रविवार, 3 अप्रैल 2011

लक्ष्‍मीकांत की कहानी - नोनी

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ठीक साढ़े नौ बजे जब मैं अपने सरकारी बंगले से दफ़्‍तर के लिए निकला, सचमुच मैं नोनी में ही उलझा हुआ था. मैं स्‍वयं से ही अपने मन की उदासी को छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगा. हर पढ़े-लिखे इंसान की तरह मैंने भी यह भ्रम पाल लिया था कि मैं बुद्धिजीवी हूँ और मुझे भावनाओं में नहीं बहना चाहिए. और, शायद ही कोई बुद्धिजीवी इस बात से असहमत हो कि वर्तमान दौर में अधिक से अधिक व्‍यावहारिक होकर ही सफल हुआ जा सकता है. सफलता से मेरा आशय हमेशा ही भौतिक सफलता से रहा है.

नोनी के ख्‍़ायालों में खोया हुआ मैं कब तहसील के मेन गेट पर पहुँच गया, मुझे पता ही नहीं चला. पता तब चला जब मेरा अर्दली ब्रीफकेस और वाटर बैग लेने के लिए मेरी तरफ लपका.

आरामदेह कुर्सी पर बैठा हुआ मैं बार-बार कोशिश कर रहा हूँ कि उसे किसी तरह से अपने दिमाग से निकाल कर कहीं दूर झटक दूँ. लेकिन यह संभव नहीं हो पा रहा है. मेरे सामने पड़े टेबल पर फाइलें करीने से रक्‍खी हुई हैं, जिनका निस्‍तारण मुझे ही करना है.आज मैं समय से कुछ पहले ही दफ़्‍तर में आ गया था. घर से निकलते समय सोचा था कि दिन भर दफ़्‍तर में बैठ कर पेंडिंग मामलों का निस्‍तारण करूंगा, कहीं दौरे पर नहीं जाऊंगा. लेकिन लगभग एक घंटा गुजर जाने के बावजूद मैनें सोचने के सिवा कुछ भी नहीं किया था. अचानक लगा, जैसे वह मेरे सामने आकर बुत की तरह चुपचाप खड़ी हो गयी है और मुझे करुणा भरी दृष्‍टि से निहार रही है. वह प्रत्‍यक्ष न होते हुए भी बार-बार आभासित हो रही है.

आज सुबह नोनी चली गयी थी. बल्‍कि, यह कहना शायद अधिक ठीक रहेगा कि उसे चलता कर दिया गया था. स्‍वयं भी यह बात मैं ठीक से नहीं समझ पा रहा हूँ कि आखिर मैं नोनी में इतना क्‍यों उलझ रहा हूँ. ज्ञानी जन कहते हैं कि कुछ बातें बुद्धि से परे होती हैं.नोनी क्‍या लगती है मेरी ? उससे मेरा क्‍या रिश्‍ता है ? उसके जाने से मेरा दिल इतना व्‍यथित क्‍यों है ? मेरी आँखें बार-बार क्‍यों सजल हो रही हैं ? मैं नोनी को लेकर इतना भावुक एवं बेचैन क्‍यों हो रहा हूँ ? बार-बार मुझे ऐसा क्‍यों लग रहा है जैसे अभी नोनी झम्‍म से मेरे सामने प्रकट हो जायेगी ? न जाने कितने यक्ष प्रश्‍न मेरे मस्‍तिष्‍क में कौंध रहे हैं. जीवन में बहुत से लोग मिलते-बिछुड़ते रहते हैं. आज की भाग-दौड़ की ज़िन्‍दगी में कौन सबको भावनाओं की डोर से बांध कर ढोता फिरता है.

बड़े बाबू बहुत ही अदब के साथ टेबल के ठीक सामने आ कर खड़े हो गये हैं.उनके हाथ में कोई फाइल है.मैं उन्‍हें देखते हुए भी नहीं देख रहा हूँ.अपनी उपस्‍थिति दर्ज कराने के लिए ही शायद वे कहते हैं,-‘‘ इस फाइल को देख लीजिए सर! ‘अर्जेंट' है. आज ही ‘स्‍टेटमेंट' भेजना है.'' मैं उन्‍हें गौर से देखता हूँ जैसे किसी अजनबी को देख रहा हूँ.

‘‘ ठीक है...'' मेरे मुँह से अनायास ही निकला.वे फाइल टेबल पर रख कर चले गये.

‘‘ अर्जेंट है तो देखना तो पड़ेगा ही...'' मैंने मन ही मन सोचा. मैं फाइल देखने लगा. कुछ देर तक दिमागी घोड़े दौड़ाता रहा, माथा-पच्‍ची किया. कॉल-बेल का स्‍वीच दबा दिया. चपरासी झट से केबिन में दाखिल होकर आदेश की प्रतीक्षा में मेरे सामने खड़ा हो गया. उससे स्‍टेनो को बुलवाकर ‘डिक्‍टेशन' दिया. कुछ देर बाद स्‍टेनो मैटर टाइप करके लाया. निर्धारित स्‍थान पर हस्‍ताक्षर करने के बाद मैंने उसे ‘डिस्‍पैच' करने के लिए प्रेषण लिपिक के पास भेजवा दिया. सब कुछ जैसे मशीनी अंदाज़ में होता चला गया. मैं फिर खाली-खाली महसूस करने लगता हूँ, लगता है जैसे मेरे इर्द-गिर्द घनी उदासी पसरी हुई हो...

