मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया - एवरेस्ट की चुनौती : 3

SHARE:

एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान (भाग - 3) पिछले अंक से जारी... थ्यांगबोचे में हम पांच दिन रुके। इस बीच हम पहाड़ों पर ...

image[2]_thumb

एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान

(भाग - 3)

पिछले अंक से जारी...

थ्यांगबोचे में हम पांच दिन रुके। इस बीच हम पहाड़ों पर चढ़ने का अभ्यास करते रहे और अगल- बगल की छोटी चोटियों पर चढे। इन अभ्यासों से हमारे

शरीर बहुत सुदृढ हो गए और 18 मार्च को सुबह हम अपने बेस कैम्प के लिए चल पड़े। रास्ते में पांगबोचे नामक एक और गांव आया। इस गांव में एक गुंबा है। गुंबा का अर्थ मंदिर होता है। इस गुंबा में हमने येटी के हाथ और खोपड़ी रखे देखे। येटी उस हिम- मानव को कहते हैं, जिसके बारे में विश्वास किया जाता है कि वह बर्फ में रहता है, परंतु जिसे अभी तक किसी ने देखा नहीं है। रात को हम फेरिचे में ठहरे। यह उस क्षेत्र का नाम है, जहां गर्मी के दिनों में खेती की जाती है। यहां आलू और जौ बोये जाते हैं। आलू बहुत मीठे होते हैं और उन्हें उबालकर बहुत-सी मिर्च के साथ खाया जाता है। दूसरे दिन हम कुछ मुलायम- सी बर्फ पर चलते हुए लोबुजे पहुंचे जो 16450 फीट की ऊंचाई पर है। यह शायद दुनिया का सबसे ज्यादा ऊंचा चरागाह है।

दूसरे दिन हम गोरक शेप पहुंचे जहां एक बड़ी झील है। झील सूखी हुई थी और हम उस पर चले। कुछ दूर चलने के बाद हम खुम्बू ग्लेशियर के नीचे पहुंचे। दो घण्टे और चलने के बाद हमने एक छोटी- सी घाटी में प्रवेश किया। इस घाटी में जगह-जगह नीली बर्फ के इतने ऊंचे स्तूप थे मानो कई मंजिली इमारतें हों। इसे 'फैन्टम ऐली' ( भूतों की गली ) कहा जाता है।

बाइस मार्च को हम एक समतल जगह पर पहुंचे, जहां बहुत-सी चट्टानें भी थीं। यही हमारा बेस कैम्प था और इसकी ऊंचाई 17800 फीट थी। अगले दो दिन हम कैम्प व्यवस्थित करने के काम में लगे रहे। अधिकांश तंबू पत्थरों पर ही गाड़ने पड़े क्योंकि समतल जगह बिलकुल भी नहीं थी। यहां बहुत सख्त सर्दी थी और तेज हवा चल रही थी। कैम्प के एक ओर रसोई घर बनाया गया और दूसरी ओर सदस्यों के लिए तथा सामान के लिए तंबू गाडे गए। कैम्प में बहुत शोर- शराबा था। रात दिन ऐवेलांश आते रहते थे। यहां से ऊपर चढ़ाई का रास्ता निश्चित करने की योजनाएं बनाई गईं। सदस्यों को तीन दलों में बांटा गया। पहला दल 25 मार्च को बेस कैम्प से निकला और खुंबू क्षेत्र में रास्ता बनाने के काम में जुट गया। यहां बर्फ गिरती रहती है और ऐसे क्षेत्र में रास्ता बनाने के काम में एक से तीन हपते तक लग जाते हैं। एवरेस्ट के मार्ग पर यह पहली बड़ी बाधा है। चढ़ाई दल क्रैम्पन प्वाइंट नामक स्थान तक जाता है। यहां से आरोही क्रैम्पन ( बूटों के नीचे लोहे का कीलदार तला ) पहन लेते हैं, जिनके बिना बर्फ पर चढना संभव नहीं होता। इस जगह से आगे सर्वत्र बर्फ पड़ी होती है। क्रैम्पन पहने बिना आदमी फिसलकर बर्फ के बीच बनी बड़ी-बड़ी दरारों में गिर जा सकता है। ये दरारें पचास से पांच हजार फीट तक गहरी होती हैं। कई दरारें चालीस फीट तक चौड़ी होती हैं।

