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राकेश भ्रमर की कहानी - अंधी गुफा

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    कहानी     अंधी गुफा      -राकेश भ्रमर     कामिनी के दुर्दिन तभी शुरू हो गये थे , जब उसने प्रोन्नति पर प्रधानाध्यापिका बनकर इ...


    कहानी
    अंधी गुफा 

    -राकेश भ्रमर

    कामिनी के दुर्दिन तभी शुरू हो गये थे, जब उसने प्रोन्नति पर प्रधानाध्यापिका बनकर इस गांव में आना स्वीकार किया था. पति और बच्चों से दूर तो हुई ही थी, एकाकी जीवन के साथ-साथ स्कूल की समस्याओं से भी उसे दो चार होना पड़ रहा था. समस्याओं से वह घबराती नहीं थी, परन्तु जब उन समस्याओं के निदान और निराकरण के सारे उपाय विफल हो जायंे, तो मन में खीझ, हताशा और कुण्ठा का व्याप्त होना संभावी था.

    प्रोन्नत्ति के साथ दूर गांव में स्थानांतरण का आदेश मिलते ही उसके घर में खुशी के साथ गम का भी माहौल पसर गया था. पति ने एक सिरे से मना कर दिया था कि प्रोन्नत्ति का कोई औचित्य नहीं था. इतनी दूर परिवार से वह कैसे रहेगी? तनख्वाह में कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ रहा था, परन्तु कामिनी का मानना था कि इससे भविष्य के लिए रास्ता खुल जाएगा. अभी उसकी बाईस साल की नौकरी शेष थी और वह प्रोन्नत्ति पाकर माध्यमिक स्कूल तक जा सकती थी. इसीलिए उसने यह पदोन्नत्ति स्वीकार कर ली थी.

    प्रधानाध्यापिका बनने के बाद ही उसे पता चला था कि स्कूल की कितनी सारी जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं. सरकार ने इतनी सारी योजनाएं चला रखी हैं और ग्रामीण स्कूल के अध्यापकों को उनमें लगा रखा है कि अध्यापकों का सारा समय उन्हीं में निकल जाता है. बच्चों को पढ़ाने का वक्त ही नहीं बचता है.

    राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार की कई प्रकार की योजनाओं के लिए स्कूल अध्यापकों की ड्यूटी लगती रहती थी. सारा दिन धूप-वर्षा और सर्दी में वह गांव-गांव चक्कर लगाते रहते थे. अभी जनगणना का कार्य प्रारम्भ हो गया था. पल्स पोलियो कार्यक्रम एक नियमित अन्तराल पर होते ही रहते थे. इसके अलावा शासन का सख्त आदेश था कि स्कूल में बच्चों की निर्धारित संख्या भी होनी चाहिए, जो कि आज के जमाने में मुश्किल हो गई थी. दूर-दराज के गांवों में पब्लिक स्कूल के नाम पर सैकड़ों स्कूल खुल गये थे. सरकारी स्कूल की तरफ कोई मुंह नहीं करता था. इसलिए गांव-गांव घूम-घूमकर बच्चों के अभिभावकों को सरकारी स्कूल में बच्चों के नाम लिखाने के लिए प्रेरित करना पड़ता था.

    खैर, इन सरकारी कार्यक्रमों से कामिनी को कोई परेशानी नहीं होती थी. सबसे बड़ी परेशानी दोपहर को बच्चों को दिए जाने वाले भोजन से होती थी. इसका सारा इंतजाम ग्राम प्रधान के जिम्मंे था. सामान खरीदने से लेकर खाना बनाने व खिलाने तक का सारा काम प्रधान के माध्यम से करवाया जाता था. परन्तु प्रधान इन सारे कामों में बहुत घपला करता था. भोजन के लिए इतना सड़ा-गला आटा, दाल, चावल और सब्जी इस्तेमाल होती थी कि खाना देखकर उबकाई आती थी. बच्चे शिकायत करते थे. उनके अभिभावक भी अक्सर स्कूल आकर हंगामा खड़ा करते रहते थे. उन सबकी बातें कामिनी को सुननी पड़ती थीं, जबकि मिडडे मील योजना में उसका कोई हाथ नहीं था. ग्राम प्रधान सरकारी पैसों में हेरा-फेरी करता था, और सुनना पड़ता था कामिनी को.

