शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

कहानी संग्रह - आदमखोर - 4 - उर्मि कृष्ण की कहानी : संघर्ष पथ

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कहानी संग्रह

आदमखोर

(दहेज विषयक कहानियाँ)

संपादक

डॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’

प्रथम संस्करण : 2008

मूल्य : 150

प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन

विवेक विहार,

शाहदरा दिल्ली-32

शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा

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कहानी

संघर्ष पथ

डॉ. उर्मि कृष्ण

घर के पिछवाड़े बहने वाले नाले के जल पर इति की दृष्टि टिक गई, हाथ में था एक पत्र, यह उसका नियुक्ति पत्र था। आज वह सिटी मजिस्ट्रेट नियुक्त हुई थी। काश! आज वह दौड़कर माँ से लिपट सकती। दादी की गोद में मचल सकती, दीदी, भैया सबसे दौड़-दौड़ कर यह शुभ समाचार सुना सकती। इस घर में चौथी कन्या के रूप में जब उसका आगमन हुआ, तब तीन दिन घर में चूल्हा नहीं जला, दादी ने सिर पीट लिया, दादा ने पहले से बुलाकर बैठाए गए बैण्ड बाजे वाले सिर धुन-धुनकर लौटाए। उनके अनुसार भगवान इतनी निर्दयी थोड़े हो सकता है फिर पंडित जी ने पत्र देखकर इस बार बहू को लड़का होने की बात कही थी, नानी, ताई, अड़ोसन-पड़ोसन सबने मातमी सूरत से उसे देखा। ‘‘बेटा बनकर आ जाती,‘‘ ये शब्द उसे कॉलेज में पढ़ने आ गई, तब तक सुनने को मिलते रहे, ये शब्द कान में पड़ने तब बंद हुए, जब बोलने वालों को वह स्वयं झिड़कने लगी। दूध की जगह पानी और फल की जगह सूखी रोटियां खा-खाकर ‘इति’ पलने लगी।

वही भोला बचपन, वही किलकारी, वही ताता-थैया। इति बढ़ने लगी इति की बाल सुलभ चेष्टाओं पर कोई ध्यान नहीं देता। माँ काम में व्यस्त रहती, पिता तो उसे देखते तक नहीं। बस, देवी के आगे बैठे घंटों पाठ करते रहते। एक पुत्र की प्रबल कामना, इस ढलती उम्र में भी बनी हुई थी, पुत्र बिना कैसे होगा जीवन का उद्धार, कैसे होगी बुढ़ापे की नैया पार और कैसे होंगे स्वर्ग के अधिकारी श्राद्ध-तर्पण के बिना हाय री किस्मत! चार बेटियों में एक भी लड़का नहीं, ये किसे बांधे राखी? किसे करें भैया दूज का टीका? किसकी उतारेंगी आरती? कौन उन्हें ससुराल लेने जाएगा? कौन मौसर में उनके यहां खड़ा होगा? उम्र के साथ पिता का दुःख भी बढ़ता जा रहा था। इति ने कमरे की ओर गर्दन घुमाई, पिता का चित्र सामने टंगा था। केवल एक बरस पहले तक पिता इस घर में चलते-फिरते थे। जिस माँ से दो क्षण बात करने का समय नहीं था, उसके बिना दो दिन नहीं निकाल सके। इति फिर स्मृतियों में लौट गई। आखिर दुःख हल्का करने के लिए दादी ने कुटुंब का एक लड़का माता-पिता की गोद में डाल दिया, इस छोटे भाई को देख इति खुश नहीं हुई, ईर्ष्या से भर उठी। जब भैया गोद लिया गया, उस समय इति की उम्र मात्र छः साल थी, इस नन्हीं उम्र में बहुत समझदार होते हुंए भी कई बार वह दुष्ट चेष्टाएं कर जाती, ईर्ष्यावश भैया का दूध चुपके से पी जाती। जब भी उसके नये कपड़े आते, उन्हें फाड़ डालती। कई बार कैंची से वह भैया के टेढ़े-मेढ़े बाल भी काट देती थी। इस तरह की हरकतों पर इति की जमकर पिटाई होती, बेचारी छोटी थी। हर कोई उसे पीट देता। माँ-पिता, दादी, भैया, सबका क्रोध जहाँ ठहरता, इति ही रहती। शरारत करके वह सदा इसी नाले के पास झाड़ी में छिप जाया करती।

