मधुसूदन आनंद की कहानी : मेंढक

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  मेरा छोटा भाई जल की फील्ड में खेलता हुआ बड़े आराम से फुदकते हुए मेंढक को पकड़ लेता था और फिर उसे अपनी हथेली पर रखकर हमें दिखाया करता था। ए...

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मेरा छोटा भाई जल की फील्ड में खेलता हुआ बड़े आराम से फुदकते हुए मेंढक को पकड़ लेता था और फिर उसे अपनी हथेली पर रखकर हमें दिखाया करता था। एक-दो बार उसने छोटे-मोटे सांप भी पकड़े। हमें डर लगता था.. मगर वह हंसता रहता था। हमने उसकी शिकायत अमा और पापा से भी की। उसे डांट पड़ी तो उसने सांप पकड़ना तो छोड़ दिया मगर मेंढक वह अक्सर पकड़ लेता था। सभी मेंढक एक-से लगते थे। हरी घास में कभी छिपे तो कभी बाहर फुदकते मेंढक बड़े भले लगते थे मगर भाई जब उन्हें अपनी हथेली पर बैठाता और भींचे रहता तो वे बड़े निरीह लगते थे। मैं उन्हें छोड़ देने को कहता पर भाई नहीं मानता और भाग जाता। मैं उसके पीछे दौड़ता। सिलसिला चलता रहता। मुझसे कभी एक तितली तक नहीं पकड़ी गई। तितलियों को पकड़कर अपनी किताबों में रखना मुझे प्रिय था मगर वे सभी तितलियां भाई ने पकड़ी थी। किताबों और कापियों के पन्नों के बीच वे सूचमुच बहुत सुंदर लगती थी। अमा जीव हत्या करने के लिए डांटती थीं। 'कैसी सुंदर रंग-बिरंगी तितली थी मुन्ना, तुमने उसे मार दिया. '' वे झिड़कतीं। “मुन्ना ये तो बाग-बागीचों में उड़ती हुई ही अच्छी लगती हैं, इन्हें मत पकड़ा कर. “ वे कहतीं। मैं छोटे भाई की तरफ इशारा करता पर अम्मा दोनों को ही कुछ कृत्रिम क्रोध से डांटतीं। पापा कुछ न कहते। कभी उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसलिए संभवत: कक्षा नौ तक किताबों में तितलियां रखने का क्रम जारी रहा। छोटा भाई भी मेंढक पकड़ने से कभी बाज नहीं आया। अब तो खैर स्कूल-कॉलेजों में मेंढक या अन्य जीव-जंतुओं के डिसेक्शन पर रोक लग चुकी है, मगर छोटे भाई ने बायोलोजी की स्कूल की अपनी प्रयोगशालाओं में जिन मेंढकों की चीर-फाड़ की. वे सभी उसने और उसके सहपाठियों ने ही पकड़े थे। भाई गर्व से यह बात बताता भी था।

इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद मैं बीए की पढ़ाई करने के लिए मेरठ चला गया। पापा इंटर कॉलेज में हिंदी पढाते थे। हिंदी के प्राध्यापक को टयुशन पढाने का काम नहीं मिलता। सो. पापा ने अपने कॉलेज के हेड क्तर्क के साथ मिलकर जिले के नल-कॉलेजों को साइंस का सामान सप्लाई करने का पार्टटाइम बिजनेस कर लिया। हेड क्लर्क का मकान हमारे मकान से बड़ा था। उसकी बैठक में फर्म का ऑफिस बनाया गया। वहां शीशे की अलमारियों में कांच के सीलबंद गैस-जारों में सांपों. बिफ्लुाएं, मेढकों.. गोहों, चमगादड़ों के स्पेसिमेन. माइक्रोस्कोप, डिसेक्शन बॉक्स.. बीकर. फ्लास्क. टेस्ट-ट्यूब, केमिकल्स आदि भांति- भांति की वस्तुएं सजी रहती थीं, जो प्रयोगशालाओं के लिए सप्लाई की जाती थीं। मैंने इंटर तक फिजिक्स और केमिष्ट्री तो पढ़ी थी. लेकिन बायोलोजी में मेरी कभी दिलचस्पी नहीं जगी। मुझे जीव-जंतुओं को चीरने- फाड़ने से तो नफरत थी ही थी. कभी किसी चिड़िया, कबूतर, तोते तक को छूने से मुझे डर लगता था। जैसे फूल सबसे मादा पौधों पर लगे हुए ही सुंदर लगते हैं, उसी तरह पशु-पक्षी भी अपनी-अपनी प्राकृतिक जगहों पर मुझे अच्छे लगते हैं। अलबत्ता किसी गाय, बैल. घोड़े को छूना और सहलाना मुझे हमेशा प्रिय रहा। हाथी भी मुझे सुंदर लगता है मगर कुत्ते- बिल्ली मुझे अच्छे नहीं लगते। सच कहूं तो उनसे डर लगता है। छोटा भाई किसी से नहीं डरता। वह अकेला एक लाठी लिये दसियों बंदरों के बीच चला जाता था और सूखते हुए कपड़े उनके दांतों के बीच से खींच लाता था। गली-मुहल्ले के कुत्तों के नन्हे-नन्हे पिल्लों को वह बचपन में चोरी से घर ले आता था। फिर मुझे वे दिखाता था. इस शर्त पर कि अम्मा- पापा को भनक न लगे पर रात-बिरात वे पिल्ले रोते, आवाजें करते तो सबको पता चल जाता। अगले दिन सुबह ही उन्हें नदी के आसपास छोड़कर आना पड़ता। वे पिल्ले बहुत निरीह लेकिन सुंदर लगते। वे अपने नन्हे-नन्हे पांवों से भागते हमारे पीछे वापस चले आते। भाई उन्हें गोदी में उठा लेता और नदी के पार छोड़ आता. जहां खेत और बाग थे। तब उन्हें इस तरह छोड़ने पर मन में कुछ होने लगता। कुछ अच्छा नहीं लगता पर घर पहुंच कर मैं सामान्य हो जाता। छोटा भाई एक बार एक नन्हे खरगोश को भी ले आया था। उसके घर में होने का भेद तब खुला जब भाई अपने छोटे-छोटे हाथों में ताजा घास लिये पकड़ा गया। उसी क्षण हमें खरगोश को नदी पार छोड़कर आना पड़ा। वह पिल्लों की तरह हमारे पीछे नहीं आया. बल्कि गोदी से उतरते हुए उसने तेजी से इधर-उधर गरदन घुमाई और फिर तीर की तरह भाग निकला. जैसे उसे पता हो कि कहां जाना है। हम दोनों भाई हंसने लगे। नदी पार करते ही हमने उसे भुला दिया।