मैं सोचता हूँ, अन्‍य फाइलों को निबटाना शुरू करूँ इसके पूर्व मुझे एक बार बॉथ रूम तक हो आना चाहिए. मैं ऐसा ही करता हूँ. फिर जब दुबारा कुर्सी पर बैठता हूँ तो वह पुनः मेरे विचारों में आ धमकती है. ‘‘ क्‍या नोनी अब कभी वापस नहीं आएगी ? वह फिर मुझसे कभी नहीं मिलेगी ? '' मैं अपने-आप से ही सवाल करने लगता हूँू. लेकिन क्‍या यह जरूरी है कि जब कभी मैं दो-चार पल के लिए खाली रहूँ तो वह अपनी अप्रत्‍यक्ष दृष्‍टि से मुझे घूरती रहे ? आिख्‍़ार वह होती कौन है मुझे इस तरह उलझाने और परेशान करने वाली ?...

वैसे तो मैं उ0प्र0 के बलिया जनपद का मूल निवासी हूँ. लेकिन लगभग दस साल पहले जब छत्‍तीसगढ़ राज्‍य भी वर्तमान मध्‍य प्रदेश का ही एक हिस्‍सा था,लोक सेवा आयोग से मेरा चयन नायब तहसीलदार के पद पर हुआ था. वर्तमान में मैं तहसीलदार के पद पर कार्यरत हूँ. हर दूसरे-तीसरे वर्ष मेरा स्‍थानान्‍तरण होता ही रहता है. कभी-कभी कुछ पहले भी हो जाता है.

लगभग चार माह पहले मैं स्‍थानान्‍तरित होकर बिलासपुर से अंबिकापुर आया था. यह स्‍थानान्‍तरण मेरी धर्मपत्‍नी को बहुत खला था. किसी शुभचिन्‍तक पड़ोसी महिला द्वारा उन्‍हें अवगत कराया गया था कि बिलासपुर की तुलना में अंबिकापुर बहुत छोटा एवं पिछड़ा हुआ शहर है, जहाँ पर न ही कोई ढंग का होटल है और न ही ब्‍यूटी पार्लर...यहाँ तक कि अंबिकापुर में कोई कायदे का स्‍कूल-कालेज भी नहीं है जहाँ बच्‍चों को अच्‍छी तालीम दिलाई जा सके.मेरा अपना मानना है कि इस दुनिया की बहुत-सी बातें मनगढ़न्‍त एवं असत्‍य होती हैं. फिर भी श्रीमती जीे ने सारी बातों को सच मानकर चिड़चिड़ाना शुरू कर दिया था. इस तरह शुरूआत ही कुछ खराब हुई थी.

मैने दूसरे दिन ही अंबिकापुर आकर कार्य भार ग्रहण कर लिया. एक हफ़्‍ते के अंदर ही अपने लिए आवंटित सरकारी आवास में सपरिवार शिफ्‍ट भी हो गया.मेरे परिवार में पत्‍नी के अलावा मेरी एक दस साल की बेटी भी है. वह पाँचवीं कक्षा में पढ़ती है. अपनी माँ की तरह वह भी जुबान की काफी तेज और तुनकमिज़ाज़ है.

लेकिन श्रीमती जी को जिस समस्‍या से सबसे पहले जूझना पड़ा वह झाड़ू-पोंछा एवं धुलाई-सफाई से संबन्‍धित थी.इन कामों के लिए एक काम वाली बाई का रखा जाना निहायत जरूरी था. श्रीमती जी ने युद्ध स्‍तर पर इसके लिए प्रयास करना शुरू कर दिया था.लेकिन दुर्भाग्‍य से सफलता नहीं मिल पा रही थी. श्रीमती जी की चिड़चिड़ाहट दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही थी.

जबकि उसका नाम नोनी नहीं है,फिर भी हम लोग उसे नोनी ही कहते हैं. मेरे पड़ोस में ही एक सिविल जज साहब भी सपरिवार रहते हैं.प्रायः रोज ही ‘मार्निंग वॉक' के वक़्‍त उनसे मेरी मुलाकात होती है.निहायत ही सज्‍जन एवं मिलनसार व्‍यक्‍ति हैं. मेरी पत्‍नी का भी उनके यहाँ आने-जाने का सिलसिला शुरू हुआ.उनकी पत्‍नी से मेरी श्रीमती जी का सहेली जैसा रिश्‍ता बन गया था. पहले नोनी उन्‍हीं के यहाँ काम करती थी.यह तो मेरी पत्‍नी का चतुरपन था जिसके चलते नोनी मेरे यहाँ काम करने लगी थी.

इसी दौरान दोनों सहेलियों में एक अलिखित समझौता हुआ कि नोनी जज साहब के घर का काम निबटाने के बाद मेरे यहाँ भी कुछ घरेलू काम कर दिया करेगी. इस प्रकार नोनी अभी भी उनके यहाँ ‘फुल-टाइमर' थी.वहाँ से उसे अब भी पहले की तरह ही महीने में पाँच सौ रूपया मिलना था.अलग से मेरी श्रीमती जी को भी मेहनताने के तौर पर नोनी को सौ रूपये देने थे.नोनी की माँ भी मान गयी थी.लेकिन इतने भर से श्रीमती जी को भला कहाँ चैन था ? ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि जब जज साहब के घर कुछ अधिक काम निकल आता, नोनी मेरे यहाँ काम करने ही नहीं आती. तब श्रीमती जी का गुस्‍सा सातवें आसमान पर होता. वे अक्‍सर घर का काम निबटाते हुए बड़बड़ाने लगतीं,-‘‘ दिन भर बेचारी को कोल्‍हू के बैल की तरह पेरती रहती हैं.नन्‍हीं सी जान बेचारी नोनी...उनके घर से छुट्‌टी मिले तब न यहाँ आए... आग लगे इस जगह को, यहाँ पर एक ढंग की काम करने वाली बाई तक तो मिलती नहीं है.और आप भी हैं कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं...''

