उमेश कुमार यादव की दो रचनाएँ

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  कविता - देख मोर मनवा रोई............. दुराचारी और दुष्ट प्रवृति जिस मनई की जाति छोड़ न पयिहैं आदतें कर लो कठिन उपाय   पापी और ये नीच...

 

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कविता -

देख मोर मनवा रोई.............

दुराचारी और दुष्ट प्रवृति

जिस मनई की जाति

छोड़ न पयिहैं आदतें

कर लो कठिन उपाय

 

पापी और ये नीच आत्मा

सदा लात ही खात

कहत कबीर सुनो भाई साधो

याद रखो ये बात

 

पंडित नाम लिखाई के

पंडित भवा न जाय

कबीरा इस संसार में

पापी, नीच कछु लोग

मुँह में राम बगल में रानी

शर्म नहीं कछु थोड़

 

औरों की चिन्ता करे

पर अपनी चिन्ता छोड़

ज्ञान बाँटते रहते हरदम

अज्ञानी खुद होई

अपनी कोई सुध नहीं

पर औरों की सुध होई

ढोंगी ऐसे नरन को

देख मोर मनवा रोई

भगवन के संसार में

इनकी दुर्गती होई

 

एक दिन ऐसा आयेगा

जब होगा तेरा न्याय

धरती से जाने से पहले

होगा तेरा हिसाब ।

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हिन्दुस्तान में हिन्दी के प्रचार प्रसार का प्रभावी एवं सशक्त माध्यम – बॉलीवुड एवं दूरदर्शन

हिन्दी फिल्में लोकप्रिय हो चुकी हैं. चाहे जो भी भाषा-भाषी हो, हिन्दी फिल्म अवश्य देखते हैं। उनके हिट गानें अवश्य गुनगुनाते हैं, भले ही उसका अर्थ नहीं पता हो। क्योंकि आज लोगों को लगने लगा है कि यदि नाम कमाना है या फिर लोकप्रिय बनना है तो हिन्दी फिल्मों से जुड़ना आवश्यक है। यदि आप आंकड़े देखें तो पायेंगे कि अहिन्दी भाषी व्यक्तियों को जितनी जनप्रियता हिन्दी फिल्मों से मिली है उतनी अपनी क्षेत्रीय भाषा से नहीं। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं। जैसे – बप्पी लाहिड़ी, किशोर कुमार, अशोक कुमार व कुमार शानू इन सबकी मातृभाषा बंगला है पर ये चमके हैं तो बस हिन्दी से ही। आप अब तनिक सोचें तो पायेंगे कि आदमी भाषा के क्षेत्र में भी कितना स्वार्थी हो चुका है। यदि किसी भाषा से फायदा है तभी उसे बोलेंगे या पढ़ेंगे नहीं तो अपनी भाषा से ही लटके रहेंगे। बहुत ऐसे गैर हिन्दी भाषी हैं जो अपनी जरुरत के अनुसार हिन्दी का अनुसरण करते हैं पर जब राष्ट्रहित में हिन्दी को बढावा देने या समर्थन देने की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं। कहते हैं कि यह मेरी भाषा नहीं है। हम क्यों करें ? हमारे साथ अन्याय हुआ है। हमारी भाषा को ही राष्ट्रभाषा होना चाहिये था। अभी जरुरत है तो बस मानसिकता बदलने की। वैसे हम अहिन्दी भाषी को ही दोष क्यों दें ? इसपर एक उदाहरण देखें।