नदी से कुछ दूर चढ़ाई पर हमारा स्कूल था, जहां हम घंटों खेलते थे। खुल में कई पेड़ थे, जिन पर हम चढ़ जाते थे। एक तरफ फूलों का उद्यान था, जिसे स्कूल का चपरासी संभालता था। कुछ दूर झाड़ियां थीं। उनमें कांटे उगते थे। वे कांटे हम अपने सहपाठियों की शर्ट और निकर पर लगा दिया करते थे और फिर हंसते थे। झाड़ियों के पार कुछ गड्ढे पानी से भरे रहते थे। कई बार बरसात में नदी गड्ढों को छूकर निकल जाती थी। वहीं आसपास हमारे स्कूल के नए भवन का मलबा आदि भी पड़ा रहता था। स्कूल की फील्ड बहुत बड़ी तो नहीं थी, मगर वहां हम क्रिकेट, कबड्डी, फुटबॉल, बैडमिंटन आदि खेलते थे और अपनी साइकिल चलाते थे। फील्ड के कुछ हिस्सों में घास थी, जिसकी गंध हम अपने फेफड़ों में भर लिया करते थे। अब तो खैर उस गंध की स्मृतियां ही रह गई हैं, ठीक वैसे ही जैसे खुल की अपनी क्याओं, प्रयोगशालाओं, सुबह की सामूहिक प्रार्थनाओं और लाइब्रेरी की गंध की स्मृतियां हैं। उसी फील्ड और उद्यान से भरे हुए गड्ढों और कंटीली झाड़ियों के पास की गीली-सी जमीन से छोटा भाई मेंढक पकड़ लाता था और हमें ऐसे दिखाता था मानो उसके हाथ कोई खजाना लग गया हो। कई बार हम दोनों भाई शाम के सुटपुटे अंधेरे में वहां गए हैं और वहां हमने मेंढकों की टरटराहटें सुनी हैं। एकदम से मेंढकों की आवाजें आने लगती और रुक जातीं। फिर रह-रहकर आने लगतीं। वे आवाजें हममें कौतुहल रचती। बादल गरजने लगते। आकाश में बिजली तड़कती तो पूरा हरा-भरा दृश्य रोशनी में नहा उठता। आंखें खुश हो जातीं मगर कलेजा दहल-सा जाता। पानी गिरने लगता। हम भीग कर भागते। अचानक पृष्ठभूमि में मेंढकों की आवाजें बारिश की आवाज में दबने लगती थीं। छोटा भाई घर आकर अपनी निकर की जेब से मेंढक निकालकर अम्मा की हथेली पर रख देता। अम्मा राम- राम करती हुई और उसे डांटते हुए अपना हाथ झटक देतीं। नन्हा-सा मेंढक आंगन में फुदकता हुआ गायब हो जाता। अम्मा फिर जीवों को न सताने का उपदेश देने लगतीं। छोटा भाई हंसता रहता। मैं कुछ सोचता। कुछ सोचा न जाता और घर में विलीन होता हुआ-सा हो जाता। लेकिन बाहर के ऐसे ही दृश्य अटके रह जाते।

