बुधवार, 20 अप्रैल 2011

रघुवीर सहाय की कविताएँ

Image030 (Custom)

हँसो हँसो जल्दी हँसो

हँसो हँसो जल्दी हँसो

हँसो तुम पर निगाह रखो जा रही हे

हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट

पकड़ ली जायेगी और तुम मारे जाओगे

ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो

वरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहीं

और मारे जाओगे

 

हँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो

सब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त होकर

एक अपनापे की हँसी हँसते हो

जैसे सब हँसते है बोलने के बजाय

 

जितनी देर ऊँचा गोल गुंबद गूँजता रहे, उतनी देर

तुम बोल सकते हो अपने से

गूंजते थमते थमते फिर हँसना

क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फँसे

अन्त में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे

 

हँसो पर चुटकुलों से बचो

उनमें शब्द हैं

कहीं उनमें अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिये हों

 

बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो

ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे

और ऐसे मौकों पर हँसो

जो कि अनिवार्य हों

जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार

जहाँ कोई कुछ कर नहीं सकता

उस गरीब के सिवाय

और वह भी अक्सर हँसता है

 

हँसो हँसो जल्दी हँसो

इसके पहले कि वह चले जायें

उनसे हाथ मिलाते हुए

नजरें नीची किये

उनको याद दिलाते हुए हँसो

कि तुम कल भी हँसे थे

--

रामदास

चौड़ी सड़क गली पतली थी

दिन का समय घनी बदली थी

रामदास उस दिन उदास था

अंत समय आ गया पास था

उसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगी

 

धीरे धीरे चला अकेले

सोचा साथ किसी को ले ले

फिर रह गया सड़क पर सब थे

सभी मौन थे सभी निह्त्थे

सभी जानते थे यह उस दिन उसकी हत्या होगी

 

खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर

दोनों हाथ पेट पर रखकर

सधे कदम रख करके आये

लोग सिमट कर आँख गड़ाये

लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगी

 

निकल गली से तब हत्यारा

आया उसने नाम पुकारा

हाथ तौलकर चाकू मारा

छूटा लोहू का फव्वारा

कहा नहीं था उसने आखिर उसकी हत्या होगी

 

भीड़ ठेलकर लौट गया वह

मरा पड़ा है रामदास यह

देखो देखो बार बार कह

लोग निडर उस जगह खड़े रह

लगे बुलाने उन्हें जिन्हें संशय था हत्या होगी

---

पानी पानी

पानी पानी

बच्चा बच्चा

हिन्दुस्तानी

माँग रहा है

पानी पानी

 

जिसको पानी नही मिला है

वह धरती आजाद नहीं

उस पर हिन्दुस्तानी बसते हैं

पर वह आबाद नहीं

 

पानी पानी

बच्चा बच्चा

माँग रहा है

हिन्दुस्तानी

 

जो पानी के मालिक हैं

भारत पर उनका कब्जा है

जहाँ न दे पानी वाँ सूखा

जहाँ दें वहां सब्ज़ा है

 

अपना पानी

माँग रहा है

हिन्दुस्तानी

 

बरसों पानी को तरसाया

जीवन से लाचार किया

बरसों जनता की गंगा पर

तुमने अत्याचार किया

 

हमको अक्षर नहीं दिया है

हमको पानी नहीं दिया

पानी नहीं दिया तो समझो

हमको बानी नहीं दिया

 

अपना पानी

अपनी बानी हिंदुस्तानी

बच्चा बच्चा मांग रहा है

 

धरती के अन्दर का पानी

हमको बाहर लाने दो

अपनी धरती अपना पानी

अपनी रोटी खाने दो

 

पानी पानी

पानी पानी

बच्चा बच्चा

मांग रहा है

अपनी बानी

पानी पानी

पानी पानी

पानी पानी

--

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------