बुधवार, 7 दिसंबर 2011

सूरज प्रकाश की कहानी - डरा हुआ आदमी

image

मैंने अपनी कहानी का अंत ऐसा तो नहीं चाहा था। भला कौन लेखक चाहेगा कि जिस आदमी को कथा नायक बना कर उसने अरसा पहले कहानी लिखी थी, उसे न केवल लुंज-पुंज हालत में देखे बल्कि अपनी कहानी को आगे बढ़ाने पर मज़बूर भी होना पड़े। एक अच्‍छे-भले आदमी पर लिखी गयी ठीक-ठाक कहानी आगे जा कर ऐसे मोड़ लेगी, मैं कभी सोच भी नहीं सकता था। अपने कथा नायक की ये हालत देख कर अब न तो चुप रहा जा सकता है और न ही उसे इग्‍नोर करके चैन से रहा ही जा सकता है।

मैं अभी-अभी बद्री प्रसाद जी से मिल कर आ रहा हूं। पिछले चार बरस से कौमा में पड़े हुए हैं। बेरसिया में। भोपाल से घंटे भर की दूरी पर। उनकी पत्‍नी का घर है यहां। घर बेशक बद्री प्रसाद जी के पैसों से बना होगा, लेकिन कोठी के दरवाजे पर लगी नेम प्‍लेट तो यही बताती है कि इस कोठी की मालकिन उमा देवी हैं।

बहुत तकलीफ़ हुई बद्री प्रसाद जी को इस हालत में देख कर। बेशक कोठी बहुत बड़ी और आलीशान बनी हुई है लेकिन बद्री प्रसाद जी को जिस कमरे में रखा गया है, वह न केवल बहुत छोटा है बल्कि ऐसा लगता है कि पहले और अब भी गोदाम की तरह ही इस्‍तेमाल होता रहा है। एक तरफ रजाइयों का ढेर, पुरानी किताबों की अल्‍मारियां, कोने में रखे अनाज के पीपे, अल्‍मारी के ऊपर रखा पुराने मॉडल का शायद इस्‍तेमाल न हो रहा टीवी और इन सबके बीच कौमा की हालत में चार बरस से लेटे देश की सबसे बड़ी वित्‍तीय संस्‍था के रिटायर्ड जनरल मैनेजर। बेशक कमरे में एयरकंडीशनर लगा हुआ है लेकिन वह जून के महीने में भी बंद है और कमरे में ताज़ी हवा आने का कोई ज़रिया नहीं है। मेज़ पर ढेर की ढेर दवाइयां रखीं हैं। डिब्‍बों और शीशियों पर जमी धूल की परत बता रही है कि अरसे से उन्‍हें हाथ भी नहीं लगाया गया है। कमरा इतना छोटा और लदा-फदा है कि दो आदमियों के खड़े होने की जगह भी मुश्किल से बचती है।

इसी कबाड़खाने में बद्री प्रसाद जी पिछले चार बरस से पड़े हुए हैं। दीन दुनिया से परे। बेशक उमा जी बता रही हैं कि वे सबकी आवाज़ पहचानते हैं और मुस्‍करा कर रिस्‍पांस भी देते हैं, लेकिन हम उन्‍हें जिस हाल में देख रहे हैं, बेचारगी वाली हालत ही है उनकी। बेशक पांच मिनट पहले ही उनकी शेव बनायी गयी है और स्‍पांज भी किया गया है, और इस तैयारी के लिए हमें पौन घंटा इंतज़ार भी करवाया गया है, लेकिन इस बाहरी और दिखावटी ताज़गी के बावजूद साफ़-साफ़ लग रहा है कि वे उपेक्षित हालत में ही पड़े हुए हैं। पता नहीं कब से।

मैंने उन्‍हें कई बार पुकारा, पुरानी बातें याद दिलाने की कोशिशें कीं, उनके माथे पर देर तक हाथ रख कर उनके बाल सहलाता रहा, देर तक उनका हाथ थामे रहा लेकिन वे किसी भी तरह की पहचान से बहुत परे हैं। कोई रिस्‍पांस नहीं। मुंह उनका खुला रहा, लम्‍बी-लम्‍बी सांसें लेते रहे वे और इस पूरे अरसे के दौरान उनकी पलकें तेज़ी से लगातार झपकती रहीं।

मैं और नीरज लगभग बीस मिनट उनके पास खड़े रहे और इस पूरे अरसे के दौरान उमा जी पूरी कोशिश करती रहीं कि बद्री प्रसाद जी को मेरे आने के बारे में बता सकें। वे उन्‍हें बंबई के दिनों की, नौकरी की, ऑफिस की याद दिलाती रहीं लेकिन बद्री प्रसाद जी सुनने की स्थिति में तो नहीं ही लग रहे हैं। सच तो ये है कि बद्री प्रसाद जी मेरी आवाज़ पहचानना तो दूर, अपनी पत्‍नी की आवाज़ भी नहीं सुन पा रहे।

उमा जी बता रही हैं कि वे तो रोज़ सुबह सात बजे चली जाती हैं और आज दिन में घर पर हैं इसलिए बद्री प्रसाद जी कल्‍पना नहीं कर पा रहे कि मैं इस समय घर पर कैसे। कितना लचर तर्क है ये उमा जी का।

मैंने नीरज को इशारा किया और हम दोनों बाहर ड्राइंग रूम की तरफ आ गये। बाहर आते समय मैंने देखा कि बायीं तथा दायीं, दोनों तरफ दो बहुत बड़े-बड़े हवादार बेडरूम हैं। करीने से सजे हुए। दुमंजि़ला कोठी के आकार को देख कर तो ऐसा ही लग रहा है कि पूरे घर में कम से कम चार बेडरूम तो होने ही चाहिये। बद्री प्रसाद जी के कमरे की हालत देख कर मन कसैला हो आया। जीवन भर परिवार की तरफ से उपेक्षा और अकेलापन झेलने के बाद जब घर मिला भी तो किस हालत में। अपने ही घर में कितनी कम और खराब जगह आयी है उनके हिस्‍से में, वह भी इतनी गंभीर हालत में बीमार होने पर।

Ø

मेरे भीतर गुस्‍सा सिर उठा रहा है। जैसे फट ही पडूंगा। जी में आया कि उमा जी को झिंझोड़ कर पूछूं कि हमने बद्री प्रसाद जी को आपके पास भला-चंगा भेजा था, उनकी ये हालत आपने कैसे कर दी। बेशक रोग पर किसी का बस नहीं होता, कम से कम रोगी की देखभाल तो ढंग से की जानी चाहिये। वे बीमार होने के बावजूद किसी पर बोझ नहीं हैं, उनकी पेंशन है, अच्‍छा-खासा बैंक बैलेंस था, संस्‍थान की मेडिकल सुविधा इतनी अच्‍छी है कि ....।

मैंने नीरज का हाथ थामा है और किसी तरह से अपने गुस्‍से पर काबू पाने की कोशिश की है। बद्री प्रसाद जी से जुड़ी पुरानी सारी बातें याद आ रही हैं। बेसिलसिलेवार। बद्री प्रसाद जी पर तरस भी आ रहा है और गुस्‍सा भी कि उन्‍होंने क्‍यों जानबूझ कर स्थितियों को इस हद तक बिगड़ने दिया कि कुछ भी उनके पक्ष में न रहा। अब तो वे न जीते में हैं न मरते में।

Ø

उमा जी ने चाय पीने का आग्रह किया है जिसे मैंने गुस्‍से में मना कर दिया है लेकिन नीरज ने मेरा हाथ दबाया है और चाय के लिए हां कर दी है। मैंने नीरज की तरफ देखा, उसने मुझे चुप रहने का इशारा किया है। उमा जी एक पल के लिए भीतर गयी हैं चाय के लिए कहने, तभी नीरज ने मुझे समझाने की कोशिश की है - आप चाय के लिए मना कर देते तो हमारे पास यहां एक पल के लिए भी रुकने का कोई कारण न रहता। आप खुद ही तो जानना चाहते हैं कि बद्री प्रसाद जी इस हालत तक कैसे पहुंचे। आपने जो कुछ बताया था, मुझे भी उनकी ये हालत देख कर और भी बातें जानने की इच्‍छा हो रही है। सब कुछ जानने का एक ही तरीका बचता है हमारे पास कि हम कुछ वक्‍त यहां और गुज़ारें।

