शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : ड्रेस कोड

ड्रेस कोड

आज जहाँ देखो वहीं ड्रेस कोड का चलन है। बहुत से स्कूलों में बच्चों तथा अध्यापकों के लिए भी ड्रेस कोड चलता है। किताबें न हों तो कोई खास दिक्कत नहीं होती। लेकिन यदि ड्रेस नहीं है तो स्कूल में प्रवेश ही नहीं दिया जाता है। ऐसे में जिनके पास ड्रेस और किताब दोनों खरीदने कि कूबत नहीं है, वे बच्चे किताब लेकर ही क्या करें ? ड्रेस में होने से कम से कम स्कूल में तो जा सकेंगे। बहुत से स्कूलों में ड्रेस बेचा भी जाता है। बाहर से लाने पर मैच न करने का खतरा जो होता है तथा जो पैसा दुकानदार ऐंठता है, उसे स्कूल वाले ही ऐंठे तो क्या बुरा है ? स्कूल और बच्चों की बात न भी करें तो नेता, अभिनेता, पुलिस, वकील, जज, नर्स, डॉक्टर तथा साधु-सन्यासियों का भी अपना बिशेष ड्रेस होता ही है।

कुछ बिशेष अवसरों के लिए भी ड्रेस का प्रावधान है ही। जैसे दूल्हे का ड्रेस, दुल्हन का ड्रेस व मुर्दे का ड्रेस इत्यादि। ड्रेस की एक खास बात होती है कि इससे पहचान बनती है। बिगड़ती भी है। पहचानने वाला कोई भी न हो तो भी। इसी पहचान की वजह से कुछ लोग ड्रेस का नाजायज फायदा भी उठा लेते हैं। लोग ड्रेस देखकर गुमराह हो जाते हैं। कुछ को कुछ समझ बैठते हैं। जैसे चोर को पुलिस और पुलिस को चोर। ड्रेस को देखकर पहले मूर्ख ही भूलते थे, अब ज्ञानी भी भूल बैठते है। शायद मूर्ख और ज्ञानी के बीच का अंतर कम हुआ है। आज पढ़े-लिखे लोग और आधुनिक पढ़ाई बढ़ जो रही है। ड्रेस का बहुत बड़ा महात्म्य है। इसके बहुत फायदे हैं। अतः तरह-तरह के ड्रेस आने ही चाहिए। आ भी रहे हैं और आयेंगे भी।

एक अलग पहचान बनाने के लिए आधुनिकादेवी भी अपनी साथी महिलाओं व लड़कियों के हित में ‘यूडीसी’ यानी ‘यूनीफोर्म ड्रेस कोड’ लागू करने के लिए बचनबद्ध हैं। इस पर आम सहमति बनाने के लिए वे काफी काम कर रहीं हैं। साथ ही कई बैठकें भी कर चुकी हैं। इनका नारा है-

“परिवर्तन हम लायेंगे, दुनिया को दिखलायेंगे”।

लाख कोशिस के बाद भी सबको साथ लेकर चलने वाली दिक्कत आती है। ज्यादा निराशा गांवों से होती है। जैसे नेता कहते हैं कि हम सबको साथ लेकर चलेंगे। लेकिन यह भूल जाते हैं कि न कोई कुछ लाता है और न ही ले जाता है। सब कुछ यहीं का यहीं रह जाता है। इसलिए जिसको जहाँ रहना होता है, रहता है। नेता लाख कोशिस क्यों न करते रहें ?

आधुनिकादेवी खुश हैं, लेकिन ज्यादा खुश नहीं हैं। इनका मानना है कि ड्रेसों में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए तो हैं। जो कि अच्छा संकेत है। लेकिन मूल समस्या यूडीसी की है। खैर देर-सबेर लागू हो ही जायेगा। इनका कहना है कि देश के गरीब जैसे गरीबी रेखा से वर्षों से चिपके हैं। उसी तरह आज महिलाएं घुटने से ऊपर व कमर के नीचे तथा पेट व गले के बीच वर्षों से मामूली बस्त्र चिपकाएँ हुए हैं। न ही देश के गरीब आगे बढने की सोचते है और न ही ये लोग।

