गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

रामवृक्ष सिंह का आलेख : अनुवाद करते समय

अनुवाद करते समय

डॉ. रामवृक्ष सिंह

अनुवाद करते हुए मुझे एक चौथाई से अधिक समय व्यतीत हो चुका है। लेकिन जिस अग्नि-परीक्षा से मैं अब गुजर रहा हूँ, वैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ। अब ऐसा लगता है, जैसे अनुवाद करने को ज्यादा कुछ रहा ही नहीं। अनुवाद का काम अब बेमानी लगता है।

भारत सरकार के कार्यालयों में अमूमन हम अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद करते हैं, क्योंकि यहाँ चपरासी से लेकर प्रधान सचिव तक, ज्यादातर लोगों को अंग्रेजी में काम करना अच्छा लगता है। आसान लगता है कि नहीं, यह तो वे ही जानते होंगे। बताते तो यही हैं कि आसान भी लगता है। इसका सद्परिणाम यह हुआ है कि हम जैसे अनुवाद करनेवाले लोगों की रोजी-रोटी चलती चली जाती है। संविधान में शुरुआत में व्यवस्था की गई थी कि जिन कार्यों के लिए अंग्रेजी का व्यवहार आजादी के पहले होता आया था, उनके लिए संविधान के लागू होने से 15 वर्ष तक अंग्रेजी चलती रहेगी और उसके बाद हिन्दी आ जाएगी। किन्तु 15 वर्ष पूरा होते-होते राजभाषा अधिनियम आ गया और बहुत से कार्यों के लिए हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी अनिवार्य रूप से जारी रखे जाने का कानून बन गया। बस तभी से यह पक्का हो गया कि सरकारी दफ्तरों में अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद अनन्त काल तक होता रहेगा।

लगभग साठ-पैंसठ वर्ष से चल रही इस प्रक्रिया में हिन्दी भाषा का एक नया स्वरूप उभरकर सामने आया है। वह कहानी-उपन्यास वाली हिन्दी नहीं है, वह कविताओं और निबंधों वाली हिन्दी भी नहीं है, बल्कि इन सबसे अलग- वह राजभाषा हिन्दी है। उसमें ढेरों पारिभाषिक शब्द हैं। संविधान के अनुच्छेद 351 की भावना के अनुरूप उसमें ढेरों संस्कृत शब्द हैं। ऐसा अनायास नहीं है। जो लोग हिन्दी में अनुवाद कर रहे हैं उन्हें यह बताया सिखाया गया है कि संस्कृत की लगभग साढ़े पाँच सौ मूल धातुओं में लगभग 20-22 उपसर्ग और लगभग 60-65 प्रत्ययों को अलग-अलग पद्धतियों से जोड़कर लाखों की संख्या में शब्द बनाए जा सकते हैं। अपनी इस रूप-विधायिनी शक्ति के कारण हमारी राजभाषा में संस्कृत से निष्पन्न शब्दों की भरमार है।

चूंकि राजभाषा हिन्दी का अपना कोई स्वतंत्रतः उद्भूत रूप नहीं है और सरकारी दफ्तरों में जो भी काम हिन्दी में हुआ है, वह प्रायः सारा का सारा ही अनूदित है, इसलिए उस पर अंग्रेजी की छाया साफ-साफ दिखाई देती है। इसके पीछे भाषा-शास्त्रीय दृष्टि यह है कि अनुवादक से अपेक्षा रहती आई है कि वह कथ्य ही नहीं, बल्कि शैली का भी अनुवाद करे। उसने छात्र-जीवन में, अनुवादक के रूप में अपने प्रशिक्षण-परिवीक्षा काल में सीखा है कि अनुवाद से अभिप्रेत है एक भाषा में कही गई बात को बिना कुछ जोड़े या घटाए, दूसरी भाषा में अंतरित करना। इस प्रकार कथ्य ही नहीं, शैली को भी दूसरी भाषा में अंतरित करना भाषा-शास्त्रीय दृष्टि से अनुवादक के पेशे की मजबूरी रही है।

चूंकि अंग्रेजी के वाक्य बहुत बड़े-बड़े और संगुंफित शैली के होते हैं, इसलिए बहुत से अनुवादकों ने उसी शैली को अपनाया। इसका नतीजा यह हुआ कि अनूदित हिन्दी बहुत ही बोझिल और कई बार सरल रूप में अर्थ-वहन में अक्षम होती चली गई। इस समस्या को समझते हुए कुछ लोगों ने कोशिश की कि अंग्रेजी से हिन्दी में अनूदित सामग्री को हिन्दी की मूल शैली के अनुरूप छोटे-छोटे वाक्यों में व्यक्त किया जाए। यह बहुत सार्थक कोशिश थी और इसका नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजी में कही गई बात हिन्दी में अनुवाद होने पर बिलकुल सहज और मूल रूप से हिन्दी में कही गई बात लगने लगी।

लेकिन कार्यालयीन हिन्दी के सिर पर कठिनता का एक नया ठीकरा फोड़ दिया गया। हमेशा की तरह इस बार भी समस्या की गहराई में न जाकर बहुत सतही तौर पर यह कहा और प्रचारित किया गया कि अंग्रेजी शब्दों को संस्कृत-निष्ठ हिन्दी में अनुवाद करने से लक्ष्य भाषा हिन्दी में दुरूहता आ रही है। समस्या को पकड़ लेने के बाद उसका इलाज भी सुझाया गया। हिन्दी की कठिनाई दूर करके उसे सरल बनाने के लिए उसमें अंग्रेजी के शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करें।

