मंगलवार, 13 मार्च 2012

असग़र वजाहत का नाटक : वीरगति

वीरगति

पात्र

सुकुमार (18-20 वर्ष)

सुन्दरी (16-18 वर्ष)

साहूकार-1-सुकुमार का पिता (50-60 वर्ष)

साहूकार-2-सुकुमार का चाचा (50 वर्ष)

साहूकार-3-सुकुमार का चाचा (45 वर्ष)

साहूकार-4-सुकुमार का चाचा (40 वर्ष)

साहूकार की मां (50 वर्ष)

ठाकुर (50वर्ष)

हकीम (45वर्ष)

वैद्य (55वर्ष)

ओझा (60वर्ष)

पीर (55वर्ष)

लड़की का पिता-1 (50 वर्ष)

लड़की का पिता-2 (55 वर्ष)

लड़की का पिता-3 (40 वर्ष)

लड़की का पिता-4 (60 वर्ष)

लड़की का पिता-5 (55 वर्ष)

मुनादी करनेवाला (40 वर्ष)

महामंत्री (55 वर्ष)

राजा (50 वर्ष)

तथा चोर, खोजी, साधारण ग्रामीण और अन्य।

दृश्य : एक

(साहूकार की हवेली का परकोटा, जहां से सुकुमार मनोरम दृश्य देखता है। मंचसज्जा सांकेतिक हो सकती है।)

सुकुमार : अहा-हा-हा, क्या बादल छाए हैं। कैसी ठंडी-ठंडी हवा चल रही है। मोर नाच रहे हैं, लेकिन कोयल कूक रही है, पपीहे कूह-कूह कर रहे हैं। सारा जंगल पानी में नाच रहा है... हाय, लेकिन मेरे दिल की जलन, जिगर के दाग़, सीने के ज़ख्‍़म, तू वैसा ही महक रहा है, जैसे हज़ार परदों में रखने के बाद भी कस्तूरी महकती है... ओफ़्फ़ोह, मैं क्या करूं? कहां जाऊं? किस दीवार से सिर टकराऊं? किस जंगल की ख़ाक छानूं? किस दरवाज़े भीख मांगूं?... कोयल की कूक से मेरे दिल में हूक उठती है और ठंडी हवा मेरे ज़ख्‍़म पर नमक छिड़कती है। पानी की फुहार मुझे उबलते तेल का माफ़िक़ जलाती है। हाय, मेरे दिल, तेरा कोई इलाज है भी कि नहीं-

बेचैनियों समेट के सारे जहान की जब कुछ बन सका तो मेरा दिल बना दिया

(सुकुमार की माता पीछे से आती है)

मां : सुकुमार, मेरे लाड़ले, आंखों के तारे, जिगर की ठंडक, दिल के क़रार, नाज़ों के पाले, तू बता, अगर किसी ने आंख दिखाई हो तो आंख निकलवा लूं, उगंली उठायी हो तो गर्दन कटवा लूं, ज़बान खोली हो तो ज़बान खिंचवा लूं। जहां तेरा पसीना बहे वहां अपना खून बहा दूं। हाय, लेकिन क्या करूं?

तू अपना राज हमीं सं छिपाए रखता है किसी से कहता नहीं, मुझसे भी बताता नहीं कि दिल के राज़ तू दिल में छिपाए रखता है।

सुकुमार : (ठंडी सांस लेकर) मेरी मां, काश मैं कुछ कह सकता होता!... ज़बान खोलता हूं तो ऐसा लगता है, कि पत्थर से बातें कर रहा हूं। पेड़पौधे मेरी बात का क्या जवाब देंगे?... मैं खुद अपने सवालात के अंधेरे में डुबकी लगा रहा हूं।... लेकिन हाय, एक बेकली है तो मुझे तड़पाती है, एक चिनागारी है जो मुझे जलाती है, एक दीवानगी है जो मुझे पागल बनाती है।

मां : कमी है क्या तुझे, मुझको बता दे जानेजिगर

तुझे क्या चाहिए, मुझको बता दे जानेजिगर

घाव दिल का तू मुझको दिखा दे जानेजिगर

कहानी तू मुझे अपनी सुना दे जानेजिगर।

सुकुमार : मेरी मां, बस यही न पूछो; क्योंकि न कुछ बता सकता हूं, और न दिखा सकता हूं। न हंसी आती है और न रोना। न निगलते बनता है, न उगलते चैन है।... ये पेड़, ये पौधे, ये बादल, ये बिजली, ये पहाड़, ये धनक- सब मुझे खाने दौड़ते हैं।

मां : हाय, सुकुमार, तू है कि अपनी मां का कलेजा छलनी किए डालता है। तुझे क्या मालूम है कि ममता किस चिड़िया का नाम है। तुझे क्या मालूम, मां के आंसुओं की क्या क़ीमत होती है। तुझे क्या मालूम...

सुकुमार : रहने दो अकेला, मैं अकेला ही रहूंगा।

तुम पास न आओ, मैं अकेला ही रहूंगा

बस छोड़ दो मुझको किसी वीरान से घर में

रहने दो अकेला मैं अकेला ही रहूंगा।

मां : चाहे जितने सितम कर तू मेरे ऊपर, सुकुमार, लेकिन तुझे मेरे दिल की क़सम, ये तूने खना-पीना क्यों छोड़ रखा है? आज तीसरा दिन है और तेरे मुंह में एक खील का दाना न गया। कुछ तो होशकर, कुछ तो अक़्ल ठिकाने लगा, कुछ तो मां का ख्‍़याल कर, कुछ तो बाप के बुढ़ाने पे नज़र डाल।

(चार-पांच औरतें अपने सिरों पर खाने के थाल लिए प्रवेश करती है और सुकुमार के सामने आकर खड़ी हो जाती है।)

माःं मेरे लाल, सत्तर तरह के पकवान बनावाए हैं तेरे लिए और और तू है कि किसी चीज़ में हाथ तक नहीं लगाता।

सुकुमार : काश तुम इस राज़ को समझ सकतीं, मेरी मां! हैं कुछ लोग ऐसे दुनिया में जिन्हें पाकर मज़ा आता है तो कुछ लोग खोकर खुश होते हैं। किसी के लिए ज़हर मौत है तो किसी के लिए ज़िन्दगी। किसी को दौलत बेहद अज़ीज़ है तो किसी को फ़क़ीरी में बादशाहत नज़र आती है। किसी के लिए धन-दौलत का ढेर ख़ुशी का ख़ज़ाना है तो किसी के लिए कूड़े का ढेर।

मां : हाय, सुकुमार, तेरी बातें हैं कि पहेलियां हैं। तेरी ज़िद के आगे राजाओं की हठ मांद पड़ जाती है... ऊपर वाले का दिया कया नहीं है तेरे पास? दरवाज़े पर सैकड़ों हाथी झूमते हैं। दरबानों की फ़ौज पहरा देती है। सोना तेरे घर का ठीकरा है और चांदी तेरे बदन का मैल। हीरे-जवाहरात शीशे के टुकड़ों की तरह नालियों में लुढ़के-लुढ़के फिरा करते हैं। दौलत तेरे पास इतनी है कि अगर...

सुकुमार : बंद करो, परमात्मा का वास्ता है, बंद करो। बचपन से लेकर आज तक हज़ारों-लाखों बार मेरे कान में यही आवाज़ पड़ती रही है कि अगर आज क़ारूं का ख़ज़ाना किसी के पास है तो मेरे पास।... दौलत, बेपनाह दौलत, बेहिसाब, बेइंतिहा दौलत... लेकिन इस खुशनसीबी के बोझ से मेरी सांस घुटी जा रही है, मेरा दिमाग़ फटने लगता है, रग-रग चटकने लगती है... हाय, मैं क्या करूं!



दृश्य : दो

(अपनी हवेली में चारों साहूकार बैठे हैं। कक्ष की सज्जा उनकी संपत्ति और धन-दौलत के अनुरूप है।)

साहूकार-1 : ऐ मेरे भाइयों, आंखों के तारों, बताओ मुझे, दुलारो, क्या करूं मैं, प्यारो?

साहूकार-2 : भाई मेरे, क्या बतायें, अक़्ल हुई फ़ौलाद। चार भाइयों के बीच में अकेली है औलाद।

साहूकार-3 : अकेली है औलाद किया है उस पर जादू-टोना।

साहूकार-4 : डुग्गी पिटा दी है, मुनादी करा दी है। देस-देस के हकीम, वैद्य, पंडित, ओझा, ज्ञानी-मुनी आवेंगे, निरोगी करावेंगे।

(हकीम आता है)

हकीम : साहूकारों को हाथ जोड़कर गाता है।

नाम है मेरा बेजोड़ हकीम!

दर्द हो, दाद हो, गठिया हो खांसी हो, सिफलिस हो, भगंदर, के शकर आती हो खाना पचता न हो, गैस भी तड़पाती हो दवा से ठीक न होवे तो मुझे फांसी हो।

(अंतिम पंक्ति संगीत के साथ कई बार पढ़ता है। वैद्य आता है। हकीम को देखकर साहूकारों को प्रणाम करता है और गाता है।)

वैद्य : (गाकर)

हकीमों से बचो ये जान ले लेते हैं लोगों की

दवा देते हैं पर इनको नहीं पहिचान रोगों की

न रोगी से, न रोगों से, इन्हें पैसे से मतलब है

हकीमों से बचो ये जान ले लेते हैं लोगों की।

हकीम : (बिगड़कर आगे बढ़ता हुआ) नादान वैद्य, क्या पिनक में अनाप-शनाम बकता है? क्याूं तू मेरे मुंह लगता है?