जनतंत्र में जहाँ देखो वहीं तन्त्र होता है। शहर से लेकर गांव तक नेता अपना तन्त्र बिछाए रहते हैं। इसी तरह आधुनिका देवी से कोई कोना अछूता नहीं है। सभी जगह इनका तन्त्र फैला है। गांवों के दूर-दराज क्षेत्रों में भी इनकी पकड़ बढती जा रही है। इनके अपने एजेंट हर जगह सक्रिय हैं। जो खुशी नेता को उसकी सरकार बनने पर होती है। वही खुशी इन्हें यूडीसी लागू होने पर होगी। तब अपने को तथा अपने संगी-साथियों को ये और आधुनिक साबित कर सकेंगी। जो दुःख नेता को उसकी अपनी सरकार डूबने पर होता है, वैसा ही दुःख यूडीसी में इतना विलम्ब क्यों ? यह सोचकर आधुनिका देवी को होता है। किसी भली महिला या लड़की को पूरे बस्त्र में देखकर इनका मन वैसे ही डूब जाता है। जैसे घूस लेते हुए पकड़े जाने पर किसी अधिकारी का या चुनाव हारे नेता का डूबता है। भले ही थोड़े समय के लिए। आवेश में कह उठती हैं-

अब मुक्ति मिलेगी नारी को।

पूरी कर लो तैयारी को ।।

फेको उतार के सारी को।

चेतो ! छोड़ो लाचारी को।।

युग आया मोल-बजारी को।

अब मुक्ति मिलेगी नारी को।।

आज सारी उतारने वाले दुर्योधन तो बहुत हैं। हर जगह, हर कोने में। लेकिन चीर देने वाले मोहन यहाँ नहीं हैं। जाहिर सी बात है कि आधुनिका देवी के इन क़दमों से आज के दुर्योधनों को काफी खुशी होगी। मुश्किलें आसान होने से खुशी किसे नहीं होती ?

गांवों में काम करने वाली इनकी एक मित्र हैं कल्याणी देवी। इन्होंने ही इन्हें यह नाम दिया है। महिलाओं के उत्थान यानी कल्याण की इनकी योजनाओं को देखते हुए ही इन्हें यह नाम मिला। ये दावे के साथ कहती हैं कि कितने ही लड़कियों को हमने गांव के दलदल से निकालकर शहर भेज दिया है। दीगर है न इन्हें ठीक से पता है और न किसी और को कि वे लडकियां कहाँ हैं ? सुनने में आता है कि गाँवों की कुछ लड़कियाँ भी शहरों के स्वच्छ जल में गोते लगाने के लिए बेताब रहती है। उन्हें क्या मालूम कि वहाँ पीने को भी स्वच्छ जल के लाले हैं ? दलदल तो ऐसा कि उसमें फंसकर कोई बिरला ही वो भी बहुत मुश्किल से निकल सकता है। खैर दलदल किसे भाता है ? कमल या फिर गर्मियों में भैसों को। कुछ भी हो कौन देखने जाता है कि दलदल से महादलदल में जा पहुँचती हैं। और कोई न देखे तो कुछ नही हुआ जो वैज्ञानिक भी है। आज देश-समाज के हर कोने में यह वैज्ञानिक सिद्धांत लागू है। इसी वैज्ञानिक सत्य के धरातल पर आज कितनों के पैर टिके हैं। चाहे वह नेता-अभिनेता, अफ़सर-साहूकार, संत-महंत, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी इत्यादि कोई भी क्यों न हो ?

सर्वप्रथम जब दोनों लोगों की मुलाकात हुई तो महिला उत्थान में सक्रिय होने से बहुत जल्दी घनिष्ठता हो गई। ड्रेस कोड के बारे में जब आधुनिका देवी ने बताया। तो बहुत ही उत्तम योजना कहते हुए साथ-साथ मिलकर काम करने के लिए राजी हो गयीं। लेकिन जब गांवों की स्थिति बयान करते हुए बताया कि वहाँ तो महिलाएं अभी अपना मुंह भी ढककर चलती हैं। तो आधुनिका देवी को बहुत ही आश्चर्य हुआ। पूछ बैठी क्या दिखाने लायक नहीं होता ? वहाँ पार्लर तो होंगे नहीं। कल्याणी ने बताया कि ऐसा नहीं है एक से एक हैं कि देखती रह जाओ। लेकिन पुराने ख्यालात की हैं। वे सबको देखने व दिखाने योग्य ही नहीं मानती। कुछ तो मोटे-मोटे बोरे जैसे कपड़े पहनती है। आधुनिका देवी यह सुनकर हँस पड़ी। बोलीं कब सुधरेगीं ये सब। जब उन्हें अपने ही बारे में पता नहीं है कि उनके पास दिखाने को बहुत कुछ है तो दुनिया क्या देखेंगी और कैसे जानेंगी कि दुनिया में अब कहाँ क्या और कैसे हो रहा है ?

