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एक शख्सियत…. फैय्याज़ फ़ारूक़ी : विजेंद्र शर्मा का आलेख

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फैय्याज़ फ़ारूक़ी घर जो भरना हो तो रिश्वत से भी भर जाता है हाँ मगर इससे दुआओं का असर जाता है एक शख्सियत … . फैय्याज़ फ़ारूक़ी शाइरी एक ...

फैय्याज़ फ़ारूक़ी

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घर जो भरना हो तो रिश्वत से भी भर जाता है

हाँ मगर इससे दुआओं का असर जाता है

एक शख्सियत. फैय्याज़ फ़ारूक़ी

शाइरी एक मिज़ाज है शाइर चाहें कितना भी ग़ज़ल का अरूज़ (व्याकरण ) जानता हो,ग़ज़ल के पैकर से वाकिफ़ हो मगर जब तक उसके मिज़ाज में शाइरी नहीं है तो उसके क़लाम में न तो कहन आ सकता है न ही शेरियत। जिस तरह नदी के बहाव में एक लय होती है उसी तरह हर ग़ज़ल की अपनी- अपनी लय होती है और शाइरी का मिज़ाज इस लय से जब मिल जाता है तब एक शाइर का जन्म होता है। मुनव्वर राना साहब का एक मतला है :-

एक एक रोज़ तो होना है ये जब हो जाये

इश्क़ का कोई भरोसा नहीं कब हो जाये

जिस तरह इश्क़ का कोई भरोसा नहीं कि ये कब हो जाए ठीक उसी तरह शाइर मिज़ाज शख्स कब शे'र कहने लग जाये और शाइर हो जाये इसका भी कोई भरोसा नहीं आज जिस शख्सियत से आपका त-आर्रुफ़ करवा रहां हूँ वो इस बात की नायाब मिसाल है। इस ख़ुशफ़िक्र शाइर और बेहतरीन पुलिस अफसर का नाम है फैय्याज़ फ़ारूक़ी। फैय्याज़ फ़ारूक़ी साहब का जन्म 14 मार्च1967 को तीन तहज़ीबों यानी तीन दरियाओं के संगम की पवित्र नगरी इलाहाबाद में मरहूम मुबारक हुसैन फ़ारूक़ी साहब के यहाँ हुआ। जिस शहर ने नदियों और मज़हबों को गले मिलते हुए देखा हो , हिन्दुस्तान की तारीख़ को अदब और सियासत की बड़ी- बड़ी हस्तियाँ दी हो उस शहर से त-अल्लुक़ होना एक कामयाब इन्सान बनने का पहला सोपान है। फ़ारूक़ी साहब की पूरी तालीम अकबर इलाहाबादी, निराला,नूर नारवी, महादेवी वर्मा,फ़िराक गोरख़पुरी , हरिवंश राय बच्चन ,कमलेश्वर और शम्स उर रहमान फ़ारूक़ी के शहर इलाहाबाद में ही हुई। फ़ारूक़ी साहब ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से परसियन (फ़ारसी ) में एम्.ए किया।

इनके वालिद बैट्रीऔर टॉर्च बनाने वाली उस वक़्त की मशहूर कम्पनी "जीप" में मुलाज़िम थे मगर इसके साथ-साथ कमाल के शाइर भी थे, फ़