मैं नीरज की बात समझ गया हूं। अब हमारा मकसद चाय पीना नहीं, थोड़ी देर बैठ कर उमा जी से बद्री प्रसाद जी के बारे में कुछ और जानना है। ये तो हम देख ही चुके कि बद्री प्रसाद जी की देखभाल ठीक से नहीं हो रही है। यह बात उमा जी को बतायी भी जानी चाहिये। आखिर बद्री प्रसाद जी जिंदा तो हैं ही, बेशक कहने-सुनने या शिकायत करने से परे हैं। संस्‍थान की ओर से उनके कैशलेस इलाज की व्‍यवस्‍था तो है ही।

Ø

मैं गहरी सोच में पड़ गया हूं। बेशक पता था कि बद्री प्रसाद जी पिछले चार बरस से कौमा में हैं, और उनसे मिलना सुखद तो नहीं ही होगा, लेकिन उन्‍हें बेचारगी की इस हालत में देख कर मैं दहल गया हूं। रिटायरमेंट के दो महीने के भीतर ही तो उनके साथ ये हादसा हुआ था। मेरा कब से इधर आना टल रहा था। भोपाल कई बार आना हुआ लेकिन हर बार मीटिंग वगैरह में ही इतना समय निकल जाता था कि इस तरफ आना नहीं हो पाया। ऑफिस के कई लोग इस बीच बद्री प्रसाद जी को देखने आये। उनके निजी सचिव संजय तो एक बार पत्‍नी को भी ले कर आये थे और बुरी तरह से आहत हो कर लौटे थे। बता रहे थे संजय कि उस वक्‍त घर पर कोई नहीं था। एक नौकर था जो घर के कामकाज के अलावा बद्री प्रसाद जी की देखभाल भी करता था। नौकर ने ही संजय को बताया था कि स्‍पांज करने, दवा देने और लिक्विड डाइट देने का काम वही करता है। जिस वक्‍त संजय वहां पहुंचे थे तब तक बारह तो बज चुके होंगे लेकिन तब तक बद्री प्रसाद जी की सुध नहीं ली गयी थी। अस्‍त-व्‍यस्‍त से पड़े थे बद्री प्रसाद जी। लगता था मुंह भी नहीं धुलाया गया था तब तक उनका। संजय अपने प्रिय बॉस की ये हालत देख कर व्‍यथित हो गये थे और काफी देर तक बद्री प्रसाद जी का हाथ थामे रोते ही रहे थे।

Ø

कई बरस पहले मैं जब भोपाल आया था तो उस वक्‍त बद्री प्रसाद जी भी आये थे। मैं पुणे से आया था और बद्री प्रसाद जी मुंबई से। एक सेमिनार के सिलसिले में। उन्‍हें सेमिनार में सिर्फ भाग लेना था इसलिए उनके बोलने का मौका तो नहीं ही आया था। हालांकि तब हमारी दुआ-सलाम ही हो पायी थी और वे ठीक ही लग रहे थे लेकिन बाद में साथियों ने बताया था कि वे अकेले बेरसिया तक जाने की हालत में नहीं थे और उमा जी उन्‍हें लिवाने भोपाल में होटल तक आयीं थीं। तब तक उनकी हालत काफी बिगड़ चुकी थी लेकिन जैसी कि उनकी आदत थी, वे किसी को कुछ भी बताते नहीं थे।

तो इस बार जब भोपाल आने का प्रोग्राम बन रहा था तो नीरज से मिलने की भी बात थी। नये लिखने वालों में नीरज ने तेजी से अपनी जगह बनायी है। खासकर ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि पर हाल ही में लिखे अपने ताज़ा उपन्‍यास से उसने सबका ध्‍यान अपनी ओर खींचा है। नीरज ने जब अपने घर का पता बताते हुए बेरसिया बताया और ये बताया कि वहां तक कैसे पहुंचा जा सकता है तो मुझे याद आया कि अरे, बद्री प्रसाद जी का घर भी तो बेरसिया में ही है और उनकी पत्‍नी उमा जी बरसों से वहां पढ़ा रही हैं। पूछने पर नीरज ने ही बताया कि वह खुद उमा जी का स्‍टूडेंट रह चुका है और उनके दोनों लड़कों को भी जानता है, अलबत्‍ता बद्री प्रसाद जी के बारे में वह कुछ नहीं जानता था। जब मैंने नीरज को बताया कि मैं वहां बद्री प्रसाद जी से भी मिलना चाहूंगा तो उसने आश्‍वस्‍त किया कि वह मैडम से बा‍त करके रखेगा और खुद भी मेरे साथ चला चलेगा।

Ø

यहां आते समय मैंने नीरज को बद्री प्रसाद जी के बारे में विस्‍तार से बताया था कि किस तरह से सारा जीवन मुंबई में अकेले गुज़ारने के बाद बद्री प्रसाद जी घर आये भी तो किस हालत में! बद्री प्रसाद जी की इस हालत के पीछे बहुत हद तक उनकी पत्‍नी उमा जी ही दोषी हैं। अपनी टुच्‍ची-सी नौकरी की जिद के चलते वे जिंदगी भर खुद भी अकेली खटती रहीं और बद्री प्रसाद जी को भी पूरे छत्‍तीस बरस तक अकेले रहने पर मज़बूर किया। उमा जी के पास फिर भी अपना कहने को परिचित माहौल और दो बच्‍चे थे लेकिन उन्‍होंने बद्री प्रसाद जी के बारे में कभी नहीं सोचा कि वह आदमी मुंबई जैसे शहर में इतने लम्‍बे अरसे तक बिना परिवार के कैसे रह सकता है। नीरज को मैंने बताया था कि जीवन भर के अकेलेपन और खालीपन के चलते बद्री प्रसाद जी ने कई गंभीर रोग पाल लिये थे। फीयर साइकोसिस यानी डर के मरीज तो वे पहले से ही थे, भूलने की गंभीर बीमारी उन्‍हें हो गयी थी जिसके कारण वे हमेशा परेशान रहे और असहज जीवन जीने को मज़बूर रहे। डर के साथ-साथ वे असुरक्षा यानी इनसिक्‍युरिटी से बेहद आतंकित रहते थे। ये सारे डर उन्‍हें चैन से जीने नहीं देते थे।

यह सुन कर नीरज ने बताया था कि उमा जी भी अपने आप में एबनार्मल कैरेक्‍टर हैं। मिलेंगे तो खुद देखेंगे। लेकिन नीरज ने यह भी बता दिया था कि वैसे उनसे मिलने की उम्‍मीद कम ही है क्‍योंकि आजकल परीक्षाएं चल रही हैं और उमा जी यहां से सत्‍तर किमी दूर एक कॉलेज की प्रिंसिपिल हैं। उनकी नौकरी इस बात की इजाज़त नहीं देती कि इन दिनों एक दिन के लिए भी अनुपस्थित रहा जाये। उमा जी के बारे में नीरज बता रहा था कि हिंदी में पीएचडी होने और एक कॉलेज की प्रिंसिपल होने के नाते उन्‍हें अक्‍सर शहर भर के हिंदी कार्यक्रमों में अध्‍यक्ष के रूप में बुलाया जाता है! जब अध्‍यक्षीय भाषण देने की उनकी बारी आती है तब तक वे भूल चुकी होती हैं कि उन्‍हें क्‍या करना है। मौका कोई भी हो वे हिंदी फिल्‍मों की तर्ज पर लिखे खुद के भजन गाने लगती हैं। या ट्रैक से उत‍र कर कुछ भी बोलने लगती हैं। और जब वे बोलने लगती हैं तो आज के विषय के छोड़ कर दुनिया कर सभी विषय कवर करने की कोशिश करती हैं। ऐसे में आयोजकों की हालत खराब हो जाती है। बाहर के कार्यक्रमों में तो वे ये करती ही हैं, अपने कॉलेज में भी वे अपने लिखे ये भजन गाने के लिए बदनाम हैं। हद तो ये है कि इन भजनों की उनकी दो किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं, उनके लोर्कापण भी हुए हैं। भूलने के मामले में भी वे अपने पति के आसपास ही ठहरती होंगी!

