रविवार, 26 फ़रवरी 2012

मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया - एवरेस्ट की चुनौती : 2

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एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान

(भाग - 2)

पिछले अंक से जारी...

दूसरा पड़ाव योकसाम गांव में था जो साढ़े पांच हजार फीट की ऊंचाई पर है। यह गांव पहले कभी सिक्किम की राजधानी था। यह गांव बड़ा ही सुन्दर था और यहां तम्बू गाड़ने लायक बहुत-सी खाली जगह थी। यहां के निवासियों के चेहरे मंगोलों जैसे थे। दूसरे दिन हम फिर आगे चले और घने जंगल में स्थित बक्किम नामक गांव में ठहरे। इसके बाद अगला पड़ाव- डीजोंगरी नामक जगह पर किया जो पहाड़ों में एक दरी है। यहां प्राय: हमेशा बर्फ गिरती रहती है। यहां से हम एक काफी समतल जगह को पार करके एक बिलकुल सीधी चढ़ाई पर पहुंचे और साढ़े चौदह हजार फीट बढ़कर चौरीखांग नामक उस जगह पर आ गए जो हमारी अगली टेर निंग का बेस कैम्प था। यहां वायु मंडल में मैदानों की तुलना में आक्सीजन की मात्रा बहुत कम थी। इस कारण यहां रात को सोना कठिन होता था। लेकिन कुछ समय बाद हमारा शरीर इसे सहने लायक बन गया।

' यहां हमें एक सप्ताह तक हिम और बर्फ, उनकी विशेषताओं तथा पहाड़ों पर चढ़ने की शिक्षा दी गई।

यहीं पहली बार मैंने तेनजिंग के अधीन कार्य किया। मैं उनके हर कदम को ध्यान से देखता था और उसी तरह चढने का अम्यास करता। पर्वतारोहण के उपकरणों के उपयोग का सही ढंग भी मैंने उनसे सीखा। उनका स्वभाव बहुत शांत था और वे कभी नाराज नहीं होते थे। इसी कारण मैं उनसे बर्फ और उस पर चलने की पूरी जानकारी प्राप्त कर सका। यह ऐसा स्थान था जहां बर्फ कभी नहीं पिघलती और यहां की हर बात मेरे लिए एक अविस्मरणीय अनुभव थी। यहां पहली बार मैंने ग्लेशियर, बर्फ में पड़े दरार, देखे। प्रकृति के इसी वास्तविक स्वरूप को देखने की कल्पना मैं वर्षों से मन में संजोए था।

एक हप्ते बाद हम दार्जिलिंग वापस आ गए। एक समारोह में प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हमें 'सिल्वर-ऐक्स' दिए, जिन्हें पाकर हम गर्व से फूले नहीं समाए।

नवम्बर में पर्वतारोहण के उच्च शिक्षण के कोर्स के लिए मैं दार्जिलिंग फिर वापस लौटा। इस बार हमें जिस बेस कैम्प पर ले जाया गया वह सोलह हजार फीट ऊपर था। यहां रहकर हमने उन्नीस हजार फीट ऊंची के चोटी की चढ़ाई पूरी की। दुर्भाग्यवश इस कोर्स के अन्य सदस्य बीमार पड़ गए और चोटी तक नहीं पहुंच सके। मेरे साथ एक शेरपा और थापा नामक सज्जन गए जो 'सांग्स आफ स्नो' नामक फिल्म बना रहे थे। इस चोटी का नामकरण श्री तेनजिंग ने मिस्टर के नामक एक विदेशी पर्वतारोही के नाम पर किया था जो 1952 में उनके साथ इसकी चढ़ाई पर गए थे। परंतु बीच में ही पैर फिसल जाने के कारण मि० के का देहान्त हो गया। तेनजिंग ने चोटी के पास ही उनकी कब्र भी बना दी। मैं जितने समय इस चोटी पर रहा, मैंने पाया कि यहां की चट्टानें स्थिर नहीं हैं और वे कभी-भी लुढ़क सकती हैं। यहां बर्फ भी निरंतर गिरती रहती थी। थापा के थैले पर काफी बर्फ गिरी लेकिन नुकसान ज्यादा नहीं हुआ। इन सब कठिनाइयों के

बावजूद भी हम आगे बढ़ते रहे और दोपहर तक शिखर पर पहुंच गए। यहां पहुंचकर हम बहुत रोमांचित हुए। इतनी ऊंचाई पर खड़े होकर चारों ओर देखना और फोटो लेना बहुत आलादकारी था।