    स्कूल के नाम पर गैस का चूल्हा और सिलिण्डर आया था. उसे भी प्रधान ने अपने घर में रखवा लिया था. लिहाजा लकड़ी के चूल्हे पर स्कूल के बच्चों के लिए खाना बनता था. खाना बनाने के लिए जो औरत रखी गई थी, उसको भी प्रधान निर्धारित मजदूरी से कम पैसा देता था.

    स्कूल की इमारत काफी पुरानी थी. उसमें मरम्मत का काम करवाना था. मरम्मत के लिए पैसा भी आ चुका था, परन्तु उसका उपयोग भी ग्राम-प्रधान के माध्यम से होना था. जब तक वह चेक पर हस्ताक्षर नहीं करता, प्रधानाध्यापिका एक पैसा भी खर्च नहीं कर सकती थी. कामिनी देवी ने मरम्मत और पुताई का कार्य करवाने के लिए कहा तो प्रधान ने कहा- ‘‘आप काम करवा लीजिए.’’

    सीधे-स्वभाव कामिनी ने तीन ठेकेदारों से बात करके, जो कम लागत पर काम करने को तैयार हुआ, उससे स्कूल की मरम्मत और पुताई का काम करवा लिया. काम पूरा हो गया तो ग्राम प्रधान पैसे का भुगतान करने में आनाकानी करने लगा. ठेकेदार को पैसा नहीं मिला तो उसने कामिनी से तगादा करना शुरू किया. प्रधान आज-कल करते-करते टालता जा रहा था. कामिनी को उसके घर जाकर पैसा मांगने में संकोच होता था, परन्तु मन मारकर जाना ही पड़ता था. प्रधान सीधे मुंह बात न करता. एक दिन बोला-

    ‘‘आप को क्या तकलीफ हो रही है? स्कूल का काम हो गया, खुश रहिए. पैसा ठेकेदार का लगा है न्! उसके लिए आप क्यों जल्दी मचा रही हैं. कमीशन खाना है?’’

    कामिनी सीधी-सादी महिला थी. प्रधान की बात पर भौंचक्की रह गयी. उसके मुंह से बोल न फूटे. अन्दर से हूक उठी. लगा कि आंसू छलककर बाहर आ जाएंगे. मुंह घुमाकर दूसरी तरफ कर लिया.

    प्रधान की तीखी जुबान चलती रही, ‘‘आप का काम पढ़ाना है, उतने तक ही सीमित रहिए. रुपये-पैसों के मामले में अपनी टांग मत अड़ाइए; वरना ऊपर जाते देर नहीं लगेगी. यह ठाकुरों का गांव है.’’ यह एक तरह से उनकी जाति पर प्रहार था. वह पिछड़ी जाति की महिला थी, परन्तु इतनी विषभरी वाणी पहली बार सुन रही थी. पुरुषों को तो आए दिन समाज में भेद-भाव, ऊंच-नीच और छुआ-छूत का दंश झेलना पड़ता है, परन्तु महिलाओं को इससे बहुत कम पाला पड़ता है. अपनों से दूर रहने पर कामिनी को यह दिन देखने पड़ रहे थे.

    कामिनी को आए दिन स्कूल संबन्धी मामलों में ग्राम-प्रधान से पाला पड़ता रहता था. अपनी तरफ से वह संयत और अल्पभाषी थी, परन्तु ग्राम-प्रधान गुण्डा प्रवृत्ति का पुरुष था. बात-बेबात पर गुस्सा करता. स्कूल के हर काम में वह अपना हिस्सा काट लेता था. कामिनी को उसकी कमीशन खोरी पर कोई एतराज नहीं था, परन्तु जब वह उसको खरी खोटी सुनाता तो वह ग्लानि और दुःख से भर उठती. अकेले कमरे मेें बिस्तर पर लेटकर रोती. कोई उसका दुःख बांटने वाला न था. फोन पर पति और बच्चों से बात करके मन को हल्का कर लेती. परन्तु उनसे अपनी परेशानी का जिक्र न करती, क्योंकि वह पति और बच्चों को अपने दुःख से दुःखी नहीं करना चाहती थी.

