मंगलवार, 29 नवंबर 2011

कृष्ण गोपाल सिन्हा का व्यंग्य - इंडियन राइटर्स लीग बतर्ज़ आईपीएल

जनार्दन जी की स्वीकृति और आशीर्वचन मिलने के बाद से मैं अपनी गिनती स्वयंभू लेखकों में करने लगा हूँ . लेखकीय वाइरस से संक्रमित होने के कारन व्यंग्य, गीत, ग़ज़ल, कहानी, लेख में थोड़ा-थोड़ा हाथ पैर मारने के बाद अब उपन्यास में हाथ आज़माना चाहता हूँ . मुझे इस मामले में अपनी औकात का भरपूर अंदाजा है फिर भी स्वयं को मैं झोला-छाप साहित्यकारों की श्रेणी में रखने को कत्तई तैयार नहीं हूँ . जनार्दन जी जीवट और उत्साह से ओतप्रोत हैं ही और उनके संगत में मुझे भी इसे अपने साथ रखने की प्रेरणा मिलती रहती है . सचमुच बड़े भाग्य से किसी को अपने गुणों को पहचानने वाला मिलता है. मेरे गुणों को पहचानने वाला उनके जैसा गुणग्राहक कहाँ मिलेगा, इस बात से मैं शत-प्रतिशत आश्वस्त हो गया हूँ.

जनार्दन जी के पास मैं अपने ज़हन में अपने भावी उपन्यास के लिए पल रहे पात्रों के बारे में सलाह-मशविरा करने गया तो देखा कि वे बहुत ही उत्साहित मुद्रा में विराजमान हैं. दरअसल, उनके गंभीर और संजीदे हाव-भाव के मुकाबले उनकी यह मुद्रा मुझे अच्छी लग रही थी परिणामतः मैं भी उत्साहित महसूस करने लगा. कुछ देर हम दोनों इसी हाल में रहते पर वे स्वयं बीच में आ गए और पूछने के अंदाज़ में बोले- 'आप के शहर में कितना बड़ा इवेंट होने जा रहा है, आप भी कुछ अता-पता रखते हैं.' इस सिलसिले में कुछ भी मालूम न होते हुए भी मैंने पूरे अदब से कहा कि हमारे अदब और तहजीब के शहर में रैलियों और प्रदर्शनों के अलावा अक्सर ही जलसे, महफ़िलें, मुशायरे, महोत्सव और दीगर इवेंट्स होते ही रहते हैं.

जनार्दन जी को मुझसे अपेक्षित जानकारी नहीं मिली तो वे कहने लगे कि 'यह तो ठीक है कि हमारे शहर में चहल-पहल और गहमा-गहमी का माहौल बना ही रहता है पर किसी भी इवेंट के छोटे या बड़े, भारी या हलके, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्टार के होने से उतना फर्क नहीं पड़ता जितना इस बात से कि ऐसे आयोजनों के पीछे की भावना और आगे की संभावित उपलब्धियां क्या हो सकती हैं. वैसे मैं उन आयोजनों को बड़ा और भारी मानने लगा हूँ जिसमे भारी और बड़े लोग जुड़े हों, भारी धन लगा हों और भारी भीड़ जुटी हो. जो जितना हिलाए, जितना बहलाए और जितना सहलाए उतना ही वजनदार होगा,

जनार्दन जी ने वजनदार की चर्चा की तो मैंने भी अपने दिमाग पर हल्का-सा वजन डालने की सोचने लगा. मेरे सोच की प्रक्रिया अभी पूरी भी नहीं हुयी थी कि जनार्दन जी ने एक नए आयोजन के होने की जानकारी से पर्दा उठाया और बताने लगे कि कुछ स्वनामधन्य और बहुत सारे आप जैसे स्वयंभू साहित्यकारों का एक डेलिगेशन सरकार से मिलने और अपनी मांगे रखने की योजना बना रहा है. इन लोगों की यह भी योजना है कि सरकार के सामने एक प्रस्ताव यह भी रखा जा सकता है कि आईपीएल की तरह आई.डब्लू.एल (इंडियन राइटर्स लीग) का गठन और संचालन किया जाय जिसके अंतर्गत लेखकों और कवियों की खरीद और नीलामी की जाय और इनकी प्रतिभा का इस्तेमाल देश के स्वर्गस्थ और मृत्युलोक के समकालीन राजनेताओं को समर्पित अभिनन्दन ग्रन्थ, महात्म्य, शतक, काण्ड, विरदावली, रासो, चालीसा और ग्रंथमाला आदि रचने के लिए किया जाय.