मेरठ कॉलेज, मेरठ में आए दिन छुट्टी हो जाती थी। वहां खाना- पीना. सोना, सपने देखना, दोस्तों के साथ घूमना और नई-नई पिक्चरें देखना कुछ ज्यादा ही चलता रहा। साइकिल पास थी और दूरी तब दूरी नहीं लगती थी। हमारे छोटे-से क़स्बे की तुलना में मेरठ काफी बड़ा शहर था। तब शाम के समय बेगम पुल पर काफी चहलपहल रहती थी। वहीं सबसे पहले टेलीविजन देखा। दुकानदार एक टीवी सेट चालू कर देता और बाहर लोगों की भीड़ टीवी पर आ रहे दृश्यों की एक झलक पाने को बेचैन रहती। फिल्मी कार्यक्रम आकर्षित करते। काली-सफेद फिल्म या रील का भी अपना आकर्षण था। घर की याद उतनी नहीं आती थी। घर के और भाई के सपने आते थे। पापा की मोती जड़े शब्दों वाली चिट्ठी आठ-दस दिन में आती थी। उसे बार-बार पढ़ता था। पापा छोटी-छोटी घटनाओं का भी विस्तृत हाल लिखते थे। लगता था जैसे आंखों देखा हाल सुना रहे हों। अकेला हो जाने के बाद छोटा भाई कुछ अंतर्मुखी होने लगा था। घर का और बाजार का सारा काम करता था। पढ़ाई के प्रति भी: गंभीर हो गया था। लाइब्रेरी से किताबें लाकर पढ़ने लगा था, अखबार भी। रेडियो पर गाने सुनता था, तो समाचार और सामयिकी भी। मगर पिता के पार्ट टाइम बिजनेस में कोई भी सहयोग देने को वह तैयार न होता। पिता परेशान नहीं होते मगर अम्मा को यह खलता। घर का खर्च भी बढ़ गया था। हर महीने पापा को एक सौ रुपये तो मुझे ही भेजने पड़ते थे। फिर पापा के कॉलेज के हेड क्लर्क महोदय ने बिजनेस बढ़ता देख नौकरी भी छोड़ दी थी। वे अब अपना पूरा समय फर्म में देने लगे। हर रोज जिले के स्कूल-कॉलेजों में जाते और साइंस के सामान का ऑर्डर प्राप्त करने की कोशिश करते। उनकी तनखाह फर्म से ही निकलनी शुरू हो गई। बदले में पापा को सारे हिसाब-किताब को रखने का जिम्मा मिला और इसके लिए वे भी फर्म से प्रति माह १०० रुपये लेने लगे। साल भर में सारे खर्चे निकालकर जो लाभ .होता, वह उन्हें कभी नहीं मिला। लाभ को बिजनेस में ही लगाया जाने लगा। दिल्ली, अंबाला, आगरा और बनारस आदि से साइंस का सामान आता था। जब तक मैं मेरठ पढ़ने नहीं आया था, मैं बिल्टी छुड़ाने या बैंक में चेक जमा करने जैसे छोटे-मोटे कामों में पापा का हाथ बंटा दिया करता था। कभी पापा, तो कभी उनके पार्टनर बाहर से मंगाए गए सामान की पेटियां खोलते। बहुत अच्छी तरह पैक की गई पेटियों में कभी वर्नियर कैलिपर्स, कभी आप्टिकल लेंस, ग्लास ग्लोब, कनक्लेव और कॉनवेक्स लेंस और मिरर, स्क्रू गेज, स्टॉप वाच या ट्यूनिंग फॉर्क निकलते तो कभी भारत, एशिया, यूरोप और विश्व के मानचित्र। कभी कनस्तरों में फोर्मलीन में पड़े हुए मेंढक निकलते। कई मेंढक सड़ जाते। उन्हें फेंकना पड़ता। फर्म में अजब गंध भर जाती। मुझे पेटियां खोलना तब अच्छा लगता था, पर मेंढकों का कनस्तर खोलने पर मन कुछ दुखी हो जाता था।

