्ट में घुसा नहीं सकते, और सीढियों के रास्ते ऊपर ले जा नहीं सकते। मान लें कि किसी तरह पार्किंग लॉट में या सीढ़ी के नीचे या गली में भैंस को रख भी लिया तो उसे क्या खिलाएँगे? क्या पिलाएँगे? और कैसे नहलाएँगे?

भैंस पिजा-बर्गर तो खाती नहीं। चाउमिन और मंचूरियन से भी उसका पेट नहीं भरने वाला। पानी हम लोग खुद बोतल वाला पीते हैं। भैंस के लिए कहाँ से लाएंगे? यही हालत नहाने की है। अपने नहाने के लिए पानी ही नहीं मिलता। तो भैंसिया को कौन से तालाब में ले जाएंगे नहलाने?

इस सब असुविधा के बावजूद शहर में भैंस का होना बहुत जरूरी है। अपने देश में और सारी बातों पर बहुत बल दिया जा रहा है। बस पढ़ाई-लिखाई वाला विभाग थोड़ा पिछड़ गया है। स्कूल और शिक्षक तो बहुत हो गए हैं। सरकारी स्कूल भी खूब बन गए हैं। और उनको बनाने की प्रक्रिया में बहुत से लोग खुद बन गए। लेकिन इन दो कमरे की इमारतों में पढ़ाई के अलावा और सब कुछ होता है। पुरुषार्थी गुरुजी लोगों की मेहरबानी से अब भी अपने देश में लगभग पैंतीस से चालीस प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। ऐसे लोगों के लिए मुहावरा प्रचलित है- काला अक्षर भैंस बराबर। अब आप सोचें कि यदि भैंस ही न रही तो काला अक्षर किसके बराबर होगा? एक मुहावरा यों ही डिक्शनरी से बाहर हो जाए, यह भला कौन चाहेगा? निरक्षरता तो मानवता का श्रृंगार है। निरक्षर लोग हमारे समाज की शान हैं। निरक्षर हैं तो भैंस की कमी होकर भी महसूस नहीं होती। दोनों को गाहे ब गाहे हाँककर डंडा रखने का शौक पूरा किया जा सकता है। इसलिए निरक्षरों और भैंसों, दोनों को समाज में ज्यादा से ज्यादा संख्या में बनाए रखना बेहद जरूरी है। अनपढ़ आदमी भैंस चराता है और भैंस अनपढ़ आदमी की पूँजी है। दोनों में अन्योन्याश्रय संबंध है। और इसी आधार पर अनपढ़ आदमी की जिससे उपमा दी जाती है, उस भैंस का समाज, गाँव और शहर में रहना भी बेहद जरूरी है। इति सिद्धम।

हिन्दी में एक मुहावरा और है- भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी पगुराए। अब बताइए यदि भैंस न रही तो किसके आगे बीन बजाइएगा? और पगुराने की प्रक्रिया को समझाने के लिए क्या उदाहरण दीजिएगा? हालांकि अपने हिन्दुस्तान में कोई-कोई आदमी भी निरन्तर पान मसाला, तंबाकू आदि का चर्वण ऐसे ही करते रहते हैं, जैसे पगुरा रहे हों। लेकिन भैंस के पगुराने में और इनके पगुराने में अंतर है। भैंस पगुराती है अपने खाए हुए चारे को और बारीक पीसने तथा वापस उसे पेट में पहुँचाने के लिए। इन्सान पगुराता है, इधर उधर गंदगी फैलाने और न पगुराने वाले इन्सानों को वमन कराकर उनके पेट का चारा बाहर निकलवाने के लिए। लिहाजा पगुराने के मामले में इन्सान भैंस से दो कदम आगे, और डार्विन चचा के शब्दों में उच्चतर ऑर्डर की प्रजाति है।

चारा, भैंस और मुष्य- ये एक ही पारितंत्र के तीन महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं। यदि भैंस है तो उसका एक मंत्रालय और एक अदद विभाग है। उसके लिए पशु-चारा है। चारा खरीदने की परिकल्पना है, प्रावधान है। सरकारी निधि है। यह बिल्कुल ऐसे ही है, जैसे बच्चे हैं तो कुपोषण है, पुष्टाहार योजना है, सरकारी बजट है। और जहाँ सरकारी निधि या बजट है, वहाँ घोटाला है। घोटाला अपने देश में वैसे ही सर्वव्यापी है जैसे भगवान। यदि गीता आज के युग में लिखी गई होती तो कृष्ण भगवान अर्जुन से कहते कि हे पार्थ जैसे घोटाला भारत में यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है, वैसे ही मैं भी सर्वत्र व्याप्त हूँ। चूंकि भैंस की खुराक अधिक होती है, इसलिए उसके चारे की मात्रा भी अधिक और चारे से जुड़ा घोटाला भी उसी के आनुपातिक आधार पर बड़ा ही होगा। खाना ही है तो बड़ा खाओ। थिंक बिग। बड़ी सोच का बड़ा जादू। इसलिए शहर में यदि बड़ी सोच का चलता-फिरता कोई प्रतिमान है तो वह भैंस ही है। यदि शहर से भैंस को रुख्सत कर दिया जाए तो बड़े सोच के लिए हम किसका उदाहरण देंगे?

