मंगलवार, 13 मार्च 2012

कुसुम का आलेख - बालश्रम और मानवाधिकार

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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग भवेत्॥

सभी सुखी हो सभी स्वस्थ हो, समाज में कोई भी दुखी न हो ऐसा इस मन्त्र का अभिप्राय है। काश हमारा समाज इस मन्त्र के अनुकूल होता तो न कोई ऊँचा होता न कोई नीचा न कोई छोटा होता न कोई बड़ा न कोई अमीर होता न कोई गरीब बल्कि सब सुखी सब खुशहाल मगर ऐसा नही है। समाज में जिधर देखिये असमानता है और यही समस्त दुखों और परेशानियों का कारण है। मानवाधिकार मानव को मानव होने पर उसके विकास और उत्कर्ष के लिये प्राप्त होते हैं। जिस से वह अपना शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, आर्थिक, सामाजिक आदि विकास करने में समर्थ हो सके। इसी लिये मानवाधिकार की भावना जियो और जीने दो की भावना से ओतप्रोत है।

कालान्तर में मानवों की दशा को दुर्दशा में परिवर्तित होते हुए देखकर ही सन् १२१५ में मानवाधिकार का मैग्नाकार्टा को अस्तित्व में लया गया जिस से कोई भी किसी की स्वतन्त्रता को छीने नही बल्कि सभी सब की स्वतन्त्रता को बनाये रखे। पहले विश्व युद्ध और दूसरे विश्व युद्ध की उठा पटक के पश्चात सन् १९४५ में संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ। १० दिसम्बर, १९४८ को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषण प्रस्तुत की गयी और समस्त देशों से अपील की गयी कि वे इन मानवाधिकारों को कानूनी तरीके से लागू करने की दिशा में अग्रसर करें । जिस से समस्त विश्व वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से प्रवाहित हो ऐसा हो पाता तो आज समाज में समस्यायें न होती और स्कूल जाने वाले बच्चों के हाथ में भीख का कटोरा या कुड़े का थैला या काम का समान नही बल्कि किताबों का बैग होता।

बालश्रम से तात्पर्य:-

बाल श्रम शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है बाल और श्रमिक। बाल से अभिप्राय उस बालक से है जो अभी अपने माता-पिता पर आश्रित है और जिसके लालन - पालन का दायित्व उसके माता-पिता का है और जो १४ वर्ष की आयु का नही है। श्रमिक उसे कहा जाता है जो आर्थिक उद्देश्य हेतु शारीरिक श्रम करके धन अर्जित करता है। जब कि श्रमिकों के अन्तर्गत एक मात्र वे स्त्री और पुरूष आते है जो व्यस्क हों लेकिन यह हमारे समाज की विडम्बना है कि बच्चों को पढ़ने-लिखने की आयु में कठोर परिश्रम करना पडता है। जिस से वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और अस्वस्थ जीवन जीने तथा शारीरिक विकृति के साथ जीने के लिये विवश होते है।

ये व्यवस्था आज की व्यवस्था नही है बल्कि प्राचीन काल से चली आने वाली व्यवस्था। वैदिक काल में सम्पूर्ण समाज चार भागों में विभाजित था जिसमें सवर्णों को ही शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार था। जिस से निम्न श्रेणी के बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नही था जिस से वे या तो अपने पैतृक व्यवसाय को अपनाते थे या गरीबी के कारण पेट पालन के लिये श्रम करते थे। कौटिल्य युग में बच्चों की खरीदा व बेचा जाता था। मध्यकाल में अपने पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने के लिये जो अपने पुश्तैनी व्यवसायों को अपना लेते थे उनसे सम्बन्धित व्यवसायों के लिये प्रशिक्षण देना भी उचित नही समझा जाता था। पीर कम होने की जगह ओर बढ गयी कि १७वी और १८वी शताब्दी में बाल श्रमिकों की संख्या अत्यधिक बढ़ गयी जिसके कारण वे अर्थव्यवस्था के अभिन्न अंग बन गये।

बाल श्रमिकों का उदय:-

बालश्रमिकों को आज की आश्चर्यजनक घटना न माने यह तो प्राचीन काल में उत्पन्न प्राचीन सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक विषमताओं का परिणाम है जो दिन प्रतिदिन विकराल रूप को धारण करती जा रही है। औद्योगीकरण और शहरीकरण ने बाल श्रमिकों के घाव को भरने की जगह ओर अधिक गहरे कर दिये है। जिसने अथक परिश्रम के द्वारा समाप्त की गयी बन्धुआ वृति को पुनः प्रारम्भ कर दिया है। आज स्वयं लाचार माता-पिता आर्थिक लाभ के लिये अपने बच्चो को बन्धुआ बना रहे है।

भारत कृषि प्रधान देश है यहाँ की समस्याओं को यहाँ के ही परिदृश्य के द्वारा ही समाप्त या कम किया जा सकता है। अन्य देश की नकल के द्वारा नही हर देश की अपनी संस्कृति है जो उसको बनाये रखे में सहयोग करती है। भारत गाँव में बसता है उसकी आधे से अधिक जनसंख्या गाँव में निवास करती है इसलिये उन समस्त सुविधाओं को गाँव में पहुँचाना होगा जो शहर में है। वैश्वीकरण,औद्योगिकरण और शहरीकरण के चकाचौंध भरे वातावरण ने कृषि करने वाले और गरीब लोगों के लिये ओर अधिक परेशानियाँ खडी कर दी हैं । शहर के वातावरण में वे न्यूनतम वृति पर काम करने के लिये मजबूर होते है जिस से वे ओर अधिक गरीब होते जाते है। वे स्वयं तो शिक्षित नही हैं और पैसे की तंगी में बच्चों को भी शिक्षित नही कर पाते बल्कि वे बाल श्रमिकों की संख्या वृद्धि में सहयोग करते है। कम आमदनी के कारण न वे स्वच्छ वातावरण में निवास करते हैं न शिक्षित हो पाते हैं न स्वस्थ नागरिक बन पाते हैं बल्कि अज्ञानता के कारण जनसंख्या वृद्धि का कारण बनते हैं ।