कल्याणी ने कहा सुधारने का ही काम तो कर रही हूँ। टीवी आदि के जरिये भी गांवों में जागरूकता बढ़ ही रही है। बहुत समझ बूझ से काम लेना पड़ता हैं। वहाँ की बड़ी-बूढियाँ यहाँ जैसी नहीं हैं जो एक हाथ आगे निकल जाने के लिए तत्पर रहती हैं। बल्कि वे महीन-पारदर्शी बस्त्रो को भी देखना नहीं चाहती। आप का ड्रेस देखकर बात करना तो दूर दरवाजे पर खड़ी तक नहीं होने देंगी। वे हमें देखकर राधेश्याम जी की निम्न पंक्तियाँ गाती हैं-

साड़ी महीन हो रेश्मीं पहनावा ऐसा रुचता है।

निर्लज्ज को इतना लाज नहीं तन अर्ध-नग्न सा रहता है।।

ऐसी ही प्रगति रही तो दुर्गति होगी अबलाओं की।

जो जाति शिरोमणि थी अब तक जूती कहाएगी पाओं की।।

कुछ तो भगवान से कहती हैं कि-

नंगापन नारी को भाये।

घूमें अपना गात दिखाए।।

निर्लज को कुछ लाज न आये।

मानो पशु ते होड़ लगाए।।

निर्लज सूपनखा को समुझाये।

द्वापर द्रोपदी लाज बचाए।।

प्रभु ! कलियुग में को समझाए।

करता वह जिसको जो भाए।।

खैर देर-सबेर ढर्रे पर आ ही जाएँगी। जब बड़े-बूढ़े लाख कोशिस के बावजूद मूंछें नहीं बचा पाए, उन्हीं के सामने मूछों का निर्दयता पूर्वक मर्दन जारी रहा और बाद में वो भी इसके आदी हो गए। तब बड़ी-बूढियां कब तक मोर्चा सभालेंगी। जब उन्हीं के सामने बेटियां और बहुएं यूडीसी में निकलेंगी, तब आँखें फाड़-फाड़कर देखेंगी। और धीरे –धीरे वे भी मुख्यधारा में आ जाएंगी। अतः बहुत चिंता की बात नहीं है। देर सही लेकिन काम बिल्कुल दुरुस्त होगा।

उपरोक्त बात तो दशकों पहले की है। आज गाँवों में भी तरह-तरह के ड्रेस हैं और गांवों से हजारों महिलाएं आधुनिका देवी के सम्मेलनों में भाग लेने आती रहती हैं। खैर यूडीसी पर अमल होना अभी बाकी है।

अंततः आधुनिका देवी को कुछ समझौता वादी होना पड़ा। शहरों से कुछ खास दिक्कत तो थी नहीं। लेकिन लाख समझाने के बाद भी गांवों में कुछ लकीर की फकीर वाली महिलाएं बची रहीं। इन्होंने कुछ कड़ा होकर भी एलान कर दिया कि अगर कम्युनिटी में रहना है तो यूडीसी पर अमल करना ही होगा। अन्यथा आधुनिक कहलाने का अधिकार नहीं रहेगा।

आधुनिकादेवी के अनुसार यूडीसी में घुटने तथा कमर के बीच कोई बस्त्र नहीं होगा। बजाय इसके इसमें घुटने के नीचे बस्त्र का प्रावधान किया गया है। इसी तरह पेट तथा गले के बीच कोई बस्त्र नहीं होगा। गले में पतली पट्टी पहनी जा सकती है। इसी ड्रेस को अमल में लाना होगा। अन्यथा आधुनिक होने का ताज छिन जायेगा।

ग्रामीण अंचल की महिलाएं जो अपना मुंह ढककर चलती हैं। उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए थोड़ी सी छूट दी गयी है। आधुनिका देवी का कहना है कि मुझे मुंह ढके रहने से कोई आपत्ति नहीं होगी बशर्ते ड्रेस कोड का पालन हो। यूडीसी सबके लिए समान है। लेकिन मुंह ढकने का प्रावधान भी इसमें शामिल कर लिया गया है। अन्य फेर बदल असंभव है। मुंह का पर्दा चाहो तो करो, लेकिन यूडीसी में रहकर।

हास्यरसिकों को बेसब्री से इंतजार है और विश्वास है कि आधुनिका देवी आमराय बनाने में सफल होंगी तथा यूडीसी शीघ्र ही अमल में आ जायेगा। आधुनिकादेवी अत्याधुनिक बनने के लिए अभी आगे देखो क्या-क्या गुल खिलाती हैं और कौन-कौन सी योजनाएं बनाती हैं ? जो कुछ भी होगा, सब हास्यरसिकों के हित में होगा। इसमें संदेह नहीं है।

डॉ एस. के. पाण्डेय।

समशापुर (उ. प्र.)।।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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