हमारे साथ सुनहरे रंग का एक छोटा-सा कुत्ता था। इसे हम 'टाइगर' कहते थे। यह कुत्ता एक गांव से हमारे साथ हो गया था। यह क्रैम्पन प्वाइंट पर हमें आगे जाने के लिए विदा करता और जब हम यहां लौटते तो हमारा स्वागत करता। शुरू में उसने क्रैम्पन प्वाइंट से आगे भी हमारे साथ जाने की कोशिश की परंतु वह फिसल-फिसल जाता था, इसलिए वह यही ठहर गया और उसने आगे बढ़ने का प्रयत्न छोड़ दिया। लेकिन यह कुत्ता बड़ा सख्त था और खुले में सोता था। बर्फ से उसे कोई परेशानी नहीं होती था। किसी गांव से अगर कोई कुत्ता आपके साथ हो जाय और बेस कैम्प पर ठहरा रहे तो अभियान दल के लिए यह भाग्यसूचक चिह्न माना जाता है।

इससे पहले आइसफोल को पार करना असंभव' माना जाता था। इसलिए इसे 'एटम बम क्षेत्र' 'हिलेरीज टेरर' आदि डरावने नामों से पुकारते थे। आइसफोल में चलना बहुत खतरनाक होता है। आपके ऊपर बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े गिर सकते हैं और आपके सामने अचानक बड़ी-बड़ी दरारें खुल या बंद हो सकती हैं। १९६३ के अमेरिकी अभियान में जान ब्रीटेनबॉक नामक आरोही एक दरार में गिरकर मर गया था। एक जापानी अभियान दल के छ: सदस्य इसमें काम आ गए। हमारे अपने अभियान में एवरेस्ट तक हमारे साथ जाने वाला सदस्य फू दोरजी कुछ समय बाद एक जापानी अभियान दल के साथ जाता हुआ यहीं दुर्घटना- ग्रस्त होकर मर गया।

दल के दो-दो सदस्य दो या तीन रस्सों के साथ बंधकर चलते हैं। ये रस्से को कमर से बांध लेते हैं। इससे उन्हें सुरक्षा प्राप्त होती है। एक रस्से में बंधे हुए दो या कभी-कभी तीन सदस्य मिलकर 'रस्सी' ही कहलाते हैं। ये रस्से बारी-बारी से हिमपात पर रास्ता बनाते हैं। हम दस दिन के भीतर आइसफोल पर रास्ता बना सके,यह हमारे लिए सौभाग्य की बात थी। उसके दूसरे सिरे पर, जो २०,००० फीट की ऊंचाई पर था, कैम्प-१ स्थापित किया गया। अगले हफ़्ते हम इस कैम्प-१ तक सामान पहुंचाने का काम करते रहे। यह जगह बहुत सुरक्षित नहीं थी, और यहां हम ज्यादा नहीं ठहरना चाहते थे। हालांकि जगह काफी समतल थी, पर यहां एवेलांश बहुत तेजी से आते थे और दरारें भी बहुत तेजी से बनती-बिगड़ती थीं। मुझे याद है-एक तम्बू के नीचे की बर्फ अचानक बैठ गई और सदस्य उसमें फट से गिर पड़े।

कैम्प-१ के आगे का रास्ता ज्यादा साफ और समतल था और हमें कैम्प-२ लगाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। २१,३०० फीट की ऊंचाई पर स्थापित यह कैम्प बहुत ही सुरक्षित था। यहां चारों तरफ निस्तब्धता थी। इस कैम्प को बाद में अगले बेस कैम्प का नाम दिया गया और हमारा सारा काम-काज यहीं से संचालित होने लगा।

यहां से हमारे दल और भी आगे चले। 6 अप्रैल को 22300 फीट की ऊंचाई पर कैम्प-3 स्थापित किया गया। इतनी ऊंचाई पर बराबर काम करते रहना बहुत कठिन होता है। इस क्षेत्र में आक्सीजन की बड़ी कमी होती है। आप जितना ऊंचे चढते जाएंगे, आक्सीजन की कमी उतनी ही अधिक होती जायेगा। इस क्षेत्र में हमने आठ-दस दिन तक लगातार काम किया था, इसलिए अब हम आराम करने लगे। कैम्प-३ के आगे रास्ता बनाने का काम दूसरे दल ने आरंभ किया। इस बीच सभी कैम्पों में खाने-पीने का सामान तथा जरूरी चीजें इकट्टी की जाती रहीं।

