रविवार, 4 मार्च 2012

आर. के. भारद्वाज का आलेख : बाइकर्स

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आजकल हमारे नौजवानों को मोटर बाइक का बहुत क्रेज है, बाइक कम्‍पनियॉ भी तरह तरह की मोटर बाइक को लॉन्‍च कर रही हैं, जिसके कारण नौजवानों का उनके प्रति रूझान और भी अधिक बढ़ रहा है, अधिक से अधिक रफतार की बाइक बाजार में उतर रही है इसके साथ साथ उन्‍हें लेने वालों का उत्‍साह भी बढ रहा है पिछले दशक में तो मोटर बाइक का क्रेज बढ़ा ही है, इसके साथ साथ उनसे होने वाली दुर्घटनाओं में भी काफी बढोतरी हुई है, हैरानी की बात यह है कि जब कोई कम्‍पनी अपनी मोटर बाइक को बाजार में उतारती है तो अपने विज्ञापन में वह लुभावने विज्ञापन दिखाती है, कभी उनकी बाइक रेल की रफ्तार को पीछे छोड़ती है कभी हवाई जहाज को, अपनी प्रियतमा से मिलने में तेज मोटर बाइक को काफी रोचक और मनोरंजक ढंग से दिखाया जाता है, जाहिर है कम्‍पनी को अपनी वस्‍तु का बाजार बनाना है, हमारे नौजवान उससे प्रेरित हो वैसे ही स्‍ंटट करने लगते हैं जिसके परिणाम स्‍वरूप सडक दुर्घटनायें काफी मात्रा में बढ़ी है, हालांकि स्‍थानीय पुलिस प्रशासन इसके विरूद्ध अभियान चलाती है, एक दो केस में चालान भी होता है, सजा भी होती है पर मोटर बाइक का क्रेज बढ़ता ही जा रहा है।

बाइकर्स को अपने ऊपर इतना भरोसा होता है कि वह भीड भरे यातायात में भी अपनी रफ्तार को कम नहीं करते इधर उधर से कट मारकर निकलने की कोशिश करते हैं और यहीं पर असावधानीवश अक्‍सर दुर्घटना घट जाती है। कभी कभी इसके भयंकर परिणाम भी हो जाते है।

जब से परिवार नियोजन का कार्यक्रम चला है, अक्‍सर घरों में एक या दो बच्‍चे ही होते हैं अक्‍सर मॉ बाप अपने लाडलों की जिद के आगे घुटने टेक देते हैं और उन्‍हें वह बाइक दिला दी जाती है जिसके लिये वह जिद करते है, हालांकि ऐसा करना कोई अनुचित बात नहीं हैं पर हम लोगों से अक्‍सर यह गलती हो जाती है कि हम अपने बच्‍चों को सडक के कायदे कानून ढंग से नहीं सिखा पाते, न उनकी उम्र का ख्‍याल रखा जाता है, न उनसे यह कहा जाता है कि दो तीन सवारी बैठाकर गाड़ी मत चलाना, और यदि कह भी दिया जाता है तो इसकी बात की क्‍या गारन्‍टी है कि हमारी बात को मान ही लेगें।

मेरे पडोस के एक सज्‍जन ने अपने इकलौते बेटे को एक काफी मंहगी बाइक दिलवा दी, लड़का बड़ा होनहार तथा पढने लिखने में भी काफी होशियार था, जब पिता द्वारा बाइक दिलवा दी गई तो जाहिर था कि मित्रों की संख्‍या भी बढी, पहले तो काफी सोचसमझ कर बाइक चलाई जाती थी पर धीरे धीरे बाइक की रफतार बढने लगी, कहते हैं कि यदि आप अपने अन्‍दर एक अवगुण पाल लेते हैं तो अन्‍य अवगुण स्‍वतः ही आ जाते हैं, इस प्रकरण में भी कुछ ऐसा ही हुआ पहले तो यार दोस्‍तों की संख्‍या बढी फिर कभी काफी के बहाने कभी आइसक्रीम के बहाने दूर दूर तक बाइक पर जाने लगे अब उनमें कुछ ऐसे दोस्‍त भी शामिल हो गये जो नशा पानी करते थे धीरे धीरे उस बच्‍चे को भी इसकी लत लग गयी, पडोस के दो चार लोगों ने देखा भी लेकिन मां बाप को कौन कहे, हम लोग आजकल सब कुछ कर सकते हैं लेकिन जहॉ जिम्‍मेदार नागरिक बनने की बात आती है अक्‍सर हमारे कदम पीछे मुड जाते हैं, बच्‍चा अब धीरे धीरे काफी रात वापस लौटता और फिर एक दिन वही हुआ अधिक नशा, तेज रफतार घर पहुंचने की जल्‍दी में बच्‍चे की बाइक एक बिजली के पोल से टकराई ठक्‍क्‍र इतनी जबरदस्‍त थी कि बिजली का पोल भी तिरछा हो गया, बाइक की क्‍या गत हुई होगी आप लोग समझ ही सकते है और इसी टक्‍कर में बच्‍चे की मौत हो गई।

