बुधवार, 7 दिसंबर 2011

विजय वर्मा की कविता - भाव-दूषित

भाव-दूषित 

[सन्दर्भ--      मंसूर को 'अनलहक'अर्थात मै ही खुदा हूँ  कहने के जुर्म में सूली की सजा दी गयी . जब उसे भीड़ -भरे इलाकों से ले जाया जा रहा था तो लोगों ने उस पर पत्थर फेकें .  वह लोगों की प्रतारणा सह रहा था लेकिन अपनी मौज मे था.उसी भीड़ मे  उसका दोस्त जुन्नैद  भी था ,वह चाहता तो नहीं था मारना पर भीड़ को दिखाने के लिए उसने सिर्फ एक फूल से मंसूर को मारा,इसे देखते ही मंसूर रोने लगा .

भाव तो बस एक ही है

मारो फूल से या पत्थरों से 

चोट तो कभी-कभी 

लग जाती है अक्षरों से.

 

बात इसमें फूल और 

पत्थरों की नहीं है,

मारने के भाव में तो 

सिर्फ हिंसा ही रही है.

बात है अविश्वास की 

परस्पर -सौहाद्र नाश की.

 

हो भले ही अत्यधिक लघु 

पर चुभती एक फांस की 

तो रहा अब फर्क क्या 

ना-समझ और समझदारों में,

दुश्मनों ने मारे पत्थर 

फूल मेरे यारों ने .

 

पत्थर की पहुँच बाहय

वार करते चर्म पर

फूल का है रिश्ता आतंरिक  

चोट करते मर्म पर.

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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