मेरठ में बेगम पुल पर एक टीवी कार्यक्रम में मैंने जानवरों पर अत्याचार के कुछ दृश्य देखे थे, जिन्हें देखकर मैं हिल गया था। मैंने देखा था कि किस तरह शहद की मक्खियों के छत्ते से शहद निकालने के लिए आग और धुएं से मक्खियों को जलाया और भगाया गया। एक दृश्य में छत्ता टूटने के बाद तमाम मक्खियां एक जगह बैठी हुई थीं, मानो मौन विलाप कर रही हों। बड़ा कारुणिक दृश्य था। एक अन्य दृश्य में जानवरों को बूचड़खाने में मारा जा रहा था, जबकि दूसरे दृश्य में किसी साफ-सुथरे विदेशी बूचड़खाने की फुटेज थी, जिसमें मांस निकालने की वैज्ञानिक पद्धति का बखान था। जल्दी ही दृश्य खत्म हो गया और 'चित्रहार' जैसा कोई फिल्मी गीतों का कार्यक्रम शुरू हुआ तो राहत मिली थी। लेकिन क्षणिक ही। दीवार पर बैठी मौन विलाप करती मधुमक्खियों वाला दृश्य रह-रहकर हाट करता था। शायद एक या दो रोज बाद छात्रों के दो गुटों के बीच हुई भीषण छुरेबाजी के कारण कॉलेज कुछ दिनों के लिए बंद हो गया और होस्टल भी खाली करा लिये गए। चुनांचे मैं अपने घर नजीबाबाद लौट आया। मेरे घर में यह अद्भुत गुण है कि यह मुझे झट अपने में विलीन कर लेता है। तब भी था और आज भी है। मुझे लगता है कि जब तक मेरे मां-बाप इस घर में रहते हैं, इस घर में यह गुण बना रहेगा। छोटा भाई इंटर में बायोलोजी पढ़ रहा था। शायद दो-तीन रोज बाद पिता ने मुझे फर्म में बुलाया। उनके पार्टनर भी साथ थे। बोले. '' मुन्ना, कल सुबह तुम्हें सहारनपुर जाना है। अगले हफ्ते हमें एक कॉलेज को पचास मेंढक सप्लाई करने हैं। आगरा से माल नहीं आ रहा। वहां श्यौराज सिंह नामक एक मास्टर साहब रहते हैं, जो पास के ही किसी क़स्बे में पढ़ाने जाते हैं। उनके पिता की रेलवे स्टेशन के समीप ही स्टेशनरी की दुकान है। मास्टर साहब मेंढक वगैरह सप्लाई करने

का पार्ट टाइम काम करते हैं। चार रुपये प्रति मेंढक के हिसाब से वे २०० रुपये लेंगे। मेंढक कनस्तर या कैन में फाँर्मलीन में पड़े नहीं मिलेंगे.. वे तो आ ही नहीं रहे। वे मेंढक पकड़वाकर देते हैं। उन्हें क्तोरोफोर्म सुंघाकर डिबे में डाल दिया जाता है। छोटा-सा डिव्या वे टाट की बोरी आदि में पैक करके देंगे। कल मिल जाए तो कल, नहीं तो परसों मेंढक लेकर तुम. लौट आना। कई गाड़ियां चलती हैं। पर कोशिश करना सहारनपुर से मुरादाबाद को जाने वाली रात वाली गाड़ी मिले., जो सुबह ६ बजे ही नजीबाबाद पहुंच जाती है। '' मुझे यह लगा ही नहीं कि मैं मेंढक लेने जा रहा हूं। मुझे तो खुशी हुई कि मुझे एक नया शहर देखने को मिलेगा। भाई यह काम करना चाहता था। मैंने मां से कहा, ंं '' अम्मा.. कल सुबह मैं सहारनपुर जाऊंगा। .' ?ं ' 'क्यों मुन्ना?'' मां ने अचरज से पूछा। '' मेंढक लेने .. '' मैंने बताया

'' मेंढक लेने? पर क्यों?'' मां अब चिंतित लगी। भाई अचरज में था।

'' आगरा से मेंढक नहीं आ रहे हैं सो इस बार सहारनपुर से मेंढक लाने हैं। पापा भेज रहे हैं,'' मैंने बताया।

नहीं तू नहीं जाएगा। या तो वे खुद जाएं या अपने पार्टनर भैयो जी को भेजें.'' मां ने कहा।

'' मुझे कहा है '' मैंने कहा। ''

'' कहा होगा,'' मां ने लापरवाही से कहा।

मैं बुझने लगा। अच्छा- खासा सहारनपुर जाने का मौका मिला है और अम्मा जाने नहीं दे रही है। भाई को भेजने का तो सवाल ही नहीं था। वह रूठ कर चला गया था।

''मुझे कोई अपने हाथ से उठाकर या जेबों में भरकर तो मेंढक नहीं लाने हैं, जो तुम डर रही हो,'' मैंने कहा

''जानती हूं '' वह बोली। ''

' तो? '' मैंने कहा।

'बस मुझे इस जीव हत्या के काम में तुझे नहीं भेजना। इन्हें भी कितनी बार कह चुकी हूं कि यह काम हम ब्राह्मणों को शोभा नहीं देता। और हजार चीजें हैं, दुनिया में बेचने के लिए। सारा मोहल्ला कहता है कि शर्मा जी ब्राह्मण होकर कसाई का काम कर रहे हैं। ज्यादा कहती हूं तो कहते हैं कि मैं मेंढक की टांगें काट कर तो उन्हें खाने के लिए नहीं बेच रहा हूं। ये तो विद्यार्थियों के प्रयोगों के लिए ही हैं। इन्हें चीर-फाड़कर विद्यार्थी इनका शरीर विज्ञान समझते हैं। ये ही विद्यार्थी आगे चलकर डाँक्टर की पढ़ाई करेंगे और समाज की सेवा करेंगे'' मां ने एक साथ गुस्से में कहा। फिर वह छोटे भाई के पीछे चली गई।