वैद्य : ओ सरफिरे हकीम, सैकड़ों बच्चों को तूने कर दिया यतीम।

वैद्य : (दोनों हाथ बढ़कार एक-दूसरे की गर्दन पकड़ लेते हैं और झिंझोड़ने लगते हैं। इसी बीच ‘जय बम भो' का नारा लगाता आझा मंच पर आता हैं यह हाथ में एक बर्तन लिए है, जिसमें धूनी सुलग रही है। हकीम के सामने धूनी वाला पात्र करके एक फूंक मारता है। धुआं दोनों पर फैल जाता है और दोनों आंखें मलते अलग हो जाते हैं।)

ओझा : साहूकारों को प्रणाम... कहां है बच्चा? उसपर है जादू, हकीम-वैद्य आए हैं फालतू।

हकीम और वैद्यः (दोनों एक साथ) अरे वाह, हमें फालतू बताकर अपने-आप पालतू होना चाहता है!

वैद्य : जा, दो-चार साल लवणभास्कर का सेवन कर फिर यहां आना।

हकीम : जा, दो-चार माजूनेमुरक्कब चाट फिर यहां आइयो।

(मंच पर पीर आता है और ओझा को देखकर जोर से चीख़ता है।)

पीर : फिर तू यहां आ गया मलंदर! अबकी बना दूंगा तुझे चुक़ंदर। पिछले साल तुझे बोतल में बंद किया था, अबकी तेरा नामो-निशान मिटा दूंगा।

(आल तू जलाल तू हब्बे कमाल तू

पानों में मान तू हिस्सेख़सल तू।)

साहूकारों, मैं वही पहुंचा हुआ पीर हूं जो औरत को बकरी और बकरी को पान बना देता है। आदमी को चिड़िया और चिड़िया को दाना बना देता है। हाथी को चींटी और चींटी को पहाड़ बना देताहै... तेरे लड़के पर एक जिन्न का साया है कि नाम जिसका हसालू है, और जो पच्छिम में काले पहाड़ के ऊपर रहता है, और शौक़ जिसका धनवान लोगों के लड़कों पर आ जाना है (गरजकर) अब देख, आने के उसके लच्छन यही हैं के पहले आदमी उदास रहने लगता है, फिर छोड़ देता है खाना-पीना। ठहरकर प्रभावशाली और डराने-वाले स्वर में) और मुंह से कलेजा कट-कटकर, कट-कटकर, कट-कटकर...

हकीम : (उसकी नक़ल में) कट-कटकटकर, कट-कटकर बहा जा रहा है तेरा भेजा...

वैद्य : जिसमें पड़ गया एक कीड़ा।

पीर : (गुस्से में) आओ... चलो, दोनों बोतल में बंद हो जाओ...

हकीम : जाओ-जाओ, आदमी हैं, जिन्न नहीं हैं कि बोतल में बंदर हो जायें।

मां : (गाती है।)

नाज़ों का वो पाला है बहुत हमको दुलारा

हो जाए अगर ठीक तो हो हमको सहारा।

पैसे की कमी है न किसी बात का दुख है

दुख है, तो यही है, के परेशां है बेचारा।

लाखों की, करोड़ों की, अरब-ख़बरों की दौलत

हो जाएगी बर्बाद जो अच्छा न हो प्यारा।

सुकुमार मंच पर आता है। हकीम, वैद्य ओझा, पीरसब

उसकी तरफ़ झपटते हैं और घबरा जाता है।

वैद्य : आ गया समझ में जो इसको है दुख।

हकीम : चुप रहो, तुम्हें आता नहीं है कुछ।

ओझा : एक झाडू मंगा दो, अभी हो जाएगा सब कुछ।

सुकुमार की मां भी पीछे जाकर खड़ी हो जाती है।

पीर : (ज़ोर का ठहाका मारकर) हसालू, आज फिर हो गया सामना! (चीख़कर) आओ... आओ... अब बचकर जाओगे कहां? अभी देखे हैं मेरे हाथ कहां?

सुकुमार : पिताजी, कौन हैं ये लोग, क्या चाहते हैं ये लोग?

पीर : बेटा सुकुमार, तुम्हारे ऊपर हसालू का साया है के उसी ने तुम्हें तड़पाया है। तुम्हारे मां-बाप को रूलाया है। तुम्हें दीवाना बनाया है।

सुकुमार : (बिगड़कर) उसने तो मुझे दीवाना नहीं बनाया, पर आप सब मिलकर मुझे ज़रूर बना देंगे। (मुड़कुर जाते हुए) अगर मुझे तंग किया तो सन्यास ले लूंगा, धूनी रमा लूंगा। परिवार छोड़ दूंगा। संसार तज दूंगा। रिश्ते-नाते तोड़ लूंगा।

(तेज़ी से निकल जाता है। उसी के पीछे हकीम, वैद्य, ओझा, पीर मुंह लटकाये निकल जाते हैं। सुकुमार की मां सामने आ जाती है।)

मां : मेरी बात जो मानो अब

इसका ब्याह रचाओ अब

शादी से मन बदलेगा

सारे ग़म तब सह लेगा

मेरी बात जो मानो अब

इसका ब्याह रचाओ अब।



दृश्य : तीन

(साहूकार की हवेली। एक ओर चारों, साहूकारों के बीच में सुकुमार हाथ में जयमाला लिए खड़ा है और दूसरी ओर कई कन्याएं अपने-अपने पिता के साथ खड़ी हैं।)

साहूकार-1 : धन्य है, धन्य है, परमपिता परमेश्वर, कि तूने यह दिन दिखाया, कि अपने पुत्र सुकुमार का विवाह होने की घड़ी आ पहुंची। सुकुमार लाखों में एक, अक़्ल का पुलता, दिमाग़ में यकतां, धीरे-वीर-गंभीर, परोपकारी गुनी, शक्तिशाली है।... सज्जनो, आपको मालूम है कि हमारी हवेली रूप, ज्ञान और धर की त्रिवेणी है। धनिकों का तीर्थ-स्थान है, रूप का ख़ज़ाना है, ज्ञान का मंदिर है तो हे बेटे सुकुमार, तेरे सामने ये जो सुंदरियां खड़ी हैं, ये देश की सर्वश्रेष्ठ सुंदरियां हैं। सुंदरियां क्या हैं, अप्सराएं हैं, अप्सराएं क्या हैं साक्षात देवियां हैं! तो हे बेटे, आगे बढ़, इनमें से जिसके गले में चाहे जयमाला डाल।

(सुकुमार दोनों हाथों में जयमाला लिए आगे बढ़ता है। पहली लड़की के पिता के सामने पहुंचता है तो लड़का का पिता हाथ जोड़कर कुछ कहता है। सुकुमार आगे बढ़ जाता है। दूसरी लड़की के पास पहुंचता है।)

दूसरी लड़की

का पिता : ( गाता है।)

पांच कन्याओं का पिता, करता है परनाम

इससे ब्याह रचाइए तो आप हमारे राम।

(नगाडा)

सुनकर डुग्गी आपकी आया हूं उज्जैन से

ब्याह अगर हो जाए इसका घर जाऊं मैं

चैन से। (नगाड़ा)

(सुकुमार आगे बढ़ जाता है और तीसरी लड़की के सामने खड़ा हो जाता है।)

तीसरी लड़की

का पिता : (गाता है।)

लड़की लड़की है हमारी बहुत अच्छी लड़की

लड़़की लड़की है, हमारी बहुत अच्छी लड़की।

नाचती-गाती है और खाना पकाती है

पूजा करके ही सदा घर से निकलती है ये

लड़की लड़की है, हमारी बहुत अच्छी लड़की।

इसकी आंखें हैं के जैसे हों हिरन की आंखें

इसका रंग-रूप निराला है ग़ज़ब की बातें

लड़की लड़की है, हमारी बहुत अच्छी लड़की।

सुकुमार चौथी लड़की की तरफ़ बढ़ता है।

चौथी लड़की

का पिता : नाम है भीम मेरा काम पहलवानी है

पूरी दुनिया में मेरा कोई नहीं सानी है

सामने वो आए मेरे मार जिसे खानी है

बाप लड़की का हूं ये मेरी परेशानी है

मत समझो कि कस्तूरी के लिए लड़कों का अकाल है। इसके लिए तो वर पकड़ कर लाना मेरे लिए बायें हाथ का कमाल है।

(गाता है।)

शादी करने को बहुत लड़के थे इससे तैयार

मैं भी तैयार था, ये भी बहुत तैयार।

पर हुआ ऐसा कि जिस रोज़ वो लड़के आए

नाश्ता करती थी बैठी हुई ये जानेगिजर

नाश्ता करते जो देखा इसे तो भाग गए

मैं बुलाता रहा कहता रहा आओ-आओ

भगना था उन्हें वो भाग गए, भाग गए।

(सुकुमार पांचवीं लड़की के पास आता है और उसके गले में जयमाला डाल देता है। शहनाई बजने लगती है।)



दृश्य : चार

(सुंदरी झूला झूल रही है। सुकुमार उसे झूला झुला रहा है। संगीत के साथ झूले की पेंगें तेज़ होती जाती हैं। धीरे-धीरे प्रकाश चला जाता है। मंच पर अंधेरा।)

धीरे-धीरे प्रकाश फिर आता है। सुंदरी नृत्य कर रही है और सुकुमार किसी कोने में खड़ा खोये-खोये अंदाज़ में किसी और तरफ़ देख रहा है। सुन्दरी नृत्य तेज़ करती है। सुकुमार को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करती है, पर सुकुमार बहुत आकर्षित नहीं होता। अंधकार।

प्रकाश फिर धीरे-धीरे आता है। सुन्दरी बिस्तार पर लेटी है। सुकुमार एक कोने में खड़ा बाहर देख रहा है। सुन्दरी हाथ ऊपर उठाकर अंगड़ाई लेती है। चूढ़ियां खनक उठती हैं। पर सुकुमार उसकी ओर देखता तक नहीं। सुन्दरी फिर अपनी चूड़ियों खनकाती है, पर सुकुमार आकर्षित नहीं होता। चूड़ियां खनकने की आवाज़ क्रमश तेज़ होती हैं। पर सुकुमार वैसे ही खड़ा रहता है। अचानक मंच पर अंधेरा।)



दृश्य : पांच

(सुकुमार और सुन्दरी सोने की तैयारी में हैं। सुकुमार कक्ष की खिड़की पर बाहर की ओर मुंह किए खड़ा है और सुन्दरी बिस्तर पर बैठी है।)

सुन्दरी : हे मेरे सिरताज, हे मेरे प्रिय, हे मेरे आराध्य, आपको पिछले कई माह से इस तरह बेक़रार पाती हूं, जैसे पानी बिन मछली, जैसे चांद बिन चकोर, जैसे प्रेमिका बिना प्रेमी। हे मेरे प्राण, पर आपकी प्रेमिका तो आपके पास है। क्या इसका नहीं आपको विश्वास है?

