मंगलवार, 9 अगस्त 2011

सुमित शर्मा की कविता

सुमित शर्मा

अलग-अलग नावों पर बैठे,

बस अपनी ही नैया खेते,

जुट जाओ माँझियों यूँ कि मानवतारूपी जलयान तरे,

आओ फिर समाज-निर्माण करें।

 

धूँ-धूँ जलता तंत्र ये अपना,

बिखर रहा बापू का सपना,

इन स्‍वप्‍नों को संजोने फिर, निज-शक्‍ति का आह्‍वान करें,

आओ फिर समाज-निर्माण करें।

 

अपने आप से एक रण हों,

मन में बस भाव समर्पण हों,

देशप्रेम की भागीरथी में सामूहिक स्‍नान करें,

आओ फिर समाज-निर्माण करें।

 

शक्‍ति प्रेरक हो, दम्‍भ न हो,

सृजन में अब विलम्‍ब न हो,

बल के मद से मूर्छित जग में, भारत फिर नव-प्राण भरे,

आओ फिर समाज-निर्माण करें।

 

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- सुमित शर्मा

आत्‍म-परिचय

नाम - सुमित शर्मा

जन्‍मतिथी - 31 जनवरी 1992

पता - तहसील चौराहा,गायत्री कालोनी,

खिलचीपुर, जिला- राजगढ़, म.प्र.

 

शिक्षा - बी.ई.-चतुर्थ वर्श (कम्‍प्‍यूटर साइंस) अध्‍ययनरत

साहित्‍यिक रचनाएँ - चलती रहेगी मधुशाला(काव्‍य) , रिश्‍ते (उपन्‍यास), कुछ कवितायें/गजले, लघु कहानियाँ । (सभी अप्रकाशित )

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