रविवार, 11 दिसंबर 2011

सदा बिहरी साहु की कविता - गरीबी

image

खुले आसमान के नीचे

धूप, बरसात, सरदी को अपनाकर

बहाता है पसीना दिन- रात

जीता है जीवन को एक सपना समझकर

भूख मिटाने के लिए कुछ खाना है

खाने के लिए भोजन जुटाना है - जीवन का है बस इतना ही लक्ष्य

फिर भी वह जीता है

सहर्ष ग्रहण करता है परिस्थितियों से मिली हर देन

मन में नहीं आती कभी किसी के प्रति दुर्भावना

न ही अपना कुछ गँवाने या छिन जाने का भय

न ही कभी दूसरों को धक्का देकर आगे बढ़ जाने का भाव

क्योंकि वह तो है गरीब-अकिंचन

बस इतना सा है उसका परिचय- चिरंतन

 

बनते हैं नियम, आती हैं योजनाएं, बहता है धन निर्बाध

जड़ से मिटाएंगे गरीबी करते हैं प्रण सब जन समवेत स्वर

मनीषीगण, नेता, अफसर, स्वयंसेवी सगंठन

करते हैं चर्चाएँ, विचार-विमर्श, चिन्तन, मनन, मंथन

लिखते हैं रिपोर्टें बड़ी-बड़ी,

रचते हैं विधान- “ कैसे हो गरीबों का उत्थान ? ”

मन में जागता है प्रश्न दुर्निवार- “क्या सचमुच लागू हुआ है कोई कार्यक्रम?”

“क्या सचमुच गरीबी हुई है कम?”

 

प्रकटतया तो बस यही दीखता है-

कि गरीबों को लूट कर धनिकों की संख्या बढ़ाने का ही हो रहा है उपक्रम

यूँ तो है प्रकटतया गरीबी रेखा से नीचे और निर्धन

लेकिन धनवान है दिल और मन से

करते नहीं किसी से लूट और जोर जबरदस्ती

करते हैं अर्पित अपना श्रम, कर्म- प्राणपण से

पाते हैं प्रतिफल में सिर्फ अभिशप्त जीवन

गरीब नहीं स्वेच्छा से, अपने मन से

समाज ने, परिस्थितियों ने दिया नहीं साथ उनका

शापित हैं इसलिए वे- और हैं निर्धन

 

आओ, करें इस पर मिलकर चिंतन-

क्यों मिली नहीं मुक्ति अब तक ?

क्या कमी है हमारे जीने के तरीके में ?

क्या कभी मुक्त होंगे हम-

अपने स्वार्थ, अपने लालच और दूसरों को लूटने के आदिम स्वभाव से?

--

डॉ. सदा बिहारी साहु / Dr. Sada Bihari Sahu,
प्रबंधक /Manager,
सूचना अधिकार अधीनयम कक्ष , मा. सं. वि. वि , केन्द्रीय पुस्तकालय    / RTI Cell,HRDD,Central Library,
लघु उद्योग विकास बैंक /
Small Industries Development
Bank of India (SIDBI)
15 अशोक मार्ग / 15, Ashok Marg,
लखनऊ - 226001 /  Lucknow-226001

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------