सुकुमार : ऐ मेरी जानेतमन्ना, तुमको क्या ख़बर के मैं किसी आग में जलता हूं? तुमको क्या पता के मैं किस ग़म में तड़पता हूं? तुमको क्या मालूम के मैं रातों को क्यों सिसकताहूं? तुमको क्या पता के मैं बच्चों की तरह क्यों बिलखता हूं? हाय, तुम्हें क्या पता!

सुन्दरी : हे मेरे प्राण आपको दुख है तो क्या? आपको चिन्ता है तो क्या? आपको बेचैनी है तो क्या? आप बेक़रार हैं तो क्यों?

सुकुमार : (खिड़की के सामने से हट आता है और सुन्दरी की ओर मुंह करके) यही सवाल मैं अपने-आप से पूछता हूं। आज से नहीं, बरसों से यही सवाल मेरे दिमाग़ में घूमता रहता है। इसी सवाल ने मुझे पागल बना दिया है। मैं कहां जाऊं अैर किससे पूंछूं? कौन मुझे बताएगा, जब मुझे ख़ुद ही नहीं मालूम है? कौन मेरा इलाज कर सकता है जबकि मर्ज़ ही का पता नहीं है? कौन उस आग को बुझ सकता है जो जो लगी ही नहीं है?

सुन्दरी : आपको सुख-ही-सुख है मेरे आराध्य!

सुकुमार : हां, मुझे सुख ही सुख है चारों ओर जिधर नज़र उठाता हूं, उधर सुख-ही-सुख दिखाई देता है। मेरी हर सांस सुख में डूबी है। मेरा रोयां-रोयां सुख में नहाया हुआ है। मेरी आंखों के सामने खूबसूरती है। मेरे हाथ संपत्ति बटोरते रहते हैं। पर... हाय, क्या कहूं कि मेरा दिल... समंदरी तूफ़ान में फंसी एक छोटी-सी कश्ती की तरह है, जो न डूबती है और न तूफ़ान ही थमता है।

(सुकुमार का पिता, उसकी मां तथा चारों चाचा एक के बाद एक कक्ष में अन्तर आते हैं। सुकुमार उनको आता देखकर चुप हो जाता है और सुन्दरी सिर ढक लेती है।)

साहूकार-1 : बेटा सुकुमार, हम पांच भाइयों के बीच तुम अकेली संतान हो। इसलिए हमारी संपत्ति के मालिक एक अकेले इंसान हो।

सुकुमार : पिताजी, आपने मुझसे कहा है ये बार-बार, और मैंने आपको जवाब दिया है हर बार, के नहीं चाहिए मुझे ये घर-बार, और न ये कारोबार।

साहूकार-1 : कैसी बातें करते हो, सुकुमार! तुम हमारे लाडले हो, आंखों के तारे हो, दिल की ठंडक हो। हमारी गर्दन भी उड़ा दो तो तुम्हें आशीर्वाद देंगे।

मां : ज़़रूर किसी ने इसे भड़काया है या किसी ने कुछ खिलाया है और हमको तड़पाया है।

सुकुमार : नहीं, मुझे किसी ने नहीं भड़काया है। न किसी ने कुछ खिलाया है।

साहूकार-1 : बेटा, हमने तुम्हें पैदा किया। पास-पोसकर इतना बड़ा किया। फिर तुम्हारा ब्याह किया।

साहूकार-2 : भगवान तक से लोग आस लगाते हैं, हमने भी तुससे आस लगायी है।

साहूकार-1 : बेटा, साहूकार के पुत्र को यूं निठल्ले बैठना शोभा नहीं देता जैसे कि तुम बैठे हो।

साहूकार-2 : कारोबार देखो, घर-बार देखो। अन्दर बाहर देखो। हम बूढ़ों को जाता हरिद्वार देखो। घर की बाहर देखो।

साहूकार-3 : हां बेटा, अब हमें राम-राम करने दो। राम नाम जपने दो।

साहूकार-4 : गद्दी पर बैठ-बैठ कमर झुग कयी।

साहूकार-1 : रूपये गिनते-गिनते उंगलियां दुख गयीं।

सुकुमार : ऐसी बातें न मुझसे करें आप सब

मिलके मुझको बुरा न कहें आप सब।

पैसे गिनने का मुझको नहीं शौक़ है।

चांदी-सोने का मुझको नहीं शौक़ है।

माफ़ चाहें तो मुझको करें आप सब।

साहूकार-1 : बेटा कहता है तू क्या ज़रा होश कर।

ऐसी बातें न कर, तू ज़रा होश कर।

सुकुमार : मैं तो हूं होश में, लेकिन आप सब बेहोश लगते हैं मुझे। पैसे के नशे में चूर लगते हैं मुझे। दौलत इतनी है कि सात क्या चौदह पीढ़ियां भी दोनों हाथों से लुटाएं तो कम हो नहीं सकती। चाहे जिस क़दर मिटाएं पर ख़त्म हो नहीं सकती।... फिर मैं दौलत क्यों कमाऊं? किसके लिए कमाऊं? पूरी ज़िंदगी कूड़े के ढेर को क्यों बढ़ाऊं? क्यों आप परेशान रहूं? क्यों दूसरों को परेशान करता रहूं?

साहूकार-2 : पर बेटा, साहूकार के घर जनम लिया है तूने। इसलिए अपना धर्म निभा।

सुकुमार : चाचाजी, क्षमा करें चाचाजी क्षमा करें, कबाड़ जमा करना आपका धर्म होगा, मेरा नहीं है। सोने-चांदी का अचार डालना आपका धर्म होगा, मेरा नहीं है। बेमक़सद रूपये गिनने से अच्छा है कि मैं आसमान के तारे गिना करूं।

साहूकार-3 : बेटा, हम तुझे जीवन का निचोड़ समझाते हैं। ऊंच-नीच बताते हैं। कल हम न रहेंगे पर तू रहेगा। कारोबार रहेगा। परिवार रहेगा। तेरा यही हाल रहा तो कुछ न रहेगा।

सुकुमार : मुझे मेरे जैसा रहने दीजिये। नहीं तो घर से निकल जाने दीजिए। सन्यास लेने दीजिए। धूनी रमाने दीजिए।

साहूकार-1 : देख बेटा, हमारे जीते-जी सम्हल, नहीं तो सिर पर हाथ रख-कर रोयेगा।

सुकुमार : अभी कौन चैन से सोता हूं जो परे रोऊंगा।

साहूकार-1 : ख़ैर, मर्ज़ी तेरी, जो जी में आए कर। हम वहीं करते रहेंगे जो हमारा कर्तव्य है। तू न करे तो न कर।

सुकुमार : हाय, अफ़सोस, के सब मुझे अपना जैसा बनाना चाहते हैं! बने-बनाये सांचे में ढालना चाहते हैं। हाड़-मांस का नहीं सोने का आदमी बनाना चाहते हैं। पानी नहीं, अमृत पिलाना चाहते हैं। (सीने पर दोनों हाथ मारकर) हाय, लेकिन मुझे समझता कोई नहीं।



दृश्य : छह

(सुकुमार का शयन-कक्ष सुन्दरी सो रही है और सुकुमार खिड़की के पास खड़ा बाहर देख रहा है। सुन्दरी करवट बदलकर उठती है और हैरत से अपने हाथ देखती है जो नंगे हैं। कान टटोलती है जिनमें बालियां, बुंदे आदि नहीं हैं। उसके शरीर का कोई आभूषण नहीं है।)

सुन्दरी : सुनो जी, ये क्या हंसी-ठिठोली है! ऐसी दिल्लगी न किया करो।

सुकुमार : (पलटकर) वाह, ये खूब कही! दिल्लगी करें आप और नाम लगायें हमारा।

सुन्दरी : देखो जी तुम्हें मेरे सर की सौगंध, मेरे गहने लौटा दो।

सुकुमार : ये अच्छी कही! लाओ निकालो मेरे सोने के कड़े! किस होशियारी से सोते में निकाल लिए।

सुन्दरी : मैंने? (आश्चर्य से) लो, झूठ की हद कर दी तुमने!... सोते में मेरा सारा ज़ेवर उतार लिया...

सुकुमार : मैं क्यों उतारूंगा तेरा ज़ेवर?

सुन्दरी : मैं ही रात जल्दी सो गई थी। तुम जाग रहे थे।

सुकुमार : पर तुम बीच में तो उठी थीं।

सुन्दरी : उठी थी, पर जब तो था सारा गहना। ज़रूर तुमने सुबह-सुबह उतारा है और, कहीं छिपाया है। (हंसती है।) चलो, ख़त्म करो मज़ाक़ और...

सुकुमारः बातें क्या बनाती हो, आंखों में धूल झोंकती हो! चलो, बहुत बना लीं बातें और लगा लीं घातें। अब मेरा हार लौटा दो।

सुन्दरी : (रुआंसी होकर) अच्छा सुलूक करते हो और मुहब्बत का दम भरते हो! क्या ज़माना आया है के उल्टा चोर कोतवाल को...

