गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

विजेंद्र शर्मा का आलेख - एक शख़्सियत….......अतुल अजनबी

अतुल अजनबी
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उस आदमी से तो हर वक़्त होशियार रहो
जो दूसरों से तुम्हें होशियार करता है

एक शख़्सियत….......अतुल अजनबी

ऐसा माना जाता है कि ग़ज़ल का इतिहास तक़रीबन 1000 साल पुराना है पर हिन्दुस्तान में अपने 300 साला सफ़र में ग़ज़ल ने मुख्तलिफ़- मुख्तलिफ़ राहों पे सफ़र किया है। ग़ज़ल कभी फ़क़ीरों की ख़ानकाहों में कयाम करती रही , कभी साक़ी- ओ- पैमाने में क़ैद रही ,कभी ख़ुदा की इबादत का एक ख़ूबसूरत ज़रिया बनी और फिर महबूब की ज़ुल्फों के साए में अपनी थकन मिटाने के बाद आज आम आदमी की ज़िन्दगी की तरह टूटी -फूटी सड़क पर भी अपना सफ़र जारी रखे हुए हैं। कोई सुख़नवर इसे अपने फिक्रो फ़न से महलों की रानी सा बना देता है तो कोई इसे नीम का रस पिलाने से भी परहेज़ नहीं करता। जदीद (आधुनिक ) शाइरी के दरख़्त को मीर तकी मीर ,मिर्ज़ा ग़ालिब, ज़ौक़ ,दाग़ ,मोमिन ,जिगर ,हफीज़ ,नजीर ,फैज़ और हाली ने अपने लहू से सींचा और वक़्त के साथ - साथ फिराक़ ,कैफ़ी ,मज़रूह ,जौन एलिया ,आदि ने भी इस शजर के साए को कम न होने दिया। इसमें भी कोई शक़ नहीं कि ग़ज़ल को मुशायरों ने आम -ओ -खवास तक पहुंचाया और ग़ज़ल कि मक़बूलियत को बुलंदी अता की पर शाइरी से त-अल्लुक़ रखने वाले ये भी सोचने लगे कि बशीर बद्र , निदा फ़ाज़ली , वसीम बरेलवी ,शहरयार , मुज्ज़फर हनफ़ी ,राहत इन्दौरी , मुनव्वर राना सरीखे शाइर ग़ज़ल का दामन किन हाथों में सौंपेंगे ? नई नस्ल क्या ग़ज़ल की नाज़ुकी और इसके नखरे उठा पाएगी ? ग़ज़ल से अगर ये सवाल किया जाए तो ग़ज़ल यही कहेगी की इस अहद में नस्ले- नौ ( नई पीढ़ी ) के हाथों में भी शाइरी महफूज़ है क्यूंकि साठ और सत्तर के दशक में पैदा हुए शाइर भी ऐसे शे'र कह रहे है जिन्हें सुनकर मीर की रूह को यकीनन चैन मिलता होगा :--

जब ग़ज़ल मीर की पढता है पड़ौसी मेरा

एक नमी सी मेरी दीवार में जाती है

ये शे'र ऐसे नौजवान शाइर ने कहा है जो अपना कहन भी अलग रखता है और लहजा भी अलग, जिसकी शाइरी में ग़ज़ल संवेदना का साथ नहीं छोडती है यूँ तो अतुल "अजनबी" नाम से उस शाइर की पहचान है पर जब उनका क़लाम सुन लिया जाय तो फिर वो "अजनबी" नहीं अपना सा लगने लगता है। अतुल "अजनबी" अपने तजरुबात और जज़्बात को इस सलीक़े से शाइरी के सांचे में ढ़ालते हैं कि फिर बड़े - बड़े उस्ताद तक यही सोचते हैं कि ;---

घर ले लिया है अब के उसी के पड़ौस में

इस बार देखें आग लगाता कहाँ से है

उसकी तरक्कियों की कहानी में मैं भी हूँ

अब देखना है ये कि सुनाता कहाँ से है

तूने ग़ज़ल पढ़ी तो "अतुल" कुछ ने दाद दी

कुछ लोग सोचने लगे लाता कहाँ से है

अतुल अजनबी की उम्र को देखते हुए उनकी शाइरी की गहराई ,लफ़्ज़ों को बरतने का उनका अंदाज़ और शे'र कहने का ढंग वाकई ये सोचने पे मजबूर करता है कि ये शख्स ऐसे अशआर लाता कहाँ से है।

अतुल अजनबी का जन्म 10 सितम्बर 1969 स्व. रमा कान्त श्रीवास्तव के यहाँ तमसा नदी के किनारे बसे शहर अकबरपुर (उतर प्रदेश ) में हुआ। अतुल साहब का बचपन अकबरपुर में ही गुज़रा और तेरह बरस की उम्र तक पहुँचते - पहुँचते उन्होंने रंगमंच पे किरदार को कपड़े की तरह पहनना शुरू कर दिया।

