गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कृष्ण गोपाल सिन्हा की कहानी - आसरा का आसमान

आसरा खूबसूरत थी, खुद्दार थी. उमर के ऐतबार से कमसिन नहीं थी पर किसी भी कमसिन से कम नहीं लगती थी. उसे अपनी ज़िंदगी से बेहद प्यार और लगाव था. उसे अपनी ज़िंदगी को अपनी तरह से जीने की पूरी शिद्दत से ज़िद और ज़ुनून थी. कल को याद किए बिना कल क्या होगा की फ़िक्र से दूर वह आज को भरपूर जीना चाहती थी. उसे किसी की हमदर्दी और मदद बिल्कुल पसंद नहीं था और वह किसी भी मामले मे किसी भी तरह की दखल पसंद नहीं करती थी. आसरा आज़ाद ख़याल और आज़ादी पसंद लड़की थी जिसे किसी भी तरह की रोकटोक या दखलंदाज़ी से सख़्त गुरेज़ और परहेज़ था.

आसरा बेझिझक और बेलाग बातें करती. उसे इस बात की परवाह ज़्यादा होती की उसे क्या अच्छा लगता है. उसे दूसरों के पसंद नापसंद की कोई परवाह नहीं होती. अपनी निजी रिश्तों और संबंधों को लेकर बातें करने में उसे किसी तरह की झिझक नहीं होती. अक्सर ऐसा लगता कि उसे ऐसी बातों मे मज़ा आता और फख्र महसूस करती थी. उसके लिए उसकी क़मज़ोरियां ही उसकी ताक़त बन गयी थी. उसे हर बात में एक अजीब सी ज़ल्दी और बेताबी महसूस होती थी. वह कुछ भी या सब कुछ कर गुजरने का हौसला रखती थी. हमेशा मुस्कुराते रहना उसकी पहचान बन चुकी थी. दरअसल उसने अपनी इस मुस्कुराहट और ज़िंदादिली में अपनी उन सारी चुभन और दर्द को छुपा रखा था जिसे वह किसी के साथ बाँटना नहीं चाहती थी. सच तो यह था कि वह अपनी खुशी और गम को किसी के भी साथ बाँटने से गुरेज़ करती थी.

आसरा की सोच, समझ, पसंद, नापसंद सब के लिए शायद वे हालात और माहौल ज़िम्मेदार थे जिसमे जीने और सांस लेने के लिए वह मज़बूर थी. बहुत ही साधारण मुस्लिम परिवार में जन्मी अपने भाई बहनों में सब उससे छोटे थे इसलिए भाई बहनों की देख भाल में उसे माँ का हाथ बँटाना ही पड़ता था. आसरा को उसकी तालीम और परवरिश के लिए भी सही और अच्छा मौका और माहौल नहीं मिल पाया.

आसरा खूबसूरत और चंचल भी थी. माँ बाप को अपनी परिस्थितियों को देखते हुए बेटी के भविष्य की चिंता सताने लगी और वे ज़ल्दी से ज़ल्दी बेटी के हाथ पीले करने की सोचने लगे. आसरा की उमर अभी शादी के लिए सही नही थी पर माँ बाप की मंशा जैसी हुई वैसा ही हुआ. आसरा की उमर कच्ची थी ही उसकी तालीम भी अधूरी थी. वह शादी के बाद ससुराल आई तो उसे एक औसत दर्ज़े के बड़े परिवार में रहना पड़ा जिसमे रस्में भी थीं रिवाज़ भी थे, पाबंदियां भी थीं, दस्तूर भी था और अपनी कच्ची उमर और समझ के सहारे वह ज़िम्मेदारियों और रिश्ते में ताल मेल बिठाने की वह भरपूर कोशिश करती. कुछ भी ग़लत या उल्टा हो जाता तो सारे ताने और बोलियाँ उसे सुनने को मिलती. वह अपनी बात या तक़लीफ़ न किसी से कह सकती न बाँट सकती. उसे इस बात का बराबर रंज और मलाल रहा की उसके सौहर अनीस ने भी न कभी उसकी सुनी न ही उससे उसका हाल ही पूछा. वह अकेली थी. अनीस को उसकी न कोई चिंता थी न ही वह उसकी ज़रूरतों की ओर ध्यान देता. आसरा जब माँ बनने वाली थी तब भी अनीस ने न ही उसकी ओर ध्यान दिया और न ही उसके साथ जज़्बाती साथ या रिश्ता ही क़ायम रखा. ऐसा ही दूसरी बार फिर हुआ जब वह दुबारा माँ बनने वाली थी. आसरा अब दो बच्चों की माँ थी. आसरा के दो बच्चे अमन और आयशा ही उसकी पूरी दुनियाँ थी. उनके बारे में वह सोचती, चिंता करती, सब कुछ करना चाहती, सब कुछ पाना चाहती.