(बेटा सुकुमार बेटा सुकुमार की आवाज़ें लगाता, हांफता घरताया हुआ साहूकार-1 आता है। सुन्दरी और सुकुमार उठकर खड़े हो जाते हैं।)

साहूकार-1 : (बहुत घबरा कर) एक हो गयी अजीब बात। अंधेर हो गया रात। हवेली में सेंध लगा गयी रात। चोरी हो गयी रात।

सुकुमार : (सामान्य ढंग से) चोरी?

साहूकार-1 : (दोनों हाथों से सिर पकड़कर) हां, बेटा, हम भी सो गये। तुम भी सो गये। नौकर-चाकर भी सो गये। मुनीम-मुन्शी भी सो गये। सिपाही- पहरेदार भी सो गये। फिर चोरों ने सेंध लगायी। अंदर आये।

सुकुमार : पर गया क्या, पिताजी?

साहूकार-1 : बेटा, जो कमाना जानता है वो खाना भी जानता है। हवेली के नीचे इतने भूंइधरे हैं, इतनी भूलभूलाइयां हैं, इतने कमरे-कोठरियां हैं कि चोर वहां तक क्या पहुंच पाते, सूंघ-सांघकर चले गये। साहूकार के माल तक चोर-उचक्के पहुंच जायें तो साहूकार साहूकार न रहे बेटा। हमने गोली नहीं खेली है कच्ची। इंतिज़ाम रखा है पक्का। पर तुम्हारा तो कुछ नहीं गया, बेटा?

सुकमार : हमारा क्या गया, हां चोरों के भाग्य खुल गये। हमारी हवेली से राते नहीं, हंसते गये होंगे।

साहूकार-1 : तू क्या बातें करता है, नादान? तुझे नहीं अपने पराये की पहचान! बता, तेरा क्या गया, मेरी जान?

सुकुमार : पिताजी, हमने और इसने (सुन्दरी की ओर इशारा करता है।) जो ज़ेवर-गहने पहने थे वे चले गये। पर आप अफ़सोस क्यों करते हैं? हाथ क्यों मलते हैं? आहें क्यों भरते हैं? समंदर से एक बूंद पानी चला भी गया तो क्या? पर हां, पिताजी, हैरत तो एक बात पर। अक़्ल परेशान है तो एक बात पर। चोर थे के हवा थी। चोर थे कि सपना थे। चोर थे कि भूत थे। चोर थे कि शैतान थे। सोते में सारा ज़ेवर उतार लिया। नाक की कील उतार ली। पैर से पहुंची उतार ली। हाथ के कड़े उतार लिए। गर्दन से हार उतार लिया। और ख़बर तक न हुई, करवट तक न ली। वाह-वाह-वाह-वाह, क्या हुनर है! क्या कला ह! क्या हाथ की सफ़ाई है! क्या हिम्मत का काम है, क्या जिगर-गुर्दे की बात है! क्या...

साहूकार-1: चुम रह, सुकुमार! तेरी अक़्ल हो गयी है बेकार। क्यों कर रहा है तकरार। जिसके घर चोरी होती है वो रोता है, और तू हंसता है? देख, ख़बरदार! चोरों ने घर देख लिया है। आज नहीं तो कल आयेंगे। आज इत्ता ले गये हैं तो कल उत्ता ले जायेंगे।

(गांव का ठाकुद अन्दर आता है

साहूकार-1 उसे प्रणाम करता है।

ठाकुर के साथ अन्य लोग भी हैं।)

साहूकार-1 : धन्य है भाग्य हमारे। ठाकुर घर पधारे।

ठाकुर : (तान मारकर)

चोरी की ख़बर सुनके चला आ रहा हूं मैं

उट्ठा हूं बिस्तरे से चला आ रहा हूं मैं

देखा-सुना नहीं है चला आ रहा हूं मैं

खाया-पिया नहीं है चला आ रहा हूं मैं

जागा हूं रात भर का चला आ रहा हूं मैं

साहूकार-1 : (तान मारकर)

महाराज, हे महाराज!

साहूकार-2,3

और 4 : दया करो, महाराज।

ठाकुर : कहां मर गये खोजी?

(दो खोजी तुरन्त सामने आते हैं।)

ठाकुर : अभी-अभी तुम दोनों जाओ।

चोर पकड़ कर फ़ौरन लाओ

हड्डी-पसली तोड़ो उनकी

गुर्री-गुर्री तोड़ो उनकी

देखो क्या अंधेर मचा है

धन के पीछे चोर पड़ा है।

(सुकुमार को छोड़कर सभी लोग कोरस में गाते हैं।)

देखो क्या अंधेर मचा है

धन के पीछे चोर पड़ा है।

(इसे कई बार दोहराया जाता है।)



दृश्य : सात

(चार चोर एक रंगे-धुड़ंगें एक मोटे रस्से में बंधे हुए हैं। रस्से के दोनों सिरे लोग पकड़े हैं। आगे-आगे दोनों खोजी हैं। पीछे लोगों की भीड़ है जो चोरों के बारे में बातें कर रहे हैं, हंस रहे हैं। चोरों के दोनों तरफ़ दो-दो आदमी कंटीली छड़ियां चोरों के नंगे बदन पर बरसा रहे हैं। चोरों को जब-जब कंटीली छड़ियां पड़ती हैं तो लोग खुश होकर शोर मचाते हैं। चोरों के जिस्म से खून टपक रहा है और वे निढाल हैं। उन्हें लगातार आगे खींचता और पटका जा रहा है। यह शोर सुनकर सुकुमार निकलता है और चोरों को इस हालत में देखकर अवाक् खड़ा रह जाता है। साहूकार-1, साहूकार-2, साहूकार-3, और ठाकुर भी सामने आते हैं।)

खोजी-1 : (ठाकुर और साहूकारों को प्रणाम करके।)

आप का हुक्म बजाया सरकार

चोर पकड़ लाया सरकार।

खोजी-2 : (हाथ जोड़कर) कर रहे थे हिस्सा-बांट

बिछा रखी थी खाट। हमने लगाई डांट

भागे ये गुनहगार। कर लिया गिरफ़्तार।

ठाकुर : किया है अच्छा काम।

मिलेगा इसका इनाम

(चोरों की और अधिक पिटाई शुरू हो जाती है। सुकुमार अवाक् खड़ा देखता रहता है।)

ठाकुर : (चोरों से) पिछली बार जब पकड़े गये थे तुम लोग। खूब मारे गये थे तुम लोग। माफ़ी मांग रहे थे तुम लोग। फिर छोड़ दिये गये थे तुम लोग। कान पकड़ रहे थे तुम लोग। पर फिर मेरे इलाक़े में आ घुसे तुम लोग! क्या चोरी करते हो तुम लोग? और पिटाई करो! आदी चोर हैं। सिरज़ोर हैं।

(चोरों की और अधिक पिटाई होने लगती है।)

खोजी-1 : (एक पोटली ठाकुर की तरफ़ बढ़ाता है।) यही मिला था माल। चोरी जिना गया था माल। उतनी ही है माल।

(ठाकुर पोटली साहूकार'1 की तरफ़ बढ़ा देता है और वह जल्दी-जल्दी खोलकर देखता है।)

साहूकार-1 : (प्रसन्न होकर) सब ज़ेवर मिल गया। भगवान की कृपा हो हो गयी। अब मैं पचास ब्राह्मणाकें को भेजन कराऊंगा। गोदान करूंगा।

दोनेां खोजीः हमें इनाम मिले, सरकार!

(साहूकार एक क्षण सोचकर वही पोटली खोजियों की ओर उछाल देता है।)

साहूकार-1: यही तुम्हारा इनाम है।

(लोग प्रसन्न होते हैं।)

दोनों खोजीः सरकार, आप दानी हैं। परोपकारी हैं।

साहूकार-1: (चोरों की ओर संकेत करके) पर इनकी चटनी बना डालों जीते-जी मार डालो। हवेली का रास्ता देख लिया है। मेरी मानो तो आंखें निकाल डालो।

(पिटाई और अधिक होने लगती है। एक चोर गिर पड़ता है।)

ठाकुरः इनकी इस तरह् जान लूंगा कि साहूकार की हलेवी की तरफ़ कोई नज़र उठाकर भी न देखे। आंखें तो इनकी निकाली ही जायेंगी। पहले इन्हें टिकटिकी पर बांधो और इनकी खाल उतारो।

(चोरों की और अधिक पिटाई होने लगती है। एक चोर को टिकटिकी पर चढ़ाया जाने लगता है। वह क़रीब-क़रीब मर चुका है। उसे टिकटिकी पर चढ़ाया जाता देख कर सुकुमार आगे बढ़ता है।)

सुकुकारः (उत्तेजित और भावुक) बस, बंद करो ये नाटक! अब अगर कोई आगे बढ़ा... (आगे बढ़ते हुए) तो उसका ग़रीबान मेरे हाथ में होगा। अब कोई आगे बढ़ा तो उसका ख़ून मेरी गर्दन पर होगा। अब अगर कोई आगे बढ़ा तो सौगंध खाता हूं अपनी मां के दूध की के उसकी बोटी-बोटी कर डालूंगा। (ठहरकर) छोड़ दो इन चोरों को। ना चाहिए मुझे अपना माल और न चाहता हूं दिलाना इन्हें सज़ा। आज़ाद कर दो इन्हें और कह दो कि जहां चाहें चले जायें।

(सन्नाटा छा जाता है। चोरों की पिटाई होना बंद हो जाती है। सब आश्चर्य में पड़ जाते हैं। सब लोग ठाकुर की तरफ़ देखने लगते हैं और ठाकुर सुकुमार के पिता साहूकार की तरफ़ देखता है। पिता वस्तुस्थिति को भांप लेता है और सुकुमार की तरफ़ बढ़ता है।)

साहूकार-1: बेटा, तुम अभी बच्चे हो। बुरा न मानो तो कहूं कि अक़्ल के कच्चे हो। तुम्हारी सबसे बड़ी कमी यही है कि तुम बड़े सच्चे हो।... पर बेटा, कुत्ते की पूंछ हज़ार बरस बांस में राखने के बाद भी सीधी नहीं होती। गधे को अगर बादाम खिलाये जायें तो वो घोड़ा नहीं बन सकता।... बेटा, ये पेशेवर चोर हैं, इनसे हमदर्दी करने का मतलब अपनी गर्दन काटना है।... इससे पहले भी ये इसी तरह कई बार पिट चुके हैं...

