मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम' का आलेख - नई मंज़िलों की आहटें : अवनीश सिंह चौहान

नई मंज़िलों की आहटें ः अवनीश सिंह चौहान

- योगेन्‍द्र वर्मा व्‍योम'

हमारे पूर्वज साहित्‍यकार डा. श्‍यामसुंदर दास ने कहा है- ‘गीत काव्‍य में कवि अपनी अंतरात्‍मा में प्रवेश करता है और बाह्य जगत को अपने अंतःकरण में ले जाकर उसे अपने भावों से रंजित करता है।' वास्‍तविकता भी यही है कि अपने समय के साथ-साथ चलते हुए, अपने समय की विद्रूपताओं से मुठभेड़ करते हुए और गीत की सुकोमल रखने की शर्त का निर्वहन करते हुए ही आज का रचनाकार अपने रचनाकर्म को प्रस्‍फुटित कर रहा है। नायक-नायिका के मिलन अथवा बिछोह वर्तमान में गीत के उतने प्रिय विषय नहीं हैं, जितने कि सामाजिक सरोकार। आज गीतकवि परंपरागत बिंबों और प्रतीकों को अपनी भावाभिव्‍यक्‍ति का माध्‍यम नहीं बनाता, वरन्‌ नये-नये प्रतीकों और वर्तमान में अपने चारों ओर विद्यमान बिंबों की ताज़ा सुरभि से सुवासित कर अपने रचनाकर्म को उजागर करता है, मैं समझता हूँ कि यही ताज़गी, यही नयापन और यही प्रस्‍फुटन शायद गीत से नवगीत की यात्रा है। वरिष्‍ठ नवगीतकार श्री देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र' ने गीत और नवगीत के अंतर को बड़ी ही सहजता से संक्षेप में बताया है कि ‘हर नवगीत मुख्‍यतः गीत होता है, किंतु हर गीत नवगीत नहीं होता।' हमारे वरिष्‍ठ गीत रचनाकारों ने तो गीत, नवगीत और सहजगीत सृजन में प्रतिमान स्‍थापित किए ही हैं, किंतु आज कुछ नौजवान रचनाकार भी अपनी गीत रचनाधर्मिता के माध्‍यम से उजले भविष्‍य के संकेत दे रहे हैं, उनमें बड़ी तेज़ी से एक नाम हिंदी गीत-साहित्‍य में उभर रहा है, बल्‍कि यों कहें कि यह नाम हिंदी साहित्‍य की बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं, इंटरनेट पत्रिकाओं और राष्‍ट्रीय समाचार-पत्रों में अपने गीत रचनाकर्म के माध्‍यम से छा गया है, वह नाम और कोई नहीं चार जून 1979 को इटावा में जन्‍मे और मुरादाबाद को अपनी कर्मस्‍थली बनाने वाले अवनीश सिंह चौहान हैं।

श्री प्रहलाद सिंह चौहान व श्रीमती उमा चौहान के आत्‍मज अवनीश जी यों तो मूलरूप में गद्य लेखक हैं, लेकिन उन्‍होंने अपने काव्‍यकर्म का आरंभ गीत-विधा से किया और थोड़े ही समय में अपने गीतों के माध्‍यम से हिंदी साहित्‍य-जगत्‌ में अपनी सशक्‍त उपस्‍थिति दर्ज कराई है। अवनीश जी बहुआयामी व्‍यक्‍तित्‍व के धनी हैं, सहज हैं, सरल हैं, मृदुभाषी है और पढ़ाकू हैं। आपका कृतित्‍व गीत-सृजन से पूर्व समीक्षा, आलोचना, आलेख इत्‍यादि के रूप में हिंदी साहित्‍य जगत्‌ के सम्‍मुख आता रहा है और ‘नये-पुराने' जो हिंदी-गीत की एक सशक्‍त पत्रिका है, के कार्यकारी संपादक के रूप में आपके संपादन कौशल की भी हम सुखद रसानुभूति कर चुके हैं। साथ ही वर्तमान में आपने ‘पूर्वाभास' और ‘गीत-पहल' नाम से इंटरनेट पत्रिकाओं का निर्माण कर मुरादाबाद का नाम अंतर-राष्‍ट्रीय स्‍तर पर चमकाने का काम किया है, जो महत्‍वपूर्ण है। आपके गीत आपकी सशक्‍त रचनाशीलता के प्रस्‍फुटन को मज़बूती के साथ प्रमाणित करते हैं। नवगीत की यात्रा के युवा पथिक अवनीश जी के गीत सामाजिक विसंगतियों को बड़ी ही सहजता से चित्रित करते हैं। एक गीत में अवनीश जी महँगाई की व्‍यथा को प्रतिबिंबित करते हुए कहते हैं-