आसरा बड़े परिवार में अपनी ज़िम्मेदारियाँ उठाने के साथ साथ अपने बच्चों की परवरिश बखूबी करने की कोशिश करती. अनीस की दिलचस्पी बच्चों की तरफ भी कम ही रहती क्योकि बच्चों की देख भाल ज़्यादातर दादा दादी और घर के और भी किया करते. आसरा को इस बात का भी मलाल रहता की अनीस को बच्चों की ज़रूरतों और तालीम की न तो फिक्र रहती न ही कभी इस बारे मे आसरा से कोई बात चीत ही करता. अनीस अपने काम धंधे के बाद दोस्तों यारों मे मस्त रहता और देर रात घर वापिस आया करता. बड़े परिवार में आसरा और अनीस के रिश्ते शौहर और बीवी के थे पर दोनो का मिलना रस्मी था. धीरे धीरे आसरा की मायूसी और बेज़ारी बढ़ती ही गयी और अब अनीस के बारे में वह कम सोचती, कम बोलती.

परिवार में घर गृहस्थी की ज़िम्मेदारियों और बच्चों की परवरिश के अलावा दो और मोर्चों पर वह लड़ने की कोशिश कर रही थी. किसी तरह वह अपनी तालीम को आगे ले जाने की कोशिश में भी लगी रही और कुछ डिग्री और डिप्लोमा भी हासिल कर ली. इस बीच वह छोटी बड़ी नौकरी की तलाश में भी रहती. वह अपने और अपने बच्चों की ज़रूरतें खुद पूरा करना चाहती थी. दरअसल वह पूरी तरह से अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी. यह सब कुछ अकेले और अपने दम पर करना चाहती थी.

क्लास. कोचिंग या नौकरी के सिलसिले में जितनी देर वह घर से बाहर रहती खुश रहती. घर की घुटन से दूर और खुली हवा उसे बेहद अच्छी लगती. बाहर निकलती तो उसे पंख मिल जाते. वह हमेशा ज़ल्दी में होती. न जाने उसके ज़िम्मे कितने काम होते. वह अक्सर कहती कि अगर उसे बाहर निकलने की आज़ादी नहीं रहेगी तो वह ख़ुदकुशी कर लेगी उसे खुले आसमान में सुकून मिलता. वह पूरे आसमान को अपना आशियाना बनाना चाहती थी. घर की चहारदीवारी और तरह तरह की पाबंदियों से वह उब चुकी थी. उसे अपने ढंग से जीने और सास लेने पर किसी तरह की पाबंदी मंज़ूर नहीं थी.

उसकी बातों से यह पता लग जाता की अब उसे भी अनीस मे कोई दिलचस्पी नहीं थी. उसकी यह शिकायत शायद वाजिब ही थी कि शौहर को अगर अपनी बीवी मे दिलचस्पी न रहे और दोनों एक दूसरे की ज़रूरतों को न समझे तो उनके रिश्ते नाम के ही रह जाते है. आसरा बेझिझक क़बूल करती कि अब उन दोनो में वे रिश्ते नहीं रहे जो अमूमन शौहर और बीवी के बीच होते हैं. वह बताती की अगर कभी अनीस रिश्ते रखने की कोशिश भी करता तो वह किसी न किसी बहाने उसे टाल देती थी और अब तो उसे इसकी आदत सी हो गयी थी.