और अपने इस भुलक्‍कड़ेपन का सुबूत उन्‍होंने हमारे यहां पर पहुंचते ही दे दिया था। हम हैरान हुए जब हमारे पहुंचने पर दरवाजा खुद उमा जी ने ही खोला था। नीरज की उनसे एक रात पहले ही बात हुई थी और उसने जब मेरे आने के बारे में बताया था तो वे यही बोलीं थीं कि उनका खुद का मिलना तो नहीं हो पायेगा, अलबत्‍ता, दोनों बच्‍चे दिन भर घर पर ही होते हैं। वे पापा से मिलवा देंगे।

उमा जी नीरज को पहचान गयीं और उलाहना देने लगीं कि अरे तुम इतने बड़े लेखक बन गये हो और तुम्‍हारी कोई किताब हम तक नहीं पहुंची। नीरज ने उनके पैर छूए थे और मुस्‍करा कर रह गया था। लेकिन जब भीतर पहुंच कर बैठने के बाद नीरज ने उन्‍हें याद दिलाने की कोशिश की कि वह बीए में दो बरस तक उनसे हिंदी पढ़ चुका है तो उन्‍हें बिल्‍कुल भी याद नहीं आया था। अब वे नीरज का नाम भी भूल चुकी थीं। नीरज ने उन्‍हें कई घटनाएं याद दिलायीं लेकिन वे अपनी ही धुन में खोयी थीं। बात कहीं से कहीं मोड़ती रहीं। तभी नीरज ने मुझे इशारा किया था। उमा जी पंखे का स्विच ढूंढ रही थीं। उन्‍होंने एक-एक करके स्विच बोर्ड के सभी बटन दबाये थे। पंखा तब भी नहीं चला था। तब उन्‍होंने जाकर दूसरी दीवार पर लगे स्विच बोर्ड के बटन दबाने शुरू किये। तब पंखा चला था। हम हैरान हुए थे कि घर की मा‍लकिन को ये न पता हो कि ड्राइंगरूम में पंखे का स्विच कहां है तो सचमुच सीरियस बात है।

Ø

चाय आ गयी है। उमा जी के पीछे पीछे एक दुबली-सी लड़की चाय की ट्रे थामे आयी है। चाय सिर्फ हम दोनों के लिए आयी है। आधा-आधा कप चाय और प्‍लेट में पार्ले ग्‍लूकोस के चार बिस्किट। इतने में भीतर से एक हट्टा-कट्टा आदमी आया है। हाथ जोड़ कर बताता है - मैं गौरव, बद्री प्रसाद जी का बड़ा लड़का। उम्र पैंतीस के करीब तो रही ही होगी गौरव की। पूछने पर बताता है कि वह एनीमेशन का काम करता है। पहले दोनों भाई, वह और छोटा भाई विवेक, दोनों ही भोपाल में एक कम्‍पनी में काम करते थे लेकिन, वह भीतर की तरफ इशारा करते हुए बताता है, पापा के कारण अब दोनों ही जॉब छोड़ कर बच्‍चों को घर पर ही एनिमेशन सिखाते हैं।

अब मुझे लगने लगा है कि नीरज ने चाय के बहाने रुक कर सही फैसला लिया है। बेशक उमा जी से ज्‍यादा बातें न उगलवायी जा सकें, गौरव कुछ तो बोलेगा। पहला सवाल मैं उसी से पूछता हूं – किस डाक्‍टर का इलाज चल रहा है?

-इंदौर के एक डॉक्‍टर हैं, उन्‍हीं की सलाह पर दवाएं देते हैं।

- मतलब, किसी बड़े अस्‍पताल से इलाज नहीं हो रहा, मैं हैरान रह गया हूं - और फिर भोपाल तो इतने पास है और इलाज की सुविधाएं भी बेहतर हैं भोपाल में?

- नहीं, वो क्‍या था कि जब चार साल पहले इलाज शुरू किया गया था तो जिस डॉक्‍टर से हम सलाह ले रहे थे, उन्‍हीं की सलाह हमें ठीक लग रही है, सो डॉक्‍टर बदला नहीं। कभी भी बुलाने पर ये डॉक्‍टर इंदौर से खुद आ जाते हैं।

- तो क्‍या कहते हैं इंदौर वाले ये डॉक्‍टर?

- कहते तो कुछ नहीं, बस यही कि अब तो इनकी यही हालत रहने वाली है। गौरव बेशरमी से बोला है।

- लेकिन अगर हालत पहले से बेहतर नहीं हो रही है तो कम से कम किसी और स्‍पेशलिस्‍ट को तो दिखाया जाना चाहिये था। क्‍या कोई काम्‍पलीकेशंस बढ़े भी हैं?

- हां, पापा को पेरेलिसेस तो पहले से ही था, अब डॉक्‍टर बता रहे थे कि बायीं आंख में मोतियाबिंद भी हो गया है।

- ओह! ये तो बहुत सीरियस बात है। आखिरी बार आप इन्‍हें इंदौर कब ले गये थे?

- चार महीने पहले।

- जरा पापा के मेडिकल पेपर्स दिखायेंगे? मेडिकल इंशोरंस कार्ड भी लेते आना। मैं अब पूरी पड़ताल कर लेना चाहता हूं कि आखिर माजरा क्‍या है।

- गौरव भीतर जा कर एक फोल्‍डर लाया है। मैं सिर्फ कार्ड देखना चाहता हूं। बाकी मेडिकल टर्म्‍स तो मुझे क्‍या ही समझ आयेंगी। हमारी संस्‍था की ओर से दिये गये पति-पत्‍नी, दोनों के मेडिकल इंशोरेंस कार्ड हैं। किसी भी बड़े अस्‍पताल में इलाज कराने के लिए सालाना कैशलेस लिमिट दो लाख चालीस हज़ार रुपये। अब मुझे बाहर के डॉक्‍टर से इलाज करवाने का कारण समझ में आने लगा है। कैशलेस सेटलमेंट में आपके हाथ में कुछ नहीं आता जबकि बाहर के डाक्‍टर से आप मनचाहा बिल बनवा सकते हैं।

- लेकिन ये इंदौर वाला डॉक्‍टर तो कैशलेस ट्रीटमेंट नहीं करता होगा।

- हां, बिल देता है जो बहुत देर से पास होता है।

- दवाइयां कैसे देते हैं?

- लिक्विड डाइट के साथ।

- इंजेक्‍शन वगैरह भी लगते हैं?

- हां, ज़रूरत पड़ने पर लोकल डॉक्‍टर लगा जाता है।

अब सारी बातें साफ होने लगी हैं। इस परिवार के लिए बद्री प्रसाद न पहले कोई मायने रखते थे, न अब रखते हैं। जीते हैं या मरते हैं इनकी बला से। एक बेसुध काया है जो घर के एक कोने में पड़ी हुई है। उसके नाम पर अच्‍छी-खासी पेंशन भी आती है और मेडिकल सुविधा के नाम कुछ राशि ऊपर से भी।

मैं देख रहा हूं कि इस सारी बातचीत के दौरान उमा जी बिल्‍कुल चुप बैठी रही हैं। मेरा अगला सवाल दोनों से ही है - क्‍या आपको नहीं लगता कि बद्री प्रसाद जी को किसी खुली और हवादार जगह में लिटाया जाना चाहिये।

जवाब उमा जी ने दिया है लेकिन ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है। बता रही हैं - मौसम जब अच्‍छा होता है तो हम उन्‍हें व्‍हील चेयर पर बिठा कर बाहर लाते हैं ना। तब उन्‍हें बहुत अच्‍छा लगता है। मुस्‍कुराते हैं तब और सबको पहचानते हैं। कुछ खिलाते हैं तो खा भी लेते हैं।

अब इस सवाल को दोहराने का कोई मतलब नहीं है।

मैं गौरव को बताता हूं - आप लोग म्‍यूजिक थेरेपी के बारे में तो जानते होंगे। स्‍टडीज बताती हैं कि इस तरह के मरीजों को बेशक मामूली-सा ही सही, संगीत सुनने से फायदा होता है। कम से कम उनकी तनी हुई शिराओं को आराम पहुंचता है। आप लोग कोशिश कर सकते हैं, एक अच्‍छा-सा म्‍यूजिक सिस्‍टम हो और उस पर मास्‍टर्स के गायन और वादन की सीडी..!