    कामिनी से शिवपूजन प्रधान के नाराज होने के मात्र उपरोक्त कारण नहीं थे. इस मनमुटाव के बीच में मानव की आदिम इच्छा और स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिल प्रक्रिया थी. कामिनी ने एक पुरुष विशेष के समक्ष स्वयं को समर्पित नहीं किया था. यही उसकी परेशानी का मुख्य कारण था.

    कामिनी चालीस की उम्र पार कर चुकी थी. यौवन के मापदण्ड के अनुसार वह जवान नहीं थी. परन्तु अच्छे खान-पान और रहन-सहन के कारण उनके चेहरे में सौम्यता के साथ-साथ किसी पुरुष को आकर्षित करने वाला लावण्य और सौन्दर्य था. वह एक शिक्षिका थी, अतएव उसकी सोच सकारात्मक थी. इसका प्रभाव उसके चेहरे से झलकता था.

    इस गांव में वह अकेली रहती थी. शिवपूजन न केवल गुण्डा प्रकृति का था; बल्कि लम्पट भी था... ग्राम प्रधान भी था. एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा. पैसा आने से आदमी की ताकत चार गुना हो जाती है.

    शिवपूजन औरतों के शरीर का भूखा भेड़िया था. औरत चाहे जितनी उम्रदराज हो जाये, वह कामी और लम्पट पुरुष को हमेशा आकर्षित करती है. वह कामिनी का दीवाना था और इसके लिए तमाम तरह के हथकण्डे इस्तेमाल कर रहा था कि परेशान होकर वह उसके सामने आत्म-समर्पण कर देगी.

    नये स्कूल में पदभार ग्रहण करते ही कामिनी को शिवपूजन के इरादों का पता चल गया था. रोज स्कूल में आकर बेवज़ह बैठना, शाम को उसके कमरे का चक्कर लगाना और चिकनी-चुपड़ी बातों से लुभाने की कोशिश करना... कामिनी की आंखों के समक्ष सब कुछ स्पष्ट हो चुका था, परन्तु वह कोई किशोरी नहीं थी कि कोई भी जवानी के रंगीन सपने दिखाकर उसे बहला-फुसला कर उसकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर लेता.

    कामिनी ने शिवपूजन को धता बताया तो वह उसे धमकाने लगा, स्कूल के कामों में अंड़गा डालने लगा... तरह-तरह से उसे परेशान करता, परन्तु कामिनी धैर्यवान महिला थी. जब तक बर्दाश्त कर सकती थी किया, फिर एक दिन स्कूल के अन्य अध्यापकों के साथ सलाह-मशविरा करके जिला शिक्षा अधिकारी को एक विस्तृत पत्र लिखकर प्रधान की ज्यादतियों के बारे में सूचित किया, परन्तु ढाक के तीन पात... कई महीने बीत गये, और शिक्षा अधिकारी की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं हुई.

    अन्ततः हारकर इन सब परेशानियों से बचने के लिए कामिनी ने अपनी बदली के लिए आवेदन दिया. इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उसके मन में खीझ व्याप्त होने लगी. हताशा के क्षणों में अकेलेपन के भार से ऊबकर उसने इस्तीफा देने के बारे में भी सोचा, परन्तु यह उचित नहीं लगा. उसके दोनों लड़के बड़े हो गये थे. जल्द ही उनकी उच्च शिक्षा के लिए लाखों रुपये की दरकार होगी. उसके पति भी तृतीय श्रेणी के कर्मचारी थे. उसके नौकरी छोड़ देने से सभी के भविष्य के उज्जवल सपनों में आग लग जाएगी.

    कुछ अध्यापकों के कहने पर एक दिन की छुट्टी लेकर कामिनी ने जिला मुख्यालय जाना तय किया. अगले दिन ही वह जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में उपस्थित थी और संबन्धित क्लर्क के समक्ष कुर्सी पर विराजमान थी.

    ‘‘तो आप तबादला चाहती हैं?’’ क्लर्क अधेड़ उम्र का गंजी खोपड़ी वाला व्यक्ति था. उसकी आंखें कामिनी के पूरे अस्तित्व को परख चुकी थीं. कामिनी के शरीर का जायजा लेने के बाद उसने अजीब तरीके से अपना मुंह बिचकाया, जैसे मुंह में कोई कड़वी चीज आ गई थी. क्लर्क की आंखों के भाव बता रहे थे कि कामिनी उसे पसन्द भी आई थी और नहीं भी... चन्द्रमणि शर्मा पहले सामने रखी चीज़ को परखता था.

