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एक शख्सियत…......हस्तीमल "हस्ती" : विजेंद्र शर्मा का आलेख

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हस्तीमल " हस्ती " प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है नये परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है ...

हस्तीमल "हस्ती"

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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है

नये परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है

एक शख्सियत......हस्तीमल "हस्ती"

ये सच है कि ग़ज़ल कहना उतना आसान नहीं है जितना लोग समझते हैं। पर ग़ज़ल, बहर की पटरियों पे चलने वाली लफ़्ज़ों और एहसासात की कोई रेल गाड़ी भी नहीं है। जिस तरह शाइरी ज़िन्दगी को सलीक़े से जीने का नाम है उसी तरह ग़ज़ल भी किसी बात को सलीक़े से कहने का एक अंदाज़ है मगर ग़ज़ल को अपनी बपोती समझने वालों ने इसे बहर और अरूज़ (व्याकरण ) के जाल में ऐसे उलझा दिया है जैसे कोई बच्चा ऊन के गोले को उलझा देता है। इसमे कोई दो राय नहीं कि ग़ज़ल का अपना अरूज़ है और उसकी जानकारी बेहद ज़रूरी है। बहर के मीज़ान (तराज़ू ) पे भी ग़ज़ल खरी उतरनी चाहिए पर कुछ ऐसे शाइर भी है जिन्होंने इन तमाम चीज़ों का इल्म न होने के बाद भी ऐसी शाइरी की है जो ग़ज़ल को नापने -तौलने के सभी माप-दंडों पे खरी उतरती है। कबीर .और अमीर खुसरो इसकी बहुत उम्दा मिसाल है उन्हें क्या मालूम था की बहर क्या है ,रदीफ़ क्या है ,काफ़िया क्या है मगर उनकी ज़मीन पर आज भी बड़े- बड़े शाइर ग़ज़ल की इमारतें तामीर कर रहे हैं । हमारे अहद के ऐसे ही एक शाइर से मुख़ातिब करवाता हूँ जिसे ग़ज़ल से इतनी मुहब्बत हुई कि वो ग़ज़ल को बिना किसी इल्मी तआर्रुफ़ के भी यूँ कहने लगा जैसे ग़ज़ल मुद्दतों से उसकी महबूबा रही हो , शाइरी को इबादत का दर्जा देने वाले उस सुख़नवर का नाम है हस्तीमल "हस्ती "।

राजस्थान में उदयपुर संभाग के राजसमन्द ज़िले में जैन धर्म के मरकज़ की परिधि में एक कस्बा आता है आमेट ,आमेट के ही एक कारोबारी जैन परिवार में हस्तीमल "हस्ती" का जन्म 11 मार्च 1946 श्री सोहनलाल जी बम्ब के यहाँ हुआ। इनके वालिद का कपड़े का कारोबार था सो घर में सिर्फ़ कारोबारी माहौल था शाइरी की फ़िज़ां से तो आमेट की आबो-हवा का कोई दूर का रिश्ता भी नहीं था। हायर सेकेंडरी तक की पढाई हस्तीमल जी ने आमेट में ही पूरी की और अपनी इसी तालीम के दौरान उन्हें साहित्य में रूचि हो गई इलाके में उस ज़माने में एक -दो अखबार आते थे जिनमें साहित्य से रब्त रखने वाली सामग्री की तलाश उन्हें हर पल रहती थी । एक पत्रिका में उनकी जब एक कहानी छपी तो कुछ अध्यापकों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या ये हस्तीमल ने लिखी है ? ये वो वक़्त था जब नियति ने हस्ती साहब के ज़हन में अदब का बीज डाल दिया था फिर कारोबार के सिलसिले में हस्ती साहब को बम्बई भेज दिया गया। कारोबार हो या शौक़ बम्बई में अपनी ज़मीन तलाश करना कौन सा आसान था हस्ती साहब कारोबार के साथ -साथ रिसाले पढ़ - पढ़ कर अपने अदब से बने रिश्ते को जवान करने लगे फिर एक दिन वो घटित हुआ जिसने हस्तीमल बम्ब को शाइर हस्तीमल "हस्ती" बना दिया उस रोज़ हस्ती साहब को किताबों की दुकान पे गुजरात के शाइर बरक़त विरानी "बेफ़ाम" का मज़्मुआ-ए- क़लाम हाथ लगा जिसे पढ़ने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि लिखना है तो बस ग़ज़ल ही लिखना है और उसी दिन से हस्ती साहब ग़ज़ल के इश्क़ में गिरफ्तार हो गये। शुरुआत उन्होंने मुक्तक लिखने से की ,कुछ ग़ज़लनुमा लिखा और ग़ज़ल के अपने जानकार मित्रों को दिखाया ,मित्रों ने कहा कि बात तो अच्छी है मगर बहर में नहीं है ,हस्ती साहब ने ग़ज़ल को अपना जुनून बना लिया सो उन्होंने अपना मुताला (अध्ययन ) बढ़ाया और ग़ज़ल को रिझाने में वो मशक किया कि कुछ बहरें तो उनके ज़हन में हमेशा के लिए आ के बस गई और फिर एक दिन वो भी आया जब ग़ज़ल ख़ुद अपनी बाँहें फैलाए हस्ती साहब कि बांहों में समा गई।