नीरज ने मेरी बात आगे बढ़ायी है। कहा है - सर ठीक कह रहे हैं। म्‍यूजिक ऐसी हालत में मरीज पर अच्‍छा असर डालता है। मेरे साथ चलना। मैं अच्‍छा कलेक्‍शन दिलवा दूंगा।

गौरव तुरंत बोला है - हम बजाते हैं ना हनुमान चालीसा पापा के लिए।

अब इस मामले में भी कहने-सुनने के लिए कुछ भी नहीं बचा है। किन मूर्खों से बात‍ कर रहा हूं मैं। मेरा गुस्‍सा फिर सिर उठाने लगा है। मैंने विषय बदला है - आप तो मुंबई कभी-कभी आ पाते होंगे, पढ़ाई वगैरह के कारण, तो वह जवाब देता है - हां, बहुत बार तो नहीं, लेकिन कभी-कभी ही जाना हो पाता था। बता रहा है वह - मैंने एनीमेशन को कोर्स पुणे से किया था और दो तीन-महीने जॉब भी मुंबई में किया, लेकिन जमा नहीं, इसलिए भोपाल आ गया था। मैं हैरान हुआ कि देश भर का लगभग 70 प्रतिशत एनीमेशन का काम मुंबई में होता है और इन जनाब को जमा नहीं।

अगला सवाल मैं उमा जी से पूछता हूं - आप भी तो शायद कम ही जाती रही हैं वहां। वे निश्‍चिंत भाव से बताती हैं - हां, कम ही जा पाते थे हम मुंबई। हर बार नौकरी का कोई न कोई लफड़ा रहता ही था।

मैंने बेशरमी से पूछ ही लिया है- मैंने बद्री प्रसाद जी को अक्‍सर अकेले ही रहते देखा है। एक बार वे खुद भी बता रहे थे कि वे पूरी जिंदगी अपने परिवार के साथ कुल मिला कर दो बरस भी नहीं रह पाये हैं! ये सच है क्‍या?

उमा जी को इस चुभते सवाल की उम्‍मीद नहीं थी। जवाब गौरव ने दिया है। सरासर झूठा जवाब - दरअसल अंकल, पापा को अकेले रहना ही अच्‍छा लगता था। वे तो हमारे आने से डिस्‍टर्ब ही हो जाते थे।

- लेकिन जब वे दो महीने के लिए पैर के इलाज के लिए अस्‍पताल में थे तब भी आप में से कोई नहीं आया था?

इस बार भी जवाब गौरव ने ही दिया है, जरा तुर्शी में आ कर - नहीं अंकल, ऐसा नहीं था, हम सब ज़रूर आते लेकिन पापा ने ही हमें खबर नहीं दी थी। हमें तो बहुत देर से पापा की बहन से पता चला था कि पापा अस्‍पताल में हैं और वे पापा की देखभाल के लिए नागपुर से वहां पहुंची थीं। हमें खुद खराब लगा था कि पापा ने हमें न बता कर अपनी बहन को बताया। जब तक हम पहुंचते पापा को घर लाया जा चुका था।

- लेकिन उस वक्‍त तो शायद आप वहीं थे जब आपके पापा ऑफिस से घर नहीं आये थे और रात भर भटकते रहे थे।

-हां, हम दोनों भाई तब पापा के पास मुंबई में ही थे। ऑफिस बंद होने के बाद जब ड्राइवर उन्‍हें लेने के लिए गया था तो पापा ऑफिस में ही थे। वह उनका ब्रीफकेस ले कर नीचे आने लगा तो पापा ने कहा था - मैं दस मिनट में नीचे आ रहा हूं। ब्रीफकेस खुद लेता आऊंगा, लेकिन जब एक घंटा बीत जाने के बाद भी पापा नीचे नहीं आये तो उन्‍हें देखने के लिए ऊपर गया था, पापा का केबिन बंद था और वे कहीं नहीं थे। ड्राइवर परेशान हो कर घर आया था कि पापा कहीं किसी और के साथ न आ गये हों। उस दिन हम बहुत परेशान हुए थे। सब जगह ढूंढा था और पापा रात को बारह बजे लौटे थे। उन्‍हें बिलकुल भी याद नहीं था कि वे इतने समय तक कहां थे।

अरे, गौरव तो बद्री प्रसाद जी के गुम होने की अलग ही कहानी बता रहा है। हमारी खुद की देखी और भोगी घटना तो अलग ही थी। पूरा ऑफिस इस घटना का गवाह था।

Ø

किस्‍सा कुछ इस तरह से था। उन दिनों उनकी पोस्टिंग वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर वाले ऑफिस में थी। घर लोवर परेल स्‍टेशन के पास था। घर से मिनिमिम फेयर पर टैक्‍सी की दूरी पर वर्ली नाका से एसी बस मिल जाती थी जो सीधे ऑफिस तक जाती थी। इस बस के कारण वे दोनों तरफ लोकल ट्रेन की तकलीफों से बच जाते थे।

उस दिन पता नहीं क्‍या हुआ, ऑफिस से वापिस आते समय वे वर्ली नाका पर बस से उतरना भूल गये और बस के आखिरी स्‍टॉप अंधेरी में लोखंडवाला तक चले गये। बस के अंतिम पड़ाव से वापिस आने का एक ही तरीका था कि उसी बस में वापिस आते। आये लेकिन इस बार भी बस से उतरना भूल गये और वापिस वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर जा पहुंचे। बस की ये आखिरी ट्रिप थी और रात के ग्‍यारह बजने को आये थे। संयोग से उन दिनों उनके बच्‍चे मुंबई आये हुए थे। पिता के लिए कम और तफरीह के लिए ज्‍यादा। मोबाइल का युग तब तक इतने बड़े पैमाने पर शुरू नहीं हुआ था। बद्री प्रसाद जी के पास तब मोबाइल नहीं था, होता भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्‍योंकि खुद उन्‍हें अपना मोबाइल बजने के बारे में पता नहीं चलता था।

बच्‍चे जब बहुत परेशान हुए तो बद्री प्रसाद जी की डायरी में से देख कर दो-एक परिचित अधिकारियों को फोन किया। बद्री प्रसाद जी की हालत उन दिनों बहुत अच्‍छी नहीं चल रही थी। बेचारे अधिकारी अपनी कार ले कर ऑफिस गये, वाचमैन से कह सुन कर ऑफिस खुलवाया, एक-एक केबिन, बाथरूम खुलवा कर देखा, इस बीच बच्‍चे सभी अस्‍पतालों वगैरह में फोन करके पूछ चुके थे। बद्री प्रसाद जी कहीं नहीं थे। इस बीच कालोनी में भी सबको खबर हो चुकी थी। बद्री प्रसाद जी संस्‍थान के वरिष्‍ठ अधिकारी थे इसलिए सबका परेशान होना लाजमी था।

उस रात बद्री प्रसाद जी अपना ब्रीफ केस झुलाते हुए रात ढाई बजे घर लौटे थे और उन्‍हें कुछ भी याद नहीं था कि वे अब तक कहां थे।