इनके उनके ताने सुनना

दिनभर देह गलाना

चंद रुपैया मज़दूरी के

नौ की आग बुझाना

अपनी-अपनी ढपली सबकी

सबके अलग शिकारे

आज आतंकवाद विश्‍व की समस्‍या बन चुका है और सबसे चिंताजनक बात यह है कि कुछ तथाकथित शक्‍तिशाली देश आतंकवाद मिटाने की आड़ में अपना प्रभुत्‍व जमाने की जुगत में है। ऐसे वातावरण में कमज़ोर और छोटे देशों की आवाज़ और पीड़ा उजागर होती है अवनीश जी के गीत की इन पंक्‍तियों में-

धरती पर बारूद उगाये

बेचे घर-घर में हथियार

इसे डराये, उसे सताये

बनकर सबका तारनहार

किससे कितना लाभ कमाना

इससे उसका नाता

पं. रमानाथ अवस्‍थी जी का प्रसिद्ध गीत है-

मेरी रचना के अर्थ बहुत-से हैं

जो भी तुमसे लग जाय लगा लेना

अवनीश जी के गीतों के संदर्भ में अवस्‍थी जी की उपरोक्‍त पंक्‍तियाँ लागू होती हैं। गीतों के शिल्‍प, भाव, कथ्‍य के संदर्भ में विविधता, पैनापन व नयापन ही अवनीश जी के रचनाकर्म का वैशिष्‍ट्‌य है। आपके गीत ज़मीनी सच्‍चाई को कड़ुवाहट के साथ उजागर करते हैं, तभी तो उनके द्वारा अपने गीतों में कही हुई बात आम आदमी को अपनी ही पीड़ा का गायन लगता है। बानगी के तौर पर पंक्‍तियाँ देखें-

गलाकाट इस कँप्‍टीशन में

कठिन हुआ जीवित रह पाना

बचे रहे यदि जीवित भी तो

मुश्‍किल है इसमें टिक पाना

सफल हुए हैं जो इस युग में

ऊँचा उनका योग

अपनी कृति ‘समर करते हुए' में वरिष्‍ठ गीतकार दिनेश सिंह जी कहते हैं कि ‘जो रचना अपने समय के साथ नहीं चलती, वह क्षणिक रूप से लोकप्रियता तो प्राप्‍त कर सकती है, किंतु सामयिक दस्‍तावेज़ नहीं बन सकती।' यह सुखद है कि अवनीश जी की रचनाएँ अपने समय के साथ केवल चल ही नहीं रही हैं, वरन्‌ समय के साथ आँखों में आँखें डालकर बात भी कर रही हैं, इसीलिए उनकी गीत-रचनाओं के सामयिक दस्‍तावेज़ बनने में किसी भी प्रकार की कोई शंका की गुंजाइश नहीं है।

अवनीश जी की सशक्‍त रचनाधर्मिता के कारण ही जहाँ नये-पुराने, उत्तरप्रदेश, सार्थक, परती-पलार, संकल्‍प रथ, प्रेसमेन, देशधर्म, अनन्‍तिम, गोलकोण्‍डा दर्पण आदि राष्‍ट्रीय पत्रा-पत्रिकाओं में उनके गीत, आलेख, समीक्षाएँ आदि प्रकाशित हुई हैं और हो रही हैं, वहीं इंटरनेट की प्रमुख बड़ी साहित्‍यिक पत्रिकाओं- कविताकोश, अनुभूति, साहित्‍य-शिल्‍पी, सृजनगाथा, हिंदयुग्‍म, पी4 पोईट्री, रचनाकार, वेबदुनिया, हिंदीनेस्‍ट आदि ने भी अवनीश जी के रचनाकर्म को ससम्‍मान प्रकाशित किया है। अंग्रेज़ी भाषा में भी आपका विपुल सृजन प्रकाशित होकर विभिन्‍न विद्यालयों-महाविद्यालयों के पाठ्‌यक्रम में शामिल है। आपकी इन्‍हीं उपलब्धियों को दृष्‍टिगत रखते हुए तथा हिंदी के प्रति आपके योगदान के अनेक साहित्‍यिक संस्‍थाओं द्वारा आपके रचनाकर्म को सम्‍मानित किया जा चुका है।

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