सुकुमारः (आश्चर्य से) पहले भी ये इसी तरह् कई बार पिट चुके हैं?

साहूकार-1: हां बेटा, फिर भी चे चोरी करते हैं, सीनाजोरी करते हैं। हम तुम तो सोच भी नहीं सकते, पर ये सीनाज़ोरी करते हैं।

सुकुमारः ये तो बड़ी निराली बात है। ये तो बड़ी अनोखी बात है। क्या इन्हें मार खाने में बड़ा मज़ा आता होगा?

साहुकार-1: क्या बचकानी बातें करते हो, साहूकार? मार खाने में भी किसी को मज़ा आयेगा? हडि्डयों का सुरमा बनवाने में भी किसी को मज़ा आयेगा? मुंह काला कराने में भी किसी को मज़ा आयेगा?

सुकुमारः मैं कैसे कुछ कह सकता हूं, पिताजी। मार क्या, मैंने तो कभी ठोकर भी नहीं खायी।... मार खाने में मज़ा न आता होगा तो चोरी करने में तो जरूर आता होगा। जब ही तो उसके लिए ये इतनी मार खाते हैं। हडि्डयां तुड़वाते हैं, खाल खिंचवाते हैं, पर चोरी करने से बाज़ नहीं आते हैं। (अपने आपसे) चोरी करने में क्या मज़ा है?

(मध्यांतर)



दृश्य : आठ

(ठाकुर अपनी चौपाल में छोटे-से तख्‍़त पर तना बैठा है और उसके सामने हाथ जोड़े गांव के साधारण लोग खड़े हैं।)

आदमी 1: रात चोरी हो गयी, सरकार।

से लोगः (एक साथ) हां, सरकार, कल रात फिर चोरी हो गई।

आदमी 2: हर रात चोरी होती है, सरकार।

सब लोगः (एक साथ) हां, सरकार, गांव में ठाकुर और साहूकार की हवेली को छोड़कर हर घर में चोरी हो चुकी है।

आदमी 3: चोर अभी तक नहीं पकड़ा गया है, सरकार।

सबः (एक साथ) हमारी रक्षा करें, अन्नदाता, हमारी रक्षा करें।

आदमी 4: (लगता है।)

इससे पहले कभी ऐसा होता न था

चोरी होती थी लेकिन ये होता न था

सब डरे घर में बैठे रहें रात भर

इससे पहले कभी ऐसा होता न था

सबः (एक साथ)

अन्नदाता गलती चोरों की नहीं है।

उनका काम चोरी करना है।

वे अपना काम कर रहे हैं।

ग़लती खोजियों की है।

वे अपना काम नहीं कर रहे हैं।

ठाकुरः (खोजियों से)

मार लगेगी ऐसी तुमको जाओगे सब भूल

चोर पकड़कर लाओ सालों, करो न टालमटूल।

खोजी 1 : (ठुमका लगाते हुए गाता है।)

रात दिन हम तो भटके हैं के पकड़ें उसको

जिसने अंधेर मचा रखा है पकड़ें उसको।

जिसने बदनाम किया है हमें पकड़ें उनको।

जो हवा की तरह आता है निकल जाता है

रात में एक दिन तरकीब से पकड़ें उसको।

ठाकुरः (गुस्से में)

बातें बनाना छोड़ दो कुछ काम तुम करो

खोजी का काम छोड़ दो दुकान तुम करो।

तुमसे न होगा काम मुझे लग रहा है ये

जाओ न अब बदनाम मेरा नाम तुम करो।

खोजी 2: देखे हैं बहुत चोर पे ऐसा नहीं देखा

है सैकड़ों सिरजार पे ऐसा नहीं देखा।

आता है निकल जाता है परछाईं के माफ़िक

पैरों से वो चलता नहीं दो-पाये के माफिक

लेता नहीं हैं सांस वो इंसान के माफिक।

ठाकुरः (गुस्स में चिल्लाकर) तुम लोगों ने नाक मेरी जड़ से कटाई है कि इज़्ज़त मेरी बढ़ाई है। होती रहे मेरे ठिकाने चोरी और सिरज़ोरी और करते रहो तुम लोग हरामखोरी। छः महीने होने को आये, चोर क्या चोर की धूल तक न लाये। (ठहर-कर) जानता हूं, दरअसल तुम ही लोग चोर हो और तुम्हीं खोजी हो। जब तक तुम लोगों की ठुकाईं न की जायगी, बात सामने न आयेगी।

सबः (एक साथ) हां, सरकार, खोजियों की ठुकाई की जाये।

खोजी 1: (हाथ जोड़कर) एक महीने की मोहलत दीजिए, सरकार। चोर न मिले तो गर्दन कटा दीजिये, सरकार।

ठाकुरः चलो, जहां छः महीने देखा, हां एक महीने और देखेंगे।

आदमी 1: ठाकुर साहब ठौर के सुन लें मेरी बात

चिकनी चुपड़ी है नहीं खरी है मेरी बात।

ठाकुरः बेलाग कहो। बेहिचक कहो। बेखटके कहो। बेख़ौफ़ कहो।

बादमी 1: इस नये चोर को कोई पकड़ेगा तो चोर ही पकड़ सकेगा, खोजी क्या पकड़ेंगे। इसलिए, अन्नदाता, मेरी अरज है कि बुलाकर चोरों से कहो कि नये चोर को पकड़ें और इनाम पावें।

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दृश्य : नौ

(रात का समय है। नये चोर को पकड़ने के लिए पुराने चोर एक दीवार के पास छिपे बैठे हैं। अचानक रस्सी ऊपर से गिरती है और नया चोर उससे उतरता है। चोर जैसे ही नीचे आता है, पुराने चोर उसे लाठी से मारते हैं। नया चोर गिर पड़ता है और उठता है, तो पुराने चोर उसका चेहरा देखते हैं। नया चोर सुकुमार है। यह देख सब पुराने चोर उसके पैर पकड़ लेते हैं।)

चोर 1: गलती ऐसी हुई के लगा दें जो फांसी तो कम है

ज़िन्दा कोल्हू में हमको पिरा दें तो कम है

बोटी-बोटी हमारी उड़ा दें तो कम है।

सुकुमारः सज़ा क्यों, तुम्हें तो इनाम मिलेगा कि तुमने एक चोर पकड़ा है जिसने पूरे ठौर में तहलका मचा दिया था। रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा दिया था।

चोर 2: अन्नदाता, सूरज पच्छिम से निकल सकता है, पानी में आग लग सकती है, धूप चांदनी में बदल सकती है, बबूल के पेड़ में आम के बौर आ सकते हैं, लेकिन आप चोरी नहीं कर सकते, सरकार।

सुकुमारः देख, मैं अभी चोरी करके उतरा हूं और तूने मुझे पकड़ा है।

चोर 1: जो राजाओं का राजा है, जो धनवानों का धनवान है, जो दानियों का दानी है, जो परोपकारियों का परोपकारी है, जिसकी हवेली से हज़ारों को रोज़गार मिलता है, जो लाखों को पेट भरता है, जो करोड़ों का दान-धर्म करता है, वह चोरी क्यों कर सकता है, अन्नदाता?

सुकुमारः क्या तुझे अपनी आंखों और मेरी बात पर विश्वास नहीं?

चोर 1: सारी दुनिया जिसे सच समझती है हम उसे झूठ कैसे कह सकते हैं, माई-बाप?

सुकुमारः बंद करो ये बकवास! मैंने चोरी की ह। मुझे वही सज़ा मिलनी चाहिए जो चोरों को मिलती है। कंटीली बातों से मुझे छलनी कर डालो। टिकटिकी पर चढ़ाओ। तब मुझे वह मिल सकेगा जिसकी तलाश है।... चलो, अब मुझे ठाकुर के सामने ले चलो।

चोर 1: अन्नदाता, हमसे अन्याय न होगा।

सुकुमारः अजीब मूर्ख है, न्याय को अन्याय कहता है!

चोर 1: हमें क्षमा करें, मालिक।

सुकुमारः चल, तो मैं अपने आप चलता हूं स्वयं अपने लिए सज़ा मांगता हूं। सज़ा मेरा अधिकार है और किसी को इससे क्या तकरार है?

(सुकुमार आगे-आगे और चोर उसके पीछे-पीछे ठाकुर के घर के सामने आते हैं। सुकुमार ज़ंजीर बजाता है और ठाकुर निकलता है। आश्चर्य से सुकमार को नंगे बदन खड़ा देखता है।)

ठाकुरः (चारों से) ये तुम्हारी क्या जालसाज़ी है, हरामज़ादो! मैंने तुम्हारी खाल न खिंचवा ली तो अपने बाप की औलाद नहीं।

चोर1: (हाथ जोड़ कर) हज़ूर, हमारा क्या क़सूर...