Ø

भूलने की आदत तो उन्‍हें शुरू से ही थी लेकिन शुरू-शुरू में ये भूलना आम तौर पर वैसा ही होता था जैसा हर आम आदमी के साथ होता रहता है। मसलन कोई चीज़ रख कर भूल जाना या बैंक से पैसे निकालना भूल जाना और मजबूरन दोस्‍तों से उधार लेना। लेकिन धीरे-धीरे ये रोग बढ़ने लगा और वे भूलने की लम्‍बी-लम्‍बी ईनिंग्‍स खेलने लगे। कभी ऑफिस पहुंच कर याद आता कि शायद प्रेस बंद करना भूल गये हैं तो कभी गैस बंद करना या फिर ताला बंद करना। कितनी ही बार ऐसा हुआ कि वे चर्चगेट से बोरिवली तक वापिस सिर्फ ये देखने के लिए गये कि प्रेस या गैस या फिर ताला ठीक से बंद करके आये थे या नहीं। चीजें रख कर भूल जाने में तो उन्‍हें जैसे महारत थी।

एक बार एक बहुत ही ज़रूरी केस देख रहे थे। मंत्रालय से आया पत्र सामने रखा था। तभी फोन की घंटी बजी। किसी सीनियर ऑफिसर का फोन था। उस अधिकारी ने कोई फोन नम्‍बर बताया होगा जिस पर बद्री प्रसाद जी को बात करनी थी। आसपास और कोई कागज़ न देख कर बद्री प्रसाद जी ने वही पत्र उलटा किया और उसके दूसरी तरफ नम्‍बर लिख दिया। फोन वापिस रखने पर देखा कि मंत्रालय वाला पत्र गायब है। खूब ढूंढ मची। ऐसे स्‍टाफ की भी शामत आ गयी जो सुबह से उनके केबिन में नहीं आया था। मज़े की बात, वे अपनी मेज़ पर रखे कागजों पर किसी को हा‍थ नहीं लगाने दे रहे थे कि कोई वहीं देख कर खोज ले। कई घंटे बाद अचानक ही कागज पलटा तो खत सामने था। खैर, किसी तरह केस निपटाया गया और वह पत्र दूसरे कागजों के साथ संबंधित डेस्‍क पर चला गया। शाम को अचानक उस फोन नम्‍बर की दोबारा ज़रूरत पड़ी तो फोन नम्‍बर गायब था। इस बात की कल्‍पना करना मुश्किल नहीं है कि उस दिन उस फोन नम्‍बर ने बद्री प्रसाद जी को कितना रुलाया होगा।

ऐसा ही एक और किस्‍सा याद आ रहा है मुझे। एक बार बद्री प्रसाद जी को व्‍याख्‍यान देने के लिए कहीं बाहर जाना था। पावर पाइंट प्रेजेंटेशन बना लिया था लेकिन पेन ड्राइव में सेव नहीं कर पा रहे थे। तभी उनके केबिन के सामने से कुछ स्‍टाफ सदस्‍य कैंटीन की तरफ जाते दिखायी दिये। बद्री प्रसाद जी ने उन्‍हें बुलाया और मदद के लिए कहा। उनमें से टाइपिस्‍ट साखरे ने अपना टिफिन बद्री प्रसाद जी की मेज पर रखा और पीसी पर काम करने लगा। इतने में बद्री प्रसाद जी ने अपनी मेज के कागज़-पत्‍तर संभाल कर अल्‍मारी में रखने शुरू किये। वैसे ही उन्‍हें जाने की देर हो रही थी। इस सफाई अभियान में साखरे का टिफिन बॉक्‍स गायब। जब उसने पेन ड्राइव बद्री प्रसाद जी को थमायी तो देखा, टिफिन बॉक्‍स कहीं नहीं है। बद्री प्रसाद जी से पूछा कि कहीं कागजों के साथ अल्‍मारी में तो नहीं रख दिया है। वे साफ मुकर गये कि उन्‍होंने कोई टिफिन बाक्‍स देखा ही नहीं। सबने लाख कहा कि वे सब लंच के लिए कैंटीन जा रहे थे और कि टिफिन साखरे के हाथ में था और वह आज मटन करी ले कर आया है। बद्री प्रसाद जी सबको हक्‍का बक्‍का छोड़ कर चल दिये! उस दिन साखरे को घर से मटन करी लाने के बावजूद कैंटीन के खराब खाने से गुज़ारा करना पड़ा।

कुछ दिन बाद की बात है बद्री प्रसाद जी जब भी अपनी अल्‍मारी खोलते, उन्‍हें बदबू का भभका लगता, वे कागज वगैरह निकाल कर जल्‍दी से अल्‍मारी बंद कर देते। कई दिन तक ये चलता रहा। वे अल्‍मारी खोलते और बंद करते रहे। बदबू झेलते रहे। एक दिन वे छुट्टी पर थे और एक जरूरी फाइल उनकी अल्‍मारी से निकाली जानी थी। चपरासी ने दो अधिकारियों की मौजूदगी में अल्‍मारी खोली। एक बार फिर तेज बदबू का भभका। तलाश करने पर मिला कई दिन पहले बद्री प्रसाद जी द्वारा बंद किया गया मटन करीवाला टि‍फिन बॉक्‍स। पूरे टि‍फिन बॉक्‍स मे फफूंद लगी हुई थी। ‍

Ø

भूलने की आदत से उन्‍हें व्‍यक्तिगत रूप से तो परेशानियां होती ही थीं, वे कई बार संस्‍थान के लिए परेशानी का सबब बन जातीं। तब उनके लिए जवाब देना भारी पड़ जाता था।

चेन्‍नै में एक बहुत ही महत्‍वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम था जिसका उन्‍हें उद्घाटन करना था। इसी कार्यक्रम में दोपहर बाद उनका एक सत्र भी था। सब कुछ तय हो चुका था। पता नहीं कैसे हुआ कि अपनी चेन्‍नै विजिट के बारे में उन्‍होंने वहां दूसरे संस्‍थानों में कार्यरत कुछ मित्रों से बात की। उन मित्रों ने भी बद्री प्रसाद जी की मौजूदगी का फायदा उठाने के मकसद से अपने यहां उनके व्‍याख्‍यान रख लिये और बद्री प्रसाद जी की सहमति भी ले ली। सहमति देते समय बद्री प्रसाद जी ने अपने कार्यक्रम का समय चेक करने की भी ज़रूरत नहीं समझी। ट्रेनिंग कार्यक्रम के उद्घाटन से पहले ही दोनों संस्‍थान वाले उनके मित्र गाडि़यां ले कर आ गये। अजीब स्थिति हो गयी। तीनों जगह बद्री प्रसाद जी ने एक ही समय दे दिया था। किसी तरह अपना कार्यक्रम निपटा कर वे दूसरे कार्यक्रम के लिए लपके। दूसरे से तीसरे के लिए और तीसरे से वापिस जब वे अपने कार्यक्रम में सत्र लेने के लिए आये तो पूरी तरह अस्‍त-व्‍यस्‍त थे। उन्‍हें याद नहीं था कि अपना ब्रीफकेस किस कार में छोड़ आये हैं और दूसरे संस्‍थानों से मिले गिफ्ट या बुके किस कार में रखे थे। सबसे बड़ी तकलीफ की बात ये रही उस दिन कि उन्‍हें बिलकुल भी याद नहीं आ रहा था कि इस सत्र में व्‍याख्‍यान किस विषय पर लेना है। जब उन्‍हें सत्र के विषय के बारे में बताया गया तो उनकी तैयारी नहीं थी सत्र लेने की। बहुत खराब अनुभव रहा था उस दिन उनका और जवाब देना भारी पड़ गया था।

अनंत किस्‍से हैं बद्री प्रसाद जी के जीवन से जुड़े। वे बेशक बहुत भले आदमी थे, कभी किसी का अहित नहीं चाहा, किया भी नहीं, लेकिन अपनी इन्‍हीं आदतों के कारण कभी भी बहुत लोकप्रिय या सफल अधिकारी नहीं बन पाये थे। वरिष्‍ठता बेशक उनके हिस्‍से में आयी लेकिन वरिष्‍ठता के साथ जुड़ा सम्‍मान उन्‍हें कभी नहीं मिला।

बातचीत का विषय एक बार फिर बदलने की नीयत से मैंने उमा जी से पूछा है - आपकी शादी कब हुई थी?