मेरे एक करीबी रिस्‍तेदार के बच्‍चे ने अपने मां बाप से बाइक की मांग कर डाली मॉ बाप द्वारा साफ मना कर दिया गया कि बाइक नहीं मिलेगी, उसने अनशन शुरू कर दिया, और एक दिन तो उसने हद ही कर दी ब्‍लेड से अपने हाथ पर लिखा ''मैं अहुत अभागा हूं'' बच्‍चे को हास्‍पिटल ले जाया गया गनीमत थी कि कोई नस नहीं कटी थी, काफी इलाज के बाद बच्‍चा घर आ गया, उसकी मौसी ने बच्‍चे को नई बाइक दिलवा दी.......अब बाइक के बाद जो घटना धटी वह और भी दर्दनाक थी, एक दिन अपने मित्र की कार से रेसिंग करते हुए सामने से आते एक दूसरे वाहन से उसकी बाइक की टक्‍कर हो गई और इस घटना में बच्‍चे के एक पैर को पूरी तरह से घुटने से काटना पड़ा।

इस तरह और ऐसी कई घटनायें हमारे आपके आस पास घटती ही रहती है तो फिर क्‍या किया जाये। मेरे अपने विचार में तो बच्‍चे को सख्‍ती से मना कर दिया जाये कि बाइक नहीं मिलेगी पहले कुछ कमाकर दिखाओ कुछ बनकर दिखाओं फिर जो चाहे खरीद लेना,तब तक बच्‍चा बड़ा हो जाता है अपनी जिम्‍मेदारी समझने लगता है, सड़कों पर चलने के नियम कायदे सीख जाता है, फिर जब वह एक जिम्‍मेदार नागरिक बन जाता है तो उससे जिम्‍मेदारी की ही अपेक्षा की जायेगी। हो सकता हे कुछ लोग मेरे विचार से इत्‍तेफाक न रखें। मैं अपना उदाहरण बताता हूं मेरे बेटे ने 10वी कक्षा पास की आजकल का बच्‍चा था उसने भी बाइक की मांग कर डाली, मेरे द्वारा साफ मना करने पर उसने मुझे धमकी दी कि फिर मैं आग की पढाई नहीं करूगा, मैं फिर भी तटस्‍थ था, मां द्वारा भी उसे समझाया गया, उसने आगे की पढाई की, जब इंजीनियरिंग की पढाई चल रही थी तो उसने कहा मुझे एक कम्‍पयूटर की आवश्‍यकता है मैने उसे तुरन्‍त दिला दिया, उसने कहा कि जब मैं बाइक मांग रहा था तो आपने कहा कि पैसे नहीं है अब कम्‍पयूटर के लिये पैसे कहॉ से आये । मैनें कहा,'' यह तुम्‍हारी आवश्‍यकता है और वह तुम्‍हारा शौक था, इससे पढ़ने के बाद तुम कई बाइक खरीद सकते हो। और हुआ भी वही उसकी नौकरी लगने के बाद उसने सीधे 10 लाख की कार खरीदी, और कार को बडे इत्‍मीनान से चलाता है, उसका अपने से अधिक ध्‍यान रखता है मेरे विचार में वह अब एक जिम्‍मेदार नागरिक है, जिसे सड़क पर चलने का कायदा कानून भी आ गया है ।

समाज में सभी का रूतबा एक जैसा नहीं होता कोई अधिक अमीर होता है कोई कम कोई्र साधारण लेकिन इस बात से सब इत्‍तेफाक करेगें कि बच्‍चे सब को अपने अपने प्रिय होते है, अतः बच्‍चों को बाइक न दिला कर उन्‍हें किसी अच्‍छी पढ़ाई अच्‍छे कैरियर की ओर मोड़ना चाहिये अन्‍यथा की दशा में ''अव पछताये होत क्‍या जब चिड़िया चुग गई खेत''

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RK Bhardwaj

151/1 Teachers’ Colony

Govind Garg,Dehradun(Uttarakhand)

Email rkantbhardwaj@gmail.com

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(चित्र - सौजन्य - आशीष श्रीवास्तव)

1 blogger-facebook:

  1. You are only looking at one side of the coin. Every innovation and invention has both the side. Simply looking at negative shows narrow mindedness and pessimism in your blog.

    Rgds
    Saurabh

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