शनिवार, 21 अप्रैल 2012

साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख : इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हिंदी की भूमिका

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इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हिंदी की भूमिका
(
इंटरनेट के संदर्भ में)
-
डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण

आजादी के बाद हिंदी पत्रकारिता व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के नवनिर्माण के प्रति प्रतिबद्ध हुई। उद्बोधन, जागरण, क्रांति के पश्चात पत्रकारिता ने व्यक्तित्व निर्माण करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। हिंदी भाषा को माध्यम बनाकर करोडो निरन्न, निर्वस्त्र नागरिकों का लेखा-जोखा शंखनाद के साथ प्रस्तुत करने में पत्रकार सफल हुए। राष्ट्र के नवनिर्माण हेतु पत्रकारों की परंपरा ने राजनेताओं का पथ प्रदर्शन किया। नया आत्मबोध, नई चिंतनधारा, नूतन रचनात्मक तत्वों के व्यापक प्रचार-प्रसार का कार्य करनेवाली हिंदी पत्रकारिता को बल देने का महत्त्वपूर्ण कार्य ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ ने किया। इसे मानना होगा। हिंदी पत्रकारिता के साथ-साथ हिंदी भाषा विकास में दूरदर्शन, सिनेमा, आकाशवाणी, इंटरनेट आदि आधुनिक जनसंचार माध्यमों की भूमिका प्रभावकारी रही है। इसे नकारा नहीं जा सकता।