खरीद और नीलामी की बात पर मन थोड़ा उचाट और खट्टा इस बात के लिए हुआ कि चाहे क्रिकेटर हो या लेखक, स्टार हो या सारिकाएँ सभी हैं तो इंसान हैं और इनकी खरीद और बिक्री कहाँ तक जायज़ है. 'साहित्यकार भी बिक सकता है' सोचकर वितृष्णा से मन भरने लगा. फिर ज़हन ने इसे जायज़ ठहराने की कोशिश की कि हमारे कई पर कुछ नेता भी तो आदमी ही होते हैं और बिकने को भी तैयार होते हैं. फिर मैंने सोचा कि मैं इस झमेले में क्यों पडूं. रही बात साहित्यकारों की तो बिकने या नीलामी होने के बजाय बोंड या कान्ट्रेक्ट के ज़रिये भी उन्हें इंगेज किया जाता है तो भी वे बंधुआ कहलायेंगे ही.

जो भी हो मुझे यह सोच और स्कीम दोनों ही धांसू लग रहे थे क्योकि कहीं मेरे फिट होने का रास्ता निकाला जा सकता था. इतने में जनार्दन जी ने दूसरा खुलासा किया और बताया कि एक योजना यह भी है कि सरकार काश्मीर, उत्तरपूर्व, बुंदेलखंड को मिलने वाले पॅकेज की तरह किसी पॅकेज का ही एलान करे और संस्थानों द्वारा दिए जा रहे सम्मानों और पुरस्कारों से वंचित और उपेक्षित (मेरे जैसे) राइटर्स के सुख सुविधा का भी सरकार ध्यान रखे.

जनार्दन जी यह अच्छी तरह समझ रहे थे कि उनकी बातों से मैं आल्हादित होने की स्थिति में आने लगा हूँ. वे नहीं चाहते थे कि अभी कुछ देर तक ही सही मैं इस मनोदशा से बाहर आऊं. लगे हाथ उन्होंने यह भी संभावना जताई कि हो सकता है कि सरकार इस यज्ञ के लिए टेंडर प्रणाली का सहारा ले और इसमे पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह सारी प्रक्रिया 'ऑनलाइन' की जाय. डर और आशंका इस बात को लेकर भी मन में घर करने लगी थी कि नीलामी की योजना का हश्र कही 'टूजी' और ‘थ्रीजी’ स्पेक्ट्रम वाला न हो जाय. मेरे मन को इस बात से खुशी हो रही थी कि संभव है कि हमारे जैसे लोग प्रकाशकों की दादागीरी और तिरस्कार-शोषण-दोहन की सांसत से बच जांय.

इस सब के आगे अब मैं स्कीमों और योजनाओं के बारे में जानने और सुनने के बजाय इस बात में रूचि लेने की सोचने लगा कि इनमे से मेरे हाथ क्या लग सकती है या मैं क्या हथियाने की जुगाड़ कर सकता हूँ. मैंने सोचा कि लगे हाथ जनार्दन जी से यह भी जान लूँ कि किन विषयों अथवा विभूतियों को ये सारे लेखन समर्पित होंगे. मेरी बेताबी बढ़ने लगी थी. इतना उतावलापन मैंने कभी भी नहीं महसूस किया था. लेखकों-कवियों के लिए किसी पॅकेज या अनुदान योजना आदि में मेरी कोई दिलचस्पी नही थी. मेरी मन में इकलौती हसरत घर कर चुकी थी कि मुझे कोई खरीदे और मैं किसी के हाथ बिकू. मैं बिक जाने के बाद भी स्वान्तःसुखाय कुछ ऐसा रच जाना चाहता था जिससे आने वाली सात-सात पीढियां मुझे याद रखती. तत्काल मैंने दंडवत की मुद्रा में जनार्दन जी से आग्रह किया कि वे उन ग्रंथों, महात्म्यों, और विरदावालियों से मुझे अवगत कराएं जिसमे से दो-चार पर अपना हक जमाने की कोशिश कर सकूँ.

