बुधवार, 6 जुलाई 2011

हिमकर श्याम की कविता - उमड़ घुमड़ घन बदरा आये


उमड़ घुमड़ घन बदरा आये।
नयनों में बन कजरा छाये॥

खेतों में, खलिहानों में
धरती की मुस्‍कानों में
मन की गांठें खोल-खोल कर
प्रेम सुधा सब पर बरसाये।
उमड़ घुमड़ घन बदरा आये॥

चरवाहों के पट पड़ाव को
हरवाहों के मनोभाव को
यादों के हर घाव-घाव को
रह-रह कर याद दिलाये।
उमड़ घुमड़ घन बदरा आये॥

सरगम-सरगम शहर गांव है
आरोह-अवरोह भरा छांव है
पुरवइया मन के तारों पे
मौसम राग मल्‍हार सुनाये।
उमड़ घुमड़ घन बदरा आये॥


एक रस कण-कण को अर्पित
धरा द्रौपदी पुलकित-पुलकित
कोई देखो कौन समर्पित
कितने अस्‍फुट स्‍वर में गाये।
उमड़ घुमड़ घन बदरा आये॥

प्राणों की मौन पुकारों में
सारी रूठी मनुहारों में
गुल, गुलशन, गुलजारों मे
कौन ये जीवन रस छलकाये।
उमड़ घुमड़ घन बदरा आये॥                                       

 

हिमकर श्‍याम
द्वारा ः एन. पी. श्रीवास्‍तव
5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,
रांची ः 8, झारखंड।

4 blogger-facebook:

  1. Ek geyata liye,apnaahee sangeet liye rachee gayee hai ye rachana! Aprateem!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सरगम-सरगम शहर गांव है
    आरोह-अवरोह भरा छांव है
    पुरवइया मन के तारों पे
    मौसम राग मल्‍हार सुनाये।
    उमड़ घुमड़ घन बदरा आये॥
    --बहुत ही सुन्दर गीत है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्षमा जी, अल्पना जी,
    अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !
    यूँही अपने विचारों से अवगत कराती रहें.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहतरीन अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं

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