शुक्रवार, 10 जून 2011

श्रद्धांजलि - हुसैन : जिनका भारतीय कलाजगत सदैव ऋणी रहेगा

husain

भारत के हृदय प्रदेश स्थित इंदौर में कला की शिक्षा प्राप्त मकबूल फ़िदा हुसैन ने अपने जीवन की अंतिम सांसें भारत भूमि से दूर, कतर में स्व-निर्वासित अवस्था में ली. हुसैन का जाना भारतीय कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति रही है. भारतीय कलाजगत को विश्व में एक बड़े मुकाम पर प्रतिष्ठित करने में, सम्मानजनक स्थान दिलाने में हुसैन के अहम् योगदान को नकारा नहीं जा सकता.

हुसैन हमेशा विवादों में रहे. कभी लोगों को यह प्रतीत होता रहा कि विवाद उनकी कला की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी का हिस्सा तो नहीं है. परंतु यदि ऐसा होता तो हर दूसरा व्यक्ति अपनी कला को फूहड़ विवादों से चमका सकता था. दरअसल वह कला ही होती है, उसका अपना सामर्थ्य होता है जो अंततः प्रसिद्धि प्राप्त करती ही है. हुसैन ने अपनी कूची को कभी विराम नहीं दिया.

हुसैन ने इंदौर के कला विद्यालय में कलागुरू देवलालीकर के सान्निध्य में अपनी शिक्षा ग्रहण की थी. 22 वर्ष की उम्र में वे मुंबई चले गए, जहाँ जीवन के उतार चढ़ाव को अपने कैनवस में बखूबी स्थान देते रहे. हुसैन की कला साधना इतनी समर्पित थी कि शहर से दूर चित्र बनाने के लिए साइकिल में कंदील लेकर चलते और यदि दिन में चित्र पूरा नहीं होता तो रात्रि में कंदील की रौशनी में वे अपना काम पूरा कर फिर वापस आते थे.

हुसैन का मानना था कि चित्रकला हमें रंगों के स्वभाव के बारे में भी बहुत कुछ बताती है. हुसैन ने संघर्ष के दिनों में न केवल चित्रकारी की, बल्कि आजीविका के लिए खिलौनों का निर्माण किया, फ़िल्मी पोस्टर भी जमकर बनाए.

बाद के वर्षों में हुसैन मुंबई में प्रगतिशील ग्रुप से जुड़ कर भारतीय चित्रकला को आधुनिक व नया मोड़ देने में सृजनात्मक भूमिका निभाई. 1946 में मुंबई आर्ट सोसायटी की प्रदर्शनी में हुसैन के बनाए एक चित्र को पुरस्कार मिला और तब उनके काम की ओर कलाप्रेमियों, कला-समीक्षकों का ध्यान गया. उसके बाद से हुसैन ने पलट कर नहीं देखा और वे निरंतर ऊँचाईयों की ओर बढ़ते चले गये.

हुसैन ने घोड़ों पर बरसों चित्र बनाए. उन्हें जो विषय उद्वेलित करते उस पर कई कई वर्षों तक चित्र बनाते. छाता, जूता, लालटेन, मकड़ी को अंकित करने वाले उनके अनेकों चित्र हैं. बनारस की गलियों, रामायण व महाभारत की कथाओं पर ढेरों चित्र बनाए. हुसैन के ज्यादातर चित्र भारत के गांवों कस्बों से संबंधित ठेठ भारतीयता को चित्रित करते हैं. एक बार हुसैन ने स्वयं स्वीकारा था कि फ़ाइव स्टार होटलों में रूकने के बावजूद वो सुबह-सुबह की चाय आसपास के ढाबों में जाकर ही पीना पसंद करते हैं जहाँ ठेठ देहातीपन व स्थानीयता मौजूद रहती है. इसी वजह से ग्रामीण परिवेश में गाय, बैल, बकरियों, चिड़ियों की भरमार उनके चित्रों में सहज ही होती थी.

हुसैन अपने चित्रों में चटक रंगों का प्रयोग बहुतायत से करते थे. उनके चित्रों में उकेरी गई रेखाओं में अदम्य शक्ति का अहसास कला प्रेमी दर्शक को सहज ही अनुभव होता है. उनकी कला के ये खूबियाँ ही दर्शकों को आकर्षित भी करती है. हुसैन के पास कलाकार का बेचैन मन था – कभी खुश, कभी संयमित, कभी उच्छृंखल जो उन्हें लगातार, बरसों बरस कला सृजन में रत रखता था. भारतीय कलाकारों में उन जैसा ऊर्जावान और लगातार सृजन रत कलाकार अन्य नहीं है, और उनके जाने से एक शून्य सा बन गया है.

हुसैन हमेशा से प्रयोगवादी रहे थे. स्वास्तिक, रागमाला, जमीन इत्यादि पर प्रसिद्ध चित्रों की लंबी सूची है. उन्होंने दृश्य-श्रव्य माध्यम यानी फ़िल्मों में भी अपने हाथ आजमाए, हालांकि यहाँ पर वे लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाए. हुसैन ने अंग्रेज़ी व उर्दू में कविताएँ भी लिखी हैं.

सिर पर चमकते सफेद बालों और सफेद दाढ़ी के साथ नंगे पैर चलने वाले हुसैन  कला जगत में रंगों का जादू बिखेर कर इस नश्वर संसार को अलविदा तो कह गए मगर उनकी कलाकृतियाँ अजर अमर रहेंगीं.

- रेखा श्रीवास्तव

1 blogger-facebook:

  1. स्व-निर्वासित अवस्था-----हुँह....अपने मूर्खतापूर्ण कार्यों के कारण डर कर भारत से भाग गया था...वह भगोड़ा .....

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