समकालीन युग सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। ‘ सूचना विस्फोट ’ के इस युग में ‘इंटरनेट ’ की भूमिका महत्त्वपूर्ण और सर्वव्यापी परिलक्षित होती है। अतः हिंदी भाषा विकास में आधुनिक संचार माध्यम के रूप में ‘इंटरनेट’ का स्थान नवीनतम प्रणाली के रूप में महत्त्वपूर्ण बनता नजर आ रहा है। ‘‘भाषा एक दैवी शक्ति है जो मानव को मानवता प्रदान करती है। भावों को प्रकट करने, विचारों को बोधगम्य बनाने तथा परस्पर व्यवहार बढ़ाने का यही एक विश्वव्यापी और सशक्त माध्यम है। वास्तव में भाषा के अभाव में मूक प्राणी निरीह बना रहता है, विचार बहरे हो जाते हैं और व्यवहार लंगडे बनकर रह जाते हैं। भाषा के कारण ही मानव सुसंस्कृत होता है, सम्मान और यश का भागी बनता है। ... मौखिक और लिखित संचार-साधनों में अरबी, अंग्रेजी, इतावली, उर्दू, चीनी परिवार की भाषाएँ जर्मन, जापानी, तमिल, तेलगु, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, बंगला, मलय-बहरसा, रुसी, स्पेनी तथा हिंदी ये 16 प्रमुख भाषाएँ हैं। गौरव की बात तो यह है कि इनमें सम्मिलित 5 भाषाएँ अपने भारत राष्ट्र की हैं। चीनी और अंग्रेजी भाषा के बाद हिंदी ही विश्व की प्रमुख भाषा है, जो स्वतंत्रता तथा सम्प्रभुता की अमरवाणी है।... हिंदी मानव के बुद्धि-कौशल, विवेक, चिंतन, आचार-व्यवहार तथा संस्कृति की भाषा है।’’1 अतः हिंदी भाषा को कंप्यूटर के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाने का विचार सामने आया। ‘‘ सन 1946’’ 2 कंप्यूटर का जन्म वर्ष माना जाता है। गुणात्मक कार्य के कारण कंप्यूटर वर्तमान युग में आवश्यक एवं व्यापक कार्यक्षेत्र वाला माध्यम बना है। इसे मानना होगा। कंप्यूटरों के माध्यम से तमाम इंटरनेट सेवाएँ अपना महत्त्व बढ़ा रही है। इंटरनेट की हिंदी भाषा विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही दृष्टिगोचर होती है। इंटरनेट की आवश्यकता और महत्व को बताने से पहले जनसंचार माध्यमों के क्रम में ‘इंटरनेट’ का स्थान निश्चित करना आवश्यक है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि समकालीन युग में अपना विशेष प्रभाव बनाएँ रखनेवाले न्यू इलैक्टॅनिक जनसंचार माध्यमों में ‘इंटरनेट’ (आन्तरिक संजाल) प्रभावी बन रहा है। अतः इंटरनेट, इंटरलिंक (Internet, Interlink) का इतिहास जानना आवश्यक है। ‘‘इंटरनेट का बीजारोपण सन 1969 में अमरीका की प्रतिरक्षा विभाग ARPA (Advanced Research Project Agency) के शोध कार्यक्रम के क्रियान्वयन से हुआ, जिसका उद्देश्य एक ऐसी तकनीक का विकास करना था जिसके कारण अलग-अलग कंप्यूटरों के मध्य एक सुरक्षित कम्युनिकेशन संभव हो सके, जिससे विभिन्न प्रकार के नेटवर्क को एक दूसरे से जोड़ा जा सके। इससे नेटवर्क की विश्वसनीयता बढ़ जायेगी। उपरोक्त नेटवर्क को (ARPANET) नाम दिया गया। प्रारंभ में इसका उपयोग केवल रक्षा संबंधी जरुरतों के लिए किया गया परंतु बाद में रक्षा संबंधी मामलों में शोध कर रहे संस्थानों व विश्वविद्यालयों को भी इस नेटवर्क से जोड दिया गया इस नेटवर्कों के नेटवर्क को इंटनेट (Internet) नाम दिया गया। यह TCP/IP (Transmission Control Procedure/Internet Protocol) अमेरिक न सुरक्षा विभाग द्वारा विकसित एक नेटवर्क में सहायक उपकरण पर आधारित है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेट का कनेक्शन सन 1973 में इंग्लैण्ड और नार्वे के मध्य स्थापित किया गया। भारत में पहला इंटरनेट कनेक्शन प्रयोग करने वाला संस्थान था नई दिल्ली स्थित नेशनल इन्फोर्मेटिक सेंटर (NIC)। भारत में व्यावसायिक रुप से प्रथम इंटरनेट सेवा 1995-96 में भारत सरकार के उपक्रम विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) ने की।’’3 समकालीन युग का अध्ययन किया जाय तो आधुनिक जनसंचार माध्यमों में (श्रव्य दृश्य माध्यम) पिछलग्गू (Satellite) का उपयोग बढ़ता हुआ दृष्टिगोचर होता है। अब हिंदी पत्र-पत्रकाएँ एवं विभिन्न पुस्तकें भी इंटरनेट के माध्यम से पढ़ने के लिए उपलब्ध है। अतः आधुनिक जन-संचार का यह माध्यम वैश्विकरण में हिंदी भाषा को सशक्त बनाता हुआ परिलक्षित होता है।


इंटरनेट के माध्यम से जिस हिंदी भाषा को हम पढ़ते है वह ‘रिमिक्स भाषा’ (Remix Language) के रूम में सामने आ रही है। ‘कंप्यूटर शब्दकोश’ देखेंगे तो अनेक अंग्रेजी शब्दों के लिए हिंदी शब्द मिल नहीं रहे हैं। इसे मानना होगा। जैसे - ‘‘ATM - का अर्थ हैं ऑटोमेटिक टेलर मशीन। इस मशीन का प्रयोग बैंको में किया जाता है। इसकी सहायता से मशीन से धन-निकाशी की जाती है। ATM- का एक और अर्थ है Adobe Type Manager यह सॉफ्टवेअर विंडोज में प्रयोग किए जानेवाले टाईप फेसों को इंस्टाल करता है।’’4 ATM- के लिए हिंदी शब्द देना नयी आधुनिक सूचना संचार प्रौद्योगिकी के कारण असंभव बन रहा है। इंटरनेट द्वारा हिंदी भाषा का नया रूप सामने आ रहा है। इस रूप का अनेक जगहों पर स्वागत हो रहा है तो कहीं विरोध। अतः भूमंडलीकरण के इस दौर में हिंदी का चेहरा बदल रहा है। इसे मानना होगा। कृष्ण कुमार रत्तू हिंदी भाषा का वैश्वीकृत बाजारमूलक चेहरा स्पष्ट करते हुए कहते हैं - ‘‘ हिंदी के इस बदलते स्वरुप में जहाँ प्रयोजन मूलकता का व्याकरणीय तत्वबोध इसके सौंदर्य में बढोतरी करता है वहीं कुछ विद्वानों द्वारा हिंदी भाषा को नष्ट करने की संज्ञा भी दी जा रही है। हिंदी का यह चेहरा हिंग्लेजी, हिंगलिश मिश्रित हिंदी अथवा बिगडी हुई हिंदी का है।