भला मैं इस मामले में क्‍या करता ?...

एक दिन अचानक मेरी बेटी ने अपनी माँ से एक अनपेक्षित-सा सवाल कर दिया-‘‘ मम्‍मी! नेहा कह रही थी कि उसके पापा मेरे पापा से बड़े हैं...'' नेहा जज साहब की बेटी है और मेरी बेटी के साथ पढ़ती है.श्रीमती जी ने बेटी को आग्‍नेय दृष्‍टि से देखा. उसके सवाल का कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘ अच्‍छा मम्‍मी! तहसीलदार और जज में कौन बड़ा होता है? '' मेरी बेटी ने जैसे कुरेदते हुए फिर पूछा.

‘‘ तहसीलदार बड़ा होता है और कौन...'' श्रीमती जी ने झल्‍लाते हुए कहा.

‘‘ तहसीलदार पूरे तहसील का मालिक होता है. देखती नहीं हो क्‍या कि जज साहब रोज रिक्‍शे पर बैठ कर कोर्ट जाते हैं. लेकिन तुम्‍हारे पापा तो सरकारी जीप से जाते हैं...'' इस तरह मेरी बेटी की जिज्ञासा शान्‍त हुई. मैं ड्राइंग रूम में पेपर पढ़ता हुआ कुढ़ कर रह गया. सोचा,-‘‘ ये औरतें भी कैसे-कैसे कुतर्क गढ़ लेती हैं...''

आखिरकार एक दिन श्रीमती जी ने नोनी की माँ को चुपके से बुलवा कर कुछ बात किया. रात में सोते समय उन्‍होंने उत्‍साह से भर कर मुझे सूचित किया,-‘‘ अब कल से नोनी केवल हमारे यहाँ काम करेगी. छः सौ रूपये महीने पर...'' साथ ही मेरी पत्‍नी ने मुझे यह भी समझाया कि उस मुटल्‍ली से इस बारे में भूल कर भी कोई चर्चा करने की जरूरत नहीं है. मुटल्‍ली से उनका आशय जज साहब की पत्‍नी तथा उनकी तथाकथित सहेली से था. मुझे मेरी पत्‍नी काफी चालाक और खतरनाक किस्‍म की औरत लगी.

‘‘ तुम भी ये क्‍या जोड़-तोड़ करती रहती हो ? '' मैने श्रीमती जी को समझाने की कोशिश की.

‘‘ ये घरेलू मामले हैं...आपको इसमें कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है. बस आप अपना तहसील संभालिए...‘' मेरी पत्‍नी ने मुझे हड़काते हुए कहा.

‘‘ ठीक है, अब तुम सो जाओ!...मुझे भी नींद आ रही है.'' मैने बिस्‍तर पर करवट बदलते हुए कहा.

अब नोनी को मेरे यहाँ ‘‘फुल-टाइमर'' होना था.

श्रीमती जी ने नोनी को काफी ठोंक-बजाकर काम पर रक्‍खा था. वह लगभग नौ-दस साल की एक आदिवासी लड़की थी. आम आदिवासी लड़कियों जैसी ही आबनूसी श्‍याम वर्ण एवं साधारण कद-काठी की. बेहद दुबली-पतली मरियल-सी लड़की... कुछ-कुछ निग्रो जैसी, सपाट चेहरे वाली.

सारे घर की सफाई-दफाई, झाडू़-पोंछा नोनी के ही जिम्‍मे था. जब कभी श्रीमती जी का ‘मूड' ठीक नहीं रहता, नोनी काम चलाऊं खाना भी बना देती थी.

एक दिन जब नोनी खाना बना रही थी,लगभग उसी की उम्र की अपनी पुत्री को छेड़ते हुए मैने कहा,-‘‘ देखो ! नोनी कितना काम करती है. इसे तो खाना बनाना भी आता है. और एक तुम हो कि एक कप चाय भी नहीं बना सकती हो.''

‘‘ मैं नोनी की तरह कोई नौकर थोड़े ही हूँ. '' मेरी पुत्री ने तपाक से कहा. उसका जवाब सुनकर मैं कुछ खास हैरान नहीं हुआ. बेटी की तुलना नोनी से करना श्रीमती जी को भी अच्‍छा नहीं लगा. रात के एकान्‍त में उन्‍होंने मुझसे कहा,-‘‘ आपको इस तरह नौकर-चाकर के सामने यह सब नहीं कहना चाहिए. इससे बच्‍चों के दिमाग पर बुरा असर पड़ता है.'' लेकिन किस तरह ? यह उन्‍होंने नहीं बताया और न ही मैंने पूछा ही.

उस दिन नये वर्ष का पहला दिन था. सुबह काफी देर तक लोग मुझे नव वर्ष की शुभ कामनाएं देने आते रहे. कुछ लोगों ने तो फोन करके औपचारिकता पूरी की. कुछ फुर्सत मिली तो मैं बाहर लॉन में जाकर चहलकदमी करने लगा.उस वक्‍त नोनी सारी दुनिया से बेखबर लॉन में ही लगे एक नलके में पाइप जोड़ कर पौधों को पानी पिला रही थी. मुझे यह देखकर काफी आश्‍चर्य होता कि नोनी लगभग अपने से आधे वजन की भरी हुई दो बाल्‍टियों को अपने दुबले-पतले दोनों हाथों से लटकाये हुए चल कैसे लेती है ?