    ‘‘जी हां, देखिए मैंने दो आवेदन पत्र दे रखे हैं. उन पर...’’ कामिनी ने अपने बैग से आवदेन की प्रति निकालकर दिखनी चाही, परन्तु शर्मा ने उसकी बात बीच में ही काट दी.

    ‘‘हां, हां, रहने दीजिए. तो क्या आप समझती हैं कि तबादला आवेदन देने मात्र से हो जाता है?’’

    ‘‘जी...’’ कामिनी की समझ में क्लर्क की बात नहीं आई. वह अकबकाकर उसे देखने लगी.

    ‘‘तबादला आप क्यों चाहती हैं?’’ शर्मा ने उल्टे सवाल किया.

    ‘‘वहीं तो आपको बताना चाहती हूं?’’ फिर कामिनी ने स्कूल की परेशानियों, ग्राम प्रधान की उद्वण्डता और मनमानी तथा अपनी घरेलू परेशानियों का संक्षेप में वर्णन किया. शर्मा अपनी मूंड़ी हिलाता हुआ ध्यान से कामिनी की बातें सुन रहा था. बीच-बीच में उसकी आंखों में चमक सी आ जाती थी.

    कामिनी की बात खत्म होते ही क्लर्क ने कुटिलता से मुस्कराते हुए कहा, ‘‘तो तबादला करवाने में आपका स्वार्थ है?’’

    ‘‘स्वार्थ...’’

    ‘‘क्यों नहीं, अपेक्षित जगह पर तबादला होने से आपकी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी, ग्राम प्रधान आपको परेशान नहीं करेगा. सबसे बड़ी बात तो यह है कि आप अपने पति और बच्चों के पास पहुंच जाएगी. इसमें आपका ही तो भला है.’’

    ‘‘जी...!’’ न समझने वाले भाव से कामिनी ने कहा.

    ‘‘और हमारा भला...’’ शर्मा ने आंखें मटकाते हुए कहा.

    कामिनी कुछ-कुछ समझ गयी. उसने कई लोगों से सुना था कि बी.एस.ए. बिना पैसा लिए कोई काम नहीं करता. उसनेे उत्सुकता से पूछा, ‘‘जी बताइए!’’

    ‘‘आपको पता नहीं है?’’

    ‘‘आप खुलकर बताइए, तो कुछ समझ में आए!’’

    ‘‘साहब के बीस हजार और मेरे पांच... फाइल में टिप्पड़ी मुझे ही तो करनी है.’’

    ‘‘ज्यादा नहीं हैं?’’

    ‘‘ज्यादा लगते हों तो वापस जाइए. जहां पर तैनात हैं, काम करिये. तनख्वाह मिलती रहेगी.’’

    ‘‘कुछ कम नहीं हो सकता?’’

    ‘‘यहीं रेट है, लोग एक हाथ से देते हैं, दूसरे हाथ से आर्डर लेकर जाते हैं,’’

    कामिनी कुछ देर विचार करती रही. अपने भले के लिए इतने पैसों का खून करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए. मनुष्य अपने सुख के लिए ही मेहनत करता है और पैसे कमाता है. जीवन में आने वाले संकट को दूर करने के लिए हम उपाय करते हैं. सुख की कामना के लिए तीर्थ स्थलों में जाते हैं, पूजा अर्चना और कथा-भागवत करते हैं. इसमें पैसा और समय दोनों खर्च होते हैं, फिर अगर एक झटके में थोड़ा ज्यादा पैसे खर्च करके उनके समस्त कष्टों और दुःखों का निवारण हो रहा था, तो कोई बुरा नहीं था.

    तुरंत उसने तय कर लिया कि क्या करना था. पूरे पैसे वह लेकर नहीं आई थी. पूछा, ‘‘क्या अभी देने होंगे?’’

    ‘‘जब आपके पास हो जाएं, दे देना. फाइल तभी आगे बढे़गी.’’

    ‘‘अभी पांच हैं मेरे पास. आप चाहें तो ले लें. बाकी बाद में...’’