कालचक्र जिस तरह से राजनीतिक सामाजिक बदलाव की और अग्रेसर है उसमें भाषायी समरसता समूचे विश्व में बहस का मुद्दा हो गई है। समूचे विश्व में भाषा भौगोलिक सीमाएँ तोड रही है। स्पष्ट उदाहरण तौर पर जिस तरह से अंग्रेजी व अन्य यूरोपीय भाषाओं में नए शब्दों को खुले मन से समाहित किया जा रहा है, उसी तरह ही हिंदी भाषा भी अब इस स्वरुप का अपवाद नहीं रह गई है। हिंदी में भी हर भाषा के ज्यादा तर अंग्रेजी के शब्दों को ज्यों का त्यों लिया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर देश के बडे मिडिया परिदृश्य पर एक नजर डालनी होंगी।’’5 इंटरनेट जैसा पिछलग्गू (Satellite) आधुनिक संचार माध्यम भी ‘रिमिक्स भाषा’ से अछूता नही रह सका। हिंदी भाषा का यह रिमिक्स भाषायी आयाम अनेक प्रश्नों को, विवादों को जन्म तो दे रहा है, साथ ही साथ हिंदी भाषा का यह चेहरा बदलते तकनीकी जगतमें अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुआ है। इसे नकारा नही जा सकता।


इंटरनेट संचार-प्रक्रिया में अपनी विशेष भूमिका निभाता है। हिंदी भाषा के प्रसार- प्रचार में भी ‘इंटरनेट’ का स्थान महत्त्वपूर्ण रहा दृष्टिगोचार होता है। ‘संचार’ शब्द को परिभाषित करते हुए डॉ. हरिमोहन लिखते हैं ‘‘ संचार एक जटिल प्रक्रिया का परिणाम है, जिसके द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच अर्थपूर्ण संदेशो (Meaningful Message) का आदान-प्रदान किया जाता है। ये अर्थपूर्ण संदेश भेजनेवाले और संदेश पानेवालों के बीच एक समझदारी या साझेदारी बनाते हैं।’’6 कहना सही होगा कि संचार प्रक्रिया में अर्थपूर्ण विचारों का आदान-प्रदान करने हेतु ‘इंटरनेट’ का सही उपयोग हो रहा है। ‘इंटरनेट’ के माध्यम से देवनागरी में यांत्रिक सुविधाओं तथा नवीनतम द्विभाषी शब्द संसाधक प्रणाली का विकास हो रहा है। विंडोज पर आधारित देवनागरी फॉण्ट उपलब्ध हो रहें हैं। अक्षरा-11, मल्टीवर्ड, शब्दमाला, शब्दरत्न सुपर, अलिशा, ए.एल.पी, विजन, वर्डसवर्थ, भाषा, शब्द सम्राट, आकृति आदि द्विभाषी शब्द संसाधकों की जानकारी इंटरनेट के माध्यम से हिंदी प्रेमियों को मिलने के कारण हिंदी भाषा विकास को नई दिशा मिल रही है। ‘इंटरनेट टेलीफोनी’ के माध्यम से भी प्रचुर मात्रा में हिदीं भाषा का प्रचार-प्रसार विदेशों में हो रहा है। साहित्यकारों के लिए अधिकतम ज्ञान प्राप्त् करने हेतु इंटरनेट उपयुक्त सिद्ध हो रहा है। विभिन्न भारतीय भाषाओं का साहित्य हिंदी के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाने का कार्य इंटरनेट के माध्यम से सुविधाजनक हो रहा है। इंटरनेट पर साहित्य, शब्दकोश, संगीत, इतिहास आदि विभिन्न विषयों की जानकारी होने के कारण अनुसंधाताओं को विचारों का आदान-प्रदान करने में सफलता मिल रही है। वर्तमान समय में हिंदी भाषा के अनुसंधानात्मक विकास में, अनुसंधान क्षेत्र को नई दिशा देने में ‘इंटरनेट’ की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही दृष्टिगोचर होती है। ‘‘ इंटरनेट के माध्यम से मानव के ज्ञान में तीव्रता से वृद्धि होती है। इंटनेट पर एक सवाल का जवाब खोजने के सिलसिले में कई दूसरे तरह का ज्ञान भी प्राप्त् हो जाता है, जो अचानक ही खोज के दौरान जाहिर होते है। इंटरनेट की भाषा में इसे ‘सिरेनडियिटी’ आकस्मिक लाभवृत्ति कहा जाता है।’’7 हिंदी भाषा के विकास में इस आकस्मिक लाभवृत्ति का उपयोग हो रहा है। हिंदी पारिभाषिक शब्दों को सीकने हेतु अब इंटरनेट का प्रयोग हो रहा है भले ही यह पारिभाषिक शब्दावली हिंदी व्याकरण के नियम तोड रही हो, इसमें अंग्रेजी शब्दों का प्राचुर्य हो, फिर भी ‘इंटरनेट ’ के माध्यम से हिंदी का जो सर्वथा भिन्न रूप सामने आ रहा है। इस रूप को हिंदी पाठक अपना रहा है।

