गुरुवार, 24 नवंबर 2011

गौरव सोलंकी की कहानी : बच्चों की पहुँच से दूर रखें

gaurav

(गौरव सोलंकी आईआईटी रूड़की से स्नातक हैं, इनके कविता संग्रह - सौ साल फिदा को ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार प्राप्त हो चुका है तथा कथादेश एवं राजस्थान पत्रिका के सृजनात्मक पुरस्कार मिल चुके हैं. )

म ऐसा कहते जरूर थे कि हमारी जान निकल जाएगी लेकिन वो निकलती नहीं थी। जब वह मुझे मारते थे तो मैं बचाव के लिए किसी चीज का इस्तेमाल नहीं करता था। ऐसे दीवार की तरह आंगन के बीचों-बीच खडा रहता जैसे मुझे कोई नहीं हिला सकता। मैं कोई देवता नहीं था कि किसी अस्त्र से उनकी गालियों और लाठियों को वापस लौटा सकूं। वे मेरे शरीर और आत्मा में उतरती थी और छिपकर बैठ जाती थी। लेकिन मैं खड़ा रहता था, आंखें पूरी खोले। मुझे एक भी दृश्य नहीं भूलना था। जब वह थकने लगते थे तब मैं कहता था कि मैं मर जाऊंगा। तब उन्हें तसल्ली हो जाती थी कि उन्होंने मुझे ठीक से मारा है। वे मुझे छोड़ देते थे और जाकर मां के कमरे का दरवाजा खोल देते। वह रो रही होती थी जैसे रोने से अपनी गलतियों का प्रायश्चित कर लेगी। मैं तब हंसता रहता और उससे बात भी न करता। मुझे ठीक से याद नहीं कि मैंने मां को पहली बार कब देखा था। जो दृश्य मुझे याद आता है, वह उसके नहाने का है। उस दृश्य में मैं अपना आसपास नहीं देख पा रहा हूं लेकिन अब सोचूं तो ऐसा लगता है कि मैं एक तसले में बैठा हूं और वह नहा रही है। इसके बाद अचानक उस बाथरूम की बत्ती बुझ जाती है। तब मैं किसी सपने से जागता हूं। यह मुझे अच्छी तरह याद है कि उस बाथरूम की सामने वाली दीवार में से दो जगह से ईंटें निकली हुई हैं। उनमें उसने अपनी बिंदी और बालियां उतारकर रख दी हैं। मैं उन्हें खा जाना चाहता हूं। मैं ऐसी कोशिश भी करता हूं लेकिन वह मुझे गिरने से बचा लेती है और उसके बाद, जैसा कि मैंने कहा, बत्ती गुल हो जाती है।

वह एक खेल जैसा था। मैं उस कमरे के बाहर कुर्सी पर बैठता था., जिसके दरवाजे के ऊपर की दीवार पर शोर करने वाली घड़ी टंगी हुई थी। समय का मुझे उस समय अनुमान नहीं था लेकिन अब लगता है कि कम से कम एक डेढ़ घंटा रोज ऐसा बीतता होगा। वह मेरी मौसी थी, जो कुछ समय के बाद उस कमरे से मेरे पिता के साथ बाहर निकलती थी, खिलखिलाती हुई जैसे अभी भीतर उन दोनों ने दुनिया को बनाना सीख लिया है। तब मेरे पिता उस एक घंटे बैठने का मुझे एक रुपया थमाते थे और सामने दीवान पर लेट जाते थे। मौसी रसोई में घुस जाती थी और कोई गाना गुनगुनाती हुई चाय बनाने लगती थी। मुझे हैरानी है कि वह रोज उस समय एक ही गाना गाती थी। कम से कम छह महीनों तक एक ही गाना। वह गाना मुझे याद नहीं लेकिन उसमें ' पायल ' शब्द जरूर आता था। बाद में मेरी क्लास में एक पागल नाम की लड़की थी.. जिससे मैं बहुत नफरत करता था और एक बार मैंने उसे परकार चुभाकर मारने की नाकाम कोशिश. भी की थी।

मौसी मेरी मां की बहन थी., ऐसा मुझे बहुत बाद में पता चला। मुझे हमेशा वह पापा की कुछ लगती थी। वह तब आई थी, जब मां मेरे लिए भाई या बहन लाने एक कमरे में गई थी। वह न भाई-बहन ला पाई और खुद भी एक साल तक उसी कमरे में पड़ी रही। मौसी को देखकर लगता था कि वह कुछ भी छू देगी तो वह पिघल जाएगा। वह चार रोटियां, सच्ची, सलाद और दही का खाना खा चुकी होती थी, तब भी शुरू के दिनों में उसकी आंखें देखकर मुझे लगता था कि. वह भूखी है और कभी भी रो सकती है। फिर अचानक एक दोपहर मैंने घड़ी वाले दरवाजे वाले कमरे में अपने पिता के हाथ उसके कुर्ते के भीतर पाए। पापा ने मुझे देख लिया और वह तुरंत उठकर मेरी ओर दौड़े। मैं बचकर भागा जैसे मैंने चोरी की हो। लेकिन घर ज्यादा बड़ा नही था और घर से बाहर जाना, जाने क्यों मुझे उसूलों के खिलाफ लगा। उन्होंने मेरी पीठ पर दनादन मुक्के मारे और फिर मुझे बाथरूम में बंद कर दिया। मुक्के खाने के दौरान मैं बरामदे में इधर-उधर भाग रहा था और मां अपने बिस्तर से मुझे देख-देखकर रो रही थी। यह उसके लिए आसान था। कभी रजाई से बाहर चेहरा निकालकर और कभी अंदर छिपाकर रोना।

