मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

महेन्द्र प्रताप पाण्डेय की रपट : वनों की आग है जैव विविधता के लिए खतरा

 

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द्वाराहाट दिनांक 12.02.2012 को राजकीय पौलीटैक्‍निक द्वाराहाट के राष्‍ट्रीय सेवा योजना के सात दिवसीय विशेष शिविर जो कि राजकीय प्राथमिक विद्यालय मल्‍ली मिरई(द्वाराहाट)में जारी है, में राजकीय इण्‍टर कॉलेज द्वाराहाट अल्‍मोड़ा उत्‍तराखण्‍ड के मौसम वेधशाला प्रभारी एवं कवि महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय नन्‍द ने ”बदलते मौसम का जैव विविधता पर प्रभाव“ विषय पर अपना व्‍याख्‍यान प्रस्‍तुत किया। उन्‍होंने विगत वर्षों में हुए मौसम परिवर्तन पर विभिन्‍न आंकड़े शिविरार्थियों के समक्ष रखें तथा बदलाव पर विस्‍तृत चर्चा की। कवि नन्‍द ने बताया कि ग्‍लोबल वार्मिंग की परिकल्‍पना अब बदल रही है । अब ग्‍लेाबल फ्रीजिंग की स्‍थिति की तरफ हम जा सकते हैं जो ग्‍लोबल वार्मिंग का ही एक परिणाम है। वर्ष 2009 में जहां द्वाराहाट का अधिकतम तापमान 34 डिग्री सेल्‍सियस पहुंचा वहीं 2010 में 33 डिग्री सेल्‍सियस और 2011 मे 31.6 डिग्री सेल्‍सियस पर ही रुक गया । हिमालयी क्षेत्र के ग्‍लेशियरों के पिघलने की रफ्तार भी कम हो रही है। उन्‍होंने पर्यावरण संरक्षण पर स्‍वरचित कवितायें भी प्रस्‍तुत की। एक अन्‍य विषय पर चर्चा के तहत कन्‍या भ्रूण हत्‍या पर कविता काफी रोचक रही।

इको क्‍लब प्रभारी जमुना प्रसाद तिवारी द्वारा ”वनों की आग का जैव विविधता पर प्रभाव“ विषय पर विस्‍तृत व्‍याख्‍यान प्रस्‍तुत किया गया। शिविरार्थियों को सम्‍बोधित करते हुए श्री तिवारी ने बताया कि उत्‍तराखण्‍ड में लगभग 67 प्रतिशत वन हैं। वन हमारे राष्‍ट्र की प्राकृतिक धरोहर हैं। विना वनों के मानव जीवन संभव नहीं है। जैव विविधता को बढ़ती जनसंख्‍या, शिकार, वन विनाश, खनन, सूखा, बाढ, एवं वनों की आग से सर्वाधिक खतरा है। वनों की आग से जहॉ जंगलों का विनाश हो रहा है वहीं महत्‍वपूर्ण जन्‍तु आवास भी समाप्‍त हो रहे हैं। प्रतिवर्ष वनों की आग से अपार एवं महत्‍वपूर्ण वन सम्‍पदा नष्‍ट हो रही है। विगत वर्षों में हजारों हेक्‍टयर वन दावानल की भेंट चढ़ चुके है। आज वनों की आग को रोकने के लिए आम आदमी को जागरूक करने की आवश्‍यकता है शिविरार्थी अपने अपने गांवों में तथा अन्‍य स्‍थानों पर लोगों को जागरूक करने का प्रयास करें तो समस्‍या का समाधान हो सकता है। वनों की आग प्रायः मनुष्‍य की लापरवाही से लग जाती है जैसे चलते चलते बीड़ी आदि के टुकड़े फेंक देना,जंगल में मशाल आदि का प्रयोग करना आदि।

उन्‍होंने बताया कि उत्‍तराखण्‍ड की जैव विविधता सम्पन्‍न तथा समृद्ध है यहां पर छःराष्‍ट्रीय उद्यान, छःवन्‍य जन्‍तु विहार, तथा एक जैव मण्‍डल आरक्ष है। राज्‍य में दुर्लभ वन्‍य प्राणी तथा वनस्‍पतियॉ पाई जाती हैं। इन सभी को वनों की आग से व्‍यापक खतरा है। अतःजागरूकता का होना अतयन्‍त आवश्‍यक है। उन्‍होंने जैव विविधता के विभिन्‍न स्‍तरों एवं आयामों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जैव विविधता संरक्षण आज के समय की महत्‍वपूर्ण आवश्‍यकता है। चिपको तथा मैती जैसे आन्‍दोलनों वाली इस धरती में जैव विविधता संरक्षण की विशेष पहल होनी चाहिए, जिससे राज्‍य की अर्थ व्‍यवस्‍था मजबूत होगी। पृथ्‍वी केवल मनुष्‍य की नहीं है वल्‍कि अन्‍य जीवधारियों की भी है हमारी सोच मानव केन्‍द्रित न होकर पारित्रन्‍त्र केन्‍द्रित होनी चाहिए। तभी हम आने वाली पीढी को सुरक्षित जीवन दे सकते है। शिविरार्थियों को जैव विविधता संरक्षण से सम्‍बन्‍धित साहित्‍य भी श्री तिवारी द्वारा वितरित किया गया।

गोष्‍ठी को कार्यक्रम अधिकारी अनिल कुमार , ओम शंकर सिंह, तथा जी0एस0राणा ने भी सम्‍बोधित किया। इस अवसर पर समस्‍त शिविरार्थी,शिक्षक आदि उपस्‍थित थे। संचालन कार्यक्रम अधिकारी अनिल कुमार ने किया।

शिविरार्थियों के साथ संदर्भदाता कवि नंद एवं जे0 पी0 तिवारी

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