यहां से 'ल्होत्से फेस' नामक क्षेत्र आरंभ होता है जो एवरेस्ट चढ़ाई की दूसरी प्रमुख बाधा मानी जाती है। ल्होत्से का दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में चौथा स्थान है। इस पहाड़ के ग्लेशियर पर रास्ता बनाना पड़ता है। पहाड़ बिलकुल सीधा खड़ा है। बर्फ नीली और बहुत ही सख्त है, जिससे उसमें पैर रखने का स्थान काटना कठिन होता है। २५,००० फीट ऊंचे ल्होत्से पहाड़ की चोटी की ओर न जाकर हम बायीं ओर मुड़ गए। यहां हमने कैम्प-4 बनाने का विचार किया। तेज हवाओं के बावजूद गोम्बू और उसका दल मेहनत से काम करते रहे। यह दल आक्सीजन का प्रयोग करते हुए चार दिन में रास्ता बना पाने में सफल हो गया। इसके बाद ग्यात्सो और उसके दल ने जेनेवा स्पर' तक रास्ता बनाने का कार्य आरंभ किया। 20 अप्रैल तक साउथ कोल का अगला कैम्प स्थापित हो गया और सामान भी यहां पहुंच गया। साउथ' कोल दो पहाड़ों के बीच को निकली जगह का नामे है। इसके एक ओर ल्होत्से और दूसरी ओर एवरेस्ट शिखर हैं। इस जगह हवाएं बहुत ही तेज रपतार से निरंतर चलती रहती हैं। हवा इतनी तेज होती है कि वे आदमी को उड़ाकर कहीं का कहीं ले जा सकती है। यहां रात को सोना तो कठिन होता ही है, सांस लेना और खाना भी कठिन होता है।

अपनी प्रगति से हम बड़े संतुष्ट थे। साउथ कोल तक इतने कम समय में अब तक किसी भी अभियान दल ने रास्ता नहीं बनाया था। अप्रैल के अंतिम सप्ताह तक हमने यह काम कर लिया। 27 अप्रैल को शिखर पर चढ़ाई करने वाले दल अगले बेस कैम्प से चले। कैम्प3 पर उन्होंने पड़ाव नहीं किया। कैम्प पर पहुंच कर वे रात को सोए और 28 अप्रैल को दक्षिण कोल पहुंच गए। 29 अप्रैल को ये शिखर दल आखिरी कैम्प की यात्रा करने को तैयार थे, परंतु मौसम खराब हो जाने के कारण वे दो दिन तक वहीं रुके रहे। उन्हें आशा थी कि मौसम ठीक हो जाएगा, परंतु आकाशवाणी ने दोपहर बाद यह सूचना हमें दे दी कि आगे का मौसम बहुत खराब रहेगा। समय बिलकुल नहीं था। यह कैम्प बंद करना पड़ा और सदस्यों से कहा गया कि वे जल्दी से जल्दी बेस कैम्प पर वापस लौट जाएं। आकाशवाणी की सूचना सही निकली। वापस लौटते हुए दल के सदस्य मौसम के शिकार हो गए और बड़ी कठिनाई से बिलकुल थके-मांदे किसी प्रकार वहां तक पहुंचने में सफल हुए।

१ मई तक अभियान दल के सभी सदस्य बेस कैम्प पर इकट्ठे हो गए। पहले प्रयास में असफल हो जाने पर भी हम उदास नहीं थे क्योंकि हम जानते थे कि मौसम ज्यादा दिन बुरा नहीं रहेगा और हम फिर एवरेस्ट पर चढ़ने का एक और प्रयत्न कर सकेंगे। ज्यादा ऊंचाई पर यद्यपि मौसम खराब था, परंतु बेस कैम्प पर मौसम काफी अच्छा था। लेकिन हमने ढील नहीं बरती और काम करते रहकर अपना स्वास्थ्य ठीक बनाए रखा। कुछ सदस्य पड़ोस की चोटियों पर चढ़ने का अभ्यास करते रहे।

चौदह दिन बाद मौसम कुछ सुधरा। आकाशवाणी ने मौसम के संबंध में जो सूचनाएं दीं उनसे हमें बड़ा उत्साह मिला। हमें लगा कि शिखर पर चढ़ने का फिर से प्रयत्न करने का समय आ गया है।

१६ मई को पहले चढ़ाई दल ने ऊपर चढ़ना शुरू किया। इसमें चीमा और गोम्बू थे। उन्हें खुंबू आइसफोल पार करने में काफी कठिनाई हुई, क्योंकि हमारे बनाए रास्ते का बहुत-सा भाग इस बीच बिलकुल टूट गया था। लेकिन आगे के रास्ते पर हमें कोई कठिनाई नहीं हुई और ये १८ मई को साउथ कोल पहुंच गए। 19 मई को आक्सीजन लगाकर ये लोग आखिरी कैम्प के लिए निकले। फू दोरजी और दूसरे

शेरपा इस दल की सहायता कर रहे थे। ये लोग आखिरी शिविर पर सामान पहुंचाकर लौट आए। यह २८,००० हजार फुट तक गोम्बू और चीमा के साथ रहे, इसके आगे अंतिम चढ़ाई का पूरा प्रयत्न उन्हें खुद करना था। 28 मई के सबेरे पांच बजे गोंबू और चीमा शिखर के लिए चले।

