शनिवार, 10 मार्च 2012

देवेन्द्र कुमार पाठक'महरूम' की कविताई/दोहे चैत के

चटख चाँदनी चैत की,दूध नहाया चाँद |

मन , मन-ही-मन तोड़ दे , मन मानी मरजाद |1|

 

मदरीले दृग खोलती, भोर-वधू निंदियार |

ललछौँही छवि सोहती,सेँदुर भरे लिलार |2|

 

रात रही जब पहर भर, तब जागा महुआर |

टप-टप टपकेँ मद-कुसुम,बीनत बीननहार |3|

 

छोड़ गाँव-घर चल पड़े,चैतहरोँ के पाँव |

जहाँ पेट पापी पले,वहाँ ठिकाना -ठाँव |4|

 

ईंटोँ के चूल्हे जले,खुले गगन की छाँव |

महानगर की गोद मेँ,आ दुबका है गाँव |5|

 

शहरी साज़िश से हुई,अमराई नीलाम |

आम पहुँच से दूर हैँ अब आमोँ के दाम |6|

 

दिन-दिन दूबर हो रहे ,नद-नदियोँ के अंग |

घाम-पसीने मेँ घुले ,फागुन के सुख रंग |7|

 

टेसू हुए दिवालिए,मदिराए महुआर |

फ़सलोँ के सिर पर टँगी, कर्ज़े की तलवार |8|

3 blogger-facebook:

  1. Gaon ke mehnatqashon ke zindgi ke badi talk hakiqut,dard,sangrus ka dastaweg hai pathak jee ke ye dohe kavi ko badhai(racnakar ko itni behtar rachna prakasan ke liye badhi

    Shaileshrajpoot166@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. Dharmendra Tripathi7:47 pm

    Behatareen dohe. Grameen jan-manas se judi hui badi atmiya rachna prakashit karne ke liye rachanakar ko badhai.

    उत्तर देंहटाएं

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