बुधवार, 1 जून 2011

कहानी संग्रह : 21 वीं सदी की चुनिन्दा दहेज कथाएँ - (11 ) निरर्थक

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कहानी संग्रह

21 वीं सदी की चुनिन्दा दहेज कथाएँ

संपादक - डॉ. दिनेश पाठक 'शशि'

अनुक्रमणिका

1 -एक नई शुरूआत - डॉ0 सरला अग्रवाल
2 -बबली तुम कहाँ हो -- डॉ0 अलका पाठक
3 -वैधव्‍य नहीं बिकेगा -- पं0 उमाशंकर दीक्षित
4 - बरखा की विदाई -- डॉ0 कमल कपूर
5- सांसों का तार -- डॉ0 उषा यादव
6- अंतहीन घाटियों से दूर -- डॉ0 सतीश दुबे
7 -आप ऐसे नहीं हो -- श्रीमती मालती बसंत
8 -बिना दुल्‍हन लौटी बारात -- श्री सन्‍तोष कुमार सिंह
9 -शुभकामनाओं का महल -- डॉ0 उर्मिकृष्‍ण
10- भैयाजी का आदर्श -- श्री महेश सक्‍सेना
11- निरर्थक -- श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ
12- अभिमन्‍यु की हत्‍या -- श्री कालीचरण प्रेमी
13- संकल्‍प -- श्रीमती मीरा शलभ
14- दूसरा पहलू -- श्रीमती पुष्‍पा रघु
15- वो जल रही थी -- श्री अनिल सक्‍सेना चौधरी
16- बेटे की खुशी -- डॉ0 राजेन्‍द्र परदेशी
17 - प्रश्‍न से परे -- श्री विलास विहारी

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(11) निरर्थक

श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्‍ठ

वेद प्रकाश को देखते ही मंजू के सीने में धड़-धड़ होने लगी। चेहरा धूप में मुरझाये पत्ते की तरह लटक गया।

‘‘अभी तो पन्‍द्रह दिन भी नहीं हुए.......और ये लिवाने भी आ गये'' मंजू ने सोचा - ‘‘अम्‍मा जी ने तो कहा था कि इस बार मंजू को भी एक महीने के लिये मायके भेज देंगे.........वैसे तो डेढ़-दो साल में एक महीना की छूट कोई ज्‍यादा भी नहीं है पर यह भी दे दी वह क्‍या कम है। उस घर में बहुओें को मायके हँसी-खुशी से कभी नहीं भेजा जाता। एक दो बार तो लिवाने वाले को लौटा ही देते हैं। भेजते समय भी आज-कल, आज-कल करके कई दिन निकाल दिये जाते हैं। पूजा के साथ ऐसा नहीं होता पर मंजू को भेजने के नाम दस सवाल उठते हैं - ‘‘क्‍या करेगी जाकर! यहाँ कौन सम्‍हालेगा! छोड़ने कौन आयेगा। कितने दिन में आ जायेगी?''

फिर भेजते समय भी कई काम कई शर्तं.......गेहूँ साफ करने हैं, चादरें धुलनी हैं........मसाले साफ होने हैं.........और हाँ आठ दिन से नौवां दिन मत करना बस......। मंजू को सावन का वह लोकगीत याद आता है जिसमें लिवाने आये छोटे भैया की सूचना सास को देते समय बहू याचना करती है - ‘‘तुम कहौ ए सासु पीहर जाऊँ?''

सास के दिमाग में घंटियाँ बजने लगती हैं बहू मायके जायेगी तो काम कौन करेगा? वह कहती है - ‘‘जितनौं ए बहू कुअंजनि नीर, उतना भरि धरि जाइयो........।''

बस बहू कैसे जा सकेगी मायके........। पूजा के आने से पहले मंजू को अम्‍मा जी की इस नीति पर हँसी आती थी। बहू पर सास की यह निर्भरता भले ही रौब और अधिकार से भरी हो, उसे अच्‍छी लगती थी लेकिन पूजा के आने के बाद उसके दिमाग में सवाल उठा - ‘‘पूजा को चाहे जब उसके भाई आकर ले जाते हैं। कोई जरा सी भी असहमति नहीं दिखाता। क्‍यों?''