जिस कारखाने में मैं काम करता हूँ वहाँ मैंने यह अनुभव किया है कि बहुत सारे ऐसे हिन्दी भाषी भी रहते हैं जिनकी मातृभाषा हिन्दी होते हुए भी उन्हें हिन्दी में कार्यालयीन कार्य करने में शर्मिंदगी महसूस होती है। उन्हें ऐसा लगता है कि यदि मैंने हिन्दी में कुछ लिखा-पढ़ा तो लोग हमें क्या कहेंगे ? शायद कहीं उन्हें ऐसा न लगने लगे कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती है। यानी अंग्रेजी लिखना और बोलना कितने फख्र की बात है ! अंग्रेज चले गये पर अपनी छाप छोड़ गये। भले ही शुद्ध शुद्ध अंग्रेजी लिखनी न आती हो पर अंग्रेजी ही लिखेंगे और बोलने में भी अपनी शान समझेंगे पर अपनी राष्ट्रभाषा में कार्यालयीन कार्य करने का प्रयास करना भी ऐसे लोगों को पसन्द नहीं है। यानी कि बातें बड़ी बड़ी पर हिन्दी के विरोध में। कहने का मतलब कि अपने थोथे दिमाग में इतने भ्रम पाल रखें गये हैं कि अंग्रेजी के बगैर एक पग भी आगे बढ़ने की सोच नहीं सकते। मानते हैं कि अंग्रेजों ने अपने भाषा को जबरन थोपा पर यह तो उनकी सफलता है, आप ने स्वीकार कर लिया यहीं तो आपकी असफलता की शुरुआत हो गई। कहा भी गया है कि जुल्म करने वाले से ज्यादा गुनाहगार होता है जुल्म सहन या स्वीकार करने वाला। आज के दिन में अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनकर सामने आयी है। यह भी सही है कि आज के तारीख में अंग्रेजी भाषा बहुत से लोगों के लिये जरुरत बन चुकी है पर मजबूरी नहीं। वो चाहे तो हिन्दी को भी अंग्रेजी की तरह प्रयोग में ला सकते हैं। अंग्रेजी एक सम्पर्क भाषा है जिससे हम अलग-अलग भाषा वाले चाहे वह किसी प्रदेश के हों या देश के, अपने विचारों को एक दूसरे से आदान-प्रदान कर पाते हैं। पर यह यहीं तक ठीक है। आप अपने ज्ञान को, अनुभव को यदि अपने भाषा में कलमबद्ध करेंगे तो इससे इस देश का भविष्य जो नन्हे पौधे के रुप में शहरों से अति दूर सम्पूर्ण सुविधा-रहित गावों में पनप रहे हैं, आपके द्वारा लिखे गये पुस्तकों को पढ़कर एक दिन हिन्दुस्तान को छाया प्रदान करने वाले वृक्ष का रुप ले पायेंगे।

खैर हम बात कर रहे थे बॉलीवुड और दूरदर्शन की। आज के युग में मीडिया के माध्यम से हिन्दी का प्रचार-प्रसार काफ़ी हद तक बढ़ा है। चलचित्र और मीडिया ज्ञान का एक ऐसा श्रोत है जिसके माध्यम से जो बातें हम सुनते और देखते हैं वह मन मस्तिष्क में इस तरह रिकार्ड हो जाता है जिसे मिटा पाना असम्भव है। यदि आप सरकारी और प्रशासनिक तौर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बातें करते हैं तो उसका विभिन्न तरिकों से विरोध प्रदर्शन सामने आता हैं क्योंकि हिन्दुस्तान में भिन्न भिन्न विचारधारा और भाषा वाले लोग रहते हैं और वे कुछ भी बोलने और करने के लिये पूरी आजादी पाये हुये हैं। पर इस आजादी को वे राष्ट्रहित में नहीं राष्ट्र के विरोध में इस्तेमाल करते हैं।

पहले भी और आज भी बॉलीवुड फिल्म जगत ने अनेकानेक हिन्दी फिल्में बनायी है। विभिन्न निर्देशकों ने अलग अलग क्षेत्र से आये हुए भिन्न भिन्न भाषाओं के कलाकारों के माध्यम से हिन्दी फिल्म की गुणवत्ता को और ज्यादा निखार प्रदान किया है।

हिन्दी जगत में यदि मीडिया के योगदान को देखा जाये तो हमें पता चलता है कि मीडिया के विभिन्न अंगों ने मिलकर हिन्दी को जन जन तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

समाचार पत्रों के हिन्दी संस्करणों ने भारत वर्ष में अपना स्थान बना लिया है। प्राय: हरेक अंग्रेजी समाचार पत्रों का हिन्दी संस्करण निकल चुका है। जैसे – टाईम्स ऑफ इन्डिया, हिन्दुस्तान टाईम्स, इकनॉमिक्स टाईम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड आदि अनेकों अखबारों के हिन्दी संस्करण बाजार में उपलब्ध हो चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ ? देर से ही सही पर इन्हें एहसास तो हुआ कि इस देश की आधी से अधिक आबादी ऐसी है जो केवल हिन्दी समझती है और बची आधे की आधी आबादी ऐसी है जो इनकी क्लिष्ट और लम्बी चौड़ी अंग्रेजी समझ नहीं पाती है। अतः यदि उन्हें अपने अखबार का व्यापार बढ़ाना है तो सरल एवं सहजता से समझी जाने वाली हिन्दी में अखबार छापना होगा जिसे आम गाँव तक का आदमी भी देश दुनिया के खबरों से अवगत हो जाये और उन्होंने ऐसा ही किया जिसका लाभ आज आम जनता उठा रही है।