न जाने अचानक मुझे क्‍या सूझा ?.. मैंने नलके के पास खड़ी नोनी के करीब जाकर मुस्‍कुराते हुए धीरे से कहा,-‘‘ नया साल मुबारक हो!.. '' वह आँखें फाड़कर चित्रलिखित-सी एकटक मुझे देखने लगी. मैं कुछ झेंप गया. चुपचाप घर के अन्‍दर चला गया. ड्राइंगरूम में मेरी बेटी एक कॉपी में किसी जानवर का चित्र बना रही थी. मुझे हमेशा यही लगता रहता है जैसे मेरी बेटी पढ़ती कम है, जानवरों के चित्र अधिक बनाती है.

मैनें बेटी से कहा,-‘‘ बहुत अच्‍छा चित्र है, बहुत ही अच्‍छा...किसका है ? '' उसने मुस्‍कुराते हुए मुझे देखा और उत्‍साह से भरकर बोली-‘‘ कुत्‍ता है... '' मैंने कुछ देर तक चुप रहने के बाद बेटी से पूछा,-‘‘ मैं कल जो चार चॉकलेट लाया था, सब खा लिया था या एकाध बची भी है ? ''

पहले तो उसने मुझे अजीब दृष्‍टि से देखा फिर विस्‍मय के साथ बोली,-

‘‘ एक बची है, क्‍यों...? ''

‘‘ क्‍या तुम मुझे वह चॉकलेट दोगी ? '' मैने याचनापूर्ण लहजे में कहा.कभी-कभी खुद खरीद कर अपने बच्‍चों को दी गई कोई चीज उनसे लेने के लिए भी कितनी खुशामद करनी पड़ती है.

‘‘ क्‍या आप खायेंगे ? '' उसने कौतूहल से पूछा.

‘‘ नहीं, नोनी को देना है. तुम्‍हारे लिए और ला दूँगा. '' मैं सीधे मुख्‍य विषय पर आ गया.कुछ देर तक ना-नुकुर करने के बाद उसने चॉकलेट मेरी हथेली पर रख दिया. मैं झट से घर से बाहर आ गया. नोनी लॉन के एक कोने में आराम की मुद्रा में बैठकर कहीं खोई हुई थी. मैने चॉकलेट उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा,-‘‘ ले! इसे खा लेना. '' कुछ देर तक ठिठकने के बाद उसने चॉकलेट ले लिया.

‘‘ साहब ! साढ़े पाँच बज गये हैं.'' बड़े बाबू ने केबिन में आकर कहा तो जैसे मैं अपने-आप में लौटा. इस बीच किसी ने कोई व्‍यवधान नहीं डाला था. अन्‍य सरकारी दफ्‍तरों की तरह मेरा दफ्‍तर भी पाँच बजे बन्‍द हो जाता है. लेकिन जब तक बॉस बैठा है, कोई कैसे जा सकता है ?

‘‘ ठीक है, अब मैं भी चलता हूँ, ये फाइलें मैं कल देख लूँगा... '' मैंने टेबल पर पड़ी हुई फाइलों की तरफ देखते हुए कहा.बड़े बाबू सारी फाइलें समेट कर लेते गये. मैं भी घर जाने के लिए केबिन से बाहर आ गया.

बातों ही बातों में एक दिन श्रीमती जी ने मुझे बताया था कि नोनी उसका नाम नहीं है. यहाँ आदिवासी लड़कियों को ‘नोनी' कहते हैं, उसका नाम गीता है. तब मुझे उसका नाम बहुत सार्थक लगा था. कारण चाहे जो भी हो, नोनी बहुत कम बोलती थी. वह हमेशा चुपचाप किसी न किसी काम में लगी रहती थी.

शुरू-शुरू में तो श्रीमती जी नोनी से काफी संतुष्‍ट रहीं. दो-चार बार उसकी खूब तारीफ भी हुई.लेकिन यह स्‍थिति अधिक दिनों तक नहीं रह सकी.शनैः-शनैः श्रीमती जी को नोनी में तमाम कमियां-कमजोरियां नज़र आने लगीं. एक रात सोते समय उन्‍होंने मुझसे कहा,- ‘‘ नोनी बहुत ही भुलक्‍कड़ लड़की है. सफाई-वफाई भी ढंग से नहीं करती है.'' शायद उस समय मुझे नींद आ रही थी. मैने कुछ खास तवज्‍जो नहीं दिया. दरअसल मैं अब अपनी पत्‍नी से कतराने लगा था. मैं उसकी बातों का जवाब बस ‘हाँ-हूँ' में देने लगा था.हमारी बहुत कम बातचीत होती थी.

सायकिल वाले ग्‍वाले का दूध काफी पतला होता था.एक दिन श्रीमती जी ने उसे भी काफी डांटा-डपटा.चोर-उचक्‍का तक कह डाला. उससे दूध लेना बन्‍द कर दिया.मुहल्‍ले में ही काम करने वाली एक जवान काम वाली बाई एक रूपया रोज के मेहनताना के आधार पर डेरी से ताजा दूध लाकर पहुँचाने लगी.

नोनी में एक कमी और भी आ गयी थी. कभी-कभी वह बिना किसी पूर्व सूचना के एक-दो दिन के लिए गायब हो जाती थी. अब ऐसी स्‍थिति में तो जैसे श्रीमती जी पर पहाड़ ही टूट पड़ता था. घर का सारा काम उन्‍हें ही करना पड़ता था. ऐसे में उनकी झुंझलाहट एवं बड़बड़ाहट तो स्‍वाभाविक बात थी.नोनी के प्रति उनकी खीज दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रहा थी.

