शेर सिंह की कविता - जाड़ा

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जाड़ा

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· शेर सिंह

जाड़े ने बोला धावा

गर्मी की कर दी

बोलती बंद

लो सर्दी आ गई ।

 

ओस से लदी

कांपती डालियां

झड़ते जर्द पत्‍ते

जाड़े की पहचान ।

 

गिरता पारा

कांपता सूरज

धुंध में छिपी सड़कें

कोहरे ने मचाया कोहराम ।

 

पार्कों, बागों में मगर

झांकने लगा गुलाब

हो गए लापता

पलाश, गुलमोहर ।

 

दिल्‍ली बनी

कुल्‍लू - मनाली

एनसीआर लगता श्रीनगर

जाड़ा अपने यौवन पर

लो आ गई सर्दी ।

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0 शेर सिंह

के. के. - 100

कवि नगर, गाजियाबाद-201 010.

E-mail- shersingh52@gmail.com

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1 टिप्पणी "शेर सिंह की कविता - जाड़ा"

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