सोमवार, 9 जनवरी 2012

मालिनी गौतम की कविता - इबारत

इबारत

यूँ तो कितनी ही बार

तुम हुए नाराज मुझसे,

रूठे...और बिना मनाये ही

मान भी गये...

जानते थे तुम

कि मैं तो घिरी हूँ

मेरी ही उदासियों में

फुर्सत ही कहाँ है मुझे

तुम्हारी उदास आँखों में

झाँकने की

तुम्हारे फटे जख्मों को सीने की...

पर आज तुम्हारी

पलकों पर आ कर ठहर गई

बूँदों के उस पार

देखा है मैनें तुम्हें

टुकड़े-टुकड़े टूटते हुए

कतरा-कतरा बिखरते हुए

देखा है मैनें

तुम्हारे अन्दर

एक जख्म को

नासूर में बदलते हुए

पहली बार महसूस किया मैनें

कि मेरे दहकते जख्मों पर

जब-जब रखे हैं तुमने ठंडे फाहे

हर बार जल गये हैं

तुम्हारे ही हाथ

तुम्हारी आँखों के जुगुनू

उड़-उड़कर आते रहे

मेरी अँधेरी रातों को

रौशन करने लिये

पर मैनें जब भी देखा तुम्हे

निगाहें उठाकर

मेरी आँखों से निकलते अंगारों ने

दे दिये तुम्हें

कोयले के दाग..

तुम मुझे प्रेम और ममता की

मूरत समझकर

हाथों में फूल

और मन में आस्था लिये

आगे बढ़ते ही गये

पर जब नजदीक पहुँचे तो पाया

कि मैं तो हूँ

पत्थर का वह शिलालेख

जिस पर कोई

लिख चुका है इबारत

सदियों पहले ही.......

--

डॉ मालिनी गौतम

3 blogger-facebook:

  1. अंत में आकर कविता अपने उत्कर्ष पर पहुँच गई.

    उत्तर देंहटाएं
  2. ह्रदय की अनुभूतियों को कविताओ के रूप में कह देना अपने आप में एक कला है. और इस कला के आप सफल कलाकारा है ! कविता के लिए बड़ाई स्वीकार करें !

    उत्तर देंहटाएं

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