वे याद करने की कोशिश करती हैं- नवम्‍बर 1975 में।

-प्रेम विवाह था क्‍या आप लोगों का?

- नहीं, मैं तब दिल्‍ली में बीएड कर रही थी, बद्री प्रसाद जी की बड़ी बहन भी मेरे साथ पढ़ रही थी। उसी ने मुझे पसंद किया था और एक बार छुट्टियों में अपने साथ अपने घर ले गयी थी। तब ये भी वहीं आये हुए थे। सबकी सहमति से ही तब विवाह हुआ था।

-बद्री प्रसाद जी तो शायद नागपुर की तरफ के रहने वाले हैं, आप कहां की हैं?

-मैं छिंदवाड़ा की तरफ की हूं।

Ø

मैंने यहां आते समय मैंने नीरज को बताया था कि 1992 के आसपास मैंने एक कहानी लिखी थी - फैसले। एक अधिकारी मुंबई में अपनी नौकरी के पहले दिन से ही अकेला रह रहा था। पहले वाजिब कारण थे कि उसके पास संस्‍थान की ओर से मिलने वाला घर नहीं था। वह खुद इधर-उधर गुज़ारा करके रह रहा था। परिवार कभी-कभार ही ला पाता। इस बीच उसकी पत्‍नी ने टाइम पास के लिए पहले तो एमए ज्‍वाइन कर लिया था, फिर कोई काम चलाऊ नौकरी भी पकड़ ली थी। इस बीच दो बच्‍चे भी हो चुके थे। तो मैडम का आना अलग-अलग कारणों से टलता चला गया था। और जब साहब को पंद्रह बरस के इंतज़ार के बाद सुकूनभरा फ्लैट मिला था तो भी वे उसे घर नहीं बना पाये थे। मैडम ने अब आने से साफ इनकार कर दिया था। कभी स्‍थायी होने का बहाना तो कभी हैड बनने का चांस।

मेरा कथा नायक उन्‍हें समझा-समझा कर हार जाता है लेकिन वे नहीं आतीं। अंत में वह यही तय करता है कि अब भी वे नहीं मानीं तो वह तलाक ले लेगा।

मेरी उस कहानी के कथा नायक बद्री प्रसाद ही थे।

नीरज ने तब एक बात कही थी कि आपकी कहानी तो वहीं ठिठकी रह गयी लेकिन आपका असली कथा नायक आगे निकल गया। अच्‍छा-बुरा जैसा भी जीवन उसने जीया, अब इतने बरसों के बाद फिर एक चुनौती की तरह आपके सामने है और कह रहा है कि न तो कहानी जीवन के नक्‍शे-कदम पर चलती है और न ही जीवन कहानी के सांचे में ढल कर चला करता है। अब हिम्‍मत है तो लिखो आगे की कहानी। बेशक मेरी कहानी तब इसी वाक्‍य के साथ खत्‍म हो गयी थी कि अगर उमा अब भी नहीं मानी तो वे तलाक ले लेंगे, लेकिन जीवन के कथा नायक को तो सचमुच अपना जीवन जीना था और जीया भी।

Ø

असली जिंदगी में बद्री प्रसाद जी बेहद कमज़ोर निकले थे। वे हताश-निराश हो गये थे। डर उनके जीवन का स्‍थायी भाव था। तलाक के बारे में सोचने के बाद भी कुछ नहीं कर पाये थे, बेशक कार्मिक विभाग में जा कर नामिनेशन फार्म से बीवी का नाम कटवा कर अपनी विधवा बहन का नाम लिखवा आये थे। लेकिन कुछ ही अरसा बीता था कि ये दांव भी उलटा पड़ गया था। कार्मिक विभाग से बुलावा आया था कि ऑफिस के रिकार्ड से अनुसार आप शादीशुदा हैं। आपका न तो तलाक हुआ है और न ही आपकी पत्‍नी की मृत्‍यु हुई है। संस्‍थान के नियमों के अनुसार आप अपनी पत्‍नी को उसके हक से वंचित नहीं कर सकते। मजबूरन उन्‍हें अपने नामिनेशन में बदलाव करना पड़ा था।

पता नहीं कैसे ये खबर उमा जी तक पहुंच गयी थी। फिर तो जैसे तूफान आ गया था। उमा जी दनदनाती हुई आयीं थीं और बद्री प्रसाद की सात पीढि़यों का तर्पण कर गयीं थीं - उनकी हिम्‍मत कैसे हुई कि वे उनके होते किसी और को नामिनी बना लें। कितना अजीब संयोग है कि मैं अरसे बाद अपनी कहानी के आगे की घटनाओं को अपनी आंखों के सामने घटना देख रहा हूं।

Ø

इस पूरे अरसे में यानी मुंबई में बद्री प्रसाद जी के प्रवास के पूरे छत्‍तीस बरस के अरसे में उनकी पत्‍नी और बच्‍चे उनके पास या वे अपनी पत्‍नी-बच्‍चों के पास मुश्किल से दो बरस के आसपास यानी पांच-सात सौ दिन रहे होंगे। ये बात मुझे बार-बार याद आ रही है और इस तरफ इशारा कर रही है कि बद्री प्रसाद जी के जीवन में जो भी बुरा घटा, उसकी पृष्‍ठभूमि में उनका यही अकेलापन रहा होगा। भयंकर अकेलापन और उससे भी ज्‍यादा मुंबई का तोड़ देने वाला खालीपन उनके जीवन में इतने गहरे प्रवेश कर गया था कि वे ताउम्र अकेलेपन और खालीपन से मिलीं दूसरी बीमारियां भी झेलते रहे।

Ø

संयोग से छोटी जाति के होने के कारण एक स्‍थायी डर जीवन भर उनके साथ लगा रहा और उनकी मुसीबतें बढ़ाता रहा। बॉस का डर, डॉक्‍टर का डर, कुछ गलत फैसले न हो जायें, इस वजह से नौकरी जाने का डर, ये डर और वे डर। वे कभी खुल कर अपनी बात नहीं कह पाये। चाहे घर हो या ऑफिस, डर उनके कंधे पर वेताल की तरह बैठा रहा। जिस वर्ग और जिस दुनिया से वे आये थे, वहां की नियति ही डर थी। कभी खुल कर हँस पाना भी जिनके नसीब में नहीं होता, वे उसी वर्ग से ताल्‍लुक रखते थे। हमेशा पिटते आये थे सो यहां आ कर बेशक पिटे नहीं, लेकिन जिन स्थितियों का उन्‍हें सामना करना पड़ा, वे पिटने से भी बदतर थीं। वे अपने काम में माहिर थे। अगर रिज़र्व कोटे से उन्‍हें दो तीन पदोन्‍नतियां न भी मिलीं होतीं तो भी वे अपनी लियाकत से वहां तक पहुंचते ही। जब वे सीनियरटी और पदोन्‍नति के चलते विभागाध्‍यक्ष बने तो उनके सबसे सगे दोस्‍त और सलाहकार ही उनके सबसे बड़े दुश्‍मन बन गये। आसपास कोई बात करने वाला, सुख दु:ख शेयर करने वाला ही न रहा। अकेले तो वे पहले ही थे, अब किसी से संवाद की स्थिति भी न रही।

