शनिवार, 21 मई 2011

रचना श्रीवास्तव की कविता - हमारी भी सुनो

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कभी साथ दिया न किस्मत ने
कभी अपनों ने भी मुंह फेर लिया
कभी हम को इतेमाल किया
कभी राह में ला के छोड़ दिया
कोई दुत्कार देता है
कोई दोचार आने पकड़ा के टाल देता है


आगे बढ़ो कह के
मुँह कोई उधर फेर लेता है
तिरस्कार उपेक्षा के बीच
भी हम गाते हैं
हाथ फैला के रिरियाते है
ये बेबसी मज़बूरी लाचारी है
नहीं ये चाहत हमारी है


दाँत किटकिटाती ठण्ड हो,
लूह के थपेड़े हो या हो बरसात
हर हाल में हमको आना होता है
भूख मौसम देख के आती नहीं
खाना लाऊँ कहाँ से बताती नहीं
बीमारी से जूझती माँ को बचाना है
गिर न जाये घर कहीं बरसात में
उस पर एक छप्पर डलवाना है


इन छोटे पैसों में
बड़ी जरूरतों को पूरा करू कैसे ?
भीख न माँगू तो जियूँ कैसे ?
हम में से कुछ तो लाचार है
इन्सान की क्रूरता का शिकार है
किसी को कर दिया पंगु
किसी की ज्योति छीन ली
किसी को होटल का छोटू बना दिया
तो किसी के हाथ में
झाड़ू कटका थमा दिया


चाहत थी हमें भी
की माँ बाबू से चिपक के बैठे
दुलराये और लाड   दिखाएँ
स्कूल जाएँ , खेल खिलौनों में दिन बिताएं
पर कहाँ  .............
तुम ही कहो जब हो गरीबी की मार
पेट पीठ एक हो जाये
एक एक हड्डी दिखे ऐसे की गिन ली जाये


न देखो यूँ नफरत से हम को
हम किस्मत से मजबूर है
जिस खुदा का है तुममे
उसी का हम में भी नूर है
दया नहीं हम को मौका चाहिए
उड़ा ले चले जो हम को भी
हवा का वो झोंका चाहिए
क्या तुम बनोगे वो हवा ?

15 blogger-facebook:

  1. amita kaundal8:36 pm

    rachna ji bahut hi marmik kavita hai sach main in chote chote bhikhariyon ko dekh kar man vyakul ho uthta hai par koi sunta nahi hum najaren jhuka aage chal dete hain. ye samsya mere dil ke bahut kareeb hai dhanyavaad jo aapne apni lekhani main is smsaya ko uthaya.
    saadar
    amita kaundal

    उत्तर देंहटाएं
  2. sangita ji

    aapka bahut bahut dhnyavad

    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. दया नहीं हमको मौक़ा चाहिये,उड़ा ले चले जो हमको भी ,
    हवा का वो झोंका चाहिये, क्या तुम बनोगे वो हवा।
    बेहतरीन अभिव्यक्ति रचनाकारा को मुबारक बाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. रचना श्रीवास्तव की कविता में जन सामान्य की पीड़ा बहुत गहराइ से व्यक्त होती है । शोषितों के प्रति इनकी संवेदना इनकी कविता का मूल स्वर बन जाती है -
    न देखो यूँ नफरत से हम को
    हम किस्मत से मजबूर है
    जिस खुदा का है तुममे
    उसी का हम में भी नूर है
    दया नहीं हम को मौका चाहिए
    उड़ा ले चले जो हम को भी
    हवा का वो झोंका चाहिए
    क्या तुम बनोगे वो हवा ?

    उत्तर देंहटाएं
  5. sanjay ji amita ji aur vijay ji aap tino ka bahut bahut dhnyavad.
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  6. Himanshu ji
    aapke sneh shbdon ka dhnyavad
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  7. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 24 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

    उत्तर देंहटाएं
  8. ये नफरत के नहीं , सहानुभूति के हक़दार हैं , स्वाभिमान इन्हें विरासत में मिला नहीं , इनका कुसूर क्या ...होता भी तो पेट की आग के आगे कब तक टिकता ...

    मार्मिक !

    "छींटे और बौछारें " अभी भी नहीं खुल रहा ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेहतरीन अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बेहद सजीव चित्रण...सोचने पर मजबूर कर दे..

    उत्तर देंहटाएं
  11. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
    --
    बुधवारीय चर्चा मंच

    उत्तर देंहटाएं

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