दूसरे तरफ हिन्दी मे समाचार पढ़ने वाले चैनलों की संख्या में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है तथा इनकी गुणवत्ता भी पहले से अधिक अच्छी हुई है। जैसे – एन डी टी वी इन्डिया, स्टार न्यूज़, तेज, आज तक, सहारा समय, ई टी वी न्यूज़, जी न्यूज़, डी डी न्यूज़ इत्यादि।

अन्त में बात करते हैं टेलीविजन के हिन्दी धारावाहिकों की। अनेकानेक टेलीविजन चैनलों के अनेकानेक हिन्दी धारावाहिकों ने तो क्या हिन्दी भाषी बल्कि अहिन्दी भाषी परिवारों में भी एक भावुक जगह बनाने में एक हद तक कामयाबी हासिल कर ली है। अभी ऐसा हो गया है जैसे महिलाओं को भले ही खाना पकाने में देर हो जाये या सोने में देर हो जाये पर उन हिन्दी धारावाहिकों को तो देखना ही है। इसका बहुत कुछ श्रेय जाता है एकता कपूर को। इस तरह से जो महिलाएँ और पुरुष हिन्दी लिखना, पढ़ना या बोलना भले ही न जानते हों पर अच्छी तरह से हिन्दी समझ तो लेते ही हैं। इतना योगदान ही क्या कम है ?

भले व्यापार ही सही पर व्यापार के माध्यम से ही लोगों में हिन्दी जानने की इच्छा तो जागी है। जिन जिन धारावाहिकों ने समाज में हिन्दी प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभायी है या अभी भी निभा रही है उनके नाम कुछ इस तरह हैं - STAR PLUS की “सास भी कभी बहु थी, कहानी घर घर की, कसौटी जिन्दगी की, प्रतिज्ञा, ये रिश्ता क्या कहलाता है, आप की कचहरी, हमारी देवरानी”। ZEE TV की “मेंहदी तेरे नाम की, सिंदूर, छोटी बहु, पवित्र रिश्ता, छोटी सी जिन्दगी, अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो, शोभा सोमनाथ की, खिचड़ी, बनूँ मैं तेरी दुल्हन”। COLORS की “लागी तुझसे लगन, बालिका वधु, ससुराल सिमर का, हमारी सास लिला, ना आना इस देश में लाडो, उत्तरन”। SONY की “अब होगा फुल ऑन, कॉमेडी सर्कस का नया दौर, X फेक्टर”। NDTV IMAGINE की “द्वारकाधीश, बींद बनूंगा घोड़ी चढ़ूँगा, बाबा ऐसो वर ढूंढो, चन्द्रगुप्त मौर्य, महिमा शनि देव की, अरमानों का बलिदान-आरक्षण”। SAB TV की “ऑफिस ऑफिस, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, लापतागंज”। यह कार्य आज तक भारत सरकार अपने किसी भी नियमों और नीतियों के तहत सम्पूर्ण रुप से नहीं कर पायी है क्योंकि भारत सरकार ये सारे कार्य कागजों में ही करती आ रही है। व्यहारिक धरातल पर कुछ भी नहीं हुआ है और हो भी तो कैसे, इनके कार्यकारी अधिकारियों में इच्छाशक्ति ही नहीं है। केवल आंकड़ों और प्रतिवर्ष हिन्दी प्रचार-प्रसार के लिये धनराशि मुहैया कराने का खेल ही चल रहा है और शायद चलता भी रहेगा।

अन्त में मैं यह कहना चाहूँगा कि सबकुछ एकतरफ और इच्छाशक्ति एकतरफ। यदि कोई लाख कोशिश कर लें पर यदि हमारे दिल में हिन्दी के प्रति या राष्ट्रहित के प्रति जागरुकता नहीं है या कुछ सृजनात्मक चाहत नहीं है तो कोई भी हमें हिन्दी नहीं सीखा सकता है।

अतः जरुरत है हिन्दी विकास के प्रति नेक भावना की जो एकमात्र नेक सोच और राष्ट्र प्रेम से ही पैदा की जा सकती है। जरुरत है अपनी घटिया सोच को बदलने की।

तुलसीदास जी ने कहा भी है - जिसकी रही भावना जैसी...प्रभु मूरति तिन देखहुँ तैसी...

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उमेश कुमार यादव / Umesh Kumar yadav

मकान सं.- 25/2 / Qrt No. C-25/2

नोट मुद्रण नगर / Note Mudran Nagar

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Salboni, Post Office - RBNML

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नाम

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: उमेश कुमार यादव की दो रचनाएँ
उमेश कुमार यादव की दो रचनाएँ
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