आसरा के दोनों बच्चें होनहार और ज़हीन थे ही उनके एजुकेशन का आसरा ने पूरा ध्यान रखा. अमन का झुकाव मेडिकल की तरफ था तो आयशा इंजीनियर बनना चाहती थी. माँ ने भी दोनों के ज़रूरतों का पूरा ध्यान रखा और किसी तरह की कमी या कोताही नहीं होने दी.

आसरा को कभी याद ही नहीं रहा कि कभी वक़्त ने उसे सहलाया भी होगा. उसे अक्सर यही मलाल रहता की उसके खाते में वक़्त ने कभी कोई राहत या सुकून का कोई लमहा अता नहीं किया. ज़िंदगी के हाथों उसे एक और चोट झेलनी पड़ी जिसमे न तो कोई उसके साथ था और न ही किसी को उसकी तक़लीफ़ से ही कोई सरोकार था. वह अकेली ही सब झेलना और बर्दाश्त करना चाहती थी.

कच्ची उमर में घर गृहस्थी और माँ बनने का बोझ और पति के साथ साथ घर वालों की ओर से पूरा ध्यान न देने का असर आसरा की सेहत पर पड़ा. वह क़मज़ोर थी ही उस पर से उसे कई चिंताओं ने आ घेरा था. मानसिक तौर पर भी वह परेशान रहती थी. ख़ान पान पर भी किसी का कोई ध्यान नहीं था. वह और क़मज़ोर होती गयी. उसे कई बातों की न तो समझ थी और न ही वह सारी बातों को जानती ही थी. अनीस की ओर से बरती गयी लापरवाही ने उसकी परेशानी में इज़ाफ़ा ही किया. न जाने कब और कैसे वह एक ऐसी बीमारी की गिरफ़्त में आ गयी जिससे उसे अकेले ही लड़ना पड़ा. ऐसी हालत में अनीस की ओर से उसे और मायूस होना पड़ा. उसे अकेली ही डाक्टरों, अस्पतालों और अल्ट्रसाउंड सेंटर के चक्कर लगाने पड़ते थे. डॉक्टरों ने सर्विक्स कॅन्सर बताय था. आसरा सचमुच मज़बूत और हिम्मतवाली थी. वह अपने घर और ससुराल वालों को बिना बताए ही अपनी बीमारी से जूझने और उसे झेलने के लिए उसने खुद को तैयार कर लिया था. अनीस की ओर से कोई मदद या हौसला उसे मिल सकता है, इसकी न तो उसे उम्मीद थी और न ही ज़रूरत.

इस बीच आसरा के मन में यह बात बड़ी गहराई से बैठ गई थी की मर्द बड़े ही ख़ुदग़र्ज़ होते हैं और उन्हें अपनी बीवियों की ज़रूरतों और ख्वाहिशों की क़तई परवाह नहीं होती. उसने देखा और महसूस किया था कि बड़े मिले जुले परिवारों में माहौल दकियानूसी होते हैं और बीवी के अलावा घर में दूसरी औरतें भी मर्दों का देख भाल कर लेती हैं. शौहर और बीवी के बीच के रिश्ते को मज़बूत और ख़ुशगवार बनाने मे दिक्कत तब होती है जब मर्द इस ओर कम तवज्जो देते हैं. आसरा और अनीस के बीच भी काफ़ी दूरियाँ आ चुकी थी. आदत और मिज़ाज दोनों से ही अनीस लापरवाह रहता तो आसरा भी उसकी ओर कम तवज्जो देती. अपनी सहेलियों या दोस्तों से बातचीत में भी वह इस बात को बेसाख्ता मानने और कहने से संकोच नहीं करती कि जब कभी अनीस को उसकी ज़रूरत महसूस होतो और वह उसके पास आने की कोशिश करता भी था तो बड़ी ही चालाकी से कोई बहाना बनाकर वह उससे दूर चली जाती. आसरा की ऐसी बातों से यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नही रहा कि दोनों के बीच अब जज़्बाती और जिस्मानी दोनों ही रिश्ते ख़त्म हो चुके थे.

