सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

दिनेश सिंह के दो नवगीत


dineah singh

१. कोख बाघिन की!


समय में ही समय का बनकर रहूँ
नींव रख दूँ या नये दिन की
रात-दिन में फर्क कोई है कहाँ
बस उजाला बीच की दीवार था
ढह गया जो अब खुला मैदान है


युगों से जो अँधेरे के पार था
जागरण करती हुई नीदें यहाँ
सुन रहीं हैं बात छिन-छिन की
एक मेला जुटा है हर मोड़ पर
एक ठो बाज़ार है हर गाँव में


आगमन अपना बताने के लिए
बंधा बिछुआ बज रहा पाँव में
कीमतों के बोल उठकर गिर रहे
बिक रही है कोख बाघिन की
गढ़ रही सच्चाइयाँ धोखा


और धोखे से मिले दो दिल
दाँव-पेचों की कतरव्यौंतें हुईं
बन गये हैं प्यार के काबिल
जो नहीं बन सके वे बदनाम हैं
रीति है यह प्रीति-पापिन की


 

२. द्वंद्व !


रहते हैं अपने घर में
उनके घर की कहते हैं
मन नद्दी-नालों में
कितने परनाले बहते हैं
कितना पानी हुआ इकट्ठा
बस्ती में आबादी में


बहकर आया ताल-पोखरे
होकर निर्जन वादी में
बाँह पसारे मिलती धारा
दो तट साधे रहते हैं
बरखा बूँदी के मौसम की
ढीली चालें बढ़ते पग


झोंके बहे खुली पछुआ के
नाव चले डगमग-डगमग
एक हाथ तट की माटी
दूजे से गठरी गहते हैं
पार उतर जाने का सुख

उस पार छूट जाने का गम
पीछे की वह राग-बाँसुरी
आगे लहराते परचम
इन दोनों के बीच अकेले
एक द्वंद्व में दहते हैं


परिचय:
१४ सितम्बर १९४७ को रायबरेली (उ.प्र.) के एक छोटे से गाँव गौरारुपई में जन्मे श्री दिनेश सिंह का नाम हिंदी साहित्य जगत में बड़े अदब से लिया जाता है।  सही मायने में कविता का जीवन जीने वाला यह गीत कवि अपनी निजी जिन्दगी में मिलनसार एवं सादगी पसंद रहा है । अब उनका स्वास्थ्य जवाब दे चुका है । दिनेश जी ने न केवल तत्‍कालीन गाँव-समाज को देखा-समझा है और जाना-पहचाना है उसमें हो रहे आमूल-चूल परिवर्तनों को, बल्कि उन्‍होंने अपनी संस्कृति में रचे-बसे भारतीय समाज के लोगों की भिन्‍न-भिन्‍न मनःस्‍थिति को भी बखूबी परखा है , जिसकी झलक उनके गीतों में पूरी लयात्मकता के साथ दिखाई पड़ती है। अज्ञेय द्वारा संपादित 'नया प्रतीक' में आपकी पहली कविता प्रकाशित हुई थी। 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' तथा देश की लगभग सभी बड़ी-छोटी पत्र-पत्रिकाओं में आपके गीत, नवगीत तथा छन्दमुक्त कविताएं, रिपोर्ताज, ललित निबंध तथा समीक्षाएं निरंतर प्रकाशित होती रहीं हैं। 'नवगीत दशक' तथा 'नवगीत अर्द्धशती' के नवगीतकार तथा अनेक चर्चित व प्रतिष्ठित समवेत कविता संकलनों में गीत तथा कविताएं प्रकाशित। 'पूर्वाभास', 'समर करते हुए', 'टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर', 'मैं फिर से गाऊँगा' आदि आपके नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । आपके द्वारा रचित 'गोपी शतक', 'नेत्र शतक' (सवैया छंद), 'परित्यक्ता' (शकुन्तला-दुष्यंत की पौराणिक कथा को आधुनिक संदर्भ देकर मुक्तछंद की महान काव्य रचना) चार नवगीत-संग्रह तथा छंदमुक्त कविताओं के संग्रह तथा एक गीत और कविता से संदर्भित समीक्षकीय आलेखों का संग्रह आदि प्रकाशन के इंतज़ार में हैं। चर्चित व स्थापित कविता पत्रिका 'नये-पुराने' (अनियतकालीन) के आप संपादक हैं ।  आपके साहित्यिक अवदान के परिप्रेक्ष्य में आपको राजीव गांधी स्मृति सम्मान, अवधी अकेडमी सम्मान, पंडित गंगासागर शुक्ल सम्मान, बलवीर सिंह 'रंग' पुरस्कार से अलंकृत किया जा चुका है।  संपर्क - ग्राम-गौरा रूपई, पोस्ट-लालूमऊ, रायबरेली (उ.प्र.)। 
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Abnish Singh Chauhan
Lecturer
Department of English
Teerthanker Mahaveer University
Moradabad (U.P.)-244001

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2 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर दार्शनिक अभिव्यक्ति । बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिनेश सिंह जी के गीत प्रेम के आधुनिक चलन को गेयता के साथ व्यंजित करते हैं. बधाई स्वीकारें - अवनीश सिंह चौहान

    उत्तर देंहटाएं

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