और, उस दिन भी, जिस दिन श्रीमती जी ने मेरे नाम पर तीज का व्रत रखा था, नोनी नहीं आई.

दूसरे दिन जब नोनी काम करने आई, अजीब ढंग से मुंह बना कर श्रीमती जी ने डपटते हुए उससे पूछा,-‘‘ क्‍यों रे ! तूँ अपने मन की हो गयी है क्‍या ? कल क्‍यों नहीं आई ? इस तरह कैसे काम चलेगा ? '' नोनी को न कुछ बोलना था और न ही वह कुछ बोली. बुत की तरह खड़ी होकर भौंचक-सी उन्‍हें देखने लगी. उसका कुछ जवाब न देना जैसे श्रीमती जी को अपमानजनक लगा. उन्‍होंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया,-‘‘ कैसी गूँगी बन जाती है...जैसे मुंह में जुबान ही न हो.बनी हुई बेवकूफ है.इससे तो कुछ कहना ही बेकार है...''

मुझे नोनी से कुछ कहने-सुनने का अवसर बहुत ही कम आता था. कभी उसे डांटा-डपटा भी नहीं था. इसके लिए तो श्रीमती जी ही काफी थीं. हो सकता है कि यह मेरा भ्रम रहा हो लेकिन कभी-कभी लगता जैसे नोनी बिलकुल मेरे जैसी है.कम बकाया वसूली के नाम पर जब कभी मुझे डी0एम0 की डांट खानी पड़ती है, मेरा चेहरा भी डांट खाई नोनी के चेहरे जैसा हो जाता है.

एक दिन अचानक श्रीमती जी के मायके से साले द्वारा बनवाये गये नये मकान के गृह-प्रवेश कार्यक्रम में शामिल होने के लिए निमंत्रण-पत्र प्राप्‍त हुआ. अब पत्‍नियाँ तो ऐसे मौकों की तलाश में ही रहती हैं, मेरी मर्जी जाने बगैर श्रीमती जी झट से जाने के लिए तैयार हो गयीं. अब इस तरह के किसी समारोह में शामिल होने के लिए अवकाश लेना मुझे निहायत गैर जरूरी लगा. अधिक टोका-टाकी करना भी उचित नहीं समझा. बीच का रास्‍ता निकालना पड़ा. तय हुआ कि श्रीमती जी पुत्री को साथ लेकर स्‍वंय मायके चली जायेंगी. बिना कोई विलम्‍ब किये, श्रीमती जी मायके चली गयीं और जाते-जाते मेरे साथ-साथ नोनी को भी काम करवाने तथा करने के संबन्‍ध में ढेर सारी हिदायतें एवं नसीहतें भी देती गयीं.

दूसरे दिन अभी मैं बिस्‍तर पर ही था कि किर्‌र-किर्‌र कर के ‘काल-बेल' ने मुझे चैतन्‍य कर दिया. उस समय सवा सात बज रहे थे. मैने बिस्‍तर से उठ कर बेसिन में जल्‍दी से चेहरा धोकर मेन गेट खोला.सामने नोनी खड़ी थी. वह मेरे साथ ही अन्‍दर आ गयी.

‘‘ तुम सफाई-वफाई करो, मैं तब तक ‘फ्रेश' हो लेता हूँ.' कहते हुए मैं ‘टॉयलेट' में घुस गया.लगभग पौने आठ बजे तक नहा-धोकर मैं पूरी तरह से तैयार हो चुका था.नोनी बेडरूम में पोछा लगा रही थी. नहाने के तुरन्‍त मैं चाय पीता हूँ. सोचा चाय नोनी से ही बनवा लेता हूँ.

‘‘ चाय तो तुम बना लेती हो न! '' मैने नोनी से पूछा.नोनी ने सहमति में ऊपर-नीचे सिर किया.उसने पोछा कमरे में ही छोड़कर बेसिन में हाथ धोया और झट से कीचन में चली गयी.

कुछ देर बाद वह कप को चाय से लबालब भर कर लाई और मेरे सामने पड़े टेबिल पर रख दिया. पहली ही चुस्‍की में पता चल गया कि चाय में शक्‍कर नहीं है.

‘‘ लगता है तुम चाय में चीनी डालना भूल गयी हो. '' मैने नोनी की तरफ देखते हुए कहा. नोनी ने कोई जवाब नहीं दिया. एक टक मुझे देखने लगी.उसके चेहरे पर कुछ ऐसा भाव था जैसे उसने चाय में शक्‍कर न डाल कर कोई अच्‍छा काम किया हो.

‘‘ लेकिन चाय में शक्‍कर तो पड़ती है न!... '' मैंने कुढ़ते हुए कहा. फिर किचन में जाकर अपनी सुविधानुसार चाय के कप में शक्‍कर मिलाया.चाय में शक्‍कर मिलाते हुए कुछ चाय कप के बाहर भी छलक गयी.

‘‘ तुमने अपने लिए चाय नहीं बनाया.? '' मैने नोनी से पूछा.

नोनी ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘ अपने लिए भी चाय बना लिया करो!..वैसे भी इतना भर कर चाय नहीं देते हैं. एक कप में ही दो कप हो जाता...'' मैंने नोनी को समझाते हुए कहा.