चढ़ाई-अभियान को ठीक से संचालित करने के लिए कुछ निरीक्षण चौकियां भी स्थापित की गई थीं। एक चौकी बेस कैम्प पर थी, दूसरी अगले बेस कैम्प पर और तोसरी कैम्प-4 पर थी। मौसम अच्छा होने के कारण इन चौकियों से शिखर की ओर बढ़ रहे दोनों सदस्यों का अच्छी प्रकार निरीक्षण किया जा सकता था। गोंबू और चीमा निरंतर आगे बढ़ते हुए 9-30 बजे के लगभग शिखर पर जा पहुंचे। भारतीय एवरेस्ट अभियान दल के लिए यह एक महान विजय थी। यह समाचार तुरंत दिल्ली भेज दिया गया क्योंकि बेतार के तार द्वारा हमारा उनसे सम्पर्क स्थापित था। रात को ९ बजे जब आकाशवाणी से यह समाचार प्रसारित किया गया, तो सभी भारतवासी रोमांचित हो उठे। इसी बीच सोनम ग्यात्सो और सोनम वांग्याल का दूसरा दल शिखर छूने के लिए आगे बढ़ा, लेकिन वे १४० किलोमीटर फी घण्ठै की रपतार से चल रही तेज हवा में फंस गए। हवा ने उन्हें इस बुरी तरह झक- झोर दिया कि वे कैम्प की वापसी का रास्ता ही भूल गए। लेकिन वे संघर्ष करते रहे और बिलकुल शाम होने पर थकान से चूर कैम्प पर पहुंचे। कैम्प के बाहर ही वे अचेत होकर गिर पड़े। सोनम ग्यात्सो अल्ट्रा- वायलट किरणों से बुरी तरह जल गया था। लेकिन यह सब तकलीफ सहन करने के बाद भी दोनों सोनम बाईस मई को शिखर छूने के लिए फिर चले। आज भी हवाएं बड़ी तेज थीं लेकिन दोपहर बाद वे शिखर पर जा पहुंचे और छ: बजे शाम तक आखिरी कैम्प में वापस भी लौट आए।

वोहरा और अंग कामी का तीसरा दल २४ मई को सबेरे पांचे ग्यारह बजे शिखर पर पहुंच गया। वोहरा ने शिखर पर पहुंच कर कुछ बहुत अच्छे फोटो भी खींचे।

अब चौथा दल शिखर पर चढ़ने के लिए तैयार हुआ, जिसमें मैं भी था। इस समय तक हमारे पास आक्सीजन का भण्डार बहुत 'कम रह गया था इसलिए, हमें डर था कि यह अंतिम दल शायद शिखर तक पहुचने में सफल न हो सके। अगले अध्याय में मैं अपनी शिखर-यात्रा का वर्णन विस्तार से कर रहा हूं।

शिखर पर मैं

एवरेस्ट पर्वत संसार का सबसे ऊंचा पर्वत-शिखर है। यह समुद्र से 29028 फुट-लगभग 5-1/2 मील ' ऊंचाहै। यह हिमालय पर्वतमाला के बायें भाग में स्थित है। इसके उत्तर में तिब्बत है तथा दक्षिण में नेपाल। ' पहले इस पर्वत के संबंध में लोगों को अधिक 'जानकारी नहीं थी। इसके अडोस-पडोस में रहने वाले तिब्बती और नेपाली ही जानते थे कि यह एक बड़ा विशाल पर्वत है। तिब्बती इसे' चोमोलुंगमा अर्थात् संसार की माता नाम से पुकारते थे। १८४९ में एक सर्वेक्षण दल को पहली बार यह पता चला कि यह संसार का सर्वोच्च पर्वत-शिखर है। उस समय इसे 'शिखर-15' नाम दिया गया। बाद में इसे एवरेस्ट कहा जाने लगा। इसे यह नाम भारतीय सर्वे विभाग के प्रमुख सर जार्ज एवरेस्ट के सम्मान में प्रदान किया गया। तिब्बत के दलाई लामा एवरेस्ट-क्षेत्र में किसी यात्री को प्रदेश नहीं करने देते थे। सबसे पहले 1921 में ब्रिटिश पर्वतारोहियों के एक दल को इस क्षेत्र में जाने की अनुमति दी गई। इस दल ने दार्जिलिंग से अपनी यात्रा आरंभ की। वे घूमते-फिरते तिब्बत जा पहुंचे। परंतु दक्षिण तिब्बत में इन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वे तिब्बत के एक प्रमुख मठ, रांगबुक तक पहुंच गये थे। तीन महीने तक संसार के इस अज्ञात भाग की यात्रा करने के बाद वे इंग्लैण्ड वापस लौट गए।

