मीनाक्षी भालेराव की दो कविताएँ - हे! पुरूष!!

हे पुरुष

हे पुरुष तुम किस बात के लिए

खुद को सर्वश्रेष्ठ समझते हो

नारी के जिस्म से पैदा होकर

नारी को ही छलते हो

दुनियां में आते ही

नारी के आंचल से

जीवन अमृत पीते हो

सांसें उसी के दम से पाते हो

तो भी उसे ही कमजोर समझते हो

थोडा बड़े हो कर,दादी, नानी की

अंगुली पकड़ कर चलना सीखते हो

फिर भी उसे असहाय कहते हो

बहनें, बहनें होकर भी भाइयों

की सलामती के लिए

रात-दिन दुआंए मांगती हैं

उपवास,व्रत रखती हैं

फिर भी उसे बोझ समझते हो

पत्नी जो दिन-रात सेवा

के लिए तत्पर रहती है

अपना अस्तित्व खोकर भी

वंश को आगे बढाती

हर मोड़ पर सब का मार्ग दर्शन करती है

अपना सुख खोकर परिवार के

सुख के लिए जीती है

फिर भी उसे अबला नारी कहते हो

बेटी जो घर की रौनक होती है

लक्ष्मी का अवतार बन कर

आंगन को महकाती है

फिर भी उस के पैदा होने पर

मातम मनाते हो, हे पुरुष

तुम किस बात के लिए

खुद को सर्वश्रेष्ठ समझते हो

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देश के नेता

ये काले-काले ये मोटे-मोटे

भैंसे जैसे नेता

पान चबाते, पीक थूकते

भष्टाचार में लिप्त हुये

जैसे गंदी नाली के कीड़े

चोर उच्चके गुंडे मवाली

उनकी करते नेता रखवाली

देश में ये घात लगवाते

राष्ट्र-सम्पति चोरी करवाते

जो जितना घोटाला करते

वो इनके रिश्तेदार बन जाते

जूते-चपल चलते देखा था एसंब्ली मे

अब देख लिया मोबाइल में

गंदा रास रचाते मुंह कला करवाते

वह-रे वाह नेता कहाँ तुम्हारी अक्ल गयी

कहाँ ले जा रहे हो तुम देश को

गुलामी से तो निकला देश

धर के डाकुओं से कोन बचाएगा

जिन्होंने रखेल बनाया देश को

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1 टिप्पणी "मीनाक्षी भालेराव की दो कविताएँ - हे! पुरूष!!"

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