शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

कैस जौनपुरी की कहानी - भग्नावेश

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रफीक अपने ऑफिस जा रहा था. ऑटोरिक्शा में बैठके मोबाइल पे गाने सुन रहा था. रास्ते में दुनिया भर की चीजों को देखता हुआ जा रहा था. “इस शहर में कितनी भीड़ है...!” यही बात उसके मन में आ-जा रही थी. वो देख रहा था कि “लोग भीड़ में आ रहे हैं...जा रहे हैं. हर कोई अपने-अपने काम में लगा हुआ है. और दुनिया चल रही है....”

तभी रफीक का ऑफिस आ गया. वो रिक्शा से उतरा. किराये के पैसे दिए. कुल अठ्ठाईस रुपये हुए थे. रफीक ने दस-दस के तीन नोट दिए. ड्राईवर ने दो रूपये वापस किए. रफीक ने एक-एक रुपये के दो सिक्के अपनी जेब में रख लिए.

तभी रफीक की नजर सड़क के किनारे पड़ी एक मूर्ति पर पड़ी. मूर्ति किसी देवी की लग रही थी. वहीं बगल में एनर्जी ड्रिंक बेचने वाले की एक छोटी सी दुकान थी. मूर्ति दुकान की दीवार से टेक लगाकर रखी हुई थी. रफीक मूर्ति के पास पहुँच गया. उसे मूर्ति बहुत सुन्दर लग रही थी. अच्छी लग रही थी. वो चाह रहा था कि इस मूर्ति की फोटो खींच ले. फिर जब चाहे इसे देख सकता है. अपने हिन्दू मित्रों को दिखा सकता है. मुसलमान दोस्त तो देखने से रहे. उल्टा उसे ही उल्टा-सीधा सुनाने लगते. मगर रफीक को इन सब बातों की परवाह नहीं थी. उसे तो वो मूर्ति बड़ी अच्छी लगी थी और वो उस मूर्ति की फोटो अपने पास रखना चाह रहा था.

उसने अपना मोबाइल निकाला. फोटो खींचने के लिए उसने उस दुकान वाले से कहा, “जरा सा फोटो खींचना है इस मूर्ति का...” दुकानदार कुछ नहीं बोला. ऐसा लगा जैसे उसे क्या फर्क पड़ता है. तुम चाहे फोटो खींचो या मत खींचो. उसके चेहरे के हाव-भाव से ऐसा लग रहा था जैसे वो कहना चाह रहा हो, “तो मैं क्या करूँ...? फोटो खींचो ना...! मैंने मना किया क्या...?” उसकी तरफ से कोई जवाब न मिलने पर रफीक फोटो का पोज सही करने लगा.

दरअसल मूर्ति टूटी हुई थी. वो दुर्गा जी की मूर्ति लग रही थी. सिर्फ कमर के ऊपर का हिस्सा बचा था. पूरे हाथ भी नहीं थे. और मूर्ति दीवार से टेक लगा के रखी गई थी. लेकिन मूर्ति के चहरे पे एक चमक थी जो फीकी नहीं पड़ी थी. बारिश में खराब होने के बाद भी चेहरे का भाव एकदम देवियों वाला ही था. शक्तिशाली...बस उनके हाथ में भाला नहीं था. शायद वो सरस्वती जी की मूर्ति रही हो. रफीक को ज्यादा पता तो था नहीं. जितना उसने देखा है दुर्गा जी के कई हाथ होते हैं. लेकिन इस मूर्ति के सिर्फ दो ही हाथ थे. इसलिए शायद ये दुर्गा जी की मूर्ति नहीं थी. रफीक को इस बात से कोई लेना-देना भी नहीं था.

उसे तो उस कलाकार की कला पसन्द आ गई थी जिसने इस मूर्ति को बनाया था. जो इतना कुछ होने के बावुजूद भी एक सुन्दर रचना लग रही थी. मगर पता नहीं किस वजह से यहाँ पड़ी थी. शायद बिकी न हो...

रफीक ने चाहा कि “ये दुकान वाला कुछ बोल नहीं रहा है तो अब फोटो ले ही लेता हूँ.” उसने अपने मोबाईल का कैमरा सेट किया. मूर्ति मोबाईल में और सुन्दर लग रही थी... और फोटो बस क्लिक होने ही वाली थी कि पीछे से किसी ने टोक दिया.

“भाईसाब...! फोटो मत लीजिए...!”

रफीक ने मुड़ के देखा. एक आदमी साईकिल लेके पैदल जा रहा था. रफीक को फोटो खींचने से मना कर दिया. रफीक को अच्छा तो नहीं लगा मगर उसने जानना चाहा कि “फोटो खींचने में बुराई क्या है...?”

उसने उस अजनबी आदमी से कहा, “क्यूँ...?”

अब वो आदमी अपनी पण्डिताई झाड़ने लगा.... “ये मूर्ति पूरी नहीं बनी है...भग्नावेश में है. फोटो मत लीजिए.” रफीक ने उस आदमी को ध्यान से देखा और सोचा, “इसे बड़ा पता है...!”