कुछ जो बेहद पिछड़े और गँवार टाइप के लोग हैं, उनके तईं भैंस दूध देनेवाला प्राणी है। बस दूध के लालच में वे सोचते हैं कि भैंस का शहर में होना जरूरी है। भैंस को शहर में रहना ही चाहिए, ऐसा तो हम भी मानते हैं। लेकिन सिर्फ दूध के वास्ते रहना चाहिए, ऐसा सोचने वालों से अपना मत-वैभिन्न्य है। शहर के बच्चों ने दूध पीना अब लगभग छोड़ दिया है। ज्यादातर बच्चे दूध नहीं, बल्कि तरह-तरह के दूसरे पौष्टिक पेय पीते हैं, जिससे उनके शरीर और मस्तिष्क, दोनों का बहुत तेज गति से विकास होता है। कम से कम टेलीविजन पर प्रसारित विज्ञापनों का तो यही दावा है। इसलिए दूध के लिए भैंस रखना कोई समझदारी का काम नहीं है। और सच पूछें तो भैंस पाले बिना यदि दूध मयस्सर हो जाए तो यह जहमत कोई क्यों मोल ले?

हाँ दूध के अलावा और सभी वजूहात से भैंस को शहर में होना ही चाहिए। भैंसें शहर की सड़कों पर वाहन चालकों से प्रतिस्पर्धा करती हैं। इससे लोगों में स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना का विकास होता है। भैंसों के गोबर से शहर की सड़कें बिलकुल द्वापर-कालीन कुंज गलियाँ लगती हैं। भैंसें हमें हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती हैं। अमूमन भैंसों का डील-डौल अच्छा होता है। इसलिए खा-खाकर बेडौल हो चले शहराती अपने माहौल में जब भैंसों को देखते हैं तो उनको अपने मुटापे पर आत्म-ग्लानि नहीं होती। बल्कि तसल्ली होती है कि चलो कम से कम अभी हम भैंस से तो दुबले हैं। इधर सुनने में आ रहा है कि मानव मस्तिष्क पहले के बनिस्बत लगभग दस प्रतिशत सिकुड़ गया है। किन्तु इसमें घबराने की कोई बात नहीं है। भैंस के रहते हमें अपनी अक्ल के छोटा होने की चिंता नहीं है, क्योंकि हिन्दी में प्रश्नसूचक एक मुहावरा है- अक्ल बड़ी या भैंस। यानी अक्ल भैंस से हमेशा बड़ी ही होती है। अब सोचिए.. यदि शहर से भैंस लुप्त हो गई तो हमारी अक्ल कितनी बड़ी है, इसका पैमाना खोजने किस संग्रहालय में जाएँगे?

---0--

आर.वी.सिंह/R.V. Singh
उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in
----

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 5
  1. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (26.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (26.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी रचना मैंने पहली बार पढ़ी| यह मेरा दुर्भाग्य है, व्यंग्य की तलवार जो अपने चलाई है वह हमारे नेताओं पर काम नहीं करेगी बहुत जोरदार, बधाई

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह..क्या खूब ...कटाक्ष किया है...

    जवाब देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * |

| * उपन्यास *|

| * हास्य-व्यंग्य * |

| * कविता  *|

| * आलेख * |

| * लोककथा * |

| * लघुकथा * |

| * ग़ज़ल  *|

| * संस्मरण * |

| * साहित्य समाचार * |

| * कला जगत  *|

| * पाक कला * |

| * हास-परिहास * |

| * नाटक * |

| * बाल कथा * |

| * विज्ञान कथा * |

* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4039,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,338,ईबुक,193,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2999,कहानी,2253,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,540,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,96,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,345,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,67,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,28,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,242,लघुकथा,1248,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2005,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,707,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,793,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,83,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,204,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: आर.वी.सिंह का व्यंग्य - शहर में भैंस
आर.वी.सिंह का व्यंग्य - शहर में भैंस
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2011/02/blog-post_7609.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2011/02/blog-post_7609.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