सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - आओ कहें दिल की बात... किश्त 3

धारावाहिक की पिछली कड़ियाँ - एक , दो,

आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी

(3)

आई लव यू बाबा...!

बाबा...!

बहुत दिनों से आपको, दिल में जो है वो बताने का मन था. वो बात... जो मेरे दिल में एक पत्थर की तरह चुभके बैठी थी. आज कह देता हूँ बस....

बचपन से मैं खुद को दूसरों से कम...या बदनसीब समझता था. वो सब जो बाकी लोगों को मिल रहा है...वो मुझे क्यों नहीं मिल रहा था...? वो खिलौने...वो घड़ी...वो कपड़े...अन्दर से खुद को खाली और कमजोर महसूस करता था...

कई साल हुए और... मैंने “कालीकत” में कॉलेज ज्वाइन किया. जरुरत बढ़ने लगी. मेरी मांग थी...नए शहर में सबके साथ जो रखना था खुद को...मुझे याद है...मेरा फ्रस्ट्रेट होना...जब मुझे पैसे सही टाइम पे नहीं मिलते थे...किताबें...जो बहुत जरुरी थीं....खरीद नहीं सकता था...

मैंने कभी ये नहीं सोचा कि पैसे आते कहाँ से थे...मेरे कपड़े...मेरी किताबें...

मुझे याद है...वो दिन...वो बात...मैं कॉलेज में थर्ड ईयर में था...सब लोग कम्प्यूटर पे ड्राइंग बनाते थे...मैं...जब लोग सो जाते, उनके कम्प्यूटर का इस्तेमाल करता......गुस्से से लाल...मेरे पिताजी क्यों नहीं दे पाते ये सब...? क्यों...?

इस “क्यों” के चक्कर में मैंने आपकी वो हिस्ट्री जो शायद हुई ही नहीं, बना दी... “आप ने लाईफ में कुछ नहीं कमाया...कुछ नहीं जोड़ा...ना खुद के लिए...ना हमसब के लिए...”

मैं घर आया था छुट्टी में... और आपको अल्टीमेटम दे दिया... “बस...! मैं जा रहा हूँ कॉलेज में.... काम नहीं करूँगा जब तक कम्प्यूटर नहीं आता...!”

मुझे नब्बे दिनों बाद पैसे मिले... कम्प्यूटर लिया....ओह...! क्या दिन था....! खूब इस्तेमाल किया...मैं तो अब सब के साथ बैठने लायक हो गया था न...!

पासआउट होने के बाद...जब मैं और “आई” बैठे थे...मैंने पूछा, “पैसे कहाँ से आए थे कम्प्यूटर के लिए...?” पता चला... “खेतों को गिरवी रखकर...!”

रो पड़ा............

आज पाँच सालों से कमाता हूँ...एक भी पैसा नहीं दिया...खुद पे शर्म आती है...

कई दिनों से कहना था...आई लव यू बाबा...!!!

मेरा सौभाग्य है कि आप मेरे बाबा हैं....!

(अगले अंकों में जारी...)

--

-कैस जौनपुरी

 

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

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