हस्ती साहब का जुनून और उनके लहजे की सादगी ने लफ़्ज़ों को जब ग़ज़ल में तब्दील करना शुरू किया तो नतीजा ये हुआ :---

ये मुमकिन है कि मिल जाएँ तेरी खोयी हुई चीज़ें

क़रीने से सजा कर रख ज़रा बिखरी हुई चीज़ें

ज़माने के लिए जो हैं बड़ी नायाब और महँगी

हमारे दिल से सब की सब हैं वो उतरी हुई चीज़ें

दिखाती हैं हमें मजबूरियाँ ऐसे भी दिन अक़्सर

उठानी पड़ती हैं फिर से हमें फेंकी हुई चीज़ें

बम्बई में हस्ती साहब का ज़ेवरात का कारोबार था ,एक ईमानदार सरकारी मुलाज़िम की तरह सुबह दस से शाम सात बजे तक का पूरा वक़्त वे अपने कारोबार को देते और अपनी ग़ज़ल के लिए वक़्त वे रात के सीने को चीर के निकालते थे जैसे - जैसे सोने को तपा - तपा के कुंदन बनाने का हुनर उनके हाथों को आता गया वैसे - वैसे लफ़्ज़ों को बरतने का खेल भी उनकी क़लम को समझ आने लगा और वक़्त के साथ -साथ मशक कर - कर के वे ग़ज़ल के ऐसे जौहरी हो गये कि पीतल की तरह दिखने वाले बेजान से मफ़हूम को भी अपनी कहन की कारीगरी से चांदी की ख़ूबसूरत ग़ज़ल सरीखी पाज़ेब में गढ़ने लगे। उनकी गढ़ी कुछ पाज़ेबों की छम -छम इन शे'रों में सुनाई देती है :---