‘‘क्‍या महीना और क्‍या पन्‍द्रह दिन! मेरा कुछ खयाल है कि नहीं?'' वेद प्रकाश मंजू को समझा रहा था या धमका रहा था, पता नहीं, पर मंजू की माँ को दामाद की बात से तसल्‍ली ही मिली। यह तो पति का अपनापन है। ‘‘लल्‍ला का जी नहीं लगता होगा तेरे बिना।'' - पुलकित होकर माँ ने मंजू को देखा जिसकी आँखों में बेबसी भरी नमी थी।

‘‘बावरी है क्‍या!'' माँ ने प्‍यार से झिड़का - ‘‘रहना तो तुझे वहीं है क्‍या चार दिन क्‍या चौदह...... घोड़ी तो घुड़साल में ही अच्‍छी लगती है। फिर यह तो सोच कि तेरी कदर है वहाँ.......।''

‘‘हाँ...... खूब कदर है'' मंजू ने कुढ़ते हुए सोचा - किसन के विवाह के बाद राजू को वह ‘कद्र' ‘बेकद्री' लगने लगी। जो काम छोटी होने के नाते पूजा से करवाने चाहिये वे तो मंजू को करने पड़ते हैं और......। मेहमानों से मिलवाना हो, नाते रिश्‍तेदारों में जाना हो, बाजार से खरीददारी करनी हो पूजा को ही भेजा जाता है। और वक्‍त बे वक्‍त आये मेहमानों के लिए खाना बनाना हो, घर की सफाई व कपड़े धोने हों तो फिर मंजू बेटी......मंजू बेटी।

मंजू को काम करने से ऐतराज नहीं है लेकिन भेदभाव उसके कलेजे को छेदकर रख देता है।

‘‘पूजा भाभी में ‘मैनर' है, ‘अक्‍ल' है.......वह ज्‍यादा पढ़ी लिक्‍खी है इसलिये....।'' रमा दीदी मंजू को समझाना चाहती है।

रमा उम्र में काफी छोटी है पर ननद होने के नाते उसे भाभी को समझाने का भी अधिकार है और उनके नाम के साथ ‘दीदी' लगवाने का भी। उस घर में चाहे कितने ही छोटे हों ननद, देवरों का नाम खाली नहीं लिया जा सकता। पर मंजू ही इसका ध्‍यान रखती है पूजा क्‍यों नहीं? और फिर भी रमा दीदी कहती हैं कि पूजा भाभी को ‘मैनर' है। खाक मैनर है। मंजू जानती है कि यह भेदभाव ‘पढ़ाई अक्‍कल,' या तहजीब के कारण नहीं, पूजा के मायके वालों के कारण है। उसके तीन-चार जवान भाई हैं पिता भेजते रहते हैं। अम्‍मा जी वैसे ही खुश हो जाती हैं जैसे महाजन कर्ज की वसूली पर खुश होता है। भाई चाहे जब बिना सूचना के आ खड़े होते हैं बहन को लेने मना करना तो दूर उसकी आवभगत में जुट जाते हैं सब। बाजार से समोसा-कचौड़ी मंगवाये जाते हैं। घर में जलेबियाँ बनवायी जाती है.....और चुपचाप पूजा को विदाकर दिया जाता है। फिर छोड़ने कोई नहीं आता खुद किसन भैया लेने जाते हैं। पूजा जब आती है अम्‍माजी खुशी से भर जाती हैं। क्‍यों न भरें पूजा अपने साथ कितनी ही चीजें, दाल चावल, बड़ी पापड़, अचार, मिठाई और कपड़े, लेकर आती हैं।

‘‘कुछ भी हो रिश्‍तेदार मिलें तो किसन की ससुराल वालों जैसे.....'' अम्‍मा पुलकित होकर सबको सुनाती हैं, खासकर मंजू को। मंजू कहाँ से लाये यह सब! मन मसोसकर रह जाती है। उसकी पारिवारिक स्‍थिति क्‍या अम्‍मा जी से छुपी है? वह तो कुछ संयोग ऐसे बने कि बाबूजी ने खुद पिताजी से मंजू को माँग लिया था। दोनों दोस्‍त थे। इधर घर की हालत भी अच्‍छी नहीं थी। आय का कोई साधन न था।