सुकुमारः (लगता है।)

ठाकुर तुम्हें सुनाता हूं छोटी-सी दास्तां

मानो जो मेरी बात तो सच्ची है दास्तां।

जिसकी तलाश थी तुम्हें वो चोर मैं ही हूं

जिससे ठिकाना डरता था वो चोर मैं ही हूं

जिसको हवा समझते थे वो चोर मैं ही हूं।

(ठाकुर पहले आश्चर्य से देखता है फिर मज़ाक़ समझ कर ज़ोर से हंसता है।)

ठाकुरः समझ गया मैं आपको करते हैं मसख़री

ये क्या सूझी आपको करते हैं दिल्लगी।

सुकुमारः (गाता है।)

ठाकुर समझो बात को करो न हेरम-फेर

सज़ा मुझे जो चाहो दे दो करो न इसमें देर।

ठाकुरः (ठहाका लगाकर) तुम्हारा हृदय कोमल है, सुकुमार, और ज़रूर ये हरामज़ादे चोर तुम्हारे पास जाकर गिड़गिड़ायें होंगे कि इन्हें जिस नये चोर की तलाश है वह इनके हाथ नहीं आ रहा है और तुमने इनकी तकलीफ़ दूर करने के लिए अपने को चोर तक बना दिया होगा। (चोरों से) मैं सब समझता हूं, हरामज़ादो, चोर की पहिचान मुझे नहीं तो क्या तुम्हें होगी?

(कुछ और लोग भी जमा हो जाते हैं। सारे साहूकार भी आ जाते हैं)

साहूकार1: यह क्या देख रहा हूं, सुकुमार, ज़रूर दाल में कुछ काला है।

सुकुमारः पिताजी, मैं चोर हूं। मैंने चोरी की हैं मुझे सज़ा मिले। वही सज़ा जो चोरों को मिला करती है।

सब चोरः नहीं, अन्नदाता, यह झूठ है।

सब चोरः तुम चोरी नहीं कर सकते, सुकुमार।

सुकुमारः (गाता है।)

चोरी चोरी है उसे और कहोगे तुम क्या

चोरी चोरी है उसे और कहोगे तुम क्या।

चोरी गर चोर करे उसको सज़ा मिलती है

चोरी गर शाह करे उसको सज़ा क्यों न मिले।

मेरी ये बात समझ में नहीं आती बिल्कुल

मैंने जो चोरियों की हैं उन्हें गर ये करते

इनको सूली पर चढ़ा के बहुत तुम खुश होते

वो सज़ा क्यों न मिले मुझको जो मिलती इनको।

चोरी चोरी है उसे और कहोगे क्या

चोरी चोरी है उसे और कहोगे तुम क्या

साहूकार 2: तुम्हारी बात यहां कोई नहीं मानता, सुकुमार।

तुम्हारे पास चोरी करने का क्या सुबूत है, सुकुमार।

सुकुमारः (सोचता है और खुश होकर) मैं बता सकता हूं, दिखा सकता हूं कि अब तक मैंने जो-जो चोरियां की हैं और जो माल चुराया है वह कहां छिपाया है। तब तो सबको यक़ीन आ जायेगा। और मुझे वही सज़ा मिलेगी जो चोरों को मिलती है?

(साहूकार और ठाकुर सन्नाटे में आ जाते हैं। एक क्षण तक ख़ामोशी रहती है।)

साहूकार 1: (गला साफ़ करके) जो हुआ सो हुआ, जो गया सो गया। ज़रूर ये हमारे दुश्मनों की जालसाज़ी है और उसमें सुकुमार को फंसाया है... हां, इतना ज़रूर कहता हूं कि इस ठिकाने जिस-जिस के घर चोरियां हुई हैं और जो-जो माल गया उसकी दुगना मैं उसे दूंगा। जिसका गया है माल, उसे कर दूंगा मालामाल।

ठाकुरः धन्य हैं, साहूकार धन्य हैं।

सब लोगः धन्य हैं, साहूकार धन्य हैं।

ठाकुरः दान देने का नया तरीक़ा निकाला है।

सब लोगः धन्य हैं साहूकार, धन्य हैं।

ठाकुरः जिसका गया है माल, उसे कर देंगे मालामाल।

सब लोगः धन्य हैं, साहूकार, धन्य हैं।



दृश्य : दस

(साहूकार की हवेली। सभी साहूकार, सुकुमार तथा सुकुमार की मां बैठे हैं।)

साहूकार1: पर, बेटा, ये तेरे दिल में क्या आयी? ये किसने तुझे राह बताई कि तू अरबों-खरबों की दौलत छोड़-छाड़, हमसे मुंह मोड़कर चोरियों करने लगा?

साहूकार 2: पर तूने यह भी देखा, कि तेरा बाल तक बांका नहीं हुआ, बल्कि तेरी जय-जयकार होने लगी।

(सुकुमार चुपचाप गुमसुम बैठा रहता है।)

साहूकार 3: कुछ तो बोल, सुकमार।

सुकुमारः (गाता है।)

अपने ही रास्ते पे बढ़ा जा रहा था मैं

चोरी किसी वजह से किये जा रहा था मैं।

जीने की आरज़ू में मरा जा रहा था मैं

नये रास्ते का राही बना जा रहा था मैं।

लेकिन ये आप सबने मेरे साथ क्या किया

मुझको बचाके आपने ये जुल्म क्या किया

देते सज़ा जो मुझको तो एक राह फूटती

घेरा है जिसने मुझको वो दीवार टूटती

साहूकार 4: देख सुकुमार, तू चाहे जो कर, पर हम जीते-जी तेरे ऊपर किसी को उंगली न उठाने देंगे।

साहूकारः (अचानक उत्त्ोजित होकर) सौगंध खाता हूं परम पिता परमेश्वर की, कि आज से मैं डाके डालूंगा। (तलवार म्यान से खींच लेता है।) तबाही और बर्बादी का बाज़ार गर्म कर दूंगा। जिसने सामने पाऊंगा मौते के घाट उतार दूंगा। बड़े-बड़ों का कस-बल निकाल दूंगा। ऐसी दहशत फैलाऊंगा कि लोग मेरे नाम से थर्राने लगेंगे। ऐसे-ऐसे डाके मारूंगा कि लोग दांतों-तले उंगली दबा लेंगे।

साहूकार 4: क्या तेरा दिमाग़ चल गया है, रे सुकुमार?

सुकुमारः मैं जो पाना चाहता हूं उसे पाकर रहूंगा। क्या क्या- मुझे कोई न रोक सकेगा।

साहूकार 1: तू क्या पाना चाहता है, मेरे बेटे? मुझे भी तो बता।

सुकुमारः मैं जो पाना चाहता हूं वह दौलत से नहीं खरीदा जा सकता।

साहूकार 1: धर्म, ज्ञान, बुद्धि, रूप- क्या है जो दौलत से नहीं ख़रीदा जा सकता है? मान, सम्मान, प्रतिष्ठा- क्या है जो दौलत से नहीं ख़रीदा जा सकता? धन, दौलत ऐश्वर्य- क्या है जो दौलत से नहीं ख़रीदा जा सकता? प्रेम, धृणा, पाप, पुण्य- क्या है जो दौलत नहीं ख़रीद सकती?

सुकुमारः लेकिन मुझे जो चाहिए है वह दौलत से नहीं ख़रीदा जा सकता।

साहूकार : (ठंडी सांस लेकर) भगवान जाने तुझे क्या चाहिए।

सुकुमारः ठीक है, तो मैं हवेली से निकलता हूं और जो कुछ मुझे चाहिए उसे पाने की कोशिश करता हूं।

(बाहर निकल जाता है। साहूकार उदास चिंतित हो जाते हैं। थोड़ी देर तक ख़ामोशी रहती है। सुकुमार की मां रोने लगती है।)

साहूकार 1: सुकुमार की मां, रोने धोने से काम न चलेगा... फ़रियाद-बैन करने से काम न चलेगा। सुकुमार का धुन पक्का है। डाके ज़रूर डालेगा।

साहूकार 2: अकेला डाके डालेगा तो पकड़ा जायेगा या-

माःं किसी विपदा में फंस जायेगा या-

साहूकार 1: जेल की हवा खायेगा या-

साहूकार 2: हड्डी-पसली तुड़वायेगा या-

साहूकार 3: नहीं, मेरे भाइयो, ऐसा कुछ न होगा। सुकुमार डाके डालेगा, पर न पकड़ा जायेगा, न किसी विपदा में फंसेगा, न हड़डी- पसली तुड़वायेगा।

साहूकार 1: यह कैसे, मेरे भाई?

साहूकार 3: सुकुमार डाके डालेगा पर सम्मान पायेगा। धन और ख्याति पायेगा।

साहूकार1: यह कैसे, मेरे भाई?

