मंगलवार, 29 नवंबर 2011

शशांक मिश्र भारती की रचना - बाल साहित्‍य एवं सामाजिक सरोकार

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बालक के व्‍यक्‍तित्‍व निर्माण में समाज की महत्‍वपूर्ण भूमिका है। बालक की अभिरुचियों, कौशलों, आवश्‍यकताओं को प्रभावित करने वाले बाल साहित्‍य सर्जक को बालक के सामाजिक परिवेश को समझकर ही बाल साहित्‍य सृजन की ओर उन्‍मुख होना चाहिए। वातावरण की सहायता से नेताजी सुभाष, रवीन्‍द्रनाथ टैगोर, वीर शिवाजी को राष्‍ट्रीय चेतना से युक्‍त क्रांतिकारी बनाने में समर्थ हुए। भले ही उनकी अपनी माताओं का भी हाथ रहा हो। समाज से जुड़ा कल्‍पनायुुक्‍त साहित्‍य हो या ऐतिहासिक कथानक। अगर उसमें वातावरण का ध्‍यान रखा गया है तो अवश्‍य ही बालक को अपनी ओर खींचकर उस पर अपना अमिट प्रभाव डालता है। जिससे ही विष्‍णु शर्मा की पंचतंत्र की काल्‍पनिक कथाएं अमर शक्‍ति के तीन मूर्ख पुत्रों को विद्वान नीति निपुण बनाने में समर्थ होती हैं। यही नहीं पिछले वर्षों हैरी पाटर की रातों रात आठ लाख प्रतियां बिक गई। निश्‍चय ही इन सबके पीछे काल्‍पनिकता के बाद भी बच्‍चों के लिए आकर्षण ही रहा है जो उन्‍हें अपनी ओर खींचने में समर्थ हुआ है।

इसके विपरीत बाधक वातावरण की बात करें तो कितने ही बालक शक्‍तिमान बनने के चक्‍कर में हाथ-पैर तुड़ा बैठे। कुछ विज्ञापनों की दुनियां में अपनी सांवली छोटी बहन को सफेद करने के लिए वाशिंग मशीन में डालने की कोशिश करते देखे गए अथवा भूत-प्रेत की कहानियों के प्रभाव में सोते-सोते जाग गए या चीखने लगे। कहने का तात्‍पर्य यह है कि कल्‍पना शीलता होना अनुचित नहीं कहा जा सकता है, लेकिन वह बालक को सृजन की ओर ले जाए। उसमें सोचने-समझने, निर्णय लेने की शक्‍ति विकसित करे। उसकी जिज्ञासा का हल स्‍वस्थ रूप से करे, न कि भय उत्‍पन्‍न कर अथवा हाथ-पैर तुड़वा कर।

कुछ लोगों का माना है कि बालक पढ़ते ही नहीं। उनके पास समय नहीं है। रुचि भी नहीं है। यदि बालसाहित्‍य बालक को पढ़ने के लिए दिया जाए तो निश्‍चित है कि बच्‍चे उसमें रुचि लेंगे। यही नहीं बार-बार पढ़ेंगे। हो सकता है कि पुस्‍तकों-पत्रिकाओं के लिए छीना-झपटी भी करें। उदाहरण स्‍वरूप सरकारी विद्यालयों में मीना की कहानियों की बारह पुस्‍तकों को लिया जा सकता है। हमें दो, हमें दो कहकर पुस्‍तकों के लिए बच्‍चे झगड़ते है।

समस्‍या पढ़ने से अधिक पुस्‍तकों-पत्रिकाओं के बच्‍चों तक पहुंचने की है। अधिकांश बच्‍चों के पास अपने पाठ्‌यक्रम के अतिरिक्‍त दूसरी पुस्‍तक ही नहीं है। वह पढ़े तो क्‍या? मैंने कई ऐसे बच्‍चे देखें हैं जो ऐसी स्‍थिति के कारण ही हाथ में आ जाने वाली किसी भी पुस्‍तक को पढ़ने लगते हैं। भले ही वह उनके आयु वर्ग की हो अथवा नहीं। इसका समाधान गांव-गांव में छोटे-छोटे पुस्‍तकालयों की स्‍थापना से हो सकता है। जिसके लिए गांव की संस्‍थाएं विशेषकर विद्यालयी घटक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जहां न केवल बालकों को पढ़ने के लिए विविध विषयों की रुचि पूर्ण ज्ञानवर्धक पुस्‍तकें-पत्रिकायें मिलें, बल्‍कि वह उन पर चर्चा भी करें।

वर्तमान समय में आधुनिकता के बोझ से दबा वातावरण पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति की नकल करते परिवार, शिक्षा, वैज्ञानिक उपलब्‍धियां, इलैक्‍ट्रानिक माध्‍यम आदि बालक को प्रभावित कर रहे हैं। जिसके संदर्भ में कहना चाहूंगा कि श्रेष्‍ठ मानव का निर्माण श्रेष्‍ठ बालसाहित्‍य कर सकता है। विद्यालयों में बालसाहित्‍य सृजन के कार्यक्रम समय-समय पर आयोजित करना सार्थक सिद्ध होगा। इनका दीवार पत्रिका, स्‍मारिका व वार्षिक पत्रिका आदि में भी उपयोग किया जा सकता है। इसमें प्रेरणा प्रोत्‍साहन व सम्‍मान पुरस्‍कार के कार्यक्रम जोड़कर और अधिक उत्‍साह वर्धन किया जा सकता है।

कभी अज्ञेय ने बच्‍चों की दुनिया के बारे में कहा था-‘‘ कि भले ही बच्‍चा दुनिया का सर्वाधिक संवेदनशील यंत्र नहीं है पर वह चेतन शील प्राणी है और अपने परिवेश का समर्थ सर्जक भी। वह स्वयं स्‍वतंत्र क्रियाशील है एवं अपनी अंतः प्रेरणा से कार्य करने वाला है। जो कि अधिक स्‍थायी होता है।'' इससे स्‍पष्‍ट होता है कि बालक से जुड़ने के लिए उसके समाज से जुड़ा जाए। समाज के सरोकारों को जानकर बालसाहित्‍य सृजन की ओर उन्‍मुख हुआ जाए। यही श्रेष्‍ठ दायित्‍व व प्रभावपूर्ण कार्य भी होगा।

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सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर

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