समकालीनता का विचार किया जाय तो इंटरनेट के प्रति लोंगों का आकर्षण दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। उपयोगकर्ताओं को जिन शब्दों में ‘ज्ञान’ की आवश्यकता है, उन्हीं शब्दों में ज्ञान दिया जा रहा है और यह ज्ञान प्रचलित शब्दों में होने के कारण ससमकालीन पीढी इंटरनेट की ‘भाषा’ पर आपत्ति नही उठा रही है। अतः इंटरनेट पर आ रही हिंदी भाषा पर विवाद उठाने के बजाय इंटरनेट के लिए ‘व्यावसायिक उद्देश्य ’ पूरा करनेवाले हिंदी शब्दों का निर्माण करना हिंदी भाषा की पुरानी इंटरनेटीय दशा बदलकर नई दिशा देना जैसा होगा। समकालीन पीढी के हिंदी प्रेमीयों को इस दिशा में अग्रेसित होना चाहिए। वर्तमान समय में हमें इंटरनेट के लिए ‘स्वतंत्र हिंदी भाषा’ का निर्माण करना होगा। अतः हिंदी शब्दों का मानकीकृत रूप इंटरनेट में लाने के लिए व्यापक स्तर पर अनुसंधान होना अनिवार्य है। डॉ.अवधेश प्रसाद सिंह कहते हैं - ‘‘लाइनक्स नामक एक नया ऑपरेटिंग सिस्टम इसी दिशा में एक अधुनातन पहल है। यह उपयोगकर्ताओं को अपनी आवश्यकता के अनुसार इंटरनेट के उपयोग की सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा है। यह इंटनेट पर अंतक्रिया करनेवाले हजारों प्रोग्रामरों का सहयोगात्मक प्रयास है, जिसमें तकनीकी शब्दों का ही नहीं आम जीवन के शब्दों को भी एक मानक रूप देकर प्रचलित करने की चेष्टा की जा रही है। कहने का तात्पर्य यह कि यदि हिंदी शब्दों और उसके रूपों को मानकीकृत करने का काम हिंदीवालों द्वारा नही किया जाता है तो ऐसा नही है कि यह काम रूका रहेगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस काम को अपने हाथ में ले लेंगी, आयोग बनाएंगी, तंत्र विकसित करेंगी और हिंदी जगत के सक्षम एक बनी-बनाई भाषा परोस देंगी। ऐसा वे हिंदी के प्रति स्नेह के आवेश में नही बल्कि अपना माल बेचने के लिए करेंगी। उनकी आँखो के सामने हिंदी क्षेत्र का एक बहुत बडा बाजार फैला है, जिस पर कब्जा किए बिना उनका व्यावसायिक उद्देश पूरा नही होगा।’’8 कहना आवश्यक नही कि अपना व्यावसायिक उद्देश्य पूरा करने के लिए कामचलावू हिंदी को विकसित करने का प्रयास हो रहा है। इसे रोकना होगा। इंटरनेट के लिए ‘हिंदी का मानक कोश’ निर्माण करने की जिम्मेदारी समकालीन पीढी की है। अतः इस ओर निर्णायक कदम उठाने होंगे। संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रमोचित हिंदी सॉफ्टवेयर उपकरण (Hindi Software Tools) विकसित किया गया है, जिसमें हिंदी भाषा के यूनीकोड आधारित ओपन टाईप फॉन्टस्, कीबोर्ड, डईवर, हिंदी भाषा के शब्द-वर्तनी जाँचकर्ता, हिंदी, भाषा का शब्दानुवाद टूल आदि विषयों की जानकारी प्राप्त् होती है।