    ‘‘ठीक है, दे दीजिए.’’ शर्मा ने हाथ आगे बढ़ा दिया. कोई शर्म संकोच नहीं... दफ्तर में सब कुछ खुलेआम चलता था. शिक्षा के दफ्तर में बाज़ार की तरह सौदेबाजी होती थी. रोज हजारों का कारोबार होता था. देने-लेने वाले सभी खुश थे. किसी का काम बनता था, तो कोई अपनी तिजोरियां भरता था.

    अगले हफ्ते कामिनी ने बैंक से बीस हजार रुपये निकाले और स्वयं जाकर चन्द्रमणि शर्मा को पकड़ा दिए. निवेदन करने पर शर्मा ने बी.एस.ए. से उसकी मुलाकात भी करवा दी. बी.एस.ए. ने ध्यान से उसकी बात सुनी. कामिनी की समस्या और परेशानी से उसके माथे पर सिलवटें भी पड़ी. ऐसा लग रहा था कि बी.एस.ए. वस्तुतः उसके दुःख से दुःखी था. उसने आश्वासन दिया कि एक महीने के अन्दर उसका तबादला उसके गांव के स्कूल में या आस-पास के किसी और स्कूल में हो जाएगा. कामिनी खुशियों के झोले में सपने समेटती हुई घर आ गई.

    अगले एक महीने तक कामिनी की आंखों में चांद उगते रहे. तारे बारात सजाकर मन के आंगन में मुस्कराते रहे. पिछली सारी परेशानियों को भूलकर वह एक नई दुनिया में जीने लगी थी. इस दुनिया में केवल खुशियों के सुगन्धित फूल थे... कष्ट व दुःख का कहीं अंशमात्र न था.

    कामिनी के तबादले की बात केवल स्कूल के अध्यापकों को पता थी.

    एक महीना बीत गया. कामिनी की आशा को पंख लग गये. उसके तबादले का आदेश किसी भी दिन आ सकता था. वह प्रतिदिन आशाओं के हिंडोले पर सवार होकर स्कूल जाती, सारा दिन डाकिये का इन्तजार करती, स्कूल के नाम आई डाक को बेसब्री से उलट-पलटकर देखती. बी.एस.ए. के कार्यालय की डाक सबसे पहले खोलती, परन्तु पत्र खोलते ही उसकी आशाओं पर घड़ों ठण्डा पानी पड़ जाता. उसके हाथ-पैर ढीले हो जाते. फिर सारा दिन उसका मन किसी काम में न लगता. शाम वीरान हो जाती, रात काट खाने को दौड़ती, आसमान का चांद नाग बनकर उसे डसने के लिए दौड़ता. उसकी रात करवट बदलते बीत जाती.

    एक महीना... दो महीना... फिर तीसरा महीना बीत गया. कामिनी का ट्रांस्फर आर्डर नहीं आया. साथी अध्यापक रोज पूछते कि उसके तबादले का आदेश अभी तक क्यों नहीं आया? इस प्रश्न का उसके पास कोई जवाब नहीं था. अन्त में परेशान होकर उसने चन्द्रमणि शर्मा को एक दिन फोन किया, ‘‘शर्माजी, मैं कामिनी बोल रही हूं. पहचाना...? मेरा तबादला...?’’

    ‘‘हां, कामिनीजी आपका आदेश तैयार है, परन्तु एक अड़चन आ गई है बीच में.’’

    कामिनी का हृदय अनजानी आशंका से धड़क उठा. सहमते हुए पूछा, ‘‘क्या?’’

    ‘‘आपको जिस स्कूल में जाना है, वहां का प्रधानाध्यापक कहीं और नहीं जाना चाहता, इसलिए उसने अपना तबादला रुकवाने के लिए बी.एस.ए. को चालीस हजार दिए हैं, अगर आप इससे ज्यादा दे सकती हैं तो आपका तबादला पक्का...’’

    कामिनी के कान सुन्न हो गये, खून खौन उठा... कमीना, मक्कार कहीं का... क्लर्क के स्वभाव को वह पहले दिन ही पहचान गई थी, परन्तु अपना काम करवाने के लिए कोई न कोई समझौता करना ही पड़ता है. कामिनी ने उसके स्वभाव को नगण्य करते हुए केवल अपने हित के लिए उसको रिश्वत देनी स्वीकार की थी. क्या पता था, वह पैसे लेकर भी उसके साथ मक्कारी करेगा.