इसके दूसरे साल एवरेस्ट की चढ़ाई करने के लिए पहला ब्रिटिश दल संगठित किया गया। ये लोग 27300 फुट की ऊंचाई तक जा पहुंचे परन्तु शिखर को नहीं छू सके। इसके बाद तो अनेक दलों ने शिखर की चढ़ाई की और पहली बार १९५३ में हंट और हिलेरी के नेतृत्व में शिखर को छूने में सफलता मिली।

इसके बाद भी प्रति वर्ष कोई न कोई अभियान दल एवरेस्ट की चढ़ाई पर जाता रहा। भारतीय दल ने दो बार पराजय का मुख देखने के पश्चात् ९६५ में पहली बार एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की।

हमारे दल ने तीन बार शिखर छूने में सफलता प्राप्त की। चौथी बार 25 मई को जो दल चला उसमें मैं भी था।

संसार में कई घटनाएं ऐसी होती हैं, जब कोई चमत्कार होता है और निश्चित पराजय के स्थान पर विजय प्राप्त होती है। एवरेस्ट की अपनी चढ़ाई में मैंने भी इसी चमत्कार का अनुभव किया। 25 मई की प्रभात बहुत सुहावनी परन्तु सर्द थी। दोरजी शेरपा हमारी सवेरे की चाय लेकर तम्बू में आया और बोला, ''साहब, कल रात कैम्प-3 में बड़ा जबर्दस्त एवेलांश आया है।'' यह सुनकर मुझे याद आया कि रात में सोते-सोते मैंने गड़गड़ाहट की आवाज सुनी थी। चाय पीना भूल-भालकर मैं बाहर निकल पड़ा। भयंकर दृश्य था-शिविर का कहीं कोई चिन्ह दिखायी नहीं देता था और सब कुछ बर्फ से दब गया था। हम इस कैम्प में रात को ठहरना चाहते थे परन्तु हमने आखिरी क्षण नीचे आने का निश्चय कर लिया था। यद्यपि किसी की मृत्यु नहीं हुई थी परन्तु जीवन के ही समान एक बहुमूल्य वस्तु नष्ट हो गई थी। ये थे आक्सीजन के सिलेण्डर। बर्फ में आक्सीजन के सिलेण्डर दब जाने से शिखर-यात्रा की हमारी आकांक्षा भी मानो बर्फ के नीचे दब गई। कोई चारा न देखकर दल के नेता ने शिखर-यात्रा का प्रयत्न समाप्त घोषित कर दिया। हमने कहा, क्या सिलेण्डरों की खोज की जाए? यह खोज वास्तव में बेकार ही थी, क्योंकि हजारों टन बर्फ के नीचे से उन्हें निकाल पाना असंभव के ही समान था। लेकिन हमने वापस न लौटकर सिलेण्डरों की खोज करना ही निश्चय किया।

दो घण्टे की कड़ी मेहनत के बाद हम कैम्प-३ में पहुंचे। चारों तरफ बर्फ थी और कैम्प का कहीं कोई पता न था। मेरे: साथ चार शेरपा और नेपाली सम्पर्क अधिकारी थे। ये चार शेरपा मेरे साथ अन्तिम शिविर तक जाने वाले थे। कई मिनट सोच-विचार करने के बाद हमने आखिरकार खुदाई करने का निश्चय किया। चारों तरफ सर्द हवाऐ गरज रहीं थीं और हमारे चेहरों से बार-बार टकरा रही थीं लेकिन! हम खुदाई में लगे रहे। काफी खुदाई करने पर भी न तो कोई सिलेण्डर दिखाई दिया और न कोई दूसरी चीज। शाम हो गई और हम थककर चूर हो गए। समय बीत रहा था। परन्तु हम खुदाई करते रहे। हर मिनट एक साल के बराबर लगता था।

हम कब तक खुदाई करते रह सकते थे? मैंने शेरपाओं की ओर एक नजर डाली। वे प्रार्थना कर रहे थे और ऐसा प्रतीत हुआ मानो ईश्वर समीप आ गया '। मैं भी प्रार्थना करने लगा-हे ईश्वर, आपके अतिरिक्त कौन हमारी सहायता कर सकता है! -और हम फिर खोदने में लग गए। अचानक मेरी कुल्हाड़ी आक्सीजन के सिलेण्डर से जा टकराई। प्रार्थना का फल मिल गया था। कुछ और कुल्हाड़ियां मारते ही हमें दो सिलेण्डर और मिल गए। यह महान् प्रसन्नता का क्षण था। हम हंसकर एक-दूसरे को देखने लगे और एक के बाद एक करके हमने सभी सिलेण्डर निकाल लिए। यह एक चमत्कार ही था।

लेकिन एवरेस्ट को चढ़ाई के मार्ग में यह बाधा अन्तिम नहीं थी। मैं जानता था कि और भी अनेक बाधाएं हैं। और मैंने स्वयं को उनके लिए तैयार कर लिया था।