वेदप्रकाश न पढ़ाई में कुछ कर पाया न किसी रोजगार में। घर बैठा रहता। घर वालों ने सोचा चलो शादी ही कर दें। बीवी के आने पर कुछ न कुछ करेगा ही। सो बिना ज्‍यादा कुछ लिये-दिये ही मंजू का वेदप्रकाश से ब्‍याह हो गया। दहेज लेने के लिये खुद की हैसियत भी तो होनी चाहिये। शायद तब सबको यह अहसास था। लेकिन किसन भैया की ससुराल से जब बिना माँगे ही काफी कुछ मिल गया तो सब की निगाहें बदल गयीं। मंजू क्‍या करे! उसका मन भी होता है कि वह भी पूजा की तरह सबकी चहेती बने। पर कैसे? माँ से वह कैसे कहे यह सब। पिताजी के बाद माँ अकेली भी हो गयी है और असहाय भी। बड़ा भैया एक विधर्मिणी लड़की से विवाह करके दूर जा बसा है जिसके ताने भी मंजू को अक्‍सर सुनने पड़ते हैं। छोटा भाई बिजली का काम करके जरूरत भर कमा लेता है बाकी पिताजी की पेंशन। माँ कहाँ से करें यह सब! और दूसरी बात यह कि शायद माँ ने कभी इस बात पर ध्‍यान ही नहीं दिया! वह तो यह सोचकर निश्‍चिन्‍त है कि बेटी सुखी है। दामाद उसे दो दिन को भी नहीं छोड़ना चाहता। माँ की नजर में यही कदर है, यही प्रेम है......। माँ को अहसास कहाँ कि.......। मंजू की आँखें बरबस छलकी जा रही थीं। माँ सोच रही थीं कि मायके से जाने का सुख है यह। अचानक वह उठीं और ऊपर से एक बैग लायी।

‘‘मंजू इसमें दो साड़ियाँ, सूट और पेन्‍ट शर्ट हैं.........।'' सबके लिये....और यह पाजेब, बिछुआ समधिन जी के लिये। गनगौर की पूजा के लिये.....।

माँ! यह सब? मंजू ने आश्‍चर्य से माँ को देखा।

''तेरे पिताजी के कुछ पैसे मिले थे, सो यह सामान खरीद लिया चुपचाप, तुझे पता चलता तो क्‍या खरीदने देती?........समधिन जी को कभी कुछ भेज नहीं पायी.......वो तो बड़े दिल की हैं, कभी कोई ‘हल्‍की-फुल्‍की' बात नहीं की।'' मंजू को कुछ सान्‍त्‍वना मिली कि चलो इस बार अम्‍मा जी को यह नहीं लगेगा कि मंजू हमेशा ऐसे ही चली आती है मायके से, पर नहीं एक अपराध बोध भी था। आज जबकि लड़कियाँ माँ की सहायता करती हैं वह उल्‍टे माँ से लेने की सोचती है। फिर भी वह सामान लेकर मंजू खुश थी।

मंजू ने अम्‍मा जी के पाँव छुए पिडलियाँ दबा दबाकर। अम्‍मा जी के चेहरे पर, क्षणिक सी मुस्‍कुराहट आयी घने बादलों के बींच से झाँकी धूप की तरह फिर गायब हो गयी। आ गयी!

अम्‍मा के स्‍वर में प्रश्‍न या आश्‍चर्य का भाव नहीं बल्‍कि वैसे ही संवाद के लिये कहा गया था। मानों मंजू का आना कोई मामूली सी बात हो। ‘‘अम्‍मा जी,'' मंजू ने सास के सामने बैग रखकर कहा- ‘‘इस में आप के व पूजा के लिये साड़ी है और सबके लिये भी कपड़े हैं। आप के लिये ये टॉप्‍स भी......।'' अरे! इस बार समधिन जी को हमारी याद कैसे आ गयी। अम्‍मा ने व्‍यंग्‍य से मुस्‍कराकर कहा। मंजू को लगा कि अम्‍मा को खुशी हो रही है। ‘‘याद तो वो करती हैं लेकिन - ‘कहते मंजू कुछ रुकी कि अम्‍मा बोल पड़ी,- ‘‘मैं सब समझती हूँ मंजू! तूने मना क्‍यों न कर दिया अपनी माँ से! क्‍या जरुरत थी यह सब करने की।''

‘‘दो गनगौर थी पूजा के लिए.......इस बार सही मौका भी था.........सो माँ ने. .........अम्‍मा जी बड़े मन से भेजा है माँ ने।

‘‘सब मन से ही भेजते हैं बेटा। ‘‘अम्‍मा ने गर्व और बड़प्‍पन से कहा - ‘‘गनगौर तो पूजा के मायके से दो दिन पहले ही आ गयी। इसकी जरुरत ही क्‍या थी। बेचारी को बेकार ही परेशान किया तूने।''

मंजू का सारा उत्‍साह ठंडा हो गया। मन में अजीब सी हलचल मच गयी। शायद सोचकर कि माँ ने उसे कुछ पूछकर क्‍यों नहीं खरीददारी की? और कर भी ली तो क्‍यों न वापस ही कर आयी। वो पैसे माँ के लिये तो काफी महत्‍वपूर्ण थे। यहाँ तो..........।

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कोटा वाला मौहल्‍ला,

खारे कुआ के पास, ग्‍वालियर (म.प्र.)

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