जैसा कि आप जानते हैं, मैं कितने समय बाथरूम में बंद रहा, इसका कोई अनुमान मुझे नहीं है। यह मुझे याद है कि जब मैं निकला तो मौसी खाना बना रही थी और उसने मुझे गोद में लेकर चूमा। अगले दिन मैंने स्कूल से लौटकर पापा से ' सोरी ' बोला। तब उन्होंने मुझे एक रुपया दिया और कहा कि अब से रोज, जब तक वह मौसी के साथ उस कमरे के अंदर रहा करें, मैं उसके दरवाजे पर बैठा रहूं और ध्यान रखूं कि कोई अंदर न जाए। कोई उस तरफ आए तो मैं सीटी बजा दूं। मैंने कहा कि मुझे सीटी बजानी नहीं आती। उन्होंने मौसी से पूछा कि क्या कोई और इशारा रखा जा सकता है। मौसी ने कहा कि मैं दरवाजे को बजाऊं।

इस तरह मैंने डेढ़ सौ रुपए कमाए। तब तक मां ठीक होने लगी और इस काबिल हो गई कि घर का सारा काम कर सके, तब उसने मौसी को वापस भिजवा दिया। थोड़ा बेइज्जत करके। जितना मुझे समझ आया, वो यह था कि मां ने मौसी से कहा कि उसने उनके राम जैसे पति को जाल में फंसा लिया। पापा उस दिन शायद जान बूझकर बाहर ही रहे। मौसी को बस स्टैंड तक छोड़ने वाला भी कोई नहीं था। वह मुझे बांहों में भरकर देर तक रोती रही और उसने मुझसे वादा लिया कि गर्मियों में मैं उससे मिलने जरूर आऊंगा। फिर वह चल दी। अकेली, अपना बैग उठाकर। मैं अचानक इतना उदास हुआ कि मैंने अपना बैट उठाकर उस कमरे की खिड़की तोड़ दी जिसके बाहर मैं एक रुपया लेकर बैठता था। मैं मौसी को बस अड्डे तक छोड़ने गया। बैग की एक तनी मौसी ने पकड़ी और एक मैंने। उसके होठ जैसे एक कोहरे में डूबे रहते थे। उसे देखकर लगता था कि वह कभी सूठ नहीं बोल सकती।

घर लौटने पर मां ने मुझे चप्पल से मारा। मां ने मौसी की लगाई सारी तस्वीरें दीवारों से उतारी और फिर घर को अपने मुताबिक सजाया। बैठक के दरवाजे पर उसने ' वेलकम ' लिखा एक पोस्टर लगाया जिसमें एक औरत दोनों हाथों से फूल बिखेर रही थी। उसने पापा का फिर से खयाल रखना शुरू किया और मैं स्कूल से लौटता था तो दरवाजे से ही अक्सर उन दोनों की हंसी सुनाई पड़ती थी। जैसे हमारा पुनर्जन्म हुआ हो, पापा मां और मेरे लिए फिर से नए-नए कपड़े लाने लगे। वे दोनों मुझे साथ लेकर बाजार घूमने जाते और हम सारे शहर के सामने ' छोटा परिवार, सुखी परिवार ' दिखते। मौसी कभी लौटकर नहीं आई। मां ने मुझे सिखाया कि बड़ों का आदर करना चाहिए और पापा के सामने उल्टा कभी नहीं बोलना चाहिए। कुछ महीने बाद ' वेलकम ' वाला पोस्टर उतारकर उन्होंने अपनी शादी की एक फोटो बैठक के दरवाजे पर लगाई। उन्हीं दिनों मैंने एक किताब में पढ़ा कि बच्चों की याददाश्त अस्थायी होती है। और बड़े होने के बाद बचपन की ज्यादातर बातें वे भूल जाते हैं। यानि मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं था।

एक शाम मैं खेलकर आया तो पापा नहीं थे। मां रसोई में थी। वह खुश थी। उसने मुझसे कहा, ' पापा कितने अच्छे हैं न?' मैंने कहा, ' हां '। मैं अंदर के कमरे में गया। वहां एक कुर्सी संदूक के पास रखकर उससे मैं संदूक पर चढ़ गया। संदूक पर चढ़कर मैंने ऊपर रोशनदान से एक लिफाफा उतारा जिसमें एक पैकेट था जिस पर लिखा था, ' बच्चों की पहुंच से दूर रखें। ' वह चूहे मारने की दवा थी। वह पैकेट मैंने जेब में रख लिया और उसी रास्ते से नीचे आ गया। जब मैं बाहर आया तो पापा आंगन के बीचों बीच एक कुर्सी पर बैठे थे। वह शायद अपने मैनेजर से डांट खाकर आए थे। मुझे देखते ही बोले, ' पढ़ भी लिया कर कभी। चूहे की तरह घूमता रहता है। '