    दगाबाजी की कोई सीमा नहीं होती. थोड़े से लालच के लिए मनुष्य ही मनुष्य के साथ ऐसी बेढब चालें चलता है और दूसरों को इस तरह धोखा देता है कि स्वयं के ऊपर से उसका विश्वास उठ जाता है.

    एक क्षण में ही कामिनी के मस्तिष्क में पास बुक का अन्तिम आंकड़ा घूम गया. दोनों बच्चे आई आई टी की तैयारी के लिए कोचिंग कर रहे थे. बच्चों की जिद् थी कि उन्हें कोटा के मशहूर गोयल कोचिंग इन्स्टीट्यूट में दाखिला दिलवाया जाए. इस कोचिंग के लिए लाखों रुपये की फीस देनी पड़ी थी. हॉस्टल में रहने का खर्चा अलग, किताबों का अलग. पति-पत्नी की अब तक की जमा-पूंजी कोचिंग के खर्चे में खत्म हो गई थी. खुदा न खास्ता अगर आई आई टी या किसी अन्य इन्जीनियरिंग इन्स्टीट्यूट में उनका दाखिला हो गया तो फिर लाखों रुपये का खर्चा... कहां से आएगा यह सब? भविष्य निधि के अलावा और कोई चारा न था.

    कामिनी ने सोचकर बताया, ‘‘परन्तु मेरे पास और पैसे नहीं है. ये भी बड़ी मुश्किल से...’’

    शर्मा कामिनी की बात हमेशा काट देता था, जैसे वह उसके मन की बात जानता था. इस बार भी बात काटकर बोला, ‘‘तो क्या हुआ? आप एक बार आकर बी.एस.ए. से मिल लें. आप औरत हैं, शायद काम बन जाए.’’

    कामिनी को लगा, क्लर्क द्विअर्थी बात कह रहा था. चौंककर पूछा, ‘‘क्या मतलब...?’’

    ‘‘मतलब... एक बार साहब से मिलकर अपनी परेशानी तफसील से बताइए. शायद वह पिघल जायें और आपका तबादला...’’ उसने जान-बूझकर बात अधूरी छोड़ दी. कामिनी के मन में जिज्ञासा और कौतूहल जगाने के लिए इतना काफी था.

    कामिनी के मन में आशा का थोड़ा संचार हुआ, ‘‘कब आ जाऊं?’’ उत्सुकता से पूछा.

    ‘‘कल ही आ जाइए.’’

    दूसरे दिन पहली बस से कामिनी जिला मुख्यालय पहुंच गई. जब वह बी.एस.ए. दफ्तर पहुंची तब दस बज रहे थे. तब तक वहां न तो कोई कर्मचारी था, न कोई अधिकारी... सर्दी के दिन थे. वह कार्यालय के बाहर लॉन में खड़ी धूप सेंकती रही. साढे़ दस के बाद चन्द्रमणि शर्मा पहुंचा था. बाहर ही कामिनी ने उसे घेर लिया. वह ही ही करता हुआ बोला, ‘‘अच्छा हुआ, आप आ गईं. साहब ग्यारह बजे तक आएंगे. तब तक आप यही इन्तजार करिए. मैं बुला लूंगा.’’ वह धड़धड़ाता हुआ अन्दर चला गया.

    कामिनी धड़कते दिल से आशंकाओं के भंवरजाल में उलझी खड़ी रही. जाड़े की धूप में बहुत सारे लोग घास के मैदान में बैठकर गप्पें मार रहे थे, परन्तु उसका मन कहीं बैठने का नहीं हुआ. सारा समय वह इधर-उधर टहलती रही. आते-जाते लोग उसे घूरकर देखते रहे, परन्तु वह सबसे निर्लिप्त अपने ही विचारों मंे खोई हुई थी.

