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यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : महँगाई का मंगल ग्रह

इधर महँगाई पर तरह तरह के वक्‍तव्‍य पढ़ने को मिल रहे हैं। सरकार कहती है हम ज्योतिषी नहीं हैं। एक मंत्री कहते है मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है, अलादीन का चिराग भी नहीं है जो महंगाई को कम कर सके। महंगाई की कुण्‍डली पढ़ने में सरकार बार बार असफल होती है, सरकार सामान्‍य ज्योतिष, अंक ज्योतिष, रमल ज्योतिष, आदि की भी जानकारी नहीं रखती है। सरकार चाहे तो प्‍याज की कुण्‍डली पढ़कर उसे सस्‍ता कर सकती है। सरकार चाहे तो कृषिमंत्री, वित्‍तमंत्री, रिजर्व बैंक, व्‍यापारियों आदि की कुण्‍डली पढ़कर कोई रास्‍ता निकाल सकती है। सरकार चाहे तो अपनी अंगुली में कोई नग, पत्‍थर आदि पहन कर ग्रहों की चाल को सुधार सकती हे। सरकार चाहे तो ग्रहशान्‍ति के लिए यज्ञ, अनुष्ठान, जाप, तंत्र, मंत्र का सहारा ले जा सकती है। मगर महंगाई का मंगल सब पर भारी पड़ रहा है। प्‍याज से बचो तो पेट्रोल, पेट्रोल से बचो तो दालें। महँगाई हर तरफ राहू-केतु के शिकंजे में फंसी पड़ी है। कहते है जिस कन्‍या की कुण्‍डली में मंगल होता है वो भारी हो जाती है, उसके शादी-ब्‍याह में बड़ी परेशानी आती है, लगभग यही स्‍थिति महँगाई की है उसे जनता की कुण्‍डली से मिलान करने की सख्‍त जरुरत है। क्‍या महँगाई की कुण्‍डली में कालसर्प योग आ गया है। जो सब को डसता ही जा रहा है।

महँगाई को कम करने के लिए किताबी ज्ञान का सहारा लिया जा रहा है, मगर सब जानते है कि महंगाई कम करने में किताबी ज्ञान काम नहीं आ सकता है। किताबी विशेषज्ञ रेपो और रिवर्स रेपो की बहस में उलझते रहते हैं और महँगाई का मंगल और भी ज्‍यादा भारी हो जाता है। वो कभी चूदंडी मंगल हो जाता है और कभी पगड़ी मंगल।

सिद्धान्‍त कक्षा में, पुस्‍तकों में अच्‍छे लगते है, क्षेत्र में ये सिद्धान्‍त काम नहीं आते है, आज नहीं तो कल क्षेत्र के लोगों को सरकार की कुण्‍डली समझ में आनी है क्‍यों कि आम आदमी सरकार, राज, नीति, पक्ष विपक्ष लोकसभा, राज्‍यसभा, सभी की कुण्‍डली के ग्रहों को पहचानता है, समझता है और साम्राज्‍य वादी, पूंजीवादी, लोकतन्‍त्र की मजबूरियों की पोल खोलने की हिम्‍मत रखता है। सरकार का ये कहना भी हास्‍यास्‍पद है कि गरीब आदमी की क्रय शक्‍ति बढ़ी है, अरे बेचारों ने खरीद कर दोनों समय रोटी खाली तो महँगाई बढ़ गयी। जब कि चार बार खाने वाले रोज, गाड़ियां बदलने वाले, रोज विदेश जाने वालों के खर्चों से महँगाई बेअसर रहती है, ये कैसा गणित है। आखिर ये महँगाई के गणित में गरीब की रोटी को क्‍या उलझा रहे है, उसका निवाला छीनने का षड्यन्त्र क्‍यों किया जा रहा है ? सुनो कैरा सुनो क्‍या मेरी आवाज तुम तक पहुँचती है। सरकारी खर्चों में कमी का कोई जिकर नहीं करता। महँगाई बढ़ी क्‍यों कि भ्रष्टाचार बढ़ा। गणितीय ज्योतिष के अनुसार महँगाई समानुपाती है भ्रष्टाचार के, भ्रष्टाचार समानुपाती है विकास के और विकास विलोमानुपाती है संस्‍कृति के, अर्थात यदि विकास होगा तो भ्रष्टाचार बढेगा, विकास होगा तो संस्‍कृति का नुकसान होगा, महँगाई बढ़ेगी मगर सरकार कुछ भी नहीं कर पाती है। महँगाई के लिए एक-दो नहीं सभी सरकारें जिम्‍मेदार है, सरकारों को अपने ग्रह देखने चाहिये नहीं तो महँगाई के ग्रहण सूर्य, चन्‍द्रमा सब को निगल जायेंगे।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

मो․․09414461207

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