पापा घर आ गए थे और मां को क्रोध में समझा रहे थे। उन्होंने मां को बताया कि स्कूलों को हमें एक साथ काफी सामान देना पड़ता है। अब हम कह दें कि हम गैस जार में सीलबंद सांप. बिच्छु चमगादड़ और मेंढक तो बेचते हैं, मगर डिसेक्शन के लिए खुले मेंढक नहीं देंगे तो खुल-कॉलेज वाले मुंह बिचकाने लगते हैं। साख के लिए जरूरी होता है कि साइंस का जो भी सामान वे खरीदना चाहें, हम सब सप्लाई करें। एक बार उन्हें पता चल गया कि ये फर्में भी सामान बेचती हैं तो वे फिर उसे ही ऑर्डर देने लगेंगे, जो ठीक समय और मुनासिब कीमत पर सप्लाई कर दे। कॉलेज वाले हमारे रिश्तेदार तो हैं नहीं। मुझे इन दिनों अपने कॉलेज में ज्यादा काम रहता है। फिर मुन्ना की छुट्टियां हैं, इसलिए मुन्ना को भेज रहा हूं। उसे जाने दो।''

मां मानी तो नहीं पर अगली सुबह मैं सहारनपुर जाने के लिए घर से निकल पड़ा। मां के साथ सहानुभूति और एकजुटता दिखाता हुआ। छोटे भाई के चेहरे पर कुछ टेढ़ी- सी मगर आत्मीय मुस्कान थी। पापा रिक्शे तक बैठाने आए थे। कोई आधा-पौन घंटा बाद गाड़ी आने वाली थी। मैं पहली बार तिजारत से जुड़ रहा था। वह भी मेंढकों की। स्टेशन पर ज्यादा भीड़ नहीं थी। मैंने सोचा कि पहले सहारनपुर वाली गाड़ी का पता कर लिया जाए कि कहीं लेट तो नहीं। गाड़ी कोई बीस मिनट लेट चल रही थी। मैं टिकट की लाइन में लग गया। मुझसे आगे मेरा एक पुराना सहपाठी रहा, भूरा खड़ा था। उसका नाम तो संतोष था मगर वह पैदाइशी भूरा था। हम उसके पीछे उसे भूरा ही कहते थे। हमारी तरह बिलकुल सामान्य था. लेकिन चमड़ी का रंग लालिमा लिये हुए सफेद। बाल भी सफेद। भौहों के भी। इसलिए सभी उसे भूरा कहते थे। उसने इंटरमीडिएट करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। अब वह अपने पिता की कपड़े की दुकान पर बैठने लगा था। वह भी सहारनपुर जा रहा था, कपड़ा खरीदने। उससे मिलकर मैं खुश हो गया।

प्लेटफॉर्म पर गाड़ी अभी नहीं आई थी। मगर पहले की तुलना में यात्री कुछ बढ़ गए थे। कुली भी दिखाई देने लगे थे। खाने-पीने का सामान बेचने वाले.. चाय और दूध बेचने वाले अखबार पत्रिकाएं और किताबें बेचने वाले भी प्लेटफॉर्म पर सक्रिय दिखने लगे थे। बस उन्होंने आवाज लगाना शुरू नहीं किया था। नजीबाबाद रेलवे जंक्शन है। रेलगाड़ियां यहां कुछ ज्यादा देर के लिए रुकती हैं। उनके प्लेटफॉर्म पर आते ही, शोर बढ़ जाता है। चीख-पुकार मचती है। कुली और वेंडर्स चिल्ला-चिल्लाकर अपने ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। गाड़ी चलती है तो राहत मिलती है। हम दोनों सहपाठियों को आराम से जगह मिल गई। गाड़ी पैसेंजर थी। वह हर स्टेशन पर रुकती थी। कोई चार- साढ़े चार घंटे बाद हम सहारनपुर पहुंच गए। संतोष को कपड़ा खरीदने दूर बाजार जाना था। मैं मेंढकों के बारे में सोच रहा था। उसे ताज्जुब हुआ कि मैं मेंढक लेने आया हूं। फिर कुछ याद करके उसने कहा, मेंढक तो वहीं पकड़वाए जा सकते हैं। तुम्हारा भाई ही पकड़ लेता। मुझे यह अपमान-सा लगा, मगर उसने शीघ्र ही स्थिति संभाल ली। वह मेरे साथ समीप ही स्थित श्यौराज सिंह के पिता की स्टेशनरी की दुकान तक पैदल ही चलने के लिए तैयार हो गया।