    चन्द्रमणि शर्मा ने उसे बारह बजे अन्दर बुलाया, ‘‘माफ करिए, कामिनीजी. आपको लंबा इंतजार करना पड़ा. दरअसल साहब अभी-अभी आए हैं.’’ वह साफ झूठ बोल रहा था. कामिनी ने बी.एस.ए. को ग्यारह बजे जीप से आते देखा था. उसके सामने वह जीप से उतरकर अन्दर गये थे. फिर भी कामिनी ने चन्द्रमणि की बात का प्रतिवाद नहीं किया. वह चाहती थी किसी प्रकार उसका काम हो जाए, फिर वह जिन्दगी में दुबारा बी.एस.ए कार्यालय की तरफ सिर उठाकर भी नहीं देखेगी.

    चन्द्रमणि ने आगे बताया, ‘‘मुझे आपके काम की बहुत चिन्ता है. मैंने साहब से बात कर ली है. उनका कहना है...’’ फिर उसने भेदभरी मुस्कराहट से कामिनी की आंखों में झांका. उसकी मुस्कान और आंखों की चमक देखकर कामिनी एक अनजाने भय से कांप गई.

    कामिनी ने कमरे में इधर-उधर निगाह दौड़ाई. चन्द्रमणि के अलावा एक अन्य क्लर्क बाईं तरफ बैठा हुआ था, परन्तु वह अपनी फाइलों में इस कदर व्यस्त था, जिससे लगता था कि कामिनी और चन्द्रमणि की बातों से वह निर्लिप्त था. कामिनी का डर थोड़ा कम हुआ... कम से कम एक आदमी तो कमरे में है. चन्द्रमणि की नज़रों में उसे खतरा महसूस हो रहा था.

    जिज्ञासा और उत्सुकता के मिले-जुले भाव से कामिनी ने चन्द्रमणि को देखा. वह बिना किसी संकोच के बोला, ‘‘आप एक औरत हैं. अक्सर अकेली रहती हैं. बी.एस.ए. साहब भी अपने परिवार से दूर यहां अकेले ही रहते हैं. आप समझ सकती हैं, मैं क्या कहना चाहता हूं?’’

    कामिनी के शरीर में एक लहर दौड़ गई. उसका दिमाग सनसना गया. लगा कि सारे बदन में आग की लपटें उठ रही थीं. चन्द्रमणि क्या कहना चाहता था, यह वह अच्छी तरह समझ गयी थी, परन्तु जब्त किये बैठी रही.

    उसकी आंखों के सामने एक अन्धेरी गुफा दिखाई पड़ने लगी थी. क्या इस गुफा के अन्दर से उसे जाना होगा? गुफा के उस तरफ क्या कोई द्वार होगा, जिससे निकलकर उसे सुबह की रोशनी दिखाई देगी?

    चन्द्रमणि अपनी रौ में कहता जा रहा था, ‘‘आपके पास देने के लिए और पैसे नहीं हैं. साहब का स्पष्ट सिद्धांत है कि बिना लिए-दिए कोई काम नहीं करते. आप एक अधेड़ महिला हैं, परन्तु अभी भी सरस हैं. साहब का मन और तन जीत सकती हैं. आप हां करें, तो शाम को उनसे आप की मुलाकात उनके घर पर करवा दूं. आपके सारे दुःख एक झटके में दूर हो जाएंगे.’’

    कामिनी को अपने जीवन में कभी इस तरह के प्रस्ताव से सामना नहीं हुआ था. जब जवान थी और अविवाहित, तब भी किसी युवक ने उनके सामने ऐसा घिनौना प्रस्ताव नहीं रखा था. प्रेम निवेदन कई लड़कों ने किया था, परन्तु उनमें छिछोरापन नहीं था, एक भावपूर्ण गरिमा थी.

    आदमी अपने सुख के लिए बहुत सारे प्रयत्न करता है. दुःखों के निवारण के लिए भी बहुत कुछ करता है. परन्तु दुःखों और कष्टों के निवारण के लिए कोई अपने आत्मसम्मान और मानमर्यादा का सौदा नहीं करता. यह तो वैश्यावृत्ति से भी बुरा कर्म था. रुपया-पैसा इज्जत के लिए कमाया जाता है, इज्जत गंवाने के लिए नहीं... कामिनी को अपने जीवन में बहुत मान-सम्मान मिला था... एक महिला होने के नाते और शिक्षिका के नाते उसका सम्मान बाकी लोगों से ज्यादा था, परन्तु आज....