जनार्दन जी मेरी पीड़ा समझ रहे थे, मेरी मेधा और प्रतिभा का अनुमान उन्हें था ही. उन्होंने सबसे पहले लेडीज़ फ़र्स्ट को दृष्टिगत रखते हुए उन महिला विदुषियों का उल्लेख किया जिन पर महात्म्य की रचना की जा सकती थी. इस श्रेणी में सोनिया, सुषमा, ममता, जयललिता, माया, उमा, मीरा, वृंदा का नाम आया तो मुझे लगा कि देवियों के लिए समर्पित की जाने वाली रचनाएँ महात्म्य के रूप में ही उपयुक्त लगेंगी. इसके बाद बारी आयी विरदावालियों की तो जिसके लिए अटल, आडवाणी , मनमोहन, प्रणव, सोमनाथ, ज्योति, फारुख, शरद, रामविलास जैसे नामों पर सहमति बनती लग रही थी. मुझे कुछ और वीरों और धुरंधरों की याद आ रही थी कि इस बीच जनार्दन जी बोल पड़े कि कुछ चालीसा और पचीसी टाइप साहित्य की भी रचना की जा सकती है और इसके लिए लालू, मुलायम, नायडू, बादल, चौटाला, नितीश आदि को लिया जा सकता है. जैसे-जैसे शीर्ष और शिखर भद्र पुरुषों और महिलाओं की सूची जनार्दन जी मेरे सामने रखते जा रहे थे उससे मेरे मन में एक भय और शंशय पलने लगा था कि कही कोई नाम उनसे छूट या रह गया तो कही लेने के देने न पड़ जाय हालाँकि मेरे ऊपर कोई बात आने के बजाय संभवतः उन्ही के पल्ले पड़ती. मुझे लगा कि जोर्ज और एनडी की अनदेखी सही नहीं होगी. तभी मेरा ध्यान छोटे भाई की और गया और उनके लिए अमर-रहस्य-पुराण का रचा जाना ज़रूरी लगा.

मैं चाहता था कि कुछ और विकल्प सामने आये तो उनमे से दो-चार का वरण करूँ. मैं मौन रहा तो जनार्दन जी ने सूची आगे बढ़ाई. अब वे पुराणों पर आते हुए बताने लगे कि वैसे तो एक पुराण 'भ्रष्टाचार पुराण' में कईयों को समेटा और लपेटा जा सकता है पर इससे लेखकों-कवियों के लिए उपलब्ध ऑप्शन कम और सीमित हो जायेंगे अतः अलग-अलग विभूतियों के लिए पुराणों को रचने के अलावा एक 'महा भ्रष्टाचार पुराण' का सृजन किया जा सकता है जिसे काल-खंडो में और प्रसंगों के अनुसार बांटा जा सकता है. जनार्दन जी शंकाग्रस्त इस बात को लेकर हुए कि काल-खण्डों और प्रसंगों की बात मेरे समझ में नहीं आने वाली है इसलिए उन्होंने स्पष्ट किया कि पंचवर्षीय कालखंड के रूप में घोटालों का वर्णन करने के साथ-साथ इनसे जुड़े विषयों जैसे बोफोर्स, पशुपालन, हवाला, दूरसंचार, चारा, बराक मिसाइल, तहलका, ताज कोरीडोर , तेल के बदले अनाज, कैश फ़ॉर वोट, सत्यम, आदर्श सोसाइटी, राष्ट्रमंडल खेल और टूजी स्पेक्ट्रम, मनरेगा, स्वास्थ्य मिशन आदि को कवर किया जा सकता है. मुझे आभास हो रहा था कि भले ही इन्हें घटित होने में बीस-बाईस साल ही लगे हों पर उन पर किसी महापुराण लिखने में तो सदियाँ लग जायेंगी.