जरा-से प्रयत्न से हमें दुकान भी मिल गई। दुकान छोटी-सी थी। वहां श्यौराज सिंह नहीं थे। उनके बूढ़े पिता थे। उन्हें मेंढकों की बाबत कुछ भी मालूम नहीं था। उन्होंने बताया कि श्यौराज सिंह तो कलानौर पढाने जाते हैं। वे देर शाम को लौटते हैं। उन्होंने अपने घर का पता दिया और शाम ७ बजे के बाद घर बुलाया। साथ ही उन्होंने रात्रि के भोजन के लिए हमें निमंत्रित भी कर लिया। मैंने अपना ब्रीफकेस उन्हीं के पास छोड़ दिया। मेरे पास घूमने और शहर को देखने के लिए काफी टाइम था। मैं बहुत खुश था और मेंढकों की बाबत सोचना नहीं चाहता था। संतोष को अपने आढ़ती के यहां साड़ियों के ऑर्डर देने थे। एक-दूसरे आढ़ती से उसे पैंट-कोट के लिए कटपीस खरीदने थे। दो-ढाई घंटे के भीतर उसने अपना काम निबटा लिया। उसने मुझे लकड़ी के कलात्मक सामान की दुकानें भी दिखाईं। एक हलवाई की दुकान पर अपन दो-दो प्लेट पूरी-छोले जीम गए। सहारनपुर में भी हमारे क़स्बे की तरह हिंदू-मुसलमान प्राय: मिल-जुलकर रहते थे। कस्बे का चरित्र नजीबाबाद से कोई बहुत ज्यादा भिन्न नहीं था। हां, वहां डिग्री कॉलेज थे। तीन या चार सिनेमाघर थे, जहां नई से नई फिल्में लगी थीं। सहारनपुर का रेलवे स्टेशन नजीबाबाद की तुलना में बहुत बड़ा था। मगर शहर या कस्बा बड़े स्टेशन के अनुरूप बड़े शहर का बोध नहीं कराता था।

संतोष ने पिक्चर देखने का प्रस्ताव रखा। मैं सहर्ष तैयार हो गया। तीन बजे का शो देखने के लिए काफी समय बचा था। श्यौराज सिंह से मिलने के लिए उनके पिता ने ७ बजे के बाद अपने घर बुलाया था। शायद राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की 'अमर प्रेम? फिल्म हमने देखी थी। कई जगह हमारी आंखें छलछला आई थीं। हॉल में सुबकियों की-सी आवाज रह-रहकर सुनाई देती थी। छोटे-से बच्चे नंदू के प्रति शर्मिला टैगोर का प्रेम और वात्सल्यपूर्ण अभिनय यादगार था। राजेश खन्ना का शीशे जैसा साफ मन उदात्त प्रेम को प्रतिबिंबित कर रहा था। मैं आगे के वर्षों के लिए फिल्म की असाधारण छवियां, मन को बांधने वाला उसका संगीत और आने वाले वर्षों में रेडियो सीलोन और विविध भारती पर छा जाने वाले उसके गीतों को अपने मन-मस्तिष्क में समाए श्यौराज सिंह के पिता के मकान की तरफ बढ़ रहा था। संतोष भी प्रसन्न था। उससे ज्यादा भावुक। मेंढक कहीं ध्यान में नहीं थे। एक छोटी-सी बैठक में श्यौराज सिंह के पिता ने हमारा स्वागत किया। हमारे दोनों के परिवारों के बारे में पूछा। हमें सस्ते-से कपों में चाय पिलाई और खाने को मठरियां दीं। श्यौराज सिंह अभी तक घर नहीं पहुंचे थे। बैठक में चार सस्ती-सी कुर्सियां, एक सादा-सा मेज और एक चौड़ा- सा पलंग पड़ा था। हम थके हुए थे। बैठते ही हमारी आंखें नींद से बोझिल होने लगी थीं। जब तक श्यौराज सिंह के पिता बैठक में हमें चाय पीते देखते रहे, हमने भरसक जागे रहने की कोशिश की। उनके जाते ही हम पलंग पर दीवार से गद्दियां सटा कर आराम से लेट गए। हम दोनों ने जूते-मोजे पहन रखे थे और हमारी टांगें लटक रही थीं। शेष हिस्सा पलंग पर था। ऐसे सोते हुए हम झट उठकर खड़े हो सकते थे। मुझे नींद आ गई थी।

मैं सपने देख रहा था। किसी पेड़ की डाली थी। उस पर एक सुनहरा-हरा सा मेंढक था। उस मेंढक पर एक और मेंढक चढा बैठा था। नीचे वाला मेंढक डाली पर सरकता तो उस पर चढ़ा मेंढक बिना हिले-डुले उसी तरह उसके साथ आगे बढ़ जाता। जैसे मेंढक दो नहीं, एक हो। नीचे वाले मेंढक का संतुलन और शक्ति भी कमाल की थी। दृश्य विस्मय से भरा हुआ था। मैंने कभी ऐसा मेंढक नहीं देखा था। श्यौराज सिंह आ गए थे। उनके पिता हमें आवाजें देते हुए भोजन के लिए जगा रहे थे। आंखों में नींद थी और नींद में वह सपना था। समझ में नहीं आ रहा था कि मैं कहां हूं। सहारनपुर में होने का कोई बोध ही नहीं था। संतोष तो हल्के-हल्के खर्राटे भी ले रहा था। मेज पर तीन थालियां लगी थीं। खाने का समय तो कब का निकल चुका था। मगर मन खाने का नहीं था। सोने का था। अजनबी घर। अजनबी मेजबान। रात दस-साढ़े दस का समय। थालियों में सब्बी, रायता और पराठे। भोजन का आग्रह करते हुए श्यौराज सिंह के बूढ़े भावुक पिता। मैंने संतोष को हिलाया और खुद उठकर खड़ा हो गया। कुछ शर्म भी आई। हम लोग धीरे-धीरे भोजन करने लगे। दिमाग उस अद्भुत मेंढक के बारे में सोच रहा था।

