देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल : अक्सर ही मेरे क़रीब से; सुख अज़नबी सा गुज़र गया॥

-----------

-----------

image

जो नज़र मेँ उसकी मैँ चढ़ गया।

तो नज़र से अपनी उतर गया ॥

 

अक्सर ही मेरे क़रीब से;

सुख अज़नबी सा गुज़र गया॥

 

हर बार दुख मुझे और भी;

ज़्यादा जुझारू कर गया ॥

 

दहलीज पर दिल की मेरी ;

कोई दीप आश का धर गया ॥

 

इक ख़्वाब जो मेरे साथ ही;

जीने का वादा कर गया ॥

 

खोकर मैँ इक उम्मीद फिर;

इक और उम्मीद के घर गया ॥

 

किया सर क़लम तूने जो मेरा;

हूँ मैँ पेड़ क़द मेरा बढ़ गया ॥

 

हूँ मैँ नज़्म या अशआर कोई;

'महरूम 'तू मुझे पढ़ गया ॥

-----------

-----------

2 टिप्पणियाँ "देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल : अक्सर ही मेरे क़रीब से; सुख अज़नबी सा गुज़र गया॥"

  1. किया सर क़लम तूने जो मेरा;

    हूँ मैँ पेड़ क़द मेरा बढ़ गया ॥

    very positive writing

    regards

    naaz

    उत्तर देंहटाएं
  2. खोकर मैँ इक उम्मीद फिर;

    इक और उम्मीद के घर गया ॥



    किया सर क़लम तूने जो मेरा;

    हूँ मैँ पेड़ क़द मेरा बढ़ गया ॥

    very positive writing

    regards

    naaz

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.