आज़ाद ख़यालों और खुलेपन के बावज़ूद उसने कोई ऐसा साथी, दोस्त या सहेली नहीं बनाया था जिससे वह अपने मन की बात या तक़लीफ़ शेयर करती. किसी के संपर्क या साथ में कुछ समय के लिए होती भी तो सब कुछ बड़ी ही बेबाकी से शेयर भी करती और बेझिझक मिलने और साथ गुजारने से किसी तरह का परहेज़ नहीं करती थी. इस दौरान वह यह भी एहसास कराने से नहीं चूकती कि हो सकता है कल वह मिले न मिले. शायद उसे ऐसे रिश्तों में अब यक़ीन ही नहीं रहा जो अपने होने का एहसास कराते हैं.

कभी कभी तो वह नामों की एक फहरिश्त ही सामने रख देती और कहती की इन लोगों ने मुझे आफर दिया है या मुझे प्रपोज़ किया है. शायद यह उसकी साफ़गोई या खुलेपन का इज़हार नहीं था बल्कि उसके अकेलेपन का पूरा दास्तान था. कभी कभी वह अनीस को तलाक़ देने की बात करती तो कभी किसी के साथ लिव इन रिलेशनशिप को जायज़ और अपना हक़ बताती. ऐसा नही कि वह रिश्तों की बारीक़ियों और पेचीदगियों से अंजान थी. उसे अपने बच्चों की भी फ़िक्र थी और इन्ही बच्चों के लिए वह कुछ भी करती या न करती.

आसरा की ज़िंदगी में एक नया मोड़ आया जब वह अपनी बीमारी से जूझने की कोशिश में जी जान से जुटी थी. अपने इलाज के सिलसिले में उसका आना जाना जिस अस्पताल में था वहा वह डॉक्टर भटनागर के संपर्क में आई. संपर्क ने नज़दीकी और जज़्बाती रिश्ते को मज़बूत किया और फिर दोनों को एक दूसरे पर भरोसा भी बढ़ने लगा. डॉक्टर ने आसरा को इस बात का भरोसा दिलाया कि वह उसकी हर कमी को पूरा करेगा और उसकी हर तरह से मदद भी करेगा. वक़्त ने उसे इस बार नयी उम्मीद और नयी चाहत का एहसास कराया. डॉक्टर के लिए उसकी चाहत और ज़रूरत दोनों ही परवान चढ़ने लगे. आसरा अब उससे मिले बिना परेशान रहने लगी, वह एक नयी ज़िंदगी के एहसास से सराबोर थी. आसरा इस नये रिश्ते को भरपूर जीना चाहती थी बिना कल के बारे में कुछ सोचे. उसे लगता कि आसमान की उंचाईयों को छूने लगी है ,समुंदर की पूरी गहराइयाँ महसूस करने लगी है. उसके लिए यह सब पहली बार महसूस और एहसास करने का तज़ुर्बा लग रहा था. उसे यह भी सोचने और समझने की ज़रूरत महसूस नहीं होती कि उसे अनीस से ये सब क्यों नहीं मिला जो अब उसे डॉक्टर भटनागर से मिलता.