    परन्तु आज... उसे स्वयं से शर्म आने लगी थी. इतना घृणित प्रस्ताव उसके सामने रखा गया था. वह जवान होती, तो कोई और बात होती. इस अवस्था में कोई उसके बारे में ऐसा सोच सकता था, यह उसकी बुद्धि से परे की बात थी. उसके सोचने समझने की शक्ति गुम हो गयी. आंखों के सामने अंधी गुफा का अंधेरा छा गया था. इस गुफा में क्या वह गुम होने वाली थी?

    नहीं... उसने अपने मन को संयत किया. गुस्से को बेकाबू हो जाने से बचाया और एक झटके से उठकर खड़ी हो गई. उसकी हड़बड़ाहट से कुर्सी पीछे गिरते-गिरते बची. वह कभी भी इस अंधेरी गुफा में प्रवेश नहीं करेगी.

    उसका चेहरा लाल हो गया था, फिर भी यथासंभव अपनी वाणी को नियंत्रित करते हुए कहा, ‘‘शर्माजी, अब इससे ज्यादा नीचता पर मत उतरिए. आप एक सरकारी कर्मचारी हैं. इस ऑफिस को चकलाघर मत बनाइए. मानव के अंदर अगर मानव होने की गरिमा नहीं है, तो वह पशु से भी बदतर है. आप अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या हैं, इससे मुझे कुछ लेना-देना नहीं है, परन्तु आपने मेरे बारे में बहुत गलत सोच लिया है. अब मैं किस तरह से आपका या किसी अन्य पुरुष का सम्मान कर सकती हूं. मेरी नज़रों में सारे पुरुष एक जैसे हो गए हैं. मैं कभी भी मन से उनका सम्मान नहीं कर पाऊंगी.

    ‘‘और हां, मैं परेशान हूं, परन्तु इतनी परेशान भी नहीं कि अपने दुःखों को दूर करने के लिए अपने तन का सौदा करूं. आपके घरों की औरतें अपना काम करवाने के लिए पैसा भी देती होंगी और जिस्म का सौदा भी करती होंगी. मेरे पारिवारिक संस्कारांे और शिक्षा ने मुझे यह नहीं सिखाया. मुझे अपना तबादला नहीं करवाना. अब अगर आपमें थोड़ी सी भी गैरत होगी, तो मेरे पैसे वापस कर दीजिएगा, वरना मैं आपके पास मांगने नहीं आऊंगी... चलती हूं, नमस्कार!’’ कामिनी ने मुंह में आई लार को वहीं जमीन पर पिच्च से थूक दिया, जैसे सारी दुनिया की गंदगी उसके मुंह में भर गई थी. वह उस गंदगी को वही थूककर जा रही थी.

    वह तमतमाती हुई बाहर निकल गई.

    कामिनी अभी भी उसी स्कूल में बतौर प्रधानाध्यापिका कार्य कर रही थी. उसका अपने गृह स्कूल में तबादला नहीं हुआ था. वह अब उसकी इच्छुक भी नहीं था. जो उसके पास था, उसी में संतुष्ट थी.

    अब वह दुःखी और परेशान भी नहीं थी. उसके दोनों बेटे आई आई टी में आ गए थे. उसके जीवन का संघर्ष समाप्त हो गया था. लेकिन दुनिया में मनुष्य को और बहुत सारे संघर्षों का सामना करना पड़ता है. कामिनी निडरता से उन सभी का सामना करते हुए इस पुरुष प्रधान समाज में गर्व से सीना तानकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही थी.
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    (राकेश भ्रमर)

    संपादक प्राची मासिक

    12, राजुल ड्यूप्लेक्स,

    निकट वैभव सिनेमा, जबलपुर-482001

    मोबाइल- 09425323193

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 7
  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  2. aaj ke samaaj par ek karara tamacha. kahani ka ant chandr mani ko usaki kie ki saja milani thi, samaj men nari kaman samman badhta.

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  3. ज़िंदगी के तत्वों से बुनी हुई कहानी अपने आस पास की परिधियों से वाकिफ करने में कामयाब रही है, बधाई

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रचनाकार: राकेश भ्रमर की कहानी - अंधी गुफा
राकेश भ्रमर की कहानी - अंधी गुफा
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