संजय दानी की ताज़ा ग़ज़ल - चल पड़ा हूँ मुहब्बत के सफर में, पैरों पे छाले रगों में खामुशी है...

मुझसे तन्हाई मेरी ये पूछती है,

बेवफ़ाओं से तेरी क्यूं दोस्ती है।

 

चल पड़ा हूं मुहब्बत के सफ़र में,

पैरों पर छाले रगों में ख़ामुशी है।

 

पानी के व्यापार में पैसा बहुत है,

अब तराजू की गिरह में हर नदी है।

 

एक तारा टूटा है आसमां पर,

शौक़ की धरती सुकूं से सो रही है।

 

बिल्डरों के द्वारा संवरेगा नगर अब,

सुन ये, पेड़ों के मुहल्ले में ग़मी है।

 

अब अंधेरों का मुसाफ़िर चांद भी है,

चांदनी के ज़ुल्फ़ों की आवारगी है।

 

अब खिलौनों वास्ते बच्चा न रोता,

टीवी के दम से जवानी चढ गई है।

 

दिल की कश्ती को किनारों ने डुबाया,

इसलिये मंझधार को वो चाहती है।

 

मत लगाना हुस्न पर इल्ज़ाम दानी,

ऐसे केसों में गवाहों की कमी है।

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8 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ताज़ा ग़ज़ल - चल पड़ा हूँ मुहब्बत के सफर में, पैरों पे छाले रगों में खामुशी है..."

  1. पानी के व्यापार में पैसा बहुत है,

    अब तराजू की गिरह में हर नदी है।

    बिल्डरों के द्वारा संवरेगा नगर अब,

    सुन ये, पेड़ों के मुहल्ले में ग़मी है।

    बहुत सही कहा है ..अच्छी गज़ल

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  2. पानी के व्यापार में पैसा बहुत है,

    अब तराजू की गिरह में हर नदी है।
    sahi kaha hai
    बिल्डरों के द्वारा संवरेगा नगर अब,

    सुन ये, पेड़ों के मुहल्ले में ग़मी है।
    kya baat hai
    sunder
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 24 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  4. अमिता कौंडल12:56 am

    पानी के व्यापार में पैसा बहुत है,

    अब तराजू की गिरह में हर नदी है।

    बिल्डरों के द्वारा संवरेगा नगर अब,

    सुन ये, पेड़ों के मुहल्ले में ग़मी है।


    बहुत सुंदर शब्द रचना है बधाई

    सादर
    अमिता कौंडल

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  5. Many many thanks to SangIta Swarup ji ,Vinaa ji, Rachna ji and Amita ji

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  6. बिल्डरों के द्वारा संवरेगा नगर अब,

    सुन ये, पेड़ों के मुहल्ले में ग़मी है।
    bahoot sahi,anek logon ki pida in panktiyon me jhalakati hai.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बहुत धन्यवाद विजय वर्मा जी।

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