पर्वतारोहण का यह उच्च शिक्षण प्राप्त करने तथा के शिखर की चढ़ाई पूरी कर लेने के बाद मैं सोचने लगा कि अब मुझे किसी पर्वतारोहण अभियान में सम्मिलित होने को अवसर मिलना चाहिए। इन्हीं दिनों भारतीय सेना के शिखर के समीप ही कोखयांग नामक २० हजार फीट ऊंचे और अभी तक अछूते शिखर पर चढ़ने को योजना बना रही थी। मुझे इस अभियान में सम्मिलित कर लिया गया। ग्यारह अप्रैल को दार्जिलिंग से यह अभियान आरंभ हुआ। यह अभियान इसलिए भी बहुत सुखद था क्योंकि इसमें हमें ऐसे अनेक स्थानों की यात्रा करनी थी, जहां अभी तक कोई नहीं पहुंचा था। इन दिनों मौसम बराबर बहुत खराब रहा और हम कठिनाई से ही साढ़े उन्नीस हजार फीट को ऊंचाई पर अपना अंतिम कैम्प बना सके। इसी कैम्प से 26 अप्रैल को दोपहर बाद तीन बजे हम शिखर के लिए चले। आसमान साफ नहीं था और चीजें स्पष्ट नहीं दिखाई देती थीं, इसलिए चढ़ाई कठिन और धीमी रही। जब हम शिखर के पास पहुंच रहे थे तभी बर्फ

पड़ना शुरू हो गयी। इन सब कठिनाइयों के बावजूद 'हम शिखर पर जा पहुंचे, पर वहां देर तक रुके नहीं, क्योंकि अंधेरा होने से पहले हमें लौटना भी था। हमारी वापसी की यात्रा और भी मुश्किल रही। बहुत जल्दी करने पर भी अंधेरा हो गया। टार्चों के सहारे हमने उतरना शुरू किया, लेकिन कुछ दूर बाद हम रास्ता भूल गए। हारकर हमने बर्फ पर ही रात गुजारने का निश्चय किया। लेकिन तभी हमारे एक साथी को कैम्प दिखायी दे गया और बड़ी मुश्किल से हम वहां तक पहुंचने में सफल हुए।

इस अभियान के समय मैं रेडियो पर उन्हीं दिनों एवरेस्ट पर चढ़ रहे दूसरे भारतीय दल की प्रगति के बारे में ध्यान से सुनता रहता था। दुर्भाग्य-वश मौसम की खराबी के कारण इस अभियान दल को एवरेस्ट शिखर से ४०० फीट समीप तक पहुंचकर वापस लौट आना पड़ा। भारतीय दलों द्वारा एवरेस्ट शिखर की इस दूसरी चढ़ाई की असफलता के बाद मैं सोचता रहा कि क्या कोई -तीसरा दल भी कभी एवरेस्ट पर चढ़ने का प्रयास करेगा? और क्या उसे सफलता भी मिलेगी? अगले दो वर्षों में यह प्रयास नहीं किया गया और उन दिनों मैं पूना के मिलिटरी इंजिनियरिंग कालेज में इंजिनियरिंग का प्रशिक्षण प्राप्त करता रहा।

पूना में हमारा जीवन बहुत व्यस्त रहता था। किन्तु पढ़ने-लिखने से हमारे पास इतना काफी समय' बच रहता था कि हम दूसरे कामों में हिस्सा ले सकते थे। इस समय का उपयोग करने के लिए मैं कालेज कैमरा क्लब का सक्रिय सदस्य बन गया। इसके अलावा मैंने पर्वतारोहण संबंधी सामान्य पुस्तकों के अतिरिक्त एवरेस्ट संबंधी साहित्य भी पढ़ना आरंभ कर दिया। मैंने एवरेस्ट पर किए गए आरंभिक अभियानों से लेकर नवीनतम अमेरिकी अभियानों तक सभी पुस्तकें पढ़ डालीं।

१९६४ की शुरुआत थी। अगली गर्मियों में पर्वतारोहण के तीन अभियान आरंभ करने की योजना थी। १९६५ में एवरेस्ट अभियान का भी चुनाव होना था। इस दल के नेता कमाण्डर कोहली ने मुझ- से दल में सम्मिलित होने के लिए कहा, परंतु इन दिनों मेरी अन्तिम परीक्षाएं भी होनी थीं (मैंने कोशिश की कि मैं परीक्षा अगले साल दे लूं और अभियान में सम्मिलित हो जाऊं, लेकिन मुझे इसकी अनुमति नहीं मिली। एवरेस्ट देखने का यह अवसर हाथ से निकल जाने के कारण मैं बहुत दुखी हुआ, लेकिन क्या कर सकता था!

