गुरुवार, 29 मार्च 2012

मीनाक्षी भालेराव के गीत व कविताएं

आकार

भोली-भाली मेरी मंशा, नींद की खुमारी सी,

जाग उठी नव स्वप्न का आकर लिए!

जैसे बूँदे आ मिलती धरती से,

मैं पिय-मिलन को आतुर वैसे !

जैसे सकुचाई, शरमाई खिलती कलियाँ,

मैं पुलकित हो बँध जाऊ पिय आलिंगन में !

हर-सिंगार महकते हैं,रात को लुभाने को,

मैं कर श्रृंगार पिय को लुभाऊं वैसे !

सुबह लाती है किरणें सजाकर उम्मीद की थाली,

मै पिय का आंगन जगमगाऊं वैसे !

भोली-भाली मेरी मंशा, नींद की खुमारी सी

 

अकेली

मैं रात अकेली जागी ऐसे, 

बिन सपनों की नींद जैसे !

मैं अकेली चली ऐसे, 

बिन मंजिल की राहें जैसे !

मैं अकेली पगडंडी ऐसी, 

बिना मुसाफिर सूनी जैसे !

मैं खड़ी चौराहे पर जैसे, 

पाँव पड़ी जंजीरें जैसे !

मैं अकेली जीऊं ऐसे, 

बिन मकसद का जीवन जैसे !

मैं रात अकेली जागी ऐसे

--

 

समर्पण

तब दोनों साथ चले थे हम

अब पथ अलग हो गये

अपनी आँखें ख़ाली कर ली

सारे स्वप्न उसकी आँखों में भरे

चेहरे का सारा आलोक

मकरंद भरा सारा अल्हड़-पन

जीवन की सारी ज्वाला

यौवन की हर अभिलाषा

उसको अर्पित कर दिए मैंने

तब दोनों साथ चले थे हम

अब पथ अलग हो गये

अपने पांवों की धरा उसे देकर

अंगारों पर चलना सहकर

सौरभ सारे उसकी राहों में

कांटे सारे अपने लिए चुने मैंने

ढलता रहा मेरा रंग-रूप

उसकी आभा कायम रखी

मेरी उम्मीदें बुझा दी मैंने

उसकी आशा-ज्योत जलाई मैंने

तब दोनों साथ चले थे हम

अब पथ अलग हो गये

 

कुछ पल

कुछ मुरझाये पल मैंने

बंद किताबों में कर दिए

कुछ अलसाये पल मैंने

बिस्तर की सलवटों में छोड़ दिए

कुछ तमन्नाएं मैंने

दरवाजे की झिरियों में केद किये

खोल नहीं पाए आज तक

बंद पड़े उस लिफाफे को

जिसमे सपनों की उड़ानों

की कहानी लिपटी हुए है

कुछ उम्मीदों से नाता तोड़ लिया

इधर-उधर सर मारती रही दीवारों से

कुछ कर पाने के हौसले तोड़ दिए

सहमी-सहमी आखे मूंदे बैठी रही मैं

आज खोल दी मैंने आशाओं की

उस पोटली को जिसमे न जाने कब से

पांवो में पड़ी बेड़ियाँ पड़ी थी

खुरच-खुरच कर निकाल दिया

जंग लगे नाकामी के निशानों को

आज उड़ान भरना है स्वछन्द

नीले आकाश को छूने के लिए

और सारे पलों को अपने लिए रख लिए  

---

5 blogger-facebook:

  1. सुंदर रचनाएँ ...
    बधाई एवं शुभकामनायें ...!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. meenakshi bhalerao11:36 am

      anupama ji aap to khud bhut achi gaika hae kbhi avsr mila to jrur sunegen aap ki ki gyi tarif ka shukriya
      mujhe achaa lgega agr aap mere kisi git ko apna svr or sngit bdh kr

      हटाएं
  2. विषयनुसार कविताए सुन्दर है .श्रेष्ठ रचनाओ के लिए बधाई .
    डॉ.प्रणव देवेन्द्र श्रोत्रिय

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. meenakshi bhalerao12:19 pm

      dr.pranay ji nmskar aap ko kvitaen achi lgi bhut-bhut dhnvad achaa lgta hae jb aap jaese kvita ko chaahne vale
      hmaara hosla bdhte hae hme or kuch krne ki prernna milti hae shukriya

      हटाएं
    2. meenakshi bhalerao11:11 am

      dr,pranav ji bhut bhut shukriya aapko kvita psnd aai maera honsla dugna ho gya

      हटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------