इति को बड़ी लापरवाही से छः वर्ष की उम्र में पढ़ने बैठाया गया। लड़की की जात है जमाना बदल रहा है, इतना तो पढ़ा ही दो कि चिट्ठी-पत्री लिख सके, पिता के सारे दोस्त मित्र जब उनकी नाक में दम करने लगे, तब उन्होंने इति को पढ़ने बैठा ही दिया। पढ़ने में वह बहुत तेज थी। कई व्यवधानों के बावजूद वह कॉलेज पहुँच गई। उसकी पढ़ाई के खर्चे का भार वह जिस स्कूल, कॉलेज में पढ़ती वे उठाने को तैयार रहते। कुशाग्र बुद्धि इति कभी-किसी कक्षा में दूसरे नंबर पर तो रही ही नहीं, सदा प्रथम आती थी।

छोटी होने के कारण घर भर उस पर हुक्म चलाता रहता। एक के बाद एक काम उसे निपटाने पड़ते। सबसे ज्यादा क्रोध इति को तब आता, जब उसे पिता के पूजा-पाठ की तैयारी करनी पड़ती या छोटे भाई का काम करना पड़ता। दादी साफ शब्दों में कहती थी।

‘‘भाई तो माँ-बाप को कमाई खिलाएगा। तुम लड़कियां सिवाय भार के और क्या बनोगी?’’

‘‘दादी, ऐसी बात दुबारा जुबान पर न लाना’’ एक दिन क्रोध से भरी इति ने दादी को खूब झिड़का था।

‘‘हाँ, हाँ तू बड़ी लाटसाब बनेगी ना। बड़ी आई दादी को झिड़कने वाली।’’

‘‘दादी, मैं जो कुछ भी बनूंगी, उसे देखने के लिए तू जिंदा रहना।’’ बड़ा गर्व भरा और आहत स्वर था इति का।

आज दादी होती तो वह सबसे पहले उसको यह शुभ समाचार सुनाती। इति की आँखों से दो आँसू टपक पड़े।

परिवार की उपेक्षा ने इति को एक संघर्षशील नारी बना दिया था। अब वह घर-बाहर, सभी से पंगा लेती और जीत कर रहती, वह हर जगह अग्रणी रहती। क्या कॉलेज का चुनाव, क्या सखी-सहेलियों की गोष्ठी, क्या कोई उत्सव-आयोजन, घर में अब उनकी उपेक्षा घटने लगी थी। अपनी पढ़ाई और बाहरी काम के साथ-साथ वह अपनी माँ के काम में पूरा-पूरा हाथ बंटाती थी, माँ के ऊपर घर का जितना बोझ था, उससे वह बहुत दुखी भी रहती थी कई बार बहस करके उसने भाई और पिता से कहा था कि वे माँ को मशीन न समझें। रात-बिरात कभी भी आकर उस पर हुक्म न चलाएं। अपना काम कुछ तो स्वयं भी कर लिया करें।

उसकी इस बात पर भाई तो लड़ने को आ जाता, पर पिता अब कुछ समझने लगे थे। अब उन्हें अपनी इस चौथी कन्या का महत्व समझ में आने लगा था। उसकी कर्मठता, निश्छल-चंचल, मिलनसार स्वभाव, कुशाग्र बुद्धि और रूप से प्रभावित हो कुछ धनवान घरों से रिश्ते उसके लिए आने लगे थे। अपनी तीन बेटियों के लिए धूप-छांव में जूतियां घिस चुके पिता के पास बेटी के लिए रिश्ता आना गर्व की बात थी। इस गर्व से वे अपने बुझे मन को काफी उत्साहित कर चुके थे, वे अपने मन में तो निश्चय कर चुके थे, किंतु बदलती दुनिया और विद्रोही स्वभाव की बेटी के कारण उन्होंने सोचा कि एक बार बेटी इति को यह बता दें।