वो आदमी था तो पैदल. मगर शकल से कोई पण्डित ही लग रहा था. उसका चेहरा साँवला था मगर उसके माथे पे लगा लाल और सफेद लम्बा टीका चमक रहा था.

रफीक ने कहा, “अच्छा जी...?”

उस अजनबी ने कहा, “क्या है कि ये मूर्ति पूरी नहीं बनी है. जिसने बनाई है इसे यहीं छोड़ गया है. बारिश से खराब हो गई है. लेकिन भग्नावेश में है इसलिए फोटो नहीं लेना चाहिए...”

रफीक ने कहा, “ठीक है...”

रफीक वहाँ से चल दिया मगर उसने मुड़के उस मूर्ति को देखा. उसे मूर्ति अब भी वैसी ही सुन्दर लग रही थी. मूर्ति की नजर आसमान की तरफ थी. ऐसा लग रहा था जैसे मूर्ति आसमान से पूछ रही हो कि “ये क्या मुसीबत है...? इतने दिनों से यहाँ टूटी-फूटी पड़ी हूँ. कोई पूछने नहीं आया. आज एक अल्लाह का बन्दा आया था तो उसको भी उस पण्डित ने भगा दिया.”

रफीक के मन में उस मूर्ति का खयाल अभी भी आ रहा था. उस आदमी की बात मानकर उसने फोटो तो नहीं ली मगर वो सोचने लगा, “अब ये भग्नावेश क्या होता है...?” रफीक को इसका मतलब नहीं पता था. उसने उस आदमी से ज्यादा बात करना पसन्द नहीं किया क्यूंकि उसने उसे फोटो खींचने से मना कर दिया था. वो तो ये सोच रहा था कि “फोटो खींच ही लेना चाहिए था.... बेकार में पोज बना रहा था. कम के कम फोटो तो मिल जाती. अब तो बारिश में मूर्ति और भी खराब हो जायेगी.” मगर वो उस आदमी की देवी थीं इसलिए उसने उसकी भावना का सम्मान किया और चुपचाप वापस आ गया.

रफीक वापस तो आ गया मगर एक सवाल उसके मन में अब भी घूम रहा था कि “भगवान के साथ भी इतने नियम-कानून क्यूँ होते हैं...?”

उसे तो वो मूर्ति इतनी अच्छी लग रही थी कि उसका जी चाह रहा था कि उस मूर्ति के पास थोड़ी देर बैठे और उस मूर्ति से दो-चार बातें करे....मूर्ति से कहे... “और बताइए...! सब ठीक-ठाक...? यहाँ क्या कर रही हैं...? और कब से हैं यहाँ...? और क्यूँ यहाँ हैं...? क्या मैं आपको कहीं और पहुँचा दूँ...?”

ऐसे जाने कितने खयाल रफीक के मन में आ-जा रहे थे. उसे उस मूर्ति से एक लगाव सा हो गया था. उसे उस मूर्ति में एक “माँ” जैसा अहसास हो रहा था. एक दोस्ती सी हो गई थी. एक अपनापन महसूस हो रहा था. जैसे वो मूर्ति कह रही हो... “आओ...थोड़ी देर बैठो इधर...!” और रफीक एक छोटे बच्चे की तरह हँसते हुए जाके मूर्ति की गोद में सिर रखके लेट जाता....

लेकिन मूर्ति की गोद तो थी ही नहीं. सिर्फ चेहरा था. और पेट का आधा हिस्सा बचा था. बाकी नीचे का हिस्सा नहीं था. शायद बना ही नहीं था. रफीक ने सोचा “कोई बात नहीं...मूर्ति के सीने से लग जाता जैसे कोई बच्चा अपनी माँ के सीने से लग जाता है. और फिर बगल में बैठ जाता. और एक दोस्त की तरह दो-चार बातें करता....”

मगर भला हो उस पैदल पण्डित का...उसने इतना कुछ होने से मना कर दिया.

रफीक ने देखा कि “वो मूर्ति आसमान की तरफ देख रही थी. शायद कोस रही थी उस कलाकार को कि “मेरे पैर भी बना देता तो तेरा क्या बिगड़ जाता...? कम से कम मैं खुद चल के कहीं जा तो सकती थी...? ऐसे में यहाँ बेसहारा पड़ी हूँ...”

मूर्ति के चेहरे पे एक उम्मीद झलक रही थी. जैसे कोई आएगा और उसे कहीं ले जाएगा. जहाँ के लिए उसे बनाया गया था. रफीक ने देखा मूर्ति के चेहरे को देख के ऐसा भी लग रहा था कि “जैसे उस मूर्ति से कोई गलती हो गई हो और भगवान ने उसे सजा दी हो कि तुम यहीं रहोगी. और वो मूर्ति भगवान से प्रार्थना कर रही हो कि “अब बहुत हुआ...अब मेरा कल्याण करो...!”

और शायद उस मूर्ति ने भगवान को मना भी लिया हो...और भगवान ने कहा हो... “रुको, किसी को भेजता हूँ...” शायद रफीक इसीलिए आया था वहाँ...मगर उसे तो भगा दिया गया था.

