रविवार, 29 जनवरी 2012

शिखा गुप्‍ता की कविताएँ

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कविता

चंचल मन

यूं ही बैठे-बैठे मैं

खुद से बात करती हूं

की क्‍या सोचता

रहता है ये मन

क्‍या चाहता है

पर जवाब नहीं

मिलता।

वक्‍त वेवक्‍त

क्‍यों आंखों में नींद

आती है

जब आंखें बंद करो

तो चंचल मन चलने लगता है

दिमाग सोचने लगता है

और आंख बंद होकर भी

बेबस नजर आती है

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अंधेरा

हम अंधेरे के हो गये

और अंधेरे में ही खो गये

क्‍या अंधेरे ही जीवन में

अब रह गये

उजाले थे कभी इस

जीवन में

उन उजालों की बात

कुछ ओर थी

अब तो अंधेरे ही अंधेरे

रह गये है

और हम अंधेरे के

हो गये।

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परिभाषा

प्‍यार क्‍या होता है

मैंने पढ़ा था प्‍यार में

समर्पण होता है

त्‍याग होता है

मान-सम्‍मान होता है

पर नहीं प्‍यार में

हकीकत में किताबों में पढ़ी

किताबी बातें ही होती है

प्‍यार में

लोग अपने स्‍वार्थ के बदले

अपने सम्‍मान की खातिर

दूसरे का अपमान करते है

प्‍यार में अपने

पराये का एहसास

कराया जाता है

क्‍या प्‍यार एक परछाई है

जो हाथ नहीं आती

आती है तो जिल्लत और

शर्मिंदगी!

हकीकत

एक रिश्‍ता जो बेमानी है

वो साथी एक छाया है

जो रोशनी में खो जाता है

अंधेरे में साथ दिखाई तो

देता है पर साथ नहीं होता

एक सपना जो मेरा भी

था और उसका भी

देखा तो साथ था पर

आंख सपना टूटा तो

मैं अकेली थी

मुझे अहसास कराया

जाता है तुम्‍हें समाज

आजादी नहीं देता

तुम्‍हें बंदिशें मिलनी चाहिए

तुम एक स्‍त्री हो

तुम पुरुष की बराबरी

नहीं कर सकती

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उम्‍मीद

हर उम्‍मीद ने साथ छोड़ दिया

जैसे दिल से दिमाग ने रिश्‍ता

ही तोड़ दिया

कोई हमें बताए कि क्‍या

करें और क्‍या न करे

इस वक्‍त

सोचा दौड़ कर लूट ले

उस कारवां को

जो बीच में

हमें इस तरह छोड़ गया

हिम्‍मत

उठ और चल

दूर तक

जहां तक आंखों

को दिखे राह

हिम्‍मत हारने

से कुछ नहीं होता

हौसले बुलंद कर

और आग बढ़ चल

मंजिल मिल ही जाती

है जब खुद पर हो

भरोसा।

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सारा जहान

सुना है कि

चाह में बड़ी ताकत होती है

विश्‍वास में

हिम्‍मत होती है

सब्र का फल मीठा

होता है

दुआ में बहुत

ताकत होती है लेकिन

मुझे तो लगता है

न प्‍यार न दुआ

है इस दुनिया में

जहां पैसा है

वहीं झुका है

सारा जहां

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आमदनी

यादों की

गहराई में

साल की दूरी तक

हर कही हर जगह

इमारतें नजर आती है

बाहर हर जगह दुकानें

नजर आती है

जहां हर चीज बेची

और खरीदी जाती है

महंगी जमीन है

घर के बाहर

छोटी-छोटी जगह

दिख जाती थी

कुछ समय पहले तक

कहीं कहीं नजर आ

जाती थी लेकिन अब

दुकानें बना दी गई है

यह सोचकर कर

कुछ पैसे की आमदनी

तो हो जाएगी।

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परिचय

नाम ः शिखा गुप्‍ता

जन्‍म तिथि ः 25-12-1976

शिक्षा ः बी.ए

लेखन-प्रकाशनः विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं

में कविता प्रकाशित

संपर्क ः ई-468, गली नं-9

वेस्‍ट विनोद नगर

दिल्‍ली-110092

ईमेल shikha.puneet@gmail.com

4 blogger-facebook:

  1. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

    उत्तर देंहटाएं
  2. सभी कवितायें..
    सार्थक...
    बेहतरीन...

    उत्तर देंहटाएं
  3. शिखा जी बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ! सभी कवितायेँ अच्छी हैं लेकिन मुझे परिभाषा और आमदनी एकदम सार्थक और सटीक नजर आई | हार्दिक बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  4. मंजिल मिल ही जाती
    है जब खुद पर हो
    भरोसा।
    बिलकुल सही कहा है... सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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