नोनी ने बिना कहे ही मेरे जूतों पर भी ब्रश मार दिया. मंगलवार होने के कारण उस दिन मेरा व्रत था. अतः खाना खाने का कोई प्रश्‍न ही नहीं था. मैं सोफे पर पसरा हुआ टी0वी0 देखने लगा और नोनी किचन में काम करती रही. तभी बिजली चली गयी. टी0वी0 बन्‍द हो गयी. नोनी किचन के बाहर फर्श पर बैठी हुई कहीं खोई हुई थी.

‘‘ सब काम हो गया ? '' मैंने नोनी से पूछा. वह फिर मुझे एकटक देखने लगी. कहा कुछ भी नहीं.

‘‘ अब तुम जाओ, इस टाइम खाना नहीं बनेगा.शाम को समय से आ जाना! '' मैने नोनी से कहा तो वह झट से चली गयी. अब मैं तहसील जाने की तैयारी करने लगा.

शाम को अॉफिस से लौटते हुए मैंने फल की दुकान के पास गाड़ी रुकवा कर फल खरीदा.

‘‘ मेनगेट '' का ताला खोलकर मैं आवास में दाखिल हुआ तो किचन से कुछ आवाज सी आती हुई महसूस हुई. कीचन का दरवाजा खोला तो देखा नल की टोंटी से पूरे वेग के साथ पानी गिर रहा था. मैने लपक कर नल बन्‍द कर दिया. सुबह नोनी नल बन्‍द करना भूल गयी थी. फिर एक सरसरी दृष्‍टि से मैंने पूरे किचन का मुआयना किया. एक टूटा हुआ कप फर्श पर औंधा पड़ा हुआ था. एक कोने में आलू-प्‍याज के छिलके छितराये हुए थे. खुले हुए ‘हॉट-पॉट' में कुछ बासी रोटियां थी,ं जिन पर चीटियां रेंग रही थीं.एक खुली हुई कटोरी में पड़ी सब्‍जी पर मक्‍खियां भिनभिना रही थीं. निश्‍चित रूप से वह एक दिन पहले का बचा हुआ खाना था. मेरा ‘मूड' खराब हो गया. किचन से निकलते हुए मैने सोचा,-‘‘ आने दो नोनी को ! आज मैं उसे खूब डाटूंगा! ''

फिर मैंने बेड रूम खोला. एक कोने में स्‍थित टी0वी0 अपने-आप चल रही थी. पास ही टेबल पर चाय का वह जूठा कप पड़ा था जिसमें सुबह मैने चाय पिया था. मैं कप को किचन में ले जाकर रखना भूल गया था.

तभी कॉल बेल बजी. मैंने मेन गेट खोला, सामने नोनी ही खड़ी थी. वह मेरे पीछे चलती हुई किचन में चली गयी. वैसे तब तक नोनी के प्रति मेरा गुस्‍सा काफी हद तक शान्‍त हो चुका था. बस औपचारिकता ही निभानी थी. मैंने नोनी को तलब किया. वह निर्विकार भाव से मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी. कुछ देर तक सोचने के बाद मैने अपने चेहरे पर गम्‍भीरता ओढ़ते हुए कहा,-‘‘ तुमने किचन का क्‍या हाल बना रक्‍खा है ? सफाई पर खास ध्‍यान दिया करो.कप टूट गया था तो बाहर फेंक आती.खाना बचता है तो ‘डस्‍टबिन' में डाल दिया करो.पूरे किचन को कूड़ाघर बना दिया है. इसीलिए तुम्‍हारी आंटी जी तुम्‍हें इतना डांटती रहती हैं...''

नोनी चुपचाप खड़ी रही.

‘‘ तुम कुछ बोलती क्‍यों नहीं ? '' मैंने कुछ तेज आवाज में कहा तो वह सकपका गयी.कुछ ठिठक कर फुस्‍स से हंसते हुए बोली,- ‘‘ बिसर गे रहिस.''

‘‘ ठीक है आइंदा से ध्‍यान रखना...जाओ! चाय बना कर दे दो! '' मैंने नोनी से कहा.

नोनी चुपचाप चली गयी. मैं ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ कर चाय का इंतजार करने लगा.

काफी देर तक प्रतीक्षा करने के बाद भी जब नोनी चाय लेकर नहीं आयी तो मैं झुंझलाते हुए किचन की तरफ गया. किचन के बगल में ही बॉथरूम था.वह बॉथरूम में बैठ कर कपड़े पटक रही थी जिनसे ढेर सारा काला-मटमैला झाग निकलकर बॉथरूम में जमा हो रहा था.

‘‘ यह क्‍या लेकर बैठ गयी हो तुम ? यह सब तो बाद में भी कर सकती हो. पहले चाय बनाकर दे दो!...''

कुछ देर बाद नोनी ने चाय का कप टेबल पर लाकर रख दिया. मैं चाय पीने लगा. थोड़ी देर बाद नोनी फिर मेरे सामने खड़ी हो गयी. मैंने उसे आश्‍चर्य से देखा. उसने पाँच सौ के चार नोट टेबल पर रख दिया और चली गयी.जैसे वे नोट न होकर रद्‌दी के टुकड़े हों. ये नोट भूल वश उस पैंट की जेब में ही रह गये थे, जिसे नोनी धोने जा रही थी. उस शाम नोनी वही पुराना फ्रॉक पहने हुई थी जिसे मैंने लगभग साल भर पहले बड़े चाव से अपनी बेटी के लिए खरीदा था. वह ड्रेस मेरी बेटी को एकदम पसंद नहीं आया था. जब कभी श्रीमती जी वह फ्रॉक उसे पहनाने की कोशिश करतीं, वह नाक-भौं सिकोड़ने लगती.श्रीमती जी ने दया भाव से भरकर एक दिन उस फ्रॉक को नोनी को दे दिया था. नोनी के श्‍याम वर्ण तन पर वह पिंक कलर का फ्रॉक बहुत फब रहा था.नोनी मुझे बहुत सुन्‍दर लगी.

