बुधवार, 2 मार्च 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - शास्‍त्रीय संगीत ः कुछ अशास्‍त्रीय प्रयोग

इधर हमारा देश तेजी से नीचे गिरा है। कई वस्‍तुओं की मर्यादायें कम हो गयी हैं। माँग बढ़ जाने के कारण ऐसा होता है। कुर्सी की माँग बढ़ जाने पर कुर्सी की मर्यादा कम हो जाती है। इधर शास्‍त्रीय संगीत में भी नीचे गिरने की प्रवृत्‍ति में तेजी आई है। बहुत से लोग जो संगीत को केवल फिल्‍मों के माध्‍यम से जानते हैं, अच्‍छी तरह जानते हैं कि शास्‍त्रीय संगीत नाम की चिड़िया इस देश में अब नहीं पाई जाती हैं, लेकिन कुछ सिर फिरे लोग जो सदा से ही बहुमत का अनादर करते रहे हैं यह कहते ही अघाते कि भारत का शास्‍त्रीय संगीत जीवित है। बज रहा है। यह बात दीगर है कि इस बजते संगीत को हमेशा श्रोताओं की तलाश रहती है। एक कला और प्रयोगात्‍मक फिल्‍म हेतु दर्शक जुटाना जितना मुश्‍किल काम है, उससे ज्‍यादा मुश्‍किल है शास्‍त्रीय संगीत के लिये एक समझदार श्रोता ढूँढना। गरीब को इसका बड़ा अवसादपूर्ण अनुभव है।

एक मित्र के यहाँ उन्‍हीं के कार्य से उन्‍हीं के स्‍कूटर पर बैठकर गया था। वहां देखा, बैठक में मसनद लगी हुई है, सफेद चांदनी बिछी हुई हैं और बीच में वाद्य यन्‍त्रों से घिरे एक सज्‍जन बिराजे हुए हैं। मैं समझ गया अब गया काम से। ईश्‍वर का स्‍मरण किया और बैठ गया। आलाप प्रलाप, आरोह, अवरोह आदि की समाप्‍ति तक यह गरीब बैठा रहा, परन्‍तु फिर आखिर उठकर बाहर आ ही गया। इधर इस क्षेत्र में नये प्रयोगों की सम्‍भावनाओं पर भी विचार शुरू हुआ है और चूँकि मैं अपने आपको विचारक की श्रेणी में रखकर देखता हूँ अतः मेरे लिये जरूरी हो जाता है कि मैं इस शास्‍त्रीय संगीत के पहलुओं पर अशास्‍त्रीय चिन्‍तन शुरू करूँ। कई बार चिन्‍तन जैसा महत्‍वपूर्ण कार्य अकेले व्‍यक्‍ति के बस का नहीं होता है, अतः मैंने भी अन्‍य लोगों की मदद ली।

सर्वप्रथम एक डाक्‍टरनुमा वैद्य से मुलाकात हुई, उन्‍हें जब शास्‍त्रीय संगीत के विषय में बताया तो कहने लगे ‘‘आप नहीं जानते चरक, सुश्रुत आदि ने संगीत से चिकित्‍सा लिखी है, और अगर आपको जुकाम है तो ठुमरी सुनिये, बुखार है तो राव भैरवी और फिर भी जिन्‍दा बच जाते हैं तो निमोनियाँ में मालकोस और मल्‍हार सुनकर स्‍वर्ग पधारिये। मैं जान-बचाकर भगा तो रास्‍ते में वैज्ञानिक जी मिल गये, ये सदा से प्रयोगधर्मी है, कहने लगे मैं चूहों, खरगोशों और बन्‍दरों पर शास्‍त्रीय संगीत के प्रयोग कर रहा हूँ, देखिये, उन चूहों के चेम्‍बर में रविशंकर का सितार बज रहा है। खरगोश किस शान से बिसमिल्‍लाह खाँ की शहनाई सुन रहे हैं और बन्‍दर तो बेगम अख्‍तर की गजल के दीवाने हैं। मेरे प्रयोगों को प्रकाशित होने दीजिये, और फिर देखिये दुनिया में तहलका मच जायेगा और․․․․․․․․․․․․․फिर शायद कोई पुरस्‍कार मिल जाये हं․․․․․․․․․․․․․․․․․․अहं․․․․․․․․․․․․․․․․․․․अह․․․․․․․․․․․․․

मैं फिर भागा और इस बार पहुँचा एक फकीर के पास। ‘‘बच्‍चा तुम शास्‍त्रीय संगीत पर चिन्‍तन करता है, अरे पहले जरा हमारे लिये चाय पानी और हुक्‍के की चरस पर चिन्‍तन कर, फिर देख कैसा नवनीत निकलता है जैसे राग बैराग बज रहा हो। राग दरबारी कब से बज रहा है, है कोई माई का लाल इसे बन्‍द करने वाला। अतः हे बच्‍चा जा और चरस ला।''

बच्‍चा बेचारा फिर भागा भागकर एक महिला से मिला और पूछ बैठा शास्‍त्रीय संगीत के बारे में आपका क्‍या खयाल है। तुम नहीं जानते यहाँ घर में रोज शास्‍त्रीय संगीत बजता है। सोना हराम है। पड़ौसी है या आफत मैं पुलिस में रपट लिखाने जा रही हूँ, तुम भी साथ चलो। पुलिस के नाम से ही मुझ गरीब की सिट्‌टी-पिट्‌टी गुम हो गयी। अतः लौटकर बुद्धू घर को आये। रास्‍ते में कवि जी मिले।

‘‘अरे भाई राग भैरवी में गाता।

वहीं कवि कहलाता।''

जाओ ओर इसे शोध-प्रबन्‍ध में छपा लो।

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यशवन्‍त कोठारी,

86, लक्ष्‍मी नगर,,

ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002

फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

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