आसरा जब किसी बहाने से निकलकर डॉक्टर भटनागर से मिलने के लिए निकलती तो जैसे उसे पंख लग जाते. अब वह उससे मिलकर वापिस आती तो उसका चेहरा उसकी खुशी और सुकून के एहसास की तर्जुमानी करता लगता. वह जानती और महसूस करती थी कि ज़माना उनके रिश्तों को आसानी से अपनी रज़ामंदी नहीं देगा और क़ानूनी तौर पर उनके रिश्तों को आसानी से पहचान नहीं मिल पाएगी. इन सब के बावज़ूद वह अपनी इस ज़िंदगी से बहुत खुश थी. दोनों हम उमर थे, दोनों एक दूसरे की ज़रूरत पूरी करने के एहसास से खुश थे. उसके चेहरे पर आई रौनक और खुशी देखते और महसूस करते हुए किसी ने उसे सलाह भी दी कि वह अपनी इस खुशी को क़ायम रखने के लिए अनीस से तलाक़ लेकर डॉक्टर से शादी कर ले पर वह अभी यह सब सोचने में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहती थी. आसरा के सामने एक रास्ता यह भी था कि वह अगर शादी नहीं भी करना चाहे तो डॉक्टर की रज़ामंदी होने पर लिव इन रिलेशन के बारे में भी सोच सकती थी. आसरा जज़्बाती थी ही इसलिए कभी कभार सारी समझदारी और नज़दीकियों के बावज़ूद कभी किसी बात को लेकर डॉक्टर भटनागर से लड़ बैठती. ज़िद्दी तो वह थी ही इसलिए यह जानते हुए कि डॉक्टर भटनागर उसे कभी भी दुखी करना और देखना नहीं चाहते वह कुछ देर तक अपनी बात से टस से मस नहीं होती और फिर थोड़ी देर बाद दोनों एक दूसरे के प्यार में पूरी शिद्दत से खो जाते.

खैर, आसरा और डॉक्टर भटनागर के नज़दीकी रिश्तों के साथ साथ उसका इलाज भी चलता रहा. बीमारी को लेकर अब आसरा कम परेशान रहती थी क्योकि अब इसकी चिंता करने मे डॉक्टर भी तो उसके साथ था ही. अब वह सुकून और खुशी दोनों ही महसूस करते हुए अपने बच्चों की तालीम पर भी पूरा ध्यान दे रही थी. उसे अब अनीस और ससुराल वालो की भी परवाह और चिंता नहीं रहती. ससुराल उसने छोड़ा नहीं था और अनीस से तलाक़ ली नहीं थी. दोनों रिश्ते अब नाम भर को ही थे और रिश्तों की वजह अमन और आयशा थे जिनके मार्फत आसरा ने अपने को इस परिवार और शौहर के साथ दुनियादारी के नाते जोड़ा हुआ था.

आसरा और डॉक्टर भटनागर के बीच रिश्तों को बढ़ाने और मज़बूत करने में आसरा को उसके बॉस अवस्थी जी से भी काफ़ी मदद मिली. दरअसल उमर और तज़ुर्बे के बिना पर वे आसरा की भावनाओं को समझने के अलावा उसकी ज़रूरतों को भी बखूबी समझते थे. आसरा और अवस्थी जी के बीच उमर के काफ़ी फ़ासले के बावज़ूद ज़िंदगी के मुख्तलिफ पहलुओं पर दोनों की बातचीत खुलकर होती जैसा आमतौर पर नहीं पाया जाता. आसरा वैसे कभी भी किसी से हमदर्दी या सलाह को न तो पसंद करती न ही उसे इसकी ज़रूरत महसूस होती. उसे अपनी परेशानी को किसी से शेयर करना भी अच्छा नहीं लगता था. लेकिन अवस्थी जी से अपनी सारी बातें परेशानियाँ और ज़रूरते शेयर करने में उसे कोई हिचकिचाहट या संकोच नहीं होता था. दरअसल, वह अवस्थी जी की बड़ी इज़्ज़त करती थी और अवस्थी जी भी उसका पूरा ख़याल रखते थे. वे हर तरह से उसकी मदद करने के लिए भी तैयार रहते. जब कभी वह उदास और मायूस होती, वह उसे हौसला रखने को कहते. डॉक्टर भटनागर के साथ आसरा के रिश्ते के वे क़ायल थे और उनकी ओर से उसे इस बात की पूरी छूट भी थी कि वह अपनी मर्ज़ी से उसके पास आ जा सकती थी और इसके लिए उसे आफ़िस के बारे में चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं थी. आफ़िस के लोगों को भी इस बात का एहसास था कि आसरा के मामले में अवस्थी जी उसके आने जाने या काम करने न करने को लेकर न कुछ कहना चाहते न सुनना चाहते थे. अक्सर वह दफ़्तर से गायब रहती. न कोई कुछ कहता न कुछ पूछता. आसरा इस छूट और आज़ादी से बेहद खुश थी.