आज के बच्चे ही देश के भविष्य निर्माता हैं। इनके कंधों पर देश का भविष्य है।–पं0 जवाहर लाल नेहरू

बालक में पिता की उन्नत सम्भावनाओं के दर्शन किये थे। - कवि विलियम वर्ड्सवर्थ

क्या ये लोगों की सम्भावनाओं को दर्शाने वाले वाक्य आज बड़ा प्रश्न खड़ा नही करते है कि वे बालक जो शिक्षित नही, स्वस्थ नही वो किस प्रकार से समाज का निर्माण करेंगे और वे किसी भी देश के सशक्त सजग और सबल नागरिक बने में समर्थ हैं । जो स्वयं खुश नही वह क्या किसी को खुशी दे सकता है। उस से राष्ट्र निर्माण में किस योगदान की आशा की जा सकती है।

बाल श्रमिकों की समस्या:-

जब देश आजाद भी नही हुआ उस से पूर्व ही वह भुखमरी और गरीबी का शिकार था। देश अत्यधिक बुरी स्थिति में आजाद हुआ अनेकानेक समस्यायें मुँह खोले थीं जिनमें बाल श्रमिक भी एक बडी समस्या थी। आंकडे बताते हैं कि १९६१ की जनगणना में बाल श्रमिकों की संख्या १.४५ करोड़ थी और ये आकडे निरन्तर बढते ही चले गये और विश्व स्वास्थ्य संगठन की १९९० की रिपोर्ट में ये आकडे ५ करोड हो गये हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मान ना है कि विश्व का हर चौथा बच्चा बाल श्रमिक है।

बाल श्रम के कारण बच्चो का बचपन छिन गया है उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ा है। जिस से उनका शारीरिक मानसिक विकास नही हो पाता और वे उचित पोषण, शिक्षा, मनोरंजन, खेलकूद, प्यार और दुलार से वंचित रह जाते हैं ।

बाल श्रमिकों की समस्याओं के सुधार के उपायः-

यूं तो इस समस्या के उपाय ऊंट के मुँह में जीरा के समान है जोकि संयुक्त राष्ट्र संघ या अन्य संस्थाओं या संघों यं भारत के संविधान या पंच वर्षीय योजनाओं के द्वारा किये गये हैं । मानवाधिकार सभी को समान मानकर सभी के अधिकारों की रक्षा की बात कहता है। इसलिये उसने समानता,स्वतन्त्रता शिक्षा,स्वास्थ्य और शोषण के विरूद्ध न्याय की बात कही हैं । भारत अपनी प्रत्येक पंच वर्षीय योजना के द्वारा इस समस्या को दूर करने की कोशिश कर रहा है। इन्दिरा गांधी ने भी २० सूत्रीय कार्यक्रम के द्वारा इसको कम करने की कोशिश की है। इस समस्या के निदान के लिये मानवाधिकार की संस्कृति को विकसित किया जाये तो शायद ये सम्भव हो कि इस से कुछ निदान पाया जा सके।

बाल श्रमिकों से सम्बन्धित कानून और नीतियाँ जिनसे बाल श्रमिकों के जीवन में सुधार आ सके वे है- सन् १८८८, १८९१, १९९१ का फैक्टरी अधिनियम, सन् १९०१ और १९२३ का खदान अधिनियम,सन् १९२६ का बाल श्रम उन्मूलन तथा नियमन अधिनियम इसके साथ-साथ मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व ।

निष्कर्ष:-

सामाजिक आर्थिक विषमताओं के कारण ये बाल श्रमिक बच्चों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक विकास की उम्र में हाथों में पेंसिल की जगह हथौड़े और पुस्तकों की जगह भार उठाने को विवश होना पडा है। डॉ० राधा कृष्णन् ने कहा कि " बाल श्रम को मानवता के प्रति सर्वाधिक घृणित स्थान दिया था उन्ही के देश में आज बाल श्रम उद्योगपतियों, व्यावसायिकों के मुनाफे का कारण बन गया है। जिसे वे बढा सकते है लेकिन गँवा नही सकते। इस शुभ कार्य के लिये हम सभी बुद्धिजीवियों, कानूनविदों और समाजसेवियों को एक साथ मिलकर कदम उठाना होगा तब ही यह कार्य सम्भव हो सकता है। ये बच्चे राष्ट्र के कर्णधार हैं इन्ही पर देश का भविष्य निर्भर है अगर ये कार्य सही समय पर प्रत्येक मानव के द्वारा प्रारम्भ नही किया गया तब बहुत देर हो जायेगी जिसे सुधारना सम्भव ही नही नामुमकिन ही हो गया और जो कलंक समास और राष्ट्र के माथे पर लग जायेगा उसे कभी धोया नही जा सकेगा।

REFERENCES:-

· BRANSON,AND TORNEY- International Human Rigrts Society and the Schools

· Council of Europe-The Teaching of Human Rights

· ऋग्वेद

· भारतीय संविधान

· मानवाधिकार और मानव- डॉ० करूणाशंकर मिश्र

सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय लोक कल्याणाय

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बालश्रम और मानवाधिकार

डॉ० कुसुम सहा० प्रो० हिन्दी

राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, सेक्टर २० डी, चण्डीगढ़

Email ID kusumhindi06@gmail.com

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(चित्र - साभार, भारत भवन, भोपाल)

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