शिविर वापस लौटकर 'मोहन ' ( दल के नेता मोहन सिंह कोहली ) को जब मैंने यह सब बताया तो उसने विश्वास ही नहीं किया। वह कैम्प समाप्त करने की

योजना पर काम कर रहा था। परन्तु हमने उसकी योजना को समाप्त कर दिया और अब यह निश्चित किया गया कि दूसरे दिन हम शिखर की यात्रा परं जाएंगे। २६ मई को सवेरे बोगी, रावत, बी० पी० और मैं अगले बेस कैम्प से शिखर के लिए चले। आसमान में बादल नहीं थे और मौसम अच्छा था। बोगी और रावत एक रस्से में बंधे थे, बी० पी० और मैं दूसरे रस्से में। हमारे साथ सहायता के लिए बारह शेरपा थे। कल हमने जिस जगह खुदाई की थी उसे पार कर के हम ल्होत्से फेस ' पर चढ़ने लगे। बर्फ बहुत सख्त होने के कारण चढ़ाई बहुत मुश्किल थी। हवायें बिना रुके गरज रही थीं। जब हम ल्होत्से की चढाई एक तिहाई पूरी कर गए, बी० पी० ने कहा, ''मेरे सीने में दर्द हो रहा है। '' इसलिए हम थोड़ी देर रुक गए और मैंने बी० पी० को गर्म काफी निकाल कर पीने को दी। लेकिन इससे उसे कोई लाभ नहीं हुआ। उसका दर्द बढ़ता ही जा रहा था, और उसने कहा, मैं आगे नहीं जाऊंगा। मुझे बहुत देर हो गई और जब हम कैम्प-4 पर पहुंचे, सूरज डूब रहा था। मैं बहुत ज्यादा थक गया था। चावल और पनीर खाकर मैं अपने स्लीपिंग बैग में सोने के लिए घुस गया। इस कैम्प से आक्सीजन का इस्तेमाल किया जाना था। मैंने बहुत थोड़े परिमाण में आक्सीजन लेना शुरू किया। सोते समय या जब आप कुछ न कर रहे हों, बहुत कम आक्सीजन की जरूरत होती है। आक्सीजन ' सिलेण्डर पर लगे रेग्युलेटर को घुमाकर कम या ज्यादा आक्सीजन ली जा सकती है। एक मिनट में आधे लीटर से लेकर चार लीटर तक आक्सीजन ली जा सकती है। मैंने फी मिनट आधा लीटर आक्सीजन लेना शुरू किया। अगर फी मिनट चार लीटर लें तो एक सिलेण्डर चार घण्टे चलता है, दो लीटर लें तो आठ घण्टे और एक लीटर लें तो सोलह घण्टे।

सिलेण्डर में कुल आक्सीजन 13-1/2 पौण्ड के लगभग होती है। मैं सारी रात करीब-करीब जागता ही रहा क्यों कि मैं जानता था कि सोते समय अगर मैंने करवट ली तो तम्बू लुढककर तीन हजार फुट नीचे जा गिरेगा। चूंकि कैम्प पर ज्यादा स्थान नहीं था, इसलिए सभी तम्बू एक लाइन में लगाए गए थे। दो आदमियों वाले मेरे तम्बू का आधा भाग नीचे कुछ न होने के कारण हवा में लटक रहा था। कुछ समय बाद मुझे थोड़ी-सी नींद आ ही गई। रात को बर्फ पड़ी और जब मैं जागा तो तम्बू की छत मेरे चेहरे पर आ गिरी थी। मैं एकदम उठकर बैठ गया और मदद के लिए चिल्लाने लगा। लेकिन तेज हवाओं के गर्जन में मेरी आवाज कौन सुन सकता था। मैं तम्बू के भीतर सर्दी से जम गया। दूसरे दिन सवेरे मुझे तम्बू के भीतर से खींचकर बाहर निकाला गया।

कड़ाके की सर्दी थी। हम आक्सीजन लगाए सवा दस बजे निकले। हमारे रुकसैक( झोलों ) में आक्सीजन के दो-दो सिलेण्डर थे और हम फी मिनट एक लीटर के हिसाब से आक्सीजन ले रहे थे। मेरे साथ मूवी और साधारण दोनों ही प्रकार के कैमरे थे। साधारण कैमरे को मैंने गर्दन में इस तरह लटका रखा था कि जब चाहूं फोटो खींच सकूं। चट्टानें काले रंग की थीं और उनपर पीली धारियां पड़ी हुई थीं। वे बहुत सख्त थीं। इस समूचे क्षेत्र को 'यैलो-बैण्ड' कहते हैं। दोपहर बाद हम 'जेनेवा स्पर' पार कर के साउथ कोल पहुंच गए। कोल में कैम्प तक पहुंचने में हमें काफी दूर चलना पड़ा। वहां पर बर्फ नहीं थी। सख्त काली चट्टानें थीं या पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े थे। उनपर चलना बहुत मुश्किल और थकाने वाला था। ठण्डी हवाएं हमारे बदन से टकरा रही थीं।