पूना का कोर्स पूरा करने के बाद मैं गुलमर्ग की पहाड़ी ऊंचाइयों पर हाई आल्टीट्यूड वारफेयर ( युद्ध- कला का प्रशिक्षण देने वाले ) स्कूल में शिक्षक नियुक्त किया गया। यहां आकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। इन्हीं दिनों अक्टूबर १९६४ में, एवरेस्ट पर चढ़ाई के लिए दल का चुनाव भारत के सभी पवर्तारोहियों में से करने का निश्चय किया गया। सारे देश से तीस लोगों की सूची तैयार की गयी, जिनमें से अन्तिम चुनाव किया जाना था। इस सूची में मेरा भी नाम था। यह समाचार पाकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। चुनाव के लिए भारत-सिक्किम सीमा पर स्थित राथोंग पर्वत नामक २१,९११ फीट ऊंची एक चोटी की चढ़ाई की जानी थी। इस चोटी पर चढ़ने में अब तक किसी को सफलता नहीं मिली थी। १९६० और १९६२ के दोनों एवरेस्ट अभियानों से पूर्व भी उन पर चढ़ने की कोशिशें की गयी थीं जो सफल नहीं हुई। हमें पता था कि यह चढ़ाई बहुत कठिन है, लेकिन इसी ढंग से चुनाव होना था। १५ अक्टूबर, १९६४ को हम दार्जिलिंग से चौरीखांग को चले। चौरीखाग से रथोंग दर्रे में होते हुए हम ने नेपाल में प्रवेश किया। यालोग ग्लेशियर के समीप हमने अपना बेस कैम्प बनाया। मुझे याद है, यह दशहरे के दिन थे और नेपाली मजदूर अक्सर शराब पीकर आगे बढ़ने से इंकार कर

कर देते थे। इस कारण सामान ढोने में कठिनाई होती थी। एक बार तो स्थिति यहां तक पहुंच गयी कि हमारे पास खाने को कुछ भी नहीं रहा। पहले एक जर्मन अभियान दल के साथ भी यही घटना घटित हुई थी और खाने पीने की सामग्री बिलकुल खत्म हो जाने के कारण उन्हें याक पशु का खून पीकर जीवित रहना पड़ा था। सौभाग्य से उनके कैम्प के पास ही सौ याकों का एक गिरोह था और पांच रुपये फी लीटर के हिसाब से उन्हें याक का खून खरीदना पड़ता था। ( याक की गर्दन में एक बड़ी नस काटकर आवश्यक रक्त निकाल लिया जाता है और फिर घाव को भर दिया जाता है। कहते हैं, पहले मंगोल भी अपने घोड़ों के साथ ऐसा ही करते थे। ) फिर इस रक्त को उबालकर जमाया जाता था और उसके लम्बे गोल टुकड़े दल के सदस्यों को खाने के लिए दिए जाते थे जिन्हें वे बड़ी रुचि से खाते थे। लेकिन हमने याक रक्त के स्थान पर उनका दूध और पनीर खाना अधिक पसंद किया।

दल के कई सदस्य ये कठिनाइयां सह न पाने के कारण बीमार पड़ गए। एक-दो को दार्जिलिंग वापस भी भेजना पड़ा। इन दिनों सर्दी भी बहुत पड़ती है और शाम के समय तापमान शून्य से नीचे गिर जाता है। हमारी दूसरी कठिनाई हिम प्रदेश में अधिक समय तक चलते रहने' से उत्पन्न शिथिलता थी जिसमें शरीर के भीतर का जल बिलकुल समाप्त हो जाता है और मनुष्य ऊंघने-सा लगता है। इन सब कठिनाइयों को झेलते हुए भी हम शिखर के मार्ग पर जा लगे और चढाई करने वाले पहले दल में गोम्बू के साथ मैं भी चुन लिया गया। उनके साथ मैं पहले भी चढाइयों में शरीक हो चुका था । 29 अक्टूबर को बहुत ही कठिन चढाईपूरी कर के हम १ बजकर १५ मिनट के लगभग शिखर पर जा पहुंचे। यहां से जानु पर्वत का बड़ा ही शानदार दृश्य दिखाई देता था। जानु बहुत ही कठिन पर्वत है। 1962 में एक फ्रेन्च दल इस पर्वत की चोटी तक पहुंचने में सफल हुआ।

