रविवार, 11 दिसंबर 2011

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल : अक्सर ही मेरे क़रीब से; सुख अज़नबी सा गुज़र गया॥

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जो नज़र मेँ उसकी मैँ चढ़ गया।

तो नज़र से अपनी उतर गया ॥

 

अक्सर ही मेरे क़रीब से;

सुख अज़नबी सा गुज़र गया॥

 

हर बार दुख मुझे और भी;

ज़्यादा जुझारू कर गया ॥

 

दहलीज पर दिल की मेरी ;

कोई दीप आश का धर गया ॥

 

इक ख़्वाब जो मेरे साथ ही;

जीने का वादा कर गया ॥

 

खोकर मैँ इक उम्मीद फिर;

इक और उम्मीद के घर गया ॥

 

किया सर क़लम तूने जो मेरा;

हूँ मैँ पेड़ क़द मेरा बढ़ गया ॥

 

हूँ मैँ नज़्म या अशआर कोई;

'महरूम 'तू मुझे पढ़ गया ॥

2 blogger-facebook:

  1. किया सर क़लम तूने जो मेरा;

    हूँ मैँ पेड़ क़द मेरा बढ़ गया ॥

    very positive writing

    regards

    naaz

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  2. खोकर मैँ इक उम्मीद फिर;

    इक और उम्मीद के घर गया ॥



    किया सर क़लम तूने जो मेरा;

    हूँ मैँ पेड़ क़द मेरा बढ़ गया ॥

    very positive writing

    regards

    naaz

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