मुझे लगने लगा था जैसे नोनी में काफी सुधार होता जा रहा है.वह हर काम पूरे लगन एवं उत्‍साह के साथ करने लगी थी. बस कभी-कभी उसे थोड़ा-बहुत कहना-समझाना भर पड़ता था. वह बिना कहे ही मेरे जूतों पर ब्रश भी मार देती थी.बदले में मैं उसे कभी-कभी स्‍नेहपूर्ण दृष्‍टि से देख भर लेता था.नोनी बहुत कम बोलती थी और जो कुछ बोलती थी, मैं केवल उसका भावार्थ ही ग्रहण कर पाता था. इतने वर्षों तक इस इलाके में सेवा करने के बावजूद मैं छत्‍तीसगढ़ी अथवा सरगुजिया नहीं सीख पाया था.

उस दिन दूध लाने वाली औरत दूध लेकर नहीं आयी थी. नोनी घर के सारे जरूरी काम निपटाने के बाद चली गयी. जैसे ही मैं तहसील जाने के लिए बाहर निकल कर मेनगेट पर ताला लगाने लगा, दूध लाने वाली औरत दूध लेकर आ गयी. उसे देखते ही मैं झल्‍ला गया,-‘‘ तुम अब दूध ले के आ रही हो! समय से लाया करो! एक दिन बिना दूध के भी काम चल जाएगा...''

‘‘ जरूरी काम में फंस गयी थी साहब! इसी लिए आज दूध लाने में देरी हो गयी.'' उस औरत ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

‘' लेकिन नोनी भी तो जा चुकी है. अब इसे गरम कौन करेगा ? ''

‘‘ मैं कर देती हूँ साहब जी! बस पाँच मिनट लगेगा.''

‘‘ ठीक है जल्‍दी करो! मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है. '' कह कर मैं ड्राइंगरूम में जाकर सोफे पर बैठ गया. वह औरत किचन में जाकर दूध गरम करने लगी.

दूध गरम करने के बाद वह औरत मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी और बोली,-‘‘ दूध गरम करके भगोने में रख दिया है.''

‘‘ ठीक है.'' कह कर मैं बाहर निकलने के लिए उद्यत हुआ तो वह औरत फिर बोली,-‘‘ साहब जी! मैं आप से कुछ बात करना चाहती थी...''

‘‘ हाँ!...कहो!क्‍या कहना चाहती हो ?'' मैंने एक झटके से कहा.

‘‘ साहब! आप मुझे अपने यहाँ काम पर लगा लीजिए.मैं नोनी से लाख गुना अच्‍छा काम करूंगी, जैसा आप चाहेंगे.कभी भी शिकायत का कोई मौका नहीं दूँगी. मेरे दो छोटे-छोटे बच्‍चे हैं.मेरे मरद ने मुझे छोड़ दिया है. उसने दूसरी औरत रख लिया है.एक घर में काम कर के बच्‍चों को पालने में बहुत दिक्‍कत हो रही है. मैं हाई स्‍कूल पास हूँ.'' वह औरत एक सांस में इतनी सारी बातें बोल गयी.

‘‘ यह औरत कितनी बेधड़क है और इसका पति भी कैसा गधा है जो इतनी खूबसूरत पत्‍नी को छोड़ दिया.'' मैने मन में सोचा, फिर बोला,-‘‘ वैसे तो नोनी भी बहुत अच्‍छा काम करती है. बस थोड़ा बचपना भर है. तुम कोशिश करोगी तो कहीं न कहीं काम मिल ही जाएगा.''

मेरा जवाब सुन कर उसका चेहरा कुछ लटक गया.

‘‘ मैं अपने कुछ परिचितों से भी इस बारे में बात करूंगा. '' मैंने उस औरत को तसल्‍ली देते हुए कहा.

वह चुपचाप चली गयी.

लगभग एक हफ़्‍ते तक मुझे नोनी को जानने-सुनने एवं साथ ही उसे समझने का भी मौका मिला. वह रोज समय से आती रही. हर काम तल्‍लीन होकर करती और जब मुझे लगता कि सारे निर्धारित कार्य उसने कर लिया है तो मेरे इतना कहते ही कि ‘‘ अब तुम जाओ...! '' वह झट से चली जाती और जाते-जाते बेवकूफों की तरह फुस्‍स से हंसते हुए एक बार मेरी तरफ जरूर देख लेती. इस बीच मुझे कुछ कहने-सुनने अथवा डाँटने-डपटने का उसने कोई मौका नहीं दिया.

इस तरह एक सप्‍ताह बीत गया. श्रीमती जी बेटी के साथ मायके से वापस आ गयीं.

गाड़ी जब एक झटके के साथ रुकी तो मुझे भी एक हल्‍का-सा झटका लगा. गाड़ी से उतर कर घर के अन्‍दर दाखिल हुआ तो पाया कि श्रीमती जी सज-धज कर ड्राइंग-रूम में बैठी हुई हैं.

उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए कहा,-‘‘ मैं आप ही के आने का इंतजार कर रही थी.कुछ जरूरी सामान लेने हैं, मार्केट जा रही हूँ. बस थोड़ी ही देर में आ जाऊंगी.आज नई वाली बाई आयेगी तो चाय बनवाकर पी लीजिएगा. आती ही होगी.'' इतना कहकर वे फुर्‌र्र हो गयीं. मैं सोफे पर ही लगभग पसर-सा गया. मेरी बेटी शायद स्‍टडी-रूम में पढ़ रही थी अथवा घर के अन्‍दर ही कहीं खेल रही थी. आज नोनी को नहीं आना था. मैं नई बाई के आने की प्रतीक्षा करने लगा.