जब हमें अपने तम्बू दूर से फहराते हुए दिखे तो हमारी जान में जान आयी। शाम होने तक हम वहां पहुंच गए। यहीं स्विस,ब्रिटिश और अमेरिकी अभियानों के पुराने तम्बू भी लगे थे और उन पर तभी का कूड़ा- कचरा भी जमा दिखाई दे रहा था। हम इन तंबुओं को आसानी से पहचान गए। हमारी आक्सीजन खत्म होती आ रही थी, इसलिए मैं इन तंबुओं में घुस गया और रात में उपयोग करने के लिए उनके कुछ आक्सीजन सिलेण्डर निकाल लाया। यहीं फू दोरजी भी हमारे साथ आकर शामिल हो गया क्योंकि शिखर की चढ़ाई के लिए उसका भी चुनाव किया गया था। उसके देर से आने का कारण यह था कि जब उससे कहा

गया कि शिखर पर चढ़ने के लिए उसे भी चुन लिया गया है तो वह खुद अपने जाने के बारे में निश्चय नहीं कर सके। वह बार-बार तम्बू के भीतर जाता और लौटकर कहता, मैं नहीं जाऊंगा। तब उससे कहा जाता कि शिखर पर चढ़ने से उसका बड़ा नाम होगा। वह फिर तम्बू के भीतर जाता और लौटकर 'नहीं' दोहरा देता। दरअसल बात यह थी कि तम्बू के भीतर उसने दो पत्थर रख छोड़े थे जिनमें से एक 'नहीं' का था और एक'हा' का। पत्थरों को जमीन पर डालकर वह देखता कि कौन-सा पत्थर ऊपर है। हमेशा 'नहीं' का पत्थर ऊपर होता और उसे तम्बू से बाहर आकर 'नहीं' कहना पड़ता। पत्थर की 'नहीं' का अर्थ वह यह लेता था कि देवी-देवता उसके चढ़ने के पक्ष में नहीं हैं।

लेकिन अंत में उसने हमारे साथ जाने का निश्चय कर ही लिया। हमने आक्सीजन का अपना स्टाक देखा और पाया कि हमें शिखर तक ले जाने और वापस लाने तक के लिए वह पर्याप्त नहीं है। लेकिन हमें इसकी कतई चिन्ता नहीं थी। हमने टमाटर का गरम सूप पिया, चावल और मुर्गा खाया और तंबुओं में सोने चले गए। तंबुओं के चारों तरफ हवाएं सारी रात गरजती रहीं। कई दफा ऐसा लगा कि हमारे तंबू गुब्बारों की तरह उड़ जाएंगे। यहां मैं यह बता दूं कि

इस अंतिम कैम्प से आगे हमें रात-दिन आक्सीजन का इस्तेमाल करना था।

दूसरे दिन साढ़े सात बजे सुबह हम आखिरी कैम्प के लिए चले।

अब मेरे साथ मेरे रस्से में फू दोरजी बंधा हुआ था। हमारे पीछे रावत, बोगी और सात शेरपा थे। हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते थे, हवाएं तेज होती जाती थीं। एक ओर हमें मकालू शिखर दिखाई पड़ रहा था और दूसरी ओर तिब्बत के ढलान। सख्त बर्फ काटते हुए, हम बड़ी कठिनाई से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। हम बहुत जल्द थक जाते और आराम करने के लिए रुक जाते थे। आगे की प्रगति बहुत ही धीमी थी। बर्फ काटने में बहुत समय लगता था। ९-१५ बजे के लगभग हम १९६२ के भारतीय अभियान दल के शिविर की जगह पर पहुंचे। घण्टे-भर बाद २७,४५० फुट की ऊंचाई पर अमेरिकी शिविर का स्थल मिला। तम्बुओं के बाहरी खोल बिलकुल नष्ट हो गए थे और भीतर के लाल-नीले चिथड़े दिखाई दे रहे थे। मैंने निशानी के तौर पर रखने के लिए ये कुछ रंग-बिरंगे टुकड़े साथ ले लिए। हवा तेज थी लेकिन आसमान साफ था। हमारे नीचे की दुनिया बड़ी विलक्षण दिखाई दे रही थी। साउथ कोल का शिविर बहुत छोटा-सा दिख रहा था। यहां कुछ देर आराम