इंटरनेट संसाधित भाषा शिक्षण को बढावा देने में भारत सरकार द्वारा हुआ यह प्रयास महत्त्वपूर्ण माना जाता है। फिर भी भाषा अध्यापक के लिए कंप्यूटर के माध्यम से भाषा सिखाना आज भी कठिन कार्य बना है। भाषा शिक्षण के लिए आवश्यक हार्डवेअर और सॉफ्टवेअर की उपलब्धता आज भी आवश्यकता के अनुसार नहीं हो रही है। इस स्थिति को नकारा नही जा सकता। ‘‘ कंप्यूटर द्वारा गणित, भौतिकी, रसायनशास्त्र आदि विषय सिखाना सरल है क्योंकि इन विषयों में किसी भी अध्यापक द्वारा पढाई जानेवाली सामग्री प्रायः पूर्वनिर्धारित होती है। उसके प्रस्तुतीकरण का तरीखा मात्र बदल जाता है। पर कं प्यूटर के द्वारा भाषा सिखाना एक अत्यधिक जटिल कार्य है। भाषा सिखाना वास्तव में कौशल सिखाना है। लिखना व पढना जैसा गौण कौशल अथवा नियमों पर आधारित व्याकरण आदि जैसा विषय तो फिर भी आधारभूत मूल। सामान्य कंप्यूटर से सिखाए जा सकते हैं, पर मौखिक और श्रवण कौशल सिखाना असंभव नहीं तो दुष्कर अवश्य है।’’9 वर्तमान समय का विचार किया जाय तो वर्तनीशोधक, कंप्यूटर कोश रुपात्मक और वाक्यात्मक विश्लेषक, स्पीच सिंथे साइजर, रिकगनाइजर, डिकोटर आदि की उपलब्धता के कारण इंटरनेट के माध्यम से हिंदी भाषा शिक्षण सुदूर पहुँच रहा है। भाषा शिक्षण की प्रक्रिया में बदलाव नजर आ रहा है। इंटरनेट में दिन-ब-दिन बदलाव, भाषाई सुधार होकर हिंदी भाषा शिक्षण पिछडी दशा से उभरकर नई दिशा की और अग्रेसित हो रहा है। इसे हमे माना होगा। भूत-पूर्व राष्ट्पति प्रख्यात वैज्ञानिक ए.पी.जे.अब्दुल कलाम जी कहते हैं- ‘‘ टेक्नॉलॉजी विज्ञान से भिन्न एक सामूहिक गतिविधि है। यह किसी एक व्यक्ति की बुद्धि या समज पर आधारित नहीं होती बल्कि कई व्यक्तियो की आपसी बौद्धिक प्रतिभा पर आधारित होती है।’’10 हिंदी भाषा के विकास हेतु नवीनतम टेक्नॉलॉजी विज्ञान के साथ सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है।