1982 में अतुल साहब अपने चाचा डॉ. उमाकांत श्रीवास्तव के साथ भिंड आ गये ये वो दौर था जब उनकी तमाम मौज़ -मस्ती उनसे छीन ली गई और उनके सामने जो आलम था वो था सिर्फ़ पढ़ाई और पढ़ाई। उसके बाद अतुल साहब तानसेन ,शाइर मुज़्तर खैराबादी, जाँ निसार अख्तर ,फैयाज़ ग्वालियरी और रानी लक्ष्मी बाई की शहादत स्थली पत्थरों के शहर ग्वालियर आ गये। जीवाजी यूनिवर्सिटी ,ग्वालियर से इन्होंने बी.एस.सी एवं एम् .ए (हिन्दी) में किया। इसके बाद इन्होंने लखनऊ से एल .एल .बी किया। इसी दरमियान अकबरपुर में अतुल साहब को इश्क़ नाम का मर्ज़ लग गया जब इश्क़ होने को होता है तो वो ये नहीं देखता की महबूब किस जाति का है किस बिरादरी का है,किस मज़हब का है। इश्क़ की राह आसान नहीं थी पर अतुल साहब इस राह पर भी डगमगाए नहीं उन्होंने 1991 में नौकरी लगने के बाद अपनी सच्ची मुहब्बत यानी अर्चना वर्मा से 1992 में निकाह कर लिया। ये मिसरे शायद उन्होंने अपने ऊपर ही कहे होंगे :--

करम है उसका कोई बददुआ नहीं लगती

मेरे चराग जलें तो हवा नहीं लगती

तुम्हारे प्यार की ज़ंजीर में बंधा हूँ मैं

सज़ा ये कैसी मिली है ,सज़ा नहीं लगती

किसी से प्यार करो और तजरुबा कर लो

ये रोग ऐसा है जिसमें दवा नहीं लगती

शाइरी से मुहब्बत अतुल अजनबी साहब को 1987 से हुई और शे'र कहने लगे। चाशनी जैसी शिरी ज़ुबान उर्दू उन्होंने मरहूम क़मर ग्वालियरी साहब से सीखी। अगर ग़ज़ल एक संगमरमर की ख़ूबसूरत मूरत है तो उस मूरत को गढ़ना अतुल अजनबी को हिन्दुस्तान के मुमताज़ शाइर प्रो. वसीम बरेलवी ने सिखाया , वसीम साहब की शागिर्दी में अतुल अजनबी ने अपने आप को ऐसा मुसव्विर (चित्रकार) बना लिया जिसने ग़ज़ल की तस्वीर बनाने में कभी रिवायत के रंग और तहज़ीब के ब्रश का साथ नहीं छोड़ा और फिर शे'र हुए तो ऐसे हुए :----

हर रंग कैनवस पे बदलने लगा था रंग

तस्वीर मैं तुम्हारी बनाने से रह गया

मंज़िल को जाने क्या हुआ ,क़दमों में आ गयी

मैं रास्ते का लुत्फ़ उठाने से रह गया

शाइरी के अपने मुख़्तसर से सफ़र में अतुल अजनबी मील के उस पत्थर तक पहुँच गये है जहाँ पहुँचने में मुद्दतें लग जाती हैं। नए ज़माने का मौसम कितना भी सख्त और गर्म क्यूँ न हुआ हो पर अतुल अजनबी ने जो रिवायत और तहज़ीब की दुशाला एकबार अपने उस्ताद से आशीर्वाद स्वरुप ओढ़ ली तो फिर उसे अपने बदन से कभी नहीं उतारा। यहाँ तक की इन्तक़ाम लेने जैसे मफ़हूम को उन्होंने इस सलीक़े से ग़ज़ल बनाया कि इसी सलीक़े से इन्तक़ाम लेने का दिल करने लगता है :---

बड़े सलीक़े बड़ी सादगी से काम लिया

दिया जला के अँधेरे से इन्तक़ाम लिया

*****

ज़िक्र क्या लब पे उसका नाम नहीं

इससे माकूल इन्तक़ाम नहीं

जब जिसे चाहिए,बुरा कहिये

इससे आसान कोई काम नहीं

मशहूर शाइर निदा फ़ाज़ली साहब के हिसाब से अतुल अजनबी आज का शाइर है पर उसके इस आज में बीते हुए बहुत सारे कलों की भी हिस्सेदारी है और अतुल ने आज में कल की शिरकत को ग़ज़ल बनाया है। अतुल अजनबी के बारे में प्रो. वसीम बरेलवी अपनी ये राय रखते हैं कि अतुल ग़ज़ल के बेपनाह समन्दर में गोताज़नी को बेताब और अनमोल मोती ढूँढने की कोशिश में लगे रहते हैं। ग़ज़ल की बारीकियों को सिखाने का जहां भी कैम्प हो अतुल को ललक रहती है कि वो उसमें शामिल हो जाए।