करने के बाद हमने फिर चढ़ना शुरू कर दिया। ११-३० बजे के लगभग हम इस पहाड़ी के उस हिस्से पर पहुंच गए जहां ढाल जरा कम था। 27930 फुट की ऊंचाई पर यह हमारा अंतिम कैम्प था। चूंकि हम चार लोगों को यहां रात बितानी थी इसलिए पिछले दलों द्वारा लगाया गया एक तम्बू पर्याप्त नहीं था। दूसरा तम्बू लगाने की जगह नहीं थी लेकिन किसी तरह जमीन समतल करके हमने तम्बू लगाया। हवा तूफान की तरह चल रही थी। इससे तम्बू गाड़ने में बहुत कठिनाई हुई। रस्साकसी के खेल की तरह हवा तम्बू को एक ओर खींचती और हम दूसरी ओर खींचते। नये तम्बू में फू दोरजी और मैं सोये। हवा का दबाव और नमी होने के कारण हमारे शरीर का करीब एक प्याला जल हर घण्टे कम हो जाता था। इस कमी को पूरा करने के लिए हमें हर घण्टे चाय, काफी या फलों का रस लेना पड़ता। चाय या काफी बनाने के लिए हमें पहले जमी बर्फ को पिघलाना पड़ता। हमारे पास कुछ उबला हुआ चिकिन भी था, जिसे गर्म करने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती थी।

चिकिन को चबाना भी आसान नहीं था। सर्दी के कारण हमारे जबड़े बहुत धीरे चलते और कुछ टुकड़े खाने में करीब घण्टा भर लग जाता था। मैंने अपने स्लीपिंग

बैग में अपने रेण्डियर के चमड़े से बने हुए बूट, बूटों के खोल, मूवी कैमरा और उसके लेन्स भी इसलिए रख लिए थे कि वे दूसरे दिन उपयोग के लिए गर्म बने रहे। इन्हीं के साथ आक्सीजन के सिलेण्डर भी लेकर सोना बड़ा मुश्किल हो जाता था। सारी रात तम्बुओं के चारों ओर हवाएं चीखती-चिल्लाती रहीं। मैं डरता रहा कि तम्बू कहीं उड़ न जाएं। इस सबके बावजूद मैं थोड़ी-सी नींद लेने में सफल हुआ और 3 बजते ही जाग गया। फू दोरजी रात-भर मजे से खर्राटा लेते हुए सोता रहा था। मैंने तम्बू से बाहर एक नजर डाली। आसमान गहरा नीला और बादलों से हीन था। दूर क्षितिज पर सूरज धीरे-धीरे निकल रहा था। पहाड़ों पर गिरती सूरज की किरणें ऐसी लग रही थीं मानो वे सोने से नहा रहे हों। मैंने तुरंत कैमरा निकाला और तम्बू की इस छोटी-सी खिड़की से बाहर के फोटो खींचने लगा।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

COMMENTS

BLOGGER

विज्ञापन

----
--- विज्ञा. --

---***---

-- विज्ञापन -- ---

|रचनाकार में खोजें_

रचनाकार.ऑर्ग के लाखों पन्नों में सैकड़ों साहित्यकारों की हजारों रचनाओं में से अपनी मनपसंद विधा की रचनाएं ढूंढकर पढ़ें. इसके लिए नीचे दिए गए सर्च बक्से में खोज शब्द भर कर सर्च बटन पर क्लिक करें:
मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें

|कथा-कहानी_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts$s=200

-- विज्ञापन --

|हास्य-व्यंग्य_$type=complex$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|लोककथाएँ_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

|लघुकथाएँ_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|आलेख_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

|काव्य जगत_$type=complex$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|संस्मरण_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

|बच्चों के लिए रचनाएँ_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|विविधा_$type=blogging$au=0$com=0$label=1$count=10$va=1$page=1$src=random-posts

 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम दोहे धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुविचार सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari undefined
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3752,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,325,ईबुक,181,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,234,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2731,कहानी,2040,कहानी संग्रह,224,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,482,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,82,नामवर सिंह,1,निबंध,3,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,325,बाल कलम,22,बाल दिवस,3,बालकथा,47,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,211,लघुकथा,791,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,16,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,302,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1864,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,616,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,668,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,49,साहित्यिक गतिविधियाँ,179,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया - एवरेस्ट की चुनौती : 3
मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया - एवरेस्ट की चुनौती : 3
http://lh5.ggpht.com/-IkWeX6S2p8w/T0oXCNSWEOI/AAAAAAAALRc/hVoWsystnYM/image%25255B2%25255D_thumb_thumb.png?imgmax=800
http://lh5.ggpht.com/-IkWeX6S2p8w/T0oXCNSWEOI/AAAAAAAALRc/hVoWsystnYM/s72-c/image%25255B2%25255D_thumb_thumb.png?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2012/02/3.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2012/02/3.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