चराग़ हो के हो दिल जला के रखते हैं

हम आँधियों में भी तेवर बला के रखते हैं

मिला दिया है पसीना भले ही मिट्टी में

हम अपनी आँख का पानी बचा के रखतें हैं

कहीं ख़ूलूस कहीं दोस्ती कहीं पे वफ़ा

बड़े करीने से घर को सजा के रखते हैं

***

जिसको सुकून कह्ते हैं अक्सर नहीं मिला

नींदें नहीं मिली कभी बिस्तर नहीं मिला

दहलीज़ अपनी छोड़ दी जिसने भी एक बार

दीवारों-दर ही उसको मिले घर नहीं मिला

सारी चमक हमारे पसीने की है जनाब

विरसे में हमको कोई भी ज़ेवर नहीं मिला

शाइरी से हस्ती साहब की मुहब्बत शुरू में इनके कारोबार और आस -पास के लोगों को रास नहीं आई ,दोनों से वफ़ा करने की कोशिश में कई बार शाइरी इनके व्यवसाय में आड़े आने लगी मगर हस्ती साहब ने अपने कारोबार को शाइरी की राह में कभी नहीं आने दिया यही वजह रही कि एक बार व्यथित हो हस्ती साहब ने शाइरी को तलाक़ देने का मन बना लिया ,पर ग़ज़ल को ये कहाँ गवारा था कि उसे बे-इंतिहा मुहब्बत करने वाला आशिक़ उस से अलग हो जाए ग़ज़ल तब अपने चाहने वाले से ऐसी लिपटी कि आज तक हस्ती साहब ग़ज़ल की चद्दर ही ओढ़ते -बिछाते हैं। वक़्त का पहिया ज्यूँ - ज्यूँ चलता गया हस्ती साहब का नाम मोतबर शाइरों में शुमार होने लगा। अपनी मेहनत और लगन से ग़ज़ल की तमाम पेचीदगियों से वे वाकिफ़ हो गये 80 के दशक तक तो उनके तेवर अपनी अलग शनाख्त बना चुके थे। हस्ती साहब के उस तेवर से आप उनके अशआर के ज़रिये मुख़ातिब हो सकते हैं :---

दोनों ही एक जैसे हैं कुटिया हो या महल

दीवारो दर के मानी समझ में जो गए

नज़रें हटा ली अपनी तो ये मोजजा हुआ

जल्वे सिमट के ख़ुद मेरी आँखों मे गए

पंडित उलझ के रह गए पोथी के जाल में

क्या चीज़ है ये ज़िंदगी बच्चे बता गए

****

बड़े- बड़ों को ज्ञान मिला उन बच्चों की नादानी से

काग़ज़ की जो नाव लड़ाते खेल-खेल में पानी से

सोच -सोच कर हैरत में हूँ कौन- सी मुझसे भूल हुई

सच्ची बात कही तो सबने देखा क्यूँ हैरानी से

बम्बई में हस्ती जी को शाइरी का अच्छा माहौल मिला, मरहूम सुदर्शन फ़ाकिर,ताजदार ताज ,निदा फ़ाज़ली, कैसर -उल- ज़ाफरी और सूर्यभानु गुप्त की सोहबतों में हस्ती साहब की शाइरी को और फलने -फूलने का मौक़ा मिला उनका पहला मज़्मुआए क़लाम "क्या कहें किस से कहें" भी 80 के दशक के आख़िर में मंज़रे - आम पे आया जिसे महाराष्ट्र साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत भी किया। उनका दूसरा ग़ज़ल -संग्रह "कुछ और तरह से भी " 2005 में ग़ज़ल प्रेमियों के हाथ में आया जिसे मध्यप्रदेश के "अम्बिका प्रसाद दिव्य" सम्मान से नवाज़ा गया।

ग़ज़ल के पैकर के साथ हस्ती साहब ने कभी कोई छेड़-छाड़ नहीं की, जीवन के तमाम पहलुओं से उन्होंने शे'र निकाले उनकी शाइरी में ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी नज़र आया तो इस सूरत में नज़र आया :---

इक चौराहे के जैसा है जिसको जीवन कह्ते हैं

राहों -सा मिल जाना भी है राहों -सा बँट जाना भी

दरिया जैसे फैले रहना है अपना अंदाज़ मगर

वक़्त पड़े आता है हमको बूँदों में ढल जाना भी

**********

आग पी कर भी रौशनी देना

माँ के जैसा है ये दिया कुछ - कुछ

उलझे धागों से हमने समझा है

जिंदगानी का फलसफ़ा कुछ - कुछ

शाइरी का एक मक़सद समाज को सही राह दिखाना भी है, हस्ती साहब ने भी शाइर होने का ये फ़र्ज़ अपनी नसीहतों को शाइरी बनाकर अदा किया है। उनकी नसीहतों भरी मानीखेज़ शाइरी समाज को बहुत से ख़तरात से आगाह करती है और इन्सान को कुछ कर गुज़रने का मशविरा भी देती है :--

साया बनकर साथ चलेंगे इसके भरोसे मत रहना

अपने हमेशा अपने रहेंगे इसके भरोसे मत रहना

बहती नदी में कच्चे घड़े हैं रिश्ते, नाते, हुस्न, वफ़ा

दूर तलक ये बहते रहेंगे इसके भरोसे मत रहना

सूरज की मानिंद सफ़र पे रोज़ निकलना पड़ता है

बैठे-बैठे दिन बदलेंगे इसके भरोसे मत रहना

हस्ती जी ने ग़ज़ल के साथ -साथ दोहे भी कहे उनके दोहे भी उसी ख़ुशबू का एहसास करवाते हैं जो ख़ुशबू उनकी ग़ज़ल के शे'रों में आती है :--