दो दिन पहले ! नोनी ने बिना कुछ बताये ही फिर नागा कर दिया था. श्रीमती जी ने झल्‍लाते हुए मुझसे कहा था,-‘‘ ये बाइयां भी कम हरामखोर नहीं होती हैं. सारी कला जानती हैं. अब तो मैंने भी फैसला कर लिया है कि दूध वाली बाई को लगा लूँगी. नोनी को निकाल बाहर करूंगी. कौन ढोये इस मलच्‍छिन को ? '' सुनकर मैं बाहर आकर लॉन में टहलने लगा था.

फिर कल सुबह जब नोनी आई तब श्रीमती जी तो जैसे उस पर टूट ही पड़ीं. उसे काफी देर तक डांटती-डपटती रहीं. ‘कामचोर',‘हरामखोर', ‘मुंहझौंसी'... जैसी कई गालियों से नोनी को नवाजने के बाद उन्‍होंने अपना दो टूक फैसला सुनाया,-‘‘ तू आज सारा काम निबटा ले !...फिर तेरा हिसाब-किताब कर देती हूँ. अब तुझे आने की कोई जरूरत नहीं है.'' न कोई स्‍पष्‍टीकरण, न ही कोई कारण बताओ नोटिस. नोनी ने कुछ नहीं कहा. लगभग बेजुबान-सी वह लड़की कहती भी तो क्‍या ? और कहती भी तो क्‍या फर्क पड़ जाता ?

मैंने कहीं पढ़ा था कि कभी-कभी आवश्‍यकता के चलते दया का निषेध होता है. वैसे भी यह पूरी तरह से श्रीमती जी के नियंत्रण में एक घरेलू मामला था. इस मामले में टांग अड़ाना मुझे तत्‍काल उचित नहीं लगा.जब नोनी अपने हिसाब के पैसे लेकर जाने लगी तो उसने बहुत ही मासूमियत के साथ मुझे देखा. उसके चेहरे पर हमेशा पसरा रहने वाला भोलापन उदासी की चादर से ढंका हुआ था. उसकी बेबस दृष्‍टि शूल-सी मेरे सीने में चुभ गयी. नोनी चुपचाप चली गयी.

श्रीमती जी की आशा के अनुरूप नोनी कल शाम को एवं आज सुबह नहीं आई. मैंने भी मान लिया कि अब नोनी वापस नहीं आयेगी. श्रीमती जी ने रो-धोकर किसी तरह घर का काम निबटाया.

इस बीच दूध पहुँचाने वाली औरत श्रीमती जी को पटाने में सफल हो चुकी थी. वही आज काम करने के लिए आने वाली थी.

‘‘ अब नोनी की जगह एक नई बाई ले लेगी. फिर नोनी की याद इस घर के साथ-साथ मेरे दिमाग से भी धीरे-धीरे मिट जायेगी.'' मैने सोचा. तभी कॉल बेल की आवाज से जैसे मैं थर्रा-सा गया. मन ही मन सोचा,-‘‘ लगता है नई बाई आ गयी है!... ''

मैंने सोफे से उठकर दरवाजा खोला तो हतप्रभ रह गया. सामने बेवकूफ-सी हंसती हुई नोनी खड़ी थी. कुछ देर तक ठिठकने के बाद मैंने पूरा दरवाजा खोलते हुए कहा,-‘‘ आ जाओ!..'' नोनी बिना कुछ बोले चुपचाप अन्‍दर चली गयी.

अभी मैंने दरवाजा बन्‍द ही किया था कि फिर कॉल बेल बजी. मैंने दरवाजा खोला तो देखा सामने वही दूध वाली औरत खड़ी थी.मुझे लगा जैसे वह सीधे ‘ब्‍यूटी पार्लर' से आ रही हो. उसके चेहरे पर पाउडर पुता हुआ था एवं ओंठ रंगे हुए थे. मुझे वह काफी भद्‌दी-सी लगी.वह शायद पान मसाला चबा रही थी. मैंने उसे आश्‍चर्य के साथ देखा तो हंसते हुए बोली,-‘‘ काम करने आई हूँ.''

‘‘ नोनी लौट आयी है. तुम जाओ! '' मैंने धीरे से कहा.उसने मुझे घूर कर देखा और कुछ भुनभुनाते हुए चली गयी. मैंने दरवाजा बन्‍द कर लिया.

अभी मैं सोफे पर बैठा ही था कि मेरी बेटी दौड़ते हुए अन्‍दर से आयी और हाँफते हुए बोली,-‘‘ पापा ! नोनी तो फिर आ गयी है. किचन में काम कर रही है.‘‘

‘‘ जब तक हम लोग यहाँ पर हैं, नोनी ही काम करेगी. तुम माँ-बेटी मिल कर उसे तंग मत किया करो!..'' मैने कुछ गंभीर होकर कहा. मेरी बेटी मुझे अजीब ढंग से घूरते हुए अन्‍दर चली गयी. सहसा मुझे लगा, जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो... (समाप्‍त)

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संपर्क: 14/260, इंदिरा नगर,लखनऊ.

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  1. वर्तमान स्थितियों का सुन्दर रेखांकन करती कहानी. प्रस्तुतकर्ता एवं रचनाकार दोनों को बधाई एवं नवसंवत्सर की शुभकामनाएं

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