हो सकता है इससे प्रकटतया हिन्दी भाषा आसान लगने लगे। लेकिन कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनका जवाब हमें समवेत रूप से ढूंढ़ना चाहिए। माना कि हमारे भाषिक परिवेश में अग्रेजी से दाखिल होनेवाली संकल्पनाओं और शब्दों की भरमार है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हम अपनी भाषा के शब्दों में उसी बात को कह नहीं सकते या अपने स्वदेशी स्रोतों से उसके समानांतर शब्द प्रस्तुत नहीं कर सकते।

इन्सान की फितरत है आसानी की और भागने की। और आसान, और आसान, और आसान। आप किसी अभिव्यक्ति को कितना आसान बना सकते हैं? हमने कार्यालयीन हिन्दी को आसान बनाने के लिए उसमें आम-फहम में प्रचलित प्रतिशब्दों का इस्तेमाल शुरू किया। इस पर भी हमें तसल्ली नहीं हो रही तो अब हम चाहते हैं कि जो तत्सम शब्द प्रचलन में आ गए हैं, उनको भी प्रयोग करना बन्द कर दें और उनकी जगह अंग्रेजी के शब्द ले लें। इसलिए ले लें क्योंकि हमारे हुक्मरान हिन्दी में कुछ भी सीखना नहीं चाहते और अंग्रेजी की चाकरी की उनको लत लग चुकी है। अंग्रेजी के वे शब्द कितने हिन्दी-भाषियों को समझ आते हैं, यह भी लाख टके का सवाल है।

क्या किसी ने सोचा है कि इसका असर हमारी भाषाओं पर क्या होगा ? दुनिया के हर कार्य-व्यापार में हम नवोन्मेषिता, अनुसंधान और विकास की बात करते हैं। रचनात्मकता और नवोन्मेषिता के दम पर ही आज मानवीय सभ्यता और संस्कृति आदिम काल से इतनी दूर तक चल कर आई है। यदि हम दूसरी भाषा के ज्यादा से ज्यादा शब्दों को अपनी भाषा में लेते जाएँगे तो क्या ऐसा नहीं होगा कि हमारे खुद के शब्द-स्रोत सूख जाएँ? पाठकों को याद होगा, आज से तीस-चालीस साल पहले तक गाँवों-कस्बों में कुओं से पानी खींचा जाता था। फिर पंप सेट और चांपा कलें आईं। कुओं का इस्तेमाल बन्द हो गया। नतीजा सामने है- कुएं पट गए।

भाषा की सबसे सार्थक इकाई है शब्द। इस नाते वह सार्थक संवाद की आत्मा है। यदि हम नई संकल्पनाओं के लिए अपने स्रोतों से नए शब्द नहीं बनाएँगे और जो लोग दुस्साहस करके नए शब्द प्रचलन में लाने का प्रयास कर रहे हैं, उनको हिकारत की नज़र से देखेंगे अथवा उन्हें हतोत्साहित करेंगे तो प्रकारान्तर से हम अपनी भाषा की आत्मा को मार रहे होंगे। भाषा बहता नीर है, यह सच है। किन्तु वह अपने आस-पास के कूलों, द्वीपों में ही अपनी अस्मिता तलाशती है। कोई वोल्गा, मिसीसिपी और टेम्स से लोटा दो लोटा पानी लाकर गंगा में डाल दे तो भी गंगा का जीवन गंगोत्री और उससे ऊपर से बहकर आती धाराओं के जल से ही चिरस्थायी रहेगा। लेकिन यदि हम वोल्गा और टेम्स से एक नहर काटकर हर की पौड़ी तक ले आएँ और ऊपर से बहकर आते गंगा जल को रोक दें तो वोल्गा-टेम्स के पानी से बनी हुई जो नई जलधारा होगी उसे हम गंगा कैसे कहेंगे?

सरकार का एक आयोग है वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग। क्या अब यह आयोग बंद हो जाएगा? कायदे से तो इसे बंद हो जाना चाहिए, क्योंकि अब तो हमने फैसला कर लिया है कि अंग्रेजी के ज्यादा से ज्यादा शब्द इस्तेमाल करेंगे। इसलिए उनके स्थान पर नए हिन्दी शब्द बनाने-सुझाने की जरूरत ही अब कहाँ रही?

सीधी-सी बात यह है कि संभव होने पर भी भारतीय स्रोतों से आगत शब्दों का प्रयोग न करके और शक्य होकर भी संस्कृत धातुओं से प्रतिशब्द न बनाकर हम हिन्दी और दीगर भारतीय भाषाओं के विकास, उनमें नवोन्मेष और सृजन की संभावनाओं को कुन्द कर रहे होंगे और सबसे शोचनीय स्थिति तो यह होगी कि अपने स्रोतों से शब्द न लेकर हम पहले से प्रचलन में आ चुके भारतीय शब्दों को भी अंग्रेजी प्रतिशब्दों से प्रतिस्थापित कर रहे होंगे। इसे कोढ़ में खाज कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

1 blogger-facebook:

  1. हमारी राष्‍ट्रभाषा और राजभाषा के विकास एवं नवोन्‍मेष्‍ा के लिए आपने गहरी चिंता जताई है । आज हिन्‍दी की वकालत करने वाले बहुत कम लोग रह गये हैं । हम अपनी जडों से दूर होते जा रहे हैं । आशा है आपके विचारों से राष्‍ट्रप्रेमी लोग कुछ सोचेंगे ।

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