बेशक़ मुझको तौल तू, कहाँ मुझे इनक़ार

पहले अपने बाट तो ,जाँच-परख ले यार। ।

****

तन बुनता है चदरिया, मन बुनता है पीर

दास कबीरा सी रही, अपनी भी तक़दीर । ।

हस्ती जी की ग़ज़लों में जो बात सबसे हट के नज़र आती है वो है उनका रदीफ़ का इंतेख़ाब,वे अपनी ग़ज़लों के लिए ऐसे रदीफ़ इस्तेमाल करते हैं जिसे एक मिसरे में निभाना ही मुश्किल होता है और हस्ती साहब उस रदीफ़ को बड़ी आसानी से ग़ज़ल का उफनता दरिया पार करवा देतें है। अपनी इस बात के हक़ में बतौर सुबूत उनके ये अशआर जो इस अजीबो -गरीब रदीफ़ "यूँ थोड़े ही होता है" को निभाते हैं :---

काम सभी हम ही निबटाएँ ,यूँ थोड़े ही होता है

आप तो बैठे हुक़म चलाएँ,यूँ थोड़े ही होता है

अपने हुनर की शेखी मारे, वक़्त नाच का आए तो

आँगन को टेढ़ा बतलाएँ यूँ थोड़े ही होता है

कभी कभी तो आप भी हमसे, मिलने की तकलीफ़ करें

हरदम हम ही आएँ - जाएँ यूँ थोड़े ही होता है

***

रखते हैं कहकहों में छुपाकर उदासियाँ

ये मयकदे तमाम,ये मालूम है मुझे

जब तक हरा -भरा हूँ उसी रोज़ तक है बस

सारे दुआ-सलाम ये मालूम है मुझे

छोटी बहर में ग़ज़ल कहना किसी भी सूरत में सहल नहीं है ये शाइर के उस हुनर का इम्तेहान है जो कम लफ़्ज़ों में बड़ी और गहरी बात कहने का फ़न रखता हो ,हस्ती साहब ने छोटी बहर में बहुत ग़ज़लें कही है जिनमें से बतौरे -ख़ास ये दो मुलाहिज़ा हो :-

उस जगह सरहदें नहीं होती

जिस जगह नफ़रते नहीं होती

उसका साया घना नहीं होता

जिसकी गहरी जड़ें नहीं होती

मुंह पे कुछ और पीठ पे कुछ और

हमसे ये हरकतें नहीं होती

*****

बरसों रुत के मिज़ाज सहता है

पेड़ यूँ ही बड़ा नहीं होता

जिस्म ऐसा लिबास है साहब

चाहने से नया नहीं होता

घर से बेटी गई तो याद आया

फल कभी पेड़ का नहीं होता

हस्तीमल हस्ती अपनी शाइरी में आम बोलचाल की उस हिन्दुस्तानी ज़ुबान का इस्तेमाल करते हैं जिसे कबीर ,अमीर खुसरो , नज़ीर बनारसी और रसखान ने अपनी शाइरी में बरता था। ऐसे लफ़्ज़ों से हस्ती साहब हमेशा परहेज़ करते हैं जिन्हें समझने के लिए पढ़ने वालों को शब्दकोष खंगालना पड़े। मामूली से नज़र आने वाले लफ़्ज़ों के थान से कुछ लफ़्ज़ लेकर अपने तख़लीकी जौहर से हस्ती साहब ग़ज़ल के लिए ऐसा लिबास तैयार करते हैं जिसे पहनकर ग़ज़ल अदब की राह पर बड़ी आसानी से अपना सफ़र इठलाते हुए तय करती है। हस्ती साहब के बनाए कुछ ग़ज़ल के पैरहन दिखाता हूँ :---