रफीक ऑफिस पहुँच गया. कम्प्यूटर ऑन किया. मगर उसके दिमाग में उस मूर्ति का प्यारा सा चेहरा अभी भी घूम रहा था. उसके कानों में उस पैदल पण्डित की बात अब भी गूंज रही थी, “मूर्ति भग्नावेश में है...” रफीक से रहा नहीं गया. उसने अपने फेवरिट “तिवारी जी” को फोन किया.

“हाँ साब...!” “तिवारी जी” ने कहा.

“ये भग्नावेश क्या होता है...?” रफीक ने पूछा.

“क्या साब आप भी न... हमेशा कुछ न कुछ उल्टा-सीधा सवाल करते रहते हैं....! अब ये सवाल कहाँ से आया...?” तिवारी जी ने कहा.

“तिवारी जी, अभी हम ऑफिस आ रहे थे. रास्ते में वो अपनी बिल्डिंग के बगल में एक दूध-बिस्किट वाली दुकान है न...?” रफीक ने कहा.

“हाँ है साब...!” तिवारी जी ने बीच में ही कहा.

“हाँ तो उस दुकान के पास एक मूर्ति पड़ी है. शायद किसी देवी की है. और वो मूर्ति मुझे अच्छी लगी. मैं फोटो खींचना चाहता था मगर किसी ने मुझसे कहा कि, “मत खींचो...मूर्ति भग्नावेश में है....”

“हाँ साब...! नहीं खींचना चाहिए...गलत है...” तिवारी जी ने भी वही बात कही...

“वही तो पूछ रहा हूँ तिवारी जी...! इसमें गलत क्या है...?” रफीक ने अपनी बात पे जोर दिया.

“अरे भाई...! आप किसी नहाती हुई औरत की फोटो खींचेंगे...तो गलत नहीं है...?” तिवारी जी ने उल्टा सवाल किया...

“लेकिन तिवारी जी, उस मूर्ति ने तो कपड़े पहने हुए हैं...बस वो क्या कहते हैं आप...? लाल रंग की चुनरी नहीं थी जो स्थापित करने के बाद पहनाते हैं. बाकी मूर्ति की बनावट में तो उन्होंने कपड़े पहने हुए हैं...” रफीक ने अपनी बात रखी.

“अच्छा आप फोन रखिये. आप फोन पे बहुत परेशान करते हैं मुझे. अभी मैं किसी के साथ हूँ. अभी आपके पास आता हूँ तब बताऊंगा आपको...” तिवारी जी ने भी कोई सटीक जवाब नहीं दिया जिससे रफीक के मन को शान्ति मिलती.

अब रफीक तिवारी जी के आने का इन्तजार करने लगा. थोड़ी देर बाद तिवारी जी आए. और फिर वही सब बातें...कि “ये गलत है...वो गलत है..ऐसा नहीं करना चाहिए...वैसे नहीं करना चाहिए...” तब रफीक ने एक सवाल पूछा....

“और अगर किसी को मूर्ति अच्छी लग गई तो...?” सवाल रफीक के मन का था.

“अरे, आपके अच्छे लगने से क्या होता है...? जो है सो है... सब आपके अच्छे लगने से होने लगा तब तो हो चुका.” तिवारी जी ने साफ़-साफ़ कह दिया.

मगर रफीक को अभी भी तसल्ली नहीं मिली थी. उसने कहा, “तिवारी जी, ये कोई बात नहीं हुई.”

तिवारी जी ने देखा कि रफीक कुछ ज्यादा ही जिद कर रहा है तो उन्होंने कहा, “अरे भाई ठीक है...! आपको नहीं मानना है तो जाइए अब खींच लीजिए. इस वक्त कोई मना नहीं करेगा. जाइए अपने मन की कर लीजिए...!”

रफीक ने देखा कि “तिवारी जी बस कहने के लिए कह रहे थे. चाह वो भी नहीं रहे थे कि रफीक उस मूर्ति की फोटो खींचे...” रफीक ने देखा कि कुछ होने वाला नहीं है...वो तो इस भक्त-भगवान के बीच की दूरी को मिटा देना चाहता था. मगर “लोग थे कि नियम-कानून बनाये बैठे हैं.”

रफीक तो उस कलाकार को ढूँढना चाह रहा था जिसने वो खूबसूरत मूर्ति बनाई थी. रफीक उस कलाकार को उसकी सुन्दर रचना के लिए बधाई देना चाह रहा था.

दोपहर को रफीक नमाज के लिए जाता था. आज भी जा रहा था. सड़क पार करने के लिए खड़ा था. तभी एक बार फिर उसकी नजर उस मूर्ति पर चली गई. उसने देखा कि “वो मूर्ति उसे बुला रही थी. वो मूर्ति कह रही थी कि “आओ तुम्हें भगवान ने भेजा है...!” रफीक ने अपने मन में कहा... “माफ कीजियेगा...लोग नहीं चाहते कि मैं आपके पास आऊँ...आपको बार-बार देखूँ...वैसे... मेरा बड़ा मन था...”

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कैस जौनपुरी

 

qaisjaunpuri@gmail.com

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