इस तरह वह अपनी मौत के लिए खुद ही जिम्मेदार माने जाएंगे। वह अगर मुझे डांटने के लिए ' चूहे ' शब्द का इस्तेमाल नू करते तो शायद मैं उनके दूध में चूहे मारने की दवा भी न मिलाता। लेकिन जिस तरह चिड़ियों के खेत चुग जाने के बाद पछताने का कोई फायदा नहीं है, उसी तरह जहर के हलक से नीचे उतर जाने के बाद अपनी भाषा कोमल बनाने का भी कोई फायदा नहीं है।

अगली सुबह एक आम सुबह थी जिसमें पापा का पोस्टमॉर्टम और मातम जुड़ गया था। डाँक्टरों ने उस जहर का तो पता लगा लिया जिससे उनकी जान गई। लेकिन यह पता लगाने के लिए कि जहर किसने दिया, हम सबको एक बाबा के पास जाना पड़ा। बाबा किसी बच्चे के अंगठे के नाखून में घटना का पूरा वीडियो दिखा देता था। बाबा पहले अपनी मुट्ठी में रेत लेता था। फिर उसे अपने मुंह के पास ले जाकर कोई मंत्र बुदबुदाता था और फिर इशारे से कहता था कि किसी बच्चे को उसके सामने लाकर बिठाया जाए। मां लगातार रो रही थी। इशारा उन्हें तो समझ नहीं आया लेकिन मेरे चाचा ने मुझे गोद में उठाया और बाबा के सामने बिठा दिया। मेरे ऊपर बाबा ने रेत फेंकी। फिर मेरी आंखों पर अपना हाथ रखकर कोई मंत्र पढ़ा। फिर मेरी हथेली को आगे किया और पूछा कि मुझे अपने अंगूठे के नाखून में क्या दिख रहा है।

मैंने बताया कि मुझे अंधेरा दिख रहा है। हां, अब रोशनी हुई। कौन सी जगह है ये? कैमरा इस स्टील के डिब्बे पर ही फोकस क्यों है? अरे हां, ये तो गुड़ वाला डिब्बा है और यह हमारी रसोई है। फिर कुछ रुककर मैं लगातार अपने नाखून को देखता रहा। फिर मैंने आंखें बंद कर ली। सब मेरी तरफ ऐसे देख रहे थे जैसे मैं जिस क्षण बोलूंगा, उसी क्षण कातिल के गले में फांसी का फंदा डल जाएगा।

मैंने कहा कि जो मैंने देखा, वह नहीं बता सकता। फिर जब सबने बार-बार पूछा। मां ने मेरे पैरों में गिरकर, चाचा ने गाल सहलाकर। तब मैंने बताया कि डिब्बे से. गुड़ निकालने के बाद मां ने डिब्बे के नीचे अलमारी में लगे अखबार के नीचे से एक छोटी सी पुड़िया निकाली। पुड़िया हरे रंग की थी और उस पर लिखा था, ' बच्चों की पहुंच से दूर रखें। ' फिर मां ने पुड़िया खोली और स्टोव पर रखे दूध के गिलास में खाली कर दी। फिर दूध और गुड़ की डली लिए बहुत धीरे- धीरे मां रसोई से बाहर आई। वहां, जहां कुर्सी पर पापा बैठे थे। उन्होंने जूते उतार दिए थे लेकिन मोजे नहीं।

इसके बाद मैं चुप हो गया। मां ने बाबा की गर्दन पकड़ ली। बाबा के चेलों ने मां को मारते हुए बाबा को छुड़वाया। सब लौट आए। नाखून का वीडियो अदालत में सबूत की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। लेकिन मैंने कुछ दिन बाद पहले पुलिस के सामने और फिर अदालत में बयान दिया कि मैंने असल में अपनी मां को पापा के दूध में उस पुड़िया से निकला पाउडर मिलाते देखा था। जज साहब ने पूछा, ' तुम्हारे मम्मी पापा लड़ते भी थे?' मैंने कहा, ' ज्यादा नहीं। लेकिन अंकल, उस पुड़िया में क्या था?' ?

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(आउटलुक हिंदी नवंबर 2011 से साभार)

5 blogger-facebook:

  1. badi ajeeb kahani hai, kya wakai koi bacha itna shatir ho sakta hai?

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  2. कहानी थी पढ़ने के बाद लगा कि अपने सर के बाल नोंच लूं..

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  3. ye kis jamaane ke bache ki kahani kahi hai gaurav ji nein...shabdo ka tana bana banate banate kahi uljhe se lage

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  4. उफ़,
    एक छोटे कस्बे की बहुत सी बातें आंखो से गुजरती चली गयी इस कहानी को पढते पढते ।

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