इस आभास के साथ मेरा यह अहसास भी मेरे ज़हन से बाहर आने लगा कि जनार्दन जी से कुछ विषय अथवा प्रसंग अनजाने ही छूट रहे थे. पर जनार्दन जी से कुछ छूट या रह जाय ऐसा तो हो ही नहीं सकता था इसलिए उन्होंने फ़ौरन अपनी अब तक की बात में आगे यह जोड़ ही दिया कि हर्षद मेहता, केतन पारेख, तेलगी, सुखराम, राजा, सुरेश, मधु कौड़ा, मोदी(ललित) पर तो अलग-अलग प्रसंग या एपिसोड लिखे जा सकते हैं. मैंने जनार्दन जी से अत्यंत विनम्र भाव से पूछा कि क्या रासो के लिए भी कुछ सख्सियतों का चयन किया गया है. उन्होंने मुझसे भी ज़्यादा विनम्र और सविनय स्वरों में बताया कि विनय, उद्धव, राज आदि पर रासो रचे जाने पर विचार किया जा सकता है. उन्हें संभवतः यह महसूस हुआ कि इसके लिए राहुल का नाम भी लिया जा सकता है तो उन्होंने राहुल के साथ ही अखिलेश, उमर आदि को रासो लिखे जाने की सूची में रख ही लिया.

अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि केवल सियासी लोगों को ही इस योजना के अंतर्गत शामिल किया जा रहा है लेकिन तभी अन्ना की हुंकार, रामदेव की चेतावनी और श्री श्री के सत्संग की लहर का स्मरण होते ही जनार्दन जी अपराध बोध से ग्रस्त होते लग रहे थे क्योंकि राजनीति में इनके हस्तक्षेपरहित रूचि की बात जगजाहिर हो रही थी. इसीलिये उन्होंने अन्ना के लिए वांग्मय, बाबा के लिए अभिनन्दन-ग्रन्थ और संत और मनीषी के लिए विरदावली के सृजन का प्रस्ताव रखा.

यकायक जनार्दन जी गंभीर हो गए. इस परिवर्तन का सबब जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि किंचित विभूतियों का उल्लेख संभवतः छूट या रह गया हो पर ऐसा सायास रहा हो ऐसी बात नहीं है और फिर अंत में 'भूल चूक लेनी देनी' का प्रावधान तो होता ही है. मुझे लगने लगा कि इस मुहर का प्रयोग वे अपनी बात के समापन के लिए कर रहे है पर ऐसा नहीं था. उन्होंने मुझसे यह बात पूरे बलपूर्वक कहा कि दिवंगत और स्वर्गस्थ देशरत्नों के लिए विशिष्ट श्रद्धांजलि विशेषांक की रचना देश के मूर्धन्य साहित्यकारों के पैनल द्वारा कराया जाएगा.

मैं मन ही मन स्वर्गीय महान आत्माओं के बारे में सोचने लगा और फिर यह भी लगने लगा कि उनके नामों की चर्चा तभी की जायेगी जब यह योजना आगे बढ़ेगी. जनार्दन जी ने इस बारे में अपनी जो मंशा बतायी वह मेरी सोच की प्रमाणित सत्य प्रतिलिपि ही थी. जनार्दन जी अब कुछ आगे कहते या बताते अथवा मैं अपनी कोई जिज्ञासा या शंका उनके सामने प्रस्तुत करता इससे पहले ही मेरा ह्रदय परिवर्तन होने लगा था. देश के कर्णधारों और खेवनहारों की प्रशंसा और यशगान राष्ट्रद्रोह न होकर परम पुनीत राष्ट्रीय दायित्व है इसलिए उन पर ग्रन्थ, पुराण, महात्म्य, चालीसा और चरित सार आदि लिखना सौभाग्य ही कहा जा सकता है. मेरा मन अब इस सौभाग्य से वंचित रह जाने के प्रति आकर्षित होने लगा तो क्षण भर के लिए मुझे अपने ऊपर अचम्भा होने लगा और फिर मन उचाट और खिन्न इस बात को लेकर होने लगा कि स्वयंभू अथवा झोलाछाप लेखक ही सही परन्तु क्या एक साहित्यकार होते हुए मैं किसी खरीद-फरोख्त या नीलामी का हिस्सा होकर अपनी बिरादरी के नाम पर कलंक का कारण कभी बनाना चाहूँगा. मेरे स्वयं से पूछे गए इस प्रश्न का त्वरित उत्तर मेरे अंतस ने दिया. वह इसके लिए रंच मात्र भी तैयार नहीं था. समय रहते ही मेरे अंतःकरण ने मुझे सही दिशा और सही राह दिखा दिया, इस बात से मैं अभिभूत था. मन की मन में समेटे मैं जनार्दन जी से अलविदा कहते हुए अपनी राह पकड़ ली.

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