Ø

डर, लगातार भूलने की आदत और महत्‍वपूर्ण बैठकों में अपने विभाग के हित की बात कह न पाने की उनकी हालत देख कर एक बार उनके वरिष्‍ठ अधिकारी ने साफ-साफ कह दिया कि खबरदार मेरे केबिन में आये या किसी बैठक में नज़र आये। वह वरिष्‍ठ अधिकारी संयोग से ब्राह्मण था। ऊपर वाले का डर तो था ही, सहारा देने के नाम पर उनके नीचे काम कर रहे दूसरे ब्राह्मण अधिकारी ने पलीता लगाया - आप चिंता न करो, बद्री प्रसाद जी, हम हैं ना, सब संभाल लेंगे। नीचे वाले अधिकारी चतुर थे। जानते थे कि जब तक बद्री प्रसाद हैं, हेड ऑफ डिपार्टमेंट बनने का चांस‍ मिलने से रहा। तो यूं ही सही, दो-ढाई बरस तक वे ही बद्री प्रसाद की जगह निर्णय लेते रहे और उनसे हस्‍ताक्षर कराते रहे। कहने को बेशक वे विभागाध्‍यक्ष थे, सारे के सारे निर्णय या तो ऊपर वाले लेते या नीचे वाले। हर महत्‍वपूर्ण बैठक के दिन उन्‍हें छुट्टी लेकर घर बैठने पर मज़बूर किया जाने लगा। इतनी उपेक्षा उनके हिस्‍से में आने लगी थी कि लोग बताते हैं कि उन दिनों उन्‍हें ऑफिस के वाश रूम में फूट-फूट कर रोते देखा जा सकता था।

लेकिन एक बात ये भी थी कि जब बद्री प्रसाद जी अपने फितूर के चलते अपने आपको किसी मामले में फंसा लेते या कुछ ऐसा कर बैठते कि न उगलते बनता न निगलते, तो उनके अधीन काम करने वाले उच्‍च वर्ग के ये अधिकारी ही संकट मोचन बन कर आते। और ऐसा अक्‍सर होता ही रहता। बद्री प्रसाद जी अक्‍सर कुछ ऐसा कर बैठते कि वरिष्‍ठ तंत्र की भौंहें तन जाती, हाय तौबा मच जाती। जवाबदेही के लिए ऊपर वाले बद्री प्रसाद जी को तलब करते। बद्री प्रसाद जी तब मुंह छुपाये फिरते और मजबूरन नीचे वाले अधिकारी किसी न किसी जुगत से उन्‍हें बचाने में कामयाब हो ही जाते। बेशक दस बातें सुननी पड़तीं। सब कुछ ऐसे ही चलता रहता था।

कभी-कभी उनके जीवन में बहार भी आ जाती लेकिन इस बहार की भी उन्‍हें बड़़ी कीमत चुकानी पड़ती और वे पहले से ज्‍यादा अकेले हो जाते। उन दिनों कम्‍प्‍यूटर में यूनिकोड फॉंट की नयी-नयी लहर थी। अब तक पूरी दुनिया में सभी भाषाओं के लिए स्‍थानीय रूप से विकसित फॉंट ही प्रयोग में लाये जा रहे थे जिनकी अपनी तकलीफें थीं। माइक्रोसॉफ्ट ने मानक फॉंट विकसित कर लिये थे जो आगे चल कर बहुत बड़ी क्रांति करने वाले थे। अभी इनमें शुरुआती दिक्‍कतें थीं और इन्‍हें बाजार में उतारने की कोशिशें चल रही थीं। मैं संस्‍थान के जिस विभाग में था वहां वेबसाइट और न्‍यूजलेटर का काम होता था। यूनिकोड फॉंट वेबसाइट पर डालने के बारे में सोचा जा सकता था लेकिन चूंकि पेजमेकर अभी तक यूनिकोड फॉंट स्‍वीकार नहीं करता था इसलिए इसके लिए हां कहने में मेरी अपनी दिक्‍कतें थीं। न्‍यूजलेटर के लिए यूनिकोड में मैटर प्रेस को नहीं भेजा जा सकता था। कुछ और भी तकनीकी समस्‍याएं थीं जिन्‍हें फॉंट खरीदने से पहले निपटाया जाना था। बड़े पैमाने पर हिंदी में ये फॉंट प्राइवेट वेंडरों के जरिये बहुत ऊंची कीमत पर बेचे जा रहे थे। वेंडर चाहता था कि एक बार हम हां कर दें तो वेबसाइट यूनिकोड में कन्‍वर्ट कर दी जायेगी और तब पूरी इंडस्‍ट्री में मैसेज जाता और उनके लिए प्राडक्‍ट बेचना आसान हो जाता।

दूसरी तरफ बद्री प्रसाद जी संस्थान के उस विभाग के मुखिया थे जहां से इस आशय का एक पत्र पूरे उद्योग की तरफ जाता और वेंडर की चांदी हो जाती। सबकी निगाह मेरी तरफ थी लेकिन मैं इतने महंगे प्राडक्‍ट की खरीद से पहले हर तरह की तसल्‍ली कर लेना चाहता था। मेरी बेरुखी देख कर वेंडर ने अपनी सेल्‍स गर्ल्‍स को बद्री प्रसाद जी के पास भेजना शुरू कर दिया। वे जा कर सुबह-सुबह उनके केबिन में बैठ जातीं और यूनिकोड फांट का राग अलापना शुरू कर देतीं। सदियों से भूखे-प्‍यासे बद्री प्रसाद को एक-साथ दोनों ही लड़कियां भाने लगीं और वे भी उन्‍हें दिन भर बिठाये रखने लगे। अब उनके आते ही केबिन के बाहर की बत्‍ती लाल हो जाती और चाय और स्‍नैक्‍स के दौर चलते रहते। ऐसी बैठकों का समापन अक्‍सर ऑफिस के सामने बने एसी रेस्‍तरां में शानदार लंच के साथ होता। इसमें दोनों लड़कियां तो होती हीं कभी मूड आये तो बद्री प्रसाद जी किसी कलीग को भी शामिल कर लेते। लड़कियों को भला क्‍या एतराज हो सकता था। पूरे उद्योग में यूनिकोड की धारा बद्री प्रसाद के हस्‍ताक्षर वाले पत्र से ही बहनी थी। इस मामले में अड़चन सिर्फ एक ही थी कि मेरे विभाग की हरी झंडी उनका काम आसान कर देती जो कि मैं नहीं कर रहा था। इसलिए मुझसे नाराज़गी लाज़मी थी।

संयोग कुछ ऐसे बने कि वह कम्‍पनी ही बंद हो गयी और माइक्रोसाफ्ट ने अपनी नीति बदल कर यूनिकोड फांट बेचने के दूसरे हथकंडे अपना लिये। इसके बाकी जो परिणाम हुए सो हुए, एक परिणाम ये ज़रूर हुआ कि बद्री प्रसाद जी यूनिकोडमय हो गये और हर मीटिंग में, हर मंच से, हर मुलाकात में और हर ब्रीफिंग में यूनिकोड की ही माला जपने लगे। वे अक्‍सर भूल जाते कि उन्‍हें व्‍याख्‍यान देने किसी और विषय पर बुलाया गया है लेकिन वे बात शुरू ही यूनिकोड से करते। बड़ी विचित्र स्थिति सामने आ जाती कि माइक्रोफाइनांस के सेमिनार के उद्घाटन भाषण में वे यूनिकोड फांट पर बोलना शुरू कर देते। ऐसा एक दो नहीं, हर बार होने लगा। बेशक बाद में उन्‍हें प्रोटोकॉल के चलते बुलाया तो जाता था, भाषण नहीं देने दिया जाता था।

Ø

इससे दु:खद स्थिति और क्‍या हो सकती थी कि माइक्रोसाफ्ट की उदार नीतियों के चलते भारत में यूनिकोड फांट को आये और लोकप्रिय हुए कम से कम सात बरस बीत चुके थे और इसमें बद्री प्रसाद जी का योगदान बहुत कम ही रहा था, वे अपनी सेवा निवृत्ति के समय दिये जाने वाले अंतिम विदाई भाषण में यूनिकोड और केवल यूनिकोड पर भाषण देते रहे थे।