हर वक़्त सिखने की चाह ,हमेशा अपने आप को तालिबे -इल्म समझना ,मशक से पीछे न हटना ये तमाम चीज़ें अतुल अजनबी को शख्स से शख्सीयत में तब्दील करती है तभी तो ऐसे मिसरे अतुल अजनबी की क़लम से निकलते हैं :---

समझ में उसकी ,ये बात आएगी कभी कभी

चढ़ी नदी तो उतर जायेगी कभी कभी

ख़मोश रह के सहा है हरेक ज़ुल्म तेरा

यही ख़मोशी गज़ब ढाएगी कभी कभी

*****

लाख ऊँचाई पे उड़ता हो परिंदा लेकिन

दाना दिखते ही ज़मीं पर वो उतर आता है

*****

लाख मजबूत से मज़बूत सहारा दीजे

झूठ सच्चाई की दीवार से गिर जाता है

सर्द मौसम की हवाओं से लड़ें हम कब तक

अपना सूरज भी तो किरदार से गिर जाता है

अतुल अजनबी LIC विभाग में कम्यूटर प्रोग्रामर है और सरकारी दफ्तरों के रोज़-मर्रा के काम अपने इर्द-गिर्द दफ्तरों की फ़जां को भी उन्होंने शे'र की शक्ल दी है :-

दीवारों से दरवाजों तक रिश्वत मांगने वाले हैं

बाँटते -बाँटते थक जाओगे ये दफ़्तर सरकारी है

अतुल अजनबी का पहला ग़ज़ल संग्रह "शजर मिज़ाज" (नागरी) 2005 में शिल्पायन प्रकाशन दिल्ली से आया जिसने ग़ज़ल से मुहब्बत करने वालों को एक नायाब तोहफा दिया। उनका दूसरा मज़्मुआ- ए- क़लाम उर्दू में "बरवक़्त " 2010 में मंज़रे -आम पे आया। शजर (पेड़) के मिज़ाज को अतुल ने बड़ी गहराई से समझा और दरख़्त को अपना मौज़ूं और प्रतीक बना के ख़ूबसूरत शे'र कहे :-

सफ़र हो शाह का या क़ाफ़िला फ़क़ीरों का

शजर मिज़ाज समझते हैं राहगीरों का

***

किसी दरख़्त से सीखो सलीक़ा जीने का

जो धूप - छाँव से रिश्ता बनाये रहता है

****

ये रहबर आज भी कितने पुराने लगते हैं

की पेड़ दूर से रस्ता दिखाने लगते हैं

****

अजब ख़ुलूस अजब सादगी से करता है

दरख़्त नेकी बड़ी ख़ामुशी से करता है

**

पत्तों को छोड़ देता है अक्सर खिज़ां के वक़्त

खुदगर्ज़ी ही कुछ ऐसी यहाँ हर शजर में है

अतुल अजनबी की परवरिश गंगा-जमुनी तहज़ीब के माहौल में हुई और हिन्दू परिवेश में पले-बढ़े होने के बा-वजूद उन्होंने दुआ भी मांगी तो क्या खूब मांगी --

हमारी शाख़े - तमन्ना पे फूल जाए

अगर ज़बान पे ज़िक्रे रसूल जाए

हवा चले तो गुज़ारिश है बस यही अपनी

हमारे घर में मदीने की धूल जाए

अतुल अजनबी की शाइरी शजर जैसे मिज़ाज के साथ - साथ कलंदाराना मिज़ाज भी रखती है अगर किसी शाइर के क़लाम में सूफियाना ख़ुश्बू न हो तो उसकी शाइरी मुकम्मल नहीं होती अतुल भाई का क़लाम इस ख़ुश्बू से महरूम नहीं है :--

हम फ़क़ीरों का कोई घर ज़मीं होती है

दिन गुज़रता है कहीं रात कहीं होती है

तेरे हर ज़ुल्म से होता है बहुत शौर मगर

उसकी लाठी में तो आवाज़ नहीं होती है

****

ग़मों की धूप वहाँ तक कभी नहीं आती

जहाँ -जहाँ तेरी रहमत का शामियाना है

अमीरे-शहर के सर पे है ताज दुनिया का

फ़क़ीरे-शहर की ठोकर में ये ज़माना है

अतुल अजनबी ने ज़िन्दगी के हर पहलू से ग़ज़ल निकाली है वो चाहे मुहब्बत हो, सियासत हो या नसीहत यही ख़ासियत एक शाइर को मुकम्मल शाइर बनाती है और इनके अशआर सुनके लगता नहीं कि इतने छोटे से अदबी सफ़र वाला अतुल अजनबी कब अजनबी से अपना हो जाता है :---