रथोंग पर्वत की चढ़ाई में सफलता प्राप्त करने के बाद मुझे आशा बंधी कि मुझे भी एवरेस्ट चढ़ाई के दल में सम्मिलित कर लिया जाएगा। अन्तिम चुनाव अभियान दल के सभी तीस सदस्यों के कार्य का निरीक्षण कर के किया जाना था।

१ नवम्बर को हम दार्जिलिंग के लिए लौट पड़े। वापसी की यह यात्रा हमने पूर्वी नेपाल होकर की, जो उन दिनों बहुत हरा-भरा था। यह प्रदेश यूं भी बहुत रमणीक माना जाता है। हम ९ नवम्बर को दार्जिलिंग पहुंचे। यहां आई० एम० एफ० के सभी सदस्य चुनाव करने के लिए पहले ही आ गए थे। हमारे पहुंचते ही कमाण्डर कोहली और कर्नल जैसवाल ने एवरेस्ट अभियान दल के सदस्यों का चुनाव आरंभ कर दिया। हम सब के कम पर विस्तार से विचार किया गया। तीस में से कुल नौ व्यक्ति चुने गए। इनमें मेरा भी नाम था। इस प्रकार एवरेस्ट दर्शन की मेरी इच्छा पूरी होने का अवसर आ गया।

एवरेस्ट अभियान

२२ फरवरी की शाम को हम सब दिल्ली रेलवे स्टेशन पर इकट्टे हुए। स्टेशन पर हमारे मित्र, संबंधी और बहुत-से प्रेस प्रतिनिधि भी आ गए थे। हमारे लिए नियत रेलगाडी के डिब्बों में पर्वतारोहण से संबंधित बहुत-सा सामान भरा हुआ था। पौने नौ बजे ट्रेन लखनऊ के लिए रवाना हुई। बीच के हर स्टेशन पर लोग हमारा स्वागत करने के लिऐ जमे थे, इसलिए हम रात में सो नहीं सके। दूसरे दिन सवेरे हम लखनऊ पहुंच गए। लखनऊ से मीटर गेज की एक छोटी रेल- गाड़ी पर सवार होकर हम तीसरे दिन जयनगर पहुंचे। जयनगर-से ही हमारी एवरेस्ट की यात्रा शुरू होनी थी। शेरपाओं के देश से हमारे साथ जाने वाले बहुत से शेरपा और पोर्टर भी यहां आ पहुंचे थे। इन सबसे मिलकर, विशेष रूप से उन शेरपाओं से मिलकर जिनके साथ हमने पहले भी चढ़ाइयां की थीं, हमें बहुत

खुशी हुई। इनमें शेरपा सरदार अंग शेरिंग, उप सरदार फू दोरजी और नवाग हिल्ला भी थे। हिल्ला औरतों की तरह बालों की चोटी बांधता था। जयनगर में हम सामान ठीक-ठाक करने के लिए कुछ दिन रुके। यह सब सामान आठ सौ पोर्टरों को एवरेस्ट के बेस कैम्प तक ले जाने के लिए दे दिया गया।

२६ तारीख को हम जयनगर से चले। दो दिन बाद हमने नेपाल में प्रवेश किया। हमारे साथ २५ टन के लगभग उपकरण और खाने-पीने का सामान जा रहा था। पचास शेरपा ऐसे थे जिनके पास कोई सामान नहीं था। शेरपा और कुली में अंतर यह होता है कि कुली बेस कैम्प तक सामान ले जाते हैं और इसके आगे शेरपा अभियान दल के सदस्यों को सामान ले जाने में सहायता करते हैं। शेरपा बहुत ही हंसमुख और मिलन- सार स्वभाव के लोग होते हैं। हमारे मुख्य रसोइये का नाम थाण्डुप था। थाण्डुप बहुत अनुभवी शेरपा था और कई एवरेस्ट की चढाइयों पर जा चुका था। हर चढ़ाई के बाद उसे सम्मान के रूप में कोई सैनिक उपाधि दे दी जाती थी। हमारे साथ जाने के समय वह 'ब्रिगेडियर' था, बाद में 'मेजर जनरल' बना' दिया गया। कुलियों में कुछ स्त्रियां भी थी और स्त्री साठ पौण्ड वजन लेकर चलतीं थी। ये कुली बड़े ईमानदार होते हैं।