अवस्थी जी को यह बहुत अच्छा लगता था की आसरा आस्था और विश्वास के मामले में बहुत ही परिपक्व और व्यावहारिक थी. वह सभी धर्मों के पर्व और त्योहारों में खुले मन से हिस्सा लेती थी. धार्मिक आयोजनों में भी वह बड़े मन से शामिल होती थी. उसे पूरा यक़ीन था कि अगर हम किसी को खुश रखते है या हमारी किसी बात या काम से किसी को खुशी और सुकून मिलता है तो बदले में हमे भी खुशी और सुकून मिलना तय है. वह सबाब हासिल करने में यक़ीन रखती थी इसलिए दूसरों को खुशी और सुकून पहुँचाने की कोशिश करती थी. उसे इस बात की तक़लीफ़ थी कि लोग उसकी इस सोच को समझते नहीं थे.

आसरा को वक़्त ने परेशान ज़रूर किया पर अब उसे सहलाने का समय आ रहा था. बच्चे बड़े हो रहे थे. उसे अपनी बीमारी से निजात मिल गया था. अनीस से बिना तलाक़ लिए डॉक्टर भटनागर से उसके रिश्ते को एक मुकाम मिल गया था. डॉक्टर भटनागर ने अपने कैरियर और ज़िंदगी के बारे में फ़ैसला कर लिया था और वह आसरा से अपने रिश्ते को लेकर पूरी तरह खुश और मुतमईंन था. अनीस और उसके परिवार वालों ने भी आसरा के फ़ैसलों और तौर तरीक़ों से समझौता कर लिया था. वह न तो परिवार से अलग हुई थी न ही उसने परिवार को छोड़ा ही था. वह अब भी परिवार में अपनी मौजूदगी और अपने फ़र्ज़ की अदायगी में किसी तरह की कोताही नहीं करती थी.

अमन और आयशा बड़े और समझदार हो गये थे. दोनों ही अपने पापा अनीस का पूरा ख़याल रखते, डॉक्टर भटनागर की पूरी इज़्ज़त करते थे. अवस्थी जी के लिए भी दोनों के मन में बड़ा आदर और सम्मान था.
अमन ने एम डी कर लिया था. कुछ समय बाद वह दुबई चला गया. आयशा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गयी और एक अच्छी एम एन सी मे जॉब करने लगी थी. तीन साल बाद दुबई से लौटकर अमन ने एक नर्सिंग होम बनवाया जिसका नाम आसरा नर्सिंग होम रखा गया. नर्सिंग होम के देख भाल की ज़िम्मेदारी डॉक्टर भटनागर ने संभाला और मैनजमेंट का काम आसरा संभालती थी.

अमन और आयशा ने अपने पापा के बिजनेस में और पैसे इनवेस्ट करके उसे और आगे ले जाने में पूरी दिलचस्पी ली. अनीस और आसरा अपने बच्चों पर नाज़ करते थे. अनीस को अपनी बीवी की समझदारी पर और आसरा को अपने अतीत पर गर्व था. डॉक्टर भटनागर की खुशी की वजह आसरा का बीमारी से निजात पाना और उसे खुश रखने की कोशिश में उसकी क़ामयाबी थी.

अवस्थी जी को इस बात की खुशी थी कि उन्होने जो सलाह, हिम्मत और हौसला आसरा को देने की कोशिश की उससे आसरा की ज़िंदगी मे नये मोड़ और नयी खुशियां आ सकी. उम्र और अनुभव को देखते हुए अवस्थी जी को इस बात से राहत थी कि कई बार उन्हें किसी आफ़त, हंगामे, बवाल और मुसीबत का डर बना रहा पर नसीब और हालात ने हमेशा आसरा को इन सब से दूर रखा और आज उसे वह मुकाम मिला जिसके बारे में शायद उसने भी नहीं सोचा होगा.

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कृष्ण गोपाल सिन्हा

अवध प्रभा,

६१, मयूर रेज़ीडेंसी,

लखनऊ-२२६०१६

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