जो बाग़ के फूलों की हिफ़ाज़त नहीं करते

हम ऐसे उजालों की हिमायत नहीं करते

जूड़े में ही सजने का फ़क़त शौक़ है जिनको

हम ऐसे गुलाबों से मुहब्बत नहीं करते

****

टकराए जैसे आईना पत्थर से बार -बार

यूँ लड़ रहा हूँ अपने मुक़द्दर से बार -बार

या रबहमें ये पाँव भी तूने अता किए

तू ही संभाल ,निकलें जो चादर से बार-बार

शाइरी को अगर सिर्फ़ शौक़ तक ही महदूद (सीमित) कर दिया जाय तो शाइरी सिर्फ़ शौक़ ही बनकर रह जाती है। हस्ती साहब से नई नस्ल को ये तो सीखना चाहिए कि शौक़ को जुनून में तब्दील कर अगर ग़ज़ल की इबादत की जाए तो वो हासिल ज़रूर होती है । हस्ती जी कह्ते है की नई पीढ़ी पढ़ती और सुनती कम है ,उसे ग़ज़ल कहना शुरू करने से पहले ग़ज़ल की तमाम बारीकियों को जानना चाहिए । ग़ज़ल के पहलुओं को अगर निष्ठा से साहित्य के किसी भी रूप में खोजा जाय तो वे मिलते ज़रूर है और जब पूरी तरह दिलो- दिमाग पे ग़ज़ल उतर जाए उसके बाद ही ग़ज़ल कहने की कोशिश करनी चाहिए। नई पीढ़ी तपने से परहेज़ करती है ,छपने में एतबार करती है और बिना तपे तो कुंदन हुआ नहीं जाता। हस्ती साहब पेशे से एक जौहरी है उन्होंने अपने पेशे की तमाम फ़नकारी को शाइरी में इस्तेमाल किया है ,लफ़्ज़ों को एहसास की भट्टी में तपा-तपा कर ही उन्होंने ऐसे ज़िन्दा शे'र कहे हैं :---

ख़ुद चराग़ बन के जल वक़्त के अँधेरे में

भीख के उजालों से रौशनी नहीं होती

शायरी है सरमाया ख़ुशनसीब लोगों का

बांस की हर इक टहनी बांसुरी नहीं होती

*****

चाहे जितने तोड़ लो तुम मंदिरों के वास्ते

फूल फिर भी कम होंगे तितलियों के वास्ते

पिछले तक़रीबन पंद्रह सालों से "युगीन काव्या " नामक एक अदबी रिसाला हस्ती साहब अपने बूते पे निकाल रहें है । अपने ज़ेवरात के कारोबार को बच्चों के हवाले कर इन दिनों हस्ती साहब पूरी तरह से समाज और अदब की ख़िदमत में लगे हैं । हस्ती साहब जैसे साहित्य उपासक बहुत कम होते हैं जो अपना सब कुछ अदब की एक ख़ास विधा ग़ज़ल को समर्पित कर दे। हस्ती साहब की ग़ज़ल पे पकड़ ,लफ़्ज़ों पे जकड़,उनके तेवर ,उनका लहजा देखकर उर्दू दुनिया के बड़े - बड़े नक्काद भी तस्लीम करते हैं कि हस्तीमल "हस्ती" ग़ज़ल कहने वालों में एक ऐसी मुहर है जो जिस काग़ज़ पे एकबार लग जाती है वो काग़ज़ फिर ग़ज़ल की ख़ुशबू से महक उठता है। बिना उर्दू लिखे -पढ़े ,बगैर रिवायत की दहलीज़ लांघे उर्दू ज़ुबान की आबो-हवा में ग़ज़ल के साथ अपने रिश्ते को ज़िन्दा रखने का कमाल और वो भी इतनी सादगी से हस्ती जी एक मुद्दत से मुसलसल करते आ रहें हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि आने वाले वक़्त में हस्तीमल "हस्ती" की शख्सीयत और उनके फ़न को ग़ज़ल वाले एक हवाले के तौर पे

इस्तेमाल करेंगे। ग़ज़ल का ये सच्चा आशिक़ ग़ज़ल की आबरू की हिफ़ाज़त यूँ ही करता रहे और आख़िर में हस्ती साहब की वो ग़ज़ल जो जगजीत सिंह साहब की आवाज़ के आग़ोश में ऐसी फ़रार हुई कि आज तक पकड़ में नहीं आ रही है :---

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है

नये परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था

लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है

गाँठ अगर लग जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी

लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है

--

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

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रचनाकार: एक शख्सियत…......हस्तीमल "हस्ती" : विजेंद्र शर्मा का आलेख
एक शख्सियत…......हस्तीमल "हस्ती" : विजेंद्र शर्मा का आलेख
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