अभियान दल के नेता कमाण्डर एम० एस० कोहली थे जिन्हें शेरपा और कुली बड़ा साहब' कहते थे। उन्होंने पर्वतारोहण के क्षेत्र में बहुत अच्छा नाम कमाया है। वे 1960 और 1962 के भारतीय एवरेस्ट अभियान दलों में थे। 1962 में वे २८००० फीट की ऊंचाई तक 'वढ गये थे। उप-नेता मेजर कुमार थे, जिन्हें सामान्य रूप से 'बुल कहा जाता था। वे भी 1960 की एवरेस्ट चढ़ाई पर गए गए थे और

२८,६०० फीट की ऊंचाई तक पहुंचने में सफल हुए थे। १९६० में नीलकण्ठ की चढ़ाई पर उन्हें तुषारा- घात हो गया था। अपने पैर गरम रखने के लिए वे बैटरी से गर्म रहने वाले मोजों का इस्तेमाल करने लगे थे।

एवरेस्ट तक पहुंचने का रास्ता बहुत लम्बा है और फोटोग्राफी, भूगर्भशास्त्र, पेड़-पौधे तथा पशु- पक्षियों के अध्ययन के लिए यह बहुत अच्छे अवसर प्रदान करता है। एक दिन यात्रा खत्म करने के बाद मैं कुलियों के कैम्प में गया और वहां मैंने उनका प्रिय भोजन सांपा चखकर देखा। सांपा और तिब्बती चाय इन लोगों के भोजन के आवश्यक अंग हैं। चाय में जरा- सा मक्खन और नमक मिलाकर लेने से सिर दर्द दूर हो जाता है और मनुष्य ताजगी अनुभव करने लगता है। यात्रा के पांचवें दिन हमने सुनकोसी नामक नदी पार की। इस नदी पर कोई पुल नहीं है। हमने पेड़ों से बनाई गई नावों पर बैठकर नदी को पार किया। बड़े-बड़े तनों को बीच से खोखला कर कामचलाऊ नावें बना ली जाती हैं। इस नदी में हिमालय की चोटियों से पिघली हुई बर्फ पानी बनकर आती है। नदी पार करके हम ओखलडूंगा पहुंचे। इस रास्ते पर यही सबसे बड़ा गांव है। कालेज के पास लगी जमीन -

पर हमने अपना कैम्प बनाया। गांव में मेले जैसी चहल-पहल थी। लोग सबसे अच्छे कपड़े पहने घूम रहे थे, औरतें अपने जेवर पहने हुए थीं। इस दिन बाजार भी था और समूचा गांव खरीद-फरोख्त में लगा था। हमने भी यात्रा के लिए साग-भाजी और दूसरी चीजें खरीदीं।

जयनगर छोड़ने के बाद हम प्रतिदिन चार से छ: घंटे तक चलते थे। सूरज निकलने से पहले ही हम चल पड़ते थे। कई बार सुबह का नाश्ता भी रास्ते में ही दिया जाता था। दूसरे पड़ाव पर हमें प्राय: हमेशा ही दोपहर का गरमागरम भोजन मिलता। दोपहर के बाद और शाम को हम अपने मोजे धोने तथा सफाई के

दूसरे कामकाज करते थे। साढ़े छ: से सात बजे के बीच शाम का भोजन मिलता और जल्दी ही सोने चले जाते। जल्दी सोने और जल्दी जागने से मनुष्य के सभी 'कामकाज सुचारु रूप से चलते हैं। थ्यांगबोचे मठ तक पहुंचने में हमें बीस दिन के लगभग लगने थे और यहीं हमें पहला पड़ाव करना था।

ओखलडंगा से हमने 10000 फीट ऊंचे एक दर्रे की चढ़ाई पूरी की। अब तक की चढाइयों में यह मबसे मुश्किल थी और शाम को काफी देर से हम कैम्प में पहुंचे। दूसरे दिन सबेरे हमें चारों ओर बर्फ से घिरे सुन्दर पहाड़ दिखाई देने लगे। इनमें गौरीशंकर, पुमोरी, तेगचे और दूसरी चोटियां थीं।