उनके मन में गहरे तक घर किये बैठे डर का ये आलम था कि वे आजीवन ज़रूरी और गैर-ज़रूरी कारणों से डरे ही रहे। कई बार तो उनके डर इतने बेबुनियाद कारणों से होते थे कि सामने वाले को झल्‍लाहट होने लगती थी कि वे इन डरों से उबर क्‍यों नहीं जाते। बेशक उनका बीपी नार्मल था और उन्‍हें डाइबीटीज भी नहीं थी लेकिन फिर भी वे डॉक्‍टर के पास जाने से हमेशा कतराते। कोई भी रोग हो जाये, टालते रहते थे। मुझे तो लगता है कि अगर वे अपने डर, असुरक्षा भावना, भूलने की भयंकर बीमारी वगैरह को लेकर किसी अच्‍छे डाक्‍टर के पास गये होते या ले जाये गये होते तो वे ज़रूर चंगे हो जाते। लेकिन अपनी सारी तकलीफें छुपाये रखना ही उन्‍हें माफिक आता था।

पैर के जख्‍म वाले मामले में भी ये ऐसा ही हुआ। अगर ऑफिस वालों ने उनके पैर से खून टपकता न देख लिया होता और उन्‍हें एक तरह से जबरदस्‍ती उठा कर अस्‍पताल भर्ती न करवाया होता तो तय था, गैंगरीन की वजह से उनका पैर ही काटने का नौबत आ जाती।

अस्‍पताल में ही उन्‍होंने डाक्‍टर के सामने पहली बार माना था कि पैर का ये जख्‍म उन्‍हें साल भर से था। ऑफिस वाले भी उन्‍हें लंगड़ाता देख कर समझा-समझा कर हार चुके थे कि वे ढंग से अपना इलाज क्‍यों नहीं कराते। केबिन में अकेले होते ही वे अपना जख्‍मी पैर खुजाना शुरू कर देते और किसी को आते देखते ही पैंट नीचे कर लेते। बताने वाले बताते हैं कि उनके मोजे जख्‍म से चिपक गये थे और कई बार वे बिना मोजे बदले ऑफिस आते थे। लेकिन न किसी को बताते थे और न ही इलाज कराते थे। वे डरते थे कि कहीं डाक्‍टर दस बीमारियां और न बता दे। पैर वाले जख्‍म के कारण उन्‍हें पूरे दो महीने अस्‍पताल में रहना पड़ा था और इस पूरे अरसे में खबर किये जाने के बावजूद उनके बीवी-बच्‍चे उनके पास नहीं आये थे। अलबत्‍ता, गांव से उनकी विधवा बहन और एक भतीजा आ कर ज़रूर रहे थे। पता चला था कि वही भतीजा आज भी नौकर की हैसियत से उनके पास रह कर उनकी सेवा कर रहा है।

Ø

ऐसा बहुत कम होता था कि उनका आत्‍म सम्‍मान ज़ोर मारता और वे अपने बलबूते पर कुछ करना चाहते। कभी-कभार सफल भी हो जाते लेकिन अधिकतर मामलों में उन्‍हें मुंह की खानी पड़ती। वे पहले की तुलना में और कमज़ोर हो जाते। उनके विभाग में दूसरे केन्‍द्र से एक अधिकारी ट्रांसफर हो कर आया था। उसका ध्‍यान ऑफिस के काम में कम और अपनी आध्‍यात्मिक शक्तियों के प्रदर्शन में ज्‍यादा लगता था। कुछ रटे-रटाये श्‍लोकों और धार्मिक ग्रंथों से उद्धरणों के बल पर वह अपनी दुकानदारी चलाये रहता। ऑफिस के नीचे जिस दुकान से वह पान खाता था, वहां पर भी उसने इन्‍हीं हथकंडों के बल पर मुफ्त पान का जुगाड़ कर रखा था। ऑफिस के काम से जहां भी जाता, पहले लोगों का भविष्‍य बताना शुरू कर देता, बाद में काम की बा‍त करता। वह डींग हांकता था कि वह हजारों मील दूर से भी शक्तियों का आह्वान कर सकता है और इन शक्तियों के बल पर किसी की भी मदद कर सकता है। इन तथाकथित शक्तियों के बल पर उसने ऑफिस में इतने चेले चांटे बना लिये थे कि उससे वरिष्‍ठ एक महिला अधिकारी ने अपना ट्रांसफर रुकवाने की गुहार करते हुए सबके सामने इन योगीराज के चरण स्‍पर्श कर लिये थे।

जब उसने देखा कि विभागाध्‍यक्ष हर तरह से अक्षम, लुंज-पुंज और डरे हुए हैं तो वह अपना रक्षा कवच ले कर उनकी मदद करने जा पहुंचा। बद्री प्रसाद जी की मदद करने के कई फायदे थे। काम से छुट्टी, किसी से डरने की ज़रूरत नहीं और अब ट्रांसफर का कोई डर नहीं। दूसरों पर रौब डालने में भी ये तरकीब काम आने वाली थी। बद्री प्रसाद जी उसके झांसे में आ गये थे और उसके कहे अनुसार ही अब सारे केस निपटाये जाते। वही उन्‍हें बताता कि किस बैठक में न जाना बेहतर रहेगा और किस केस पर किसा तरह का निर्णय लेना या न लेना उनके हित में रहेगा। रहेगा। कई दिनों तक परोक्ष रूप में योगीराज ही ऑफिस चलाता रहा। जब कुछ बेहद संगीन गलत फैसले हो गये और रिपोर्ट ऊपर तक पहुंची तो योगीराज का दूसरे सेक्‍शन में ट्रांसफर कर दिया गया। बद्री प्रसाद जी अड़ गये कि वे योगीराज को रिलीव नहीं करेंगे। तना तनी इतनी बढ़ गयी कि खुद बद्री प्रसाद की जी नौकरी पर आ बनी। मैनेजमेंट उनसे वैसे ही खफा था लेकिन मामला कहीं दलित उत्‍पीड़न का न बन जाये, इसलिए चुप था लेकिन अब बद्री प्रसाद जी के कुछ फैसले संस्‍थान के हितों के खिलाफ जाने लगे तो आर या पार का फैसला लिया गया। तब कहीं जा कर योगीराज बाहर हुए।

कोई अंत नहीं है बद्री प्रसाद जी के किस्‍सों का। यहां बद्री प्रसाद जी के घर पर बैठे हुए कितनी ही बातें बेसिलसिलेवार याद आ रही हैं। अब उमा जी और गौरव जिस तरह‍ से हमें झूठ की एक अलग ही दुनिया में ले जा रहे हैं, हमें नहीं लगता, हम चाह कर भी बद्री प्रसाद जी की बेहतरी के लिए कुछ करवा पायेंगे।

Ø

मैं और नीरज वापिस लौट रहे हैं। पता है मुझे अब इस तरफ कभी आना नहीं होगा। बद्री प्रसाद जी से यही आखिरी मुलाकात है। देर-सबेर हमारे पास बद्री प्रसाद जी के न रहने की खबर ही आयेगी और हम ऑफिस में दो मिनट का मौन धारण कर उन्‍हें अपनी श्रद्धांजलि देंगे, उनके बारे में अच्‍छी-अच्‍छी बातें करेंगे, उनके लिए अफसोस जाहिर करेंगे और इस तरह से अपने कर्तव्‍य की इतिश्री समझ लेंगे। और इस तरह बद्री प्रसाद जी हमारी स्‍मृतियों में से हमेशा के लिए चले जायेंगे।

नीरज का भी यही मानना है कि वह बेशक यहां से तीन गली छोड़ कर रहता है, शायद ही वह दोबारा यहां आने की हिम्‍मत जुटा पायेगा।

......

15 सितम्‍बर 2011

सूरज प्रकाश

एच1/101 रिद्धि गार्डन, फिल्म सिटी रोड, मालाड पूर्व, मुंबई 400097

मोबाइल 09930991424

Email: mail@surajprakash.com

Website www.surajprakash.com

(नया ज्ञानोदय नवम्बर 2011 से साभार)

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------