अचानक श्यौराज सिंह ने कहा कि वे कल दोपहर से पहले मेंढक देने की स्थिति में नहीं हैं। दोपहर से पहले-पहले वे जरूर मेंढक देने की कोशिश करेंगे। मैंने सोचा, दोपहर वाली गाड़ी पकड़कर मैं शाम तक घर पहुंच सकता हूं। तब तो मुझे नींद की जरूरत थी। नींद मुझे प्रिय भी थी। फिर उस शाम तो एक सपना भी नींद में अटका रह गया था, जिसने ' अमर प्रेम देखने के भावनात्मक अनुभव को अपने आवरण में छिपा लिया था। क्या कहीं कोई सुनहरा हरा-सा मेंढक होता है? मैं तो तब दो ही तरह के मेंढकों के बारे में जानता था। एक होता है टोड और दूसरा राना टेगरीना। टोड तो दिखावे भर का मेंढक होता है, जिसकी गरदन उसकी दोनों अगली टांगों के बीच धंसी-सी लगती है। हमारे कॉलेज के बायोलॉजी के प्रवक्ता खुद ऐसे ही आकार के थे। उनकी गरदन कंधों के बीच दिखाई नहीं देती थी। छात्रों ने उनका नाम ही टोड रख दिया था। उन्हें इस बात का पता भी चल गया था, मगर वे मुस्कराते रहते थे। राना मेंढक कुछ हल्के हरे मटमैले रंग का होता है। अपने रंग का लाभ उठाकर वह हरी झाड़ियों और लंबी घास में छुपा रहता है। प्रकृति ने जीव-जंतुओं को खतरों से बचाने के लिए उनके शारीरिक अस्व ही विकसित नहीं किए, भूगोल पर्यावरण और वनस्पतियों के अनुरूप उन्हें ऐसी त्वचा भी प्रदान की कि आमतौर पर वे दृश्य में समाए हुए और उसका अंतरंग हिस्सा लगें। डिसेक्शन के लिए राना नामक मेंढक की प्रजाति का हमारे स्कूल-कॉलेजों में तब इस्तेमाल किया जाता था। मुझे श्यौराज सिंह की बात से राहत मिली, मगर संतोष आधी रात को रवाना होने वाली ट्रेन से नजीबाबाद वापस जाने का पक्का फैसला कर चुका था।

उसे अगले रोज अपने पिता की दुकान पर हाजिर होना ही होना था। वह पक्का तिजारती था। मैं जूते उतारकर उसी तरह पलंग पर सो गया। बहुत अच्छी नींद आई थी और अब सुबह मेंढकों की चिंता सताने लगी थी। वे मिल जाएं तो मैं भी घर भागूं. नहा-धोकर मैंने नाश्ता किया और श्यौराज सिंह से जल्दी से जल्दी मेंढक दिलाने का अनुरोध करने लगा। वे अपनी नौकरी पर भी नहीं गए और मेंढकों का इंतजाम करने में लग गए। पता चला कि वे पिछली रात से ही इंतजाम में लग गए थे। कुछ देर बाद वे एक कनस्तर में मेंढक लिये चले आ रहे थे और बता रहे थे कि दोपहर से कुछ पहले एक एक्सप्रेस ट्रेन जाती है पर उसमें भीड़ बहुत होती है। उन्होंने कहा कि मेंढकों को क्लोरोफोर्म सुंघाकर शांत कर दिया गया है। उछल-कूद का तो सवाल ही नहीं है। सभी मेंढक मर चुके होंगे। हो सकता है पांच-दस सड़ भी जाएं।

इसलिए मैंने साठ मेंढक इस कनस्तर में पैक करा दिए हैं। कनस्तर को सीमेंट के इस खाली बोरे में लपेटकर रस्सियों से बांध दिया गया है। अच्छा है, तुम इसे सीट के नीचे छुपाकर ले जाओ। दुर्गंध आ सकती है, मगर भीड़ में किसी को पता नहीं चलेगा। बोरे से ढंके और रस्सियों से बंधे उस कनस्तर को अपने ब्रीफकेस के साथ लिये मैं भीड़ भरे एक्सप्रेस ट्रेन के डिबे में दाखिल हो गया। ट्रेन रुड़की के बाद लश्कर स्टेशन पर रुकी, जहां से हरिद्वार के लिए अलग लाइन कटती है। इससे पहले यात्री लोग किसी दुर्गंध का जिक्र कर चुके थे, मगर भीड़ में उन्हें पता नहीं चल पा रहा था कि दुर्गंध डिब्बे के अंदर से आ रही है र या बाहर से। अनजान बना रहा। शुरू में मैं खुश था कि कनस्तर को एक सीट के नीचे मैंने सुरक्षित रख दिया था। मगर जब सीट के पास बैठे और खड़े लोगों को मैंने मुंह बनाते और बिचकाते देखा तो मुझे अपराधबोध होने लगा। मैंने कनस्तर में बंद मेंढकों की कल्पना की और मुझे उनमें कई नन्हे-नन्हे बायोलॉजी के लेक्चरर नजर आने लगे, जिन्हें उनकी पीठ पीछे हम टोड कहते थे और वे हमें देखकर मुस्कराते रहते थे। मुझे लगा कि मैं इन 76 मेंढकों का हत्यारा हूं। मुझसे ही इन 60 निरीह जीवों की हत्या हुई है। मेरा मन विषाद से भर गया। पापा के कारोबार पर अम्मा के विचार भारी पड़ने लगे। इसी मन:स्थिति में मैं नजीबाबाद स्टेशन पर कनस्तर और ब्रीफकेस लिये उतरा।