अखिल भारतीय स्तर पर यह प्रयास होना जरुरी है कि हिंदी भाषा को व्यवहार एवं प्रयोग के स्तर पर सार्वदेशिक बनाया जाय। अतः यह बात तब संभव है जब समकालीन पीढी इंटरनेट के माध्यम से हिंदी भाषा शिक्षण को नई दिशा दें। हिंदी के विकास की यह प्रक्रिया जितनी तेज रफ्तार से हो उतना ही हमारा और हमारे देश का विकास होगा। इंटरनेट के माध्यम से हिंदी भाषा को वैज्ञानिक, तकनीकी, यांत्रिकी, प्रौद्योगिकी आदि विषयों के साथ जोडकर हिंदी भाषा की सुदीर्घ परंपरा को और अधिक समृद्ध बनाना होगा। समकालीन पीढी के कंप्यूटरविज्ञ तथा भाषाविज्ञ दोनों को एक साथ मिलकर हिंदी भाषा विकास मे‘ इंटरनेट’ जैसे आधुननिक जनसंचार माध्यम की भूमिका को ध्यान में रखकर निरंतर कार्यरत रहना होगा। तभी हिंदी भाषा के विकास में ‘इंटरनेट’ के माध्यम से नई दिशा प्राप्त् होगी। इसमें दो राय नही।

निष्कर्ष -
हिंदी भाषा विकास में इंटरनेट जैसे आधुनिक जनसंचार माध्यम की भूमिका के सिंहावलोकन से यह स्पष्ट है कि इंटरनेट हिंदी भाषा विकास में सर्वाधिक प्रभावी माध्यम बन रहा है। इंटरनेट के माध्यम से हिंदी पत्र-पत्रकाएँ, नवीनतम सूचनाएँ, पुस्तकें हमें प्राप्त् हो रही है। अतः हिंदी भाषा विकास में इंटरनेट दिशादर्शक बनता नजर आ रहा है। हम हिंदी भाषा को इंटरनेट के माध्यम से जितना जीवनापयोगी, व्यवसायमूलक बनाने की दृष्टि से विकसित करेंगे उतनी जल्दी हिंदी समृद्ध और शक्तिमान भाषा बनकर विश्व के सामने आयेगी। सरकारी, सार्वजनिक, व्यक्तिगत, स्कूलों, कालेजों में व्यापक तौर पर यदि हिंदी भाषा विकास के लिए ‘इंटरनेट’ का प्रयोग किया जाएगा तो हिंदी अंततः विश्व-मंच पर अपनी अलग पहचान बनायेगी। इसमें दो राय नहीं।

संदर्भ - संकेत
1. डॉ.अर्जुन तिवारी - हिंदी पत्रकारिता का बृहद् इतिहास, पृष्ठ - 17, 18
2. संपा. डॉ.शशि भारद्वाज - भाषा (द्वैमासिक) पत्रिका, मई-जून,2002, पृष्ठ - 132.
3. प्रह्लाद शर्मा - इन्टरनेट और पुस्तकालय, पृष्ठ-2.
4. संपा.अरविंद त्रिपाठी, गुंजन शर्मा - कम्प्यूटर शब्दकोश, पृष्ठ-3
5. संपा.डॉ.डी.एन.प्रसाद - बहुवचन, अक्टूबर-दिसम्बर,2007, पृष्ठ-130, 131
6. डॉ.हिरमोहन - सूचना प्रौद्योगिकी और जनमाध्यम, पृष्ठ - 25.
7. डॉ.गोविंद प्रसाद, अनुपम पाण्डेय - हिंदी पत्रकारिता का स्वरुप, पृष्ठ - 282.
8. संपा. नन्द किशोर मिश्र - भाषा (द्वैमासिक) पत्रिका, जुलाई-अगस्त, 2000, पृष्ठ -10
9. संपा.डॉ.गंगाप्रसाद विमल - भाषा (द्वैमासिक) पत्रिका, मई-जून,1996, पृष्ठ-14
10. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम - अग्नि की उड़ान, पृष्ठ - 183
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डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर - 41 4 001.
(महाराष्ट्र)
मो. 9850619074
E_mail : drsatappachavan@gmail.com

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  1. आपने जो जानकारी समेटी है वह अत्यंत सतही और सेद्धांतिक है । इंटरनेट और हिन्दी का विस्तृत और अधुनातन संबंध है । आपसे अधिक नवीन जानकारी की आशा थी । कृपया नवीन तथ्यों और संदर्भों से जुड़ें और लाभान्वित हों । डॉ. मोहसीन खान

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