तुम्हारा ज़िक्र मेरी दास्ताँ तक पहुंचा

जुनूने-इश्क़ कहाँ से कहाँ तक पहुंचा

ख़रीदना था यहाँ क्या मुझे पता ही नहीं

बस एक जुनून में तेरी दुकाँ तक पहुंचा

****

नगर को छोड़ गये जब से कुछ सियासी लोग

नगर में तब से कोई हादसा नहीं होता

****

फ़सादियों से वतन को बचा के रखना है

चराग़ प्यार का हमको जला के रखना है

बहाने ढूँढ के जो रोज़ घर में आता हो

सयानी बेटी को उससे बचा के रखना है

यहाँ तक कि सानिया मिर्ज़ा को ज़हन में रख के उन्होंने किस सलीक़े से अपने दिल की टीस बयान की है :-

ऐसा नहीं कि भूल से इसबार गिर गई

हर बार एतबार की दीवार गिर गई

सब हाथ मलते रह गये दरिया के इस तरफ़

ऐसी कटी पतंग कि उस पार गिर गई

छोटी बहर में भी बड़ी बात कहने का हुनर अतुल भाई अपने फ़न के खाते में रखते हैं :-

आँसुओं की अजब कहानी है

सब समझते रहे कि पानी है

***

ख़ुद को पानी सा बना लेता है

इस तरह सब से निभा लेता है

इन दिनों इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने मुशायरों को हर जगह मक़बूल कर दिया है। दिनों - दिन अतुल अजनबी की माँग मुशायरों में बढ़ने लगी है पर ये भी सच है कि मुशायरे में शुहरत और तालियों कि चाह शाइर को उसकी शाइरी से दूर कर देती है। ख़ुदा का शुक्र है कि अतुल अजनबी अभी तक इस बीमारी की चपेट में नहीं आयें है मगर ये ऐसा संक्रमण है जिससे उन्हें हर हाल में बचना होगा, उन्होंने ख़ुद कहा है :-

मुशाइरों में फ़क़त शाइरी नहीं चलती

मुशाइरों में अदाएँ भी काम करती है

अतुल अजनबी बिजली के तारों सरीखी बिछी हुई नफरतों के दरमियान अपनी मुहब्बत की पतंग एक मंझे हुए पतंगबाज़ की तरह उड़ाते हैं और अभी तक उनकी पतंग न तो कटी है न ही शुहरतों की डोर में कहीं उलझी है तभी तो ऐसे शे'र उनकी शाइरी के खज़ाने में है :--

आती है तेरी याद तो उड़ता है ज़हन यूँ

जैसे कटी पतंग को बहकी हवा मिले

**

मेरे बगैर मुकम्मल है दास्तान तेरी

तेरे बगैर मुकम्मल मैं हो नहीं सकता

***

तुम्हारे शहर में गर इक दुकान मिल जाती

मैं खुशबुओं का वहाँ कारोबार कर लेता

अतुल अजनबी ग़ज़ल के हर पेचो-ख़म से वाक़िफ़ है और ग़ज़ल में हस्सास (संवेदना) की उन्हें हर पल तलाश रहती है यही उनके क़लम की ताक़त भी है। इसमें कोई शक़ नहीं कि आज की ग़ज़ल अतुल अजनबी की क़लम से लिपटकर मुतमईन है उसे पक्का यक़ीन है कि अतुल अजनबी जैसे शाइर इस आपा - धापी के मौसम में भी उसकी आबरू की हिफाज़त पूरी शिद्दत के साथ कर सकते हैं। हिन्दुस्तानी ग़ज़ल का परचम पूरे विश्व में फहराने वाले हमारे अहद के मोतबर अदीब भी इस बात से इतेफाक़ रखते हैं कि आने वाले वक़्त में निश्चित तौर पर शाइरी अतुल अजनबी के कहन में महफूज़ रहेगी।

आख़िर में अतुल भाई के इन्ही मिसरों के साथ :---

उड़ते परिंदे देखे तो एहसास ये हुआ

कितनी कमी अभी भी हमारे सफ़र में है

तख्लीक़ जिसने देखी वो दीवाना हो गया

जादू ज़रूर कोई तुम्हारे हुनर में है

ख़ुदा हाफ़िज़ ....

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. atul ji ki ghazal,sher pahli baar padh rahi hoon ...kamaal ki shakhsiyat hain ...padhvaane ke liye haardik aabhar.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहोत ही उम्दा और लाजवाब कलाम है जनाब अतुल साहब आपके

    उत्तर देंहटाएं

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