‘‘बेटी इति, इधर तो आओ।’’

आज जितने प्यार से इति को उन्होंने बुलाया, इससे इति आश्चर्यचकित थी।

‘‘जी पापा,’’ कहकर वह पिता के सम्मुख आ गई।

‘‘बैठो बेटी’’

इति बैठ गई और आगे किसी पहाड़ के सिर पर टूटे पड़ने-सी मुसीबत का अंदाजा लगा, मौन सिर झुकाए बैठी रही।

‘‘बेटी, लगता है अब हमारे अच्छे दिन फिर आने लगे हैं।’’

‘‘अच्छा! क्या गणेश ने आगे पढ़ाई करने का सोच लिया है?’’

‘‘उसकी बात नहीं है बेटी। बेटा गणेश यदि दसवीं से आगे नहीं पढ़ता तो मैं उसे कुछ-न-कुछ व्यवसाय करवा दूंगा।’’

‘‘किसी भी व्यवसाय को चलाने के लिए अक्ल और उससे भी पहले पैसा चाहिए पापा।’’

‘‘हाँ, सच कहती हो बेटी। अक्ल तो पैसा होने पर और कुछ उम्र बढ़ने पर आ जाती है।’’

‘‘पर पिताजी, पैसा आएगा कहाँ से? मुझसे कुछ छिपा नहीं है। आपकी पास बुक में कभी हजार रुपये नहीं हो पाए। आपकी रिटायरमेंट को केवल कुछ मास बाकी हैं।’’

‘‘यह सब क्या मैं नहीं जानता बेटी?’’

‘‘फिर......?’’ इति पिता का मुँह ताक रही थी। और इस बात पर वह आश्चर्य भी कर रही थी कि पिता के सामने अब इतनी बात करने का उसमें साहस आ गया है।

‘‘बेटी, आज चावल वालों की बुआ आई थी।’’

‘‘किसलिए?’’ पिता की बात आगे सुनने से पहले ही वह बोल पड़ी।

‘‘बेटी इति, आज हमारे भाग्य खुल गए हैं, इतने धनवान घर से तुम्हारे लिए रिश्ता लेकर आई थीं वह।’’

‘‘पर मुझे तो अभी पढ़ाई करनी है पापा।’’

‘‘लड़की के लिए रिश्ता आना बहुत बड़ी बात है बेटी इतने धनवान घर में चली जाओ तो पढ़ाई-लिखाई का क्या करना है।’’

इति बोली कुछ नहीं, क्रोध से तमतमा उठी।

‘‘इति, वे लोग कहते हैं कि तुम्हारे भाई गणेश को भी अपने व्यवसाय में लगा लेंगे।’’

‘‘पापा, मैं पढ़ाई पूरी करुंगी, इसके आगे कुछ नहीं जानती।’’ इति पैर पटकती कमरे में आ गई।

दो दिन बाद माँ ने इति को बड़े प्यार से समझाया था, ‘‘बेटी इति, पिता की बात मान ले। अब हमारे पास कुछ बचा भी नहीं है कैसे करेंगे तेरी शादी?’’

‘‘माँ, तुम तो कुछ सोचकर बोलो।’’

‘‘मैं सोचकर ही बोल रही हूँ बेटी। अपने भैया की सोच, हमारी सोच। बड़े घर में संबंध हो जाएगा तो इज्जत के साथ-साथ घर का दरिद्र भी धुल जाएगा।’’

‘‘माँ, लगता है तुम उल्टा दहेज लोगी? ऐसा क्या है मुझमें, जो वे लोग मुझे माँग रहे हैं?’’