सहारनपुर घूमने, वहां ' अमर प्रेम' देखने और सुनहरे-हरे मेंढकों का सपना देखने का सारा अनुभव जाता रहा। बस एक कटार की तरह यह चुभता बोध कि मैं हत्यारा हूं। मैंने 60 जीवों की हत्या की है। जिस तरह अम्मा पिल्लों या खरगोश को नदी पार छोड़कर आने के लिए हमें दो-टूक निर्देश देती थी, वैसे ही मेरा मन मुझे कह रहा था इन मेंढकों को नदी के पार रख आओ या इन्हें नदी में प्रवाहित कर आओ। इन मेंढकों के लिए मैं २०० रुपये श्यौराज सिंह को दे आया था। करीब २५ या ३० रुपये का खर्च टिकट और पिक्चर आदि पर भी हुआ होगा। यह भी डर था कि इतने बड़े नुकसान को पता नहीं पापा किस रूप में लें। भैयोजी के साथ उनके संबंधों पर न जाने क्या असर पड़े। स्कूल वाले पता नहीं पापा और भैयोजी को क्या-क्या ताने दें और सुनाएं। तर्क- वितर्क चलता रहा। तरह-तरह के विचार, तरह-तरह के डर। संकल्प- विकल्प नदी के किनारे पर पहुंचकर मैंने एक आवेग में कनस्तर को किसी तरह खोल डाला और मरे हुए मेढकों को नदी में प्रवाहित कर दिया। मैंने आंखें मीच लीं। कटार की-सी तीखी चुभन बंद होने लगी मगर मैं तो हवा में सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था और उड़ा चला जा रहा था। जैसे शरीर में जान न हो। अम्मा-पापा घर में थे और मुझे खाली हाथ देखकर अचरज कर रहे थे। मैं डरा हुआ दरवाजे पर अटका था और मेरे आंसू निकल आए थे। सच कहने की शक्ति मुझमें अचानक कहीं से आ गई थी। मां के चेहरे पर हल्की-सी खुशी और बड़ी-सी आशंका के भाव आ जा रहे थे। मैं बीए फाइनल में था मगर तब भी पापा का एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गाल पर पड़ा था।

“साला महावीर स्वामी की औलाद, इतना बड़ा नुकसान कर आया। आदमी को फिर तो मुंह से सांस भी नहीं लेनी चाहिए। अबे वे मेंढक डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए थे। साले, तुझे तो पढ़ाना भी बेकार है। ये है तेरा वैज्ञानिक सोच, जो जीव हत्या और मनुष्य के लाभ के लिए जीव के अध्ययन में अंतर नहीं कर सकता! - ' पापा ने क्रोध में कहा। मुझे लगा पापा कहीं मुझे ही मेंढक समझकर चीर-फाड़ न डालें। २३० रुपये की चोट लगी है बैठे-बिठाए। मैं जोर-जोर से रोने लगा। मां ने खैर स्थिति संभाल ली। मगर मुझे वर्षों तक मरे हुए मेंढकों के सपने आते रहे। आज भी आते हैं। सुनहरे-हरे मेंढक के नहीं। भगवान ही जानता है कि क्या हुआ, मगर इस वाकये के पांच-दस साल बाद ही स्कूलों-कॉलेजों में मेंढकों आदि जीवों के डिसेक्शन पर रोक लग गई। मगर ताज्जुब की बात यह, कि मेंढक फिर भी दिखाई देने बंद हो गए। इस पृथ्वी पर जीवों की कितनी प्रजातियां तो विकास की भेंट चढ गईं, मगर कितनी ही हम जान-बूझकर नष्ट कर रहे हैं। तब मेरे रोने पर छोटा भाई मुस्करा रहा था। मुस्कराहट बिलकुल निर्दोष थी। फिर उसने धीरे से कहा, '“मुझे भेजते तो ये मेंढक नदी में नहीं गिरते। वे तो पहले ही मरे हुए थे। फिर उन्हें नदी में क्यों विसर्जित किया, मेरे भाई मुन्ना?

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लेखक वरिष्ठ कथाकार हैं और संप्रति नई दुनिया के राष्ट्रीय संपादक हैं.

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साभार - शुक्रवार, साहित्य वार्षिकी, 2012

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रचनाकार: मधुसूदन आनंद की कहानी : मेंढक
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