अब हमने सोलू और रवुम्बू के प्रसिद्ध इलाके में प्रवेश किया। शेरपा लोग इन्हीं दोनों जिलों के रहने वाले हैं। यहां देवदार, फर और रोडेड़्रॉन के खूबसूरत पेड़ बहुतायत में हैं। फापलू नामक एक स्थान पर हमने डेरा डाला। यहां से आगे के मार्ग पर ऊंचे-ऊंचे कई दर्रे हैं। रास्ते में हमें जगह-जगह लामा लोग दिखाई देते जो अपने प्रार्थनाचक्रों पर 'ओमे मणि पदमै हुम्' मंत्र का जाप करते होते।

इसके बाद कई दिन तक हम पहाड़ी पर ऊपर- नीचे इस तरह चढ़ते-उतरते रहे मानों सांप-सीढ़ी का खेल खेल रहे हों। कुछ दिन बाद हम नामचे बाजार नामक प्रसिद्ध गांव में पहुंच गए जो शेरपाओं के देश का सबसे बड़ा गांव है।। 12400 फीट की ऊंचाई पर स्थित होने पर भी यहां बर्फ नहीं थी। यह एक ढलवां पहाड़ी पर स्थित है। घर पत्थर, मिट्टी और लकड़ी के बने है। गांव बहुत खुश्क और धूल से भरा था। पेड़ बहुत ही कम थे। पहाड़ी के ऊपर बहने वाले झरनों से बांस के पाइपों द्वारा पानी गांव में लाया जाता है। इस गांव का तिव्बत के साथ व्यापार होता है। यहां से तिब्बत केवल दो दिन का रास्ता है। गांव के जरा ऊपर एक पठार पर हमने कैम्प लगाया। वहां से हमने पहली बार एवरेस्ट की झलक देखी। इसी के माथ ल्होत्से और नुप्त्से के शिखर भी दिखाई देते हैं। एवरेस्ट शिखर मुझे बहुत सुन्दर लगा और मैं देर तक उसकी ओर देखता रहा।

कैम्प बनाने के बाद चीमा, बोगी और मैं गांव देखने गए। हम एक धनी व्यापारी के घर भी गए। यह एक दोमंजिली इमारत थी। नीचे की मंजिल पर याक बैल, भेड़ें, बकरियां तथा मुर्गियां पाली जाती हैं। इस मंजिल पर अंधेरा और गंदगी थी। इस मंजिल में प्रवेश करने के बाद दस गज चलकर हम दायीं ओर मुड़े जहां लकड़ी की एक सीढ़ी लगी थी। सावधानी से न चलने पर छत से लटकते तख्तों से टकरा जाने का डर था।

पहली मंजिल साफ-सुथरी थी। एक सिरे पर रसोई घर था और दूसरे सिरे पर एक छोटे-से कमरे में घर की कीमती चीजें रखी हुई थीं। मुख्य कमरे में एक मेज लगी थी और लम्बी बेंच रखी थी, जिस पर तिब्बती कालीन पड़ा हुआ था। कमरे की खाली जगह में तांबे के बड़े-बड़े बर्तन रखे थे। रसोई में हमेशा कुछ न कुछ पकता रहता था। रसोई का धुआं चिमनियां न होने के कारण कमरे में छत पर घुमड़ता रहता। शेरपा देश का हर घर: इसी ढंग से बना होता है। याक घरेलू जानवर है। इसका दूध, पनीर तथा मांस सभी प्रयोग में लाये जाते हैं। लोग उसकी खाल के कोट बनाकर पहनते हैं।

पच्चीस दिन तक चलने के बाद हम थ्यांगबोचे के प्रसिद्ध मठ में पहुंचे। कुछ लोग इसे दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह मानते हैं। मठ के चारों तरफ ढलानों पर खूबसूरत घास लगी हुई है। वातावरण में कपूर तथा चमेली की खुशबू फैल रही थी। इस स्थान की ऊंचाई १५,००० फीट है। यह अत्यंत प्रसिद्ध बौद्ध मठ है। यहां का प्रमुख लामा अवतार माना जाता है और दलाई लामै की ही भांति उसका भी चुनाव किया जाता है। चारों तरफ बर्फ से ढंके पहाड़ हैं। बाई तरफ एवरेस्ट है, बीच में ल्होत्से और नूप्त्से हैं और दाई तरफ अमा डबलम है। अमा डबलम पिरैमिड की भांति दिखाई देता है और दूसरे पहाड़ों से कहीं ज्यादा बड़ा है। पहले दिन हमें सांस लेने में कुछ कठिनाई हुई लेकिन शीघ्र ही हम वातावरण के अभ्यस्त हो गये। हमारा डेरा मठ के एक ओर बने एक छोटे से विश्रामगृह में था।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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