साहूकार 3: मेरे भाइयो, मैं आज ही राज-दरबार जाता हूं और सुकुमार के नाम सरकारी दरोगा की नियुक्ति का परवाना लिए आता हूं। वह राजा का विश्वासपात्र दरोगा नियुक्त हो जायेगा। जिसके साथ राजा की सेना होगी। तब जैसा चाहेगा वैसा करेगा। कोई चूं तक न कर सकेगा।

साहूकार 1: (कुछ सोचकर) ठीक कहते हो,

ठीक कहते हो, मेरे भाई, बिल्‍कुल उचित। पर उतनी दूर जाने की क्‍या आवश्‍यकता? आओ, हम सुकुमार को दिखा दें कि दौलत से क्‍या नहीं हो सकता।

साहूकार 2: धन-दौलत से असंभव को संभव बनाया जा सकता है।

सभी साहूकारः (एक स्वर में) असंभव को संभव बनाया जा सकता है।

साहूकार 1: डुग्गी पीटने वाले को बुलाया जाये।

साहूकार 2: हां, बुलाया जाय।

साहूकार 3: अवश्य बुलाया जाय।

माःं तुरन्त हाज़िर किया जाये।

(डुग्गी पीटने वाला आता है।)

साहूकार 1: (डुग्गी पीटने वाले से) हमारा इकलौता लाडला घर से निकल गया है। दिमाग़ में क्या आयी है कि डाके डालने गया है। मरने-मारने गया है। आग से खेलने गया है। तो हे डुग्गी पीटने वाले, तेरा मुंह मोतियों से भर दिया जायेगा। तेरी सात पीढ़ियों को खुश कर दिया जायेगा। तेरा इहलोक और परलोक सुधार दिया जायेगा। तू सारे राज्य में डुग्गी पीट दे, मुनादी कर दे कि जिस घर में सुकुमार डाका डालेगा और जितना माल ले जायेगा, उससे दुगना माल उस आदमी को हमारी हवेली से मिल जायेगा।

डुग्गी पीटने वालाः (डुग्गी बजाकर गाते हु)

एक मुनादी सुन लो लोगो

बात पते की सुन लो लोगो।

जान बचेगी सुन लो लोगो

काम बनेगा सुन लो लोगो।

देश के साहूकार का बेटा

लाड का पाला नाज़ का बेटा

घर से भागा है यह कहकर

लूट करेगा डाकू बनकर

जिसके घर वह डाकू आये

वह उसको आसन पे बिठाये

घर में जो हो उसे खिलाये

फिर डाकू जो कुछ ले जाये

जिसका जितना धन जायेगा

उसको दुगना मिल जायेगा।

एक मुनादी सुन लो लोगो!



दृश्य : ग्यारह

(सुकुमार एक घर के सामने खड़ा है। वहां डाका डालने गया है।)

सुकुमारः डाकू हूं कौम का नाम मेरा सुकुमार

घर से निकला हाथ में ले नंगी तलवार।

बदक़िस्मती तू मुझसे, कर न कोई तकरार-

एक साधारणः (तुरन्त दरवाजा खोलकर) खुल गए भाग्य हमारे। बाप यहां।

आदमीः पधारे।

सुकुमारः क्यों करता है नादानी?

मैं हूं डाकू खानदानी।

कर दूंगा तुझे पानी-पानी।

बता कहां रखा है माल-पानी।

बादमी-1: पहले हाथ मुंह धो लें, सरकार। थोड़ा आराम कर लूं सरकार, फिर कुछ खा लें सरकार। फिर जो चाहें ले जायें, सरकार।

(एक आदमी आता है। इसे आदमी-2 कह सकते हैं।)

आदमी-2: (सुकुमार से हाथ जोड़कर) माई-बाप आप मेरे घर डाका डालने चलें। आप यहां आ गए डाका डालने? इस कंगाल के पास कुछ नहीं है, सरकार। मेरे बास बहुत माल है, सरकार।

आदमी-1: आप इसकी बातों में न आएं, हुजूर। आप मेरे घर पहले आए हैं, यहीं डाका डालें, सरकार।

(सुकुमार आश्चर्य में पड़ जाता है।)

आदमी-2: हुजूर, डाकू डाका वहीं डालता है जहां माल होता है। ये कंगाल है।

(सुकुमार कुछ खिन्न हो जाता है।)

सुकुमार-2: मेरी समझ में यह नहीं आती।

आदमी-1: (आदमी-2 से) अब तुम यहां से चले जाओ। मेरे घर डाका पड़ने दो। मेरी क़िस्मत खुलने दो।

आदमी-2: (निराशा होकर चला जाता है।)

आदमी-1: (सुकुमार को कुर्सी पर बिठाता है।) थक गए होंगे, सरकार। थोड़ा आराम करें। हाथ-मुंह धोने को कुंए से ताज़ा पानी लाता हूं। कहें तो हाथ-पैर दबा दूं, हुजूर। गरीब आदमी हूं, सरकार। औरत ने आपके लिए कढ़ाई चढ़ा रखी है। गरम-गरम पूड़ी का पहले नाश्ता करें, सरकार।

सुकुमारः बड़ी अजीब बातें कर रहे हो तुम। बड़ी हमदर्दी का दम भर रहे हो तुम। क्या बात है के मेरे ऊपर इतना मर रहे हो तुम?

आदमी-1: सरकार, मैं गरीब आदमी हूं, फकीर आदमी हूं। पर आपके आने से मेरा दलिद्दर कुछ दूर होगा।

(अंदर से एक औरत खाने की थाली लाती है। सुकुमार हैरत से देखता है। औरत थाली रखकर चली जाती है।)

आदमी-1: सरकार, खायें।

सुकुमारः क्या तुम मुझे पहिचानते हो? क्या तुम मुझे जानते हो?

आदमी-1: आपको, सरकार, पूरे राज्य में कौन नहीं जानता! कौन नहीं पहिचानता!

सुकुमारः अच्छा, तो मैं चलता हूं। मेरे डाका मारने की उमंग ठंडी पड़ गयी। हाय, मैं क्या करूं और..

आदमी-1: नहीं, सरकार, ये न होने दूंगा। जीते-जी आपको खाली हाथ न जाने दूंगा।

(आदमी सुकुमार के पैर पकड़ लेता है। इतने समय में आठ-दस ग्रामीण जमा हो जाते हैं। सुकुमार उनको आते देखता है।)

सुकुमारः (ग्रामीणों से) क्या मुझे पकड़ने आये हो तुम लोग? मुझे रस्सी से जकड़ने आये हो तुम लोग?

सभी ग्रामीणः माई-बाप, हम बिनती करने आये हैं कि हमारे घरों में भी डाका डालें।

सुकुमारः (बिगड़रकर) यह क्या मज़ाक है, या तुम लोग पागल हो गये हो? तुम्हारी अक्ल चरने चली गयी है या तुम लोग बौरा गये हो?

एक ग्रामीणः आज जिसके घर डाका मारेंगे, उसका भागय खुल जायेगा।

सुकुमारः यह किस तरह?

दूसरी ग्रामीणः अन्नदाता, आपके पिता राज्य के साहूकार ने मुनादी करा दी है, डुग्गी पिटा दी है कि आप जिस किसी के यहां डाका डालेंगे और जो ले जायेंगे उससे दुगना माल उसे मिल जायेगा। परमात्मा की सौगंध, हमारे घर डाके डालिए ताकि कुछ...

सुकुमारः (गुस्से में) मैं तुम सबको टुकड़े-टुकड़े कर डालूंगा।

तीसरा ग्रामीणः अन्नदाता, यदि ऐसा कर दें तो इससे बढ़िया क्या हो! राज्य के साहूकार की घोषण के अनुसार आप जिस किसी व्यक्ति की हत्या करेंगे उसकी सात पीढ़ियों तक को...

सुकुमारः (गुस्से और प्रतिशोध में) धरती की सौगंध जो हमारी जननी है, आकाश की कसम जो हमें ज़िंदगी देता है, विशाल समुद्र की सौगंध जो हमें चुनौती देता है, ऊंचे पहाड़ों की सौगंध जो हमं साहस देते हैं, अब मुझे अपने रास्ते पर आगे बढ़ने से कोई न रोक सकेगा। अब मुझे उस समय तक चैन न आयेगा जब तक कि मेरे जिस्म से लहू का फव्वारा न फूट पड़ेगा। अब मुझे उस समय तक करार न आयेगा जब तक कि मेरे शरीर पर लाल फूल न खिल उठेंगे। अब उस समय तक मैं चैन की सांस न लूंगा जब तक कि इस देश के राजा से मेरा आमना-सामना न हो जायेगा, भरे दरबार में मेरी तलवार न चमक जायेगी। मैं बेदर्द बिजली की तरह तड़पकर राजा पर गिरूंगा और उसे भस्म कर दूंगा। मैं महामारी बनकर उसे दबोच लूंगा। मैं यमदूर बनकर उसे उस लोक ले जाऊंगा। अब मेरे रास्ते में कोई बाधा नहीं है। (ठहाका लगाकर) अब देखता हूं मुझे कौन रोकता है!



दृश्य : बारह

(राज्य के महामंत्री का दरबार लगा है। महामंत्री एक आसन पर बैठा है और उसके सामने चारों साहूकार खड़े हैं।)

महामंत्रीः क्यों चिंतित हो, क्या चिंता है? क्यों व्यथित हो, क्या व्यथा है? क्यों भयभीत हो, क्या भय है? क्यों रोते हो, क्या दुख है?

साहूकार-1: हे राज्य के महामंत्री, क्या बतायें कि हम पर कितना बुरा समय पड़ा है कि हमारा कोई नाम- लेव न बचेगा, कि वंश का नामों-निशान मिट जाने को है।

महामंत्रीः क्या बकते हो, साहूकार? बिना कारण दुख करते हो, साहूकार? बेकार आहें भरते हो, साहूकार!

साहूकार-2: हे महामंत्री, सुन लें और रास्ता बतायें कि...

साहूकार-1: (साहूकार-2 की बात काटकर) हे मूर्ख, मंदिर तक में आदमी जाता है तो कुछ भगवान को भेंट करता है। और तू इतनी देर से टपर-टपर लगाये हैं, महामंत्री की सेवा में कुछ अर्पित कर लेने दे।

साहूकार-1: माला लेकर महामंत्री की ओर बढ़ता है और उसके चरणों पर माला डाल देता है। महामंत्री हार उठा लेता है।

साहूकार-1: एक तुच्छ-सी भेंट हैं, पर समय पर काम इतनी आ सकती है कि इससे राज्य तक खरीदा जा सकता है।

(महामंत्री प्रशंसात्मक ढंग से हार देखता है)

साहूकार-1: इसके अतिरिक्त कुछ हीरे-पन्ने, कुछ मोती-मणियां भी सेवा में अर्पित है।

(ताली बजाता है। नाचती हुई कन्याएं अपने सिरों पर छोटे चांदी के कलश लिये आती हैं और नृत्य करती हुई महामंत्री के सामने रख देती हैं।)

साहूकार-1: इनके अतिरिक्त (कलशों की ओर संकेत करके) ये दासियां भी आपकी सेवा के लिए छोड़ जाने का साहस कर रहा हूं।

महामंत्रीः साहूकार, जो करेगा सेवा, उसे मिलेगा मेवा। अब बोल दे अपने दिल की बात और बता दे कि तूने लगायी है क्या घात?

