रविवार, 11 दिसंबर 2011

रघुनंदन प्रसाद दीक्षित प्रखर की सन्डे कविता

DSCN4348 (Mobile)

सन्डे

उठो आज प्रिय है सन्‍डे।

उठो आज प्रिय है सन्‍डे॥

पडे पडे क्‍या सोते प्रियतम चाय तुम्‍हें पिलानी है।

शर्मा जी तो खुद ही बनाते अब तुमसे बनवानी है॥

कितनी सुबह से जगा रही मैं करवट पड़े बदल रहे।

उठो उठो टल्लू के पापा बच्‍चे देखो मचल रहे॥

उठ जाओ जल्‍दी से

वर्ना अपनाऊँगी हथकंडे॥

 

देखो कितने काम पड़े, ये सब तुमको निपटाने हैं।

चाय नाश्‍ता और ये कपड़े आज सभी धुलवाने हैं॥

लेकिन तुम हो ऐसे प्रियतम सीधे होटल जाओगे।

वहां मिलेंगे शर्मा वर्मा संग में चाय उड़ाओगे॥

मित्र मंडली यों घेरेगी

ज्‍यों हों मथुरा के पण्‍डे॥

 

पिछले सण्‍डे बाजार गये मिली सलोनी बाला थी।

गोरी सुघर नयन कजरारे मानो पूरी ज्‍वाला थी॥

हंस हंस के बतियाय रही प्रियतम मुझ पर तरस नहीं।

उससे तो मैं अब भी सुन्‍दर ये ही तुममें कसक नहीं॥

तुम हो गये पती जी मेरे

वर्ना लगवाती मैं डंडे॥

--

भोजपुरी कविता

बना रहाय दै मोका

काहे भारु बिटिया लागल, तू काहे अम्‍मा हारेलू ।

दुई घर की बा बिटिया शोभा, तू रुप निशाचर धारेलू॥

भइया तोहका दीपक जइसन दंश समझला तू हमका।

अइसन हम का करनी करली ,मानै कारन तू गम का॥

हत्‍यारिन बा तोहरी मंशा,

गरभ बीच तू मारेलू॥

बिन अंगना आंगन मरुभूमी,ई घर हमसे खनकत बा।

भइया लागै जेठ दुपाहरी,बिटिया पाबस अमरत बा॥

कुल दीपक के दाख छुआरा ,

हम सूखी रोटी खावेलू॥

बना रहाय दै  मोका भव मा ,हमरहुं बाटे जीवन माँ।

ईसुर बुद्धि सद्‌ दे इनका होला जग में पावन माँ ॥

कहिया प्रखर मोर इक -

बतिया, पतवा काहे झारेलू॥

--

(कुंडलिया)

नथ

नथ की अकथ कहानियां ,रच डाले इतिहास।

कभी रही चित चोरनी, कभी हास परिहास॥

कभी हास परिहास बहुमुखी किलोलें करे चिबंक पर।

मूंगा मोती मकर आकृति अंगना ज्‍यों खग लागे पर॥

'प्रखर' हिलोरें उर अर्न्‍त में जैसे काम चढा हो रथ।

इतिहास बन गयी मंहगाई में हाय फैशन मारी नथ॥

--

मैं नदिया सी चंचल

दिल का काला जालिम बेमानी चाहता है।

फिजाओं सी बहती रंगी रवानी चाहता है॥

वो मेरा मैं उसके दिल की ,जरुरत बनी,

मेरी चाहत और चश्‍म ए आब चाहता है॥

ढजकता नमर ढलती शाम का शाम,

लेकिन पागल रातें वही पुरानी चाहता है॥

मैं नदिया सी बल खाती मचलती चंचल,

क्‍यों मुझ पर समन्‍दर सी हुक्‍मरानी चाहता है॥

'प्रखर‘छिडकता वो दिलो जान मुझ पर ,

आज प्रेमी वही शोख नादानी चाहता है॥

--

शांतिदाता सदन

नेकपुर चौरासी फतेहगढ

जनपद फर्रुखाबाद (उ0प्र0½

पिन 209601

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------