‘‘बेटी, घर संभालने वाली सुशील लड़की चाहते हैं वे, लड़के की माँ छोटी उमर में ही चल बसी थी। घर बरबाद हो रहा है उनका।’’

‘‘उनका घर बचाने के लिए तुम मेरा हवन करना चाहती हो?’’

‘‘बेटी, मैं अपना घर पहले बचाना चाहती हूँ।’’

‘‘अपना घर बचाना चाहती हो तो मेरी शादी छोड़, पढ़ाई पूरी करने दो मुझे।’’

‘‘इति, ऐसा घर-बार भाग्य से मिलता है तेरी बड़ी तीन बहनों की शादी के लिए जो कष्ट हमने झेले हैं, हमीं जानते हैं।’’

‘‘माँ, स्कॉलरशिप भी बार-बार नहीं मिलती। मेरा पक्का निर्णय सुन लो। मैं पढ़ाई पूरी करके नौकरी करूँगी। शादी के लिए उसके बाद सोचूंगी।’’

माँ उदास और चुप हो गई। बेटी के आगे आज उसे हार माननी पड़ी।

‘‘इति’’ उसके धीमे शब्द निकल पड़े। ‘‘तेरे भाई का क्या होगा? न पढ़ रहा है, न कुछ काम सीख रहा है।’’

‘‘आपने बेटा इसलिए तो नहीं पाला कि उसकी चिंता में अपना बुढ़ापा गला दो?’’ कुछ क्रोध में बात कहती इति बाहर बरामदे में आ गई। कुछ देर माँ निरुपाय सिर पकड़कर बैठी रही। फिर साहस कर उठी। पति की ओर देखा और उनके इंगित करने पर फिर बेटी के सम्मुख आ खड़ी हुई।

‘‘इति बेटी.......।’’

इति एकटक बाहर देखती रही। मानो उसकी दृष्टि पथरा गई हो।

‘‘बेटी,’’ माँ ने कहना आरंभ किया, ‘‘तू इतनी समझदार है नासमझ मत बन, आज तो लड़के वाले तुझे मांग रहे हैं, स्वयं लड़के ने तुझे पसंद कर लिया है। सोच, हम नहीं रहेंगे, भाई समर्थ नहीं होगा, रिश्ता भी नही हो सकेगा, फिर क्या होगा? यह बदनामी बहुत बड़ी होती है कि लड़की ने रिश्ता ठुकरा दिया.......फिर क्या होगा बेटी?’’ माँ ने सिर पीट लिया और रो पड़ी।

‘‘माँ, बस करो, बंद करो यह भाषण मैं अपना भविष्य स्वयं बनाना चाहती हूँ, मैं ऐसी नारी नहीं बनना चाहती, जो केवल पिता, भाई या परिरक्षिता हो’’ बेटी का निर्णय सुन माँ सन्न रह गई थी।

उसके बाद तो दो वर्षों में क्या-क्या नहीं बीत गया। अर्ध शिक्षित भाई किसी तरह दुबई भेज दिया गया। माँ बेटी के निर्णय की आंधी में टिक नहीं सकी। बेटी और पति के विचारोें के बीच झूलती उस नारी ने गहरी नींद सो जाना ही अच्छा समझा।

दो वर्ष तक कठिन परिश्रम करके इति प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई और इति सिटी मजिस्ट्रेट नियुक्त हुई।

पर आज वह इस शुभ समाचार को किसे सुनाए? सामने बहते पहाड़ी नाले के जल को देख इति मुस्कुरा दी। यह जल भी तो अपना पथ खोजकर निरंतर आगे बढ़ रहा है। फिर हम क्यों स्थिर हो जाएं? अभी तो पूरे जीवन का संघर्ष पथ आगे पड़ा हुआ है। ’’’

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शुभतारिका,

कहानी लेखन महाविद्यालय,47-ए,

शास्त्री कॉलोनी, अम्बाला छावनी (हरि.)

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