साहूकार-1: (गाता है।)

अरज करूं क्या आपसे मालिक हैं सरकार

काम बनेगा आपसे हाकिम हैं सरकार

दिन गुजरते थे अपने बड़े चैन से

खाते-पीते थे अपना बड़े चैन से।

क्या नहीं था जो उसकी शिकायत हो हमको

पर जो सूरज निकलाव वो ढलता भी है

जो बहुत बढ़ गया हो वो घटता भी है।

महामंत्रीः क्यों पहेली बुझाता है ऐ साहूकार

क्यों समय गंवाता है ऐ साहूकार

क्यों विपदा छिपाता है ऐ साहूकार।

साहूकार-1: बात ऐसी है, महामहिम, कि ज़बान खोलते हुए डर लगता है। कहते हुए मन लजाता है। पर क्या करूं न कहे बिना चैन न रहे बिन चैन। पांच भाइयों के बीच में सुकुमार है अकेली औलाद। उसी ने फैलाया है यह सारा फ़साद। उसके दिमाग में क्या आयी है, या कहें कि झक समायी है कि वह पिद्दी न पिद्दी का शोरवा, किस खेत की मूली है, कि उसके मन में राजा से दो-दो हाथ करने की समायी है... हम तो पुश्तैनी साहूकार हैं, महामंत्री। किसी की गांठ से दो ही पैसे निकालते हों तो हम बिनती-चिरौरी करके छः पैसे निकाल लेते हैं। नरम को देखकर गरम हो जात हैं और गरम को देख कर नरम। हमारे लिए क्रोध वर्जित है और अपमान जैसे शब्द से हम अपरिचित हैं। लाग-डांट राजा का धर्म है, हमारा नहीं। पर जाने पिछले जनम के क्या पाप थे कि यह दिन देखना पड़ रहा है।

महामंत्रीः पर तुम्हारा पुत्र क्या चाहता है, साहूकार?

साहूकार-1: दीवाना क्या चाहता है, महामंत्री? पागल कया चाहता है, महामंत्री? सिड़ी और सनकी का क्या ध्येय होता है, महाराज? हाथ में नंगी तलवार लिये घूमता है और राजा से टक्कर लेने का स्वप्न देखता है। यानी टुकड़े-टुकड़े हो जाने का बंदोबस्त करता है। अपनी हस्ती मिटा देने का इंतिज़ाम करता है।

साहूकार-2: महामहिम, वह राजा के पास आने के लिए गांव से निकल खड़ा हुआ है और किसी भी समय राजधानी में आ सकता है।

साहूकार-1: यदि सुकुमार मार डाला गया तो हम सब बेमौत मर जायेंगे, महामहिम।

सब साहूकारः हम सब बेमौत मर जायेंगे महामहिम।

महामंत्रीः बस इतनी-सी नादानी है। मतलब ये कि खून में अभी जवानी है। पर धीरे-धीरे ही अक्ल आनी है। तुम चिंता न करो, साहूकार, तुम्हारा पुत्र राज-दरबार आयेगा, वही सम्मान पायेगा, जो तुम्हारे पुत्र को मिलना चाहिए। पागल है या सनकी है, सिड़ी है या दीवाना है, मजनूं है या सौदाई है, पर है तो तुम्हारा पुत्र।



दृश्य : तेरह

(राजा का दरबार लगा हुआ है। पूरी साज-सज्जा के साथ महामंत्री तथा अन्य मंत्रीगण खड़े हैं। अचानक सुकुमार अंदर आता है। उसके हाथ में नंगी तलवार है। आते ही वह सीधे राजा के सामने जा खड़ा होता है।)

सुकुमारः (गाता है।)

राजा मेरे देश के तू है बेईमान।

तेरा इस दरबार में करता हूं अपमान।

राजाः (महामंत्री से) कौन है यह नादान जिसको जान नहीं प्यारी है? क्या इसको नहीं मालूम कि यह हमारी राजधानी है?

महामंत्रीः अन्नदाता, यह नवयुवक कि नाम जिसका सुकुमार है, राज्य के सबसे धनवान साहूकार का अकेला पुत्र है। और उसका हर रंग निराला है। जिस आदमी को सम्मान देता है उसे गालियां देता है। जिसके लिए इसके मन में अपार श्रद्धा होती है उसके लिए अपशब्द बोलता है। जिसे यह जी-जान से चाहता है उसे मर जाने का शाप देता है। अन्नदाता, दरअसल यह नवयुवक अपमान को मान समझता है और गालियां देने को गौरवगान। माई-बाप, यह नवयुवक आपका परम भक्त है और अपने शब्दों में जो बात कह रहा है उसका भावार्थ यह है कि-

राजा मेरे देश के तुम हो बड़े महान्

तुमको इस दरबार में करता हूं परनाम।

राजाः हम प्रसन्न हुए महामंत्री, हम प्रसन्न हुए।

महामंत्रीः महाराजा, हीरा शीशे का टुकड़ा है अगर उसका पारखी न मिले, अरबी घोड़ा गधा है अगर उसे अच्छा सवार न मिले, सुंदर स्त्री कुरूप है यदि उसे दिलफेंक चाहने वाला न मिले तो, हे अन्नदाता आप ही हीरों को परखते हैं और सम्मान देते हैं।

राजाः हम प्रसन्न हुए, महामंत्री, हम प्रसन्न हुए।

महामंत्रीः अन्नदाता, आपने इसे सम्मान दिया है और यह आपको अपनी जान देना चाहता है। महाराज, यदि आप इसे यहां नौकर रख लें तो आपको सिर हथेली पे लिये फिरनेवाला तरहदार मिल जाये। सेना को एक दिलदार मिल जाये। शासन को एक समझदार मिल जाये। अन्नदाता को एक सेवक बेमिसाल मिल जाये।

राजाः हम प्रसन्न हुए, महामंत्री, हम प्रसन्न हुए। तो इसको क्या बना दें, महामंत्री?

महामंत्रीः अन्नदाता, जो चाहें बना दें। जो भी बनायेंगे यह धन्य-धन्य हो जायेगा। मेरी सलाह मानें तो पहरेदारों का पहरेदार बना दें, या सिपहसालार बना दें, कुछ और नहीं तो वज़ीरे- बेकलमदान बना दें।

राजाः हम प्रसन्न हुए, महामंत्री, हम प्रसन्न हुए... हम इसको... बज़ीरे... (भूल जाता है।) क्या कहा था- वज़ीरे...?

महामंत्रीः बज़ीरे-बेकलमदान।

राजाः हां, वहीं बनाते हैं।

महामंत्रीः (सुकुमार से) हे नवयुवक, ले अब आगे बढ़, और महाराज के चरण स्पर्श कर, जिन्होंने तुझे ज़मीन से आसमान बना दिया।

(सुकुमार आगे बढ़ता है। राजा के पास आता है और अचानक तेज़ी से अपना जूता उतारकर राजा के सिर पर मारने लगता है। आठ-दस जूते मारता है और राजा की पगड़ी उतारकर फेंक देता है। दरबार में सनाटा छा जाता है। पगड़ी फेंकने के बाद सुकुमार खड़ा हो जाता है। महामंत्री धीरे-धीरे चलता हुआ पगड़ी के पास जाता है। उसे उठाने के लिए झुकता है।)

महामंत्रीः अन्नदाता, सांप!

(कई और मंत्री पगड़ी के पास जाते हैं और एक-एक करके ‘अन्नदाता सांप' कहते हैं।)

मंत्री-1: अन्नदाता, सांप!

मंत्री-2: (गाकर) अन्नदाता, सांप!

मंत्री-3: (भाव यह निकलता है कि अन्नदाता यानी राजा ही सांप है।) अन्नदाता, सांप!

मंत्री-4: (मखौल उड़ानेवाले तथा यह दिखनेवाले ढंग में कि वास्तव में सांप नहीं है।) अन्नदाता, सांप!

महामंत्रीः धन्य हो, धन्य हो! महाराज के प्रताप और ईश्वर की दया से पगड़ी पर जूते पड़ने के कारण सांप मर गया और अन्नदाता बच गये।

(राजा घबराकर खड़ा हो जाता है।)

महामंत्रीः (चीखकर) मैं ने कहता था यह कोई पहुंचा हुआ पीर है। महाराज, इसी नवयुवक ने आपकी जान बचायी है, और पूरे देश पर उपकार किया है।

सब मंत्रीः (एक स्वर में) इसी ने आपकी जान बचायी है, महाराज।

राजाः हम प्रसन्न हुए, महामंत्री, हम प्रसन्न हुए।

महामंत्रीः महाराज, केवल प्रसन्न होना पर्याप्त नहीं है, इस नवयुवक ने आपकी जान बचायी है, इसे कुछ-

राजाः हम भगवन को अपना आधा राज्य देते हैं।

दरबारीः धन्य हैं, महाराज धन्य हैं!

राजाः हम अपनी राजकुमारी से भगवन का विवाह करते हैं।

दरबारीः धन्य हैं महाराज, धन्य हैं!

राजाः हम भगवन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हैं।

दरबारीः धन्य हैं भगवन, धन्य हैं!

राजाः हम आज ही इस राजगद्दी पर भगवन को बैठाते हैं।

(राजा सुकुमार का हाथ पकड़कर उसे राजगद्दी पर बैठा देता है।)

महामंत्रीः श्री भगवन महाराज सुकुमार की-

दरबारीः जय!

(परदा गिरता है।)



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