अनीता कपूर की कविता - मैं प्रवासी

image

मैं प्रवासी

सपना एक सँजोये

वर्षों से पलटती रही, पन्ने विदेशी केलेण्डर के

इंतज़ार में उस निमंत्रण के, जो देता माह दिसम्बर

एक ढलती शाम की विदाई का और स्वागत

होगा पाहुने सा, खिलखिलाते नूतन वर्ष का

सपना सच भी हुआ, मैं आज स्वदेश में हूँ

पर बोझिल मन, और आँखें तलाशती हैं

उस प्यार, अपनेपन और उस समाज को

जो ले गयी थी, मैं अपने साथ एक धरोहर

संस्कारों और विचारों की मिट्टी की खूशबू

और पढ़ाती रही, जिसका पाठ विदेश मे

गौरवान्वित रही, भारतीय होने पर

अब क्या कहूँ , मन बोझिल है, दुखी है

पूछता आप से सवाल, क्योंकर सड़ गयी

सबसे प्राचीन सभ्यता की सुगंध ,

ढक लिया समाज को लूटपाट

अत्याचार और भ्रष्टाचार के बादलों ने

पर अभी भी देर नहीं हुई, चुनौतियाँ स्वीकारो

आओ मिल कर नव-वर्ष को सतरंगी बनाएँ

प्यार संस्कृति के सभी रंगों से सजा कर

विश्व के आसमान पर भारत का परचम लहराएँ

--

डॉ अनीता कपूर

-----------

-----------

2 टिप्पणियाँ "अनीता कपूर की कविता - मैं प्रवासी"

  1. अनीता कपूर की रचनाएँ किसी भी विषय पर हों , उनकी प्रखर संवेदना हृदय का प्रत्येक कोना छूने की सामर्थ्य रखती है । देश-देशान्तर का अनुभव इस'मैं प्रवासी ' कविता में उतर आया है और साथ ही वह दु:ख भी जो अaप्ने सामने विभिन्न रूप धारण करके आता है आर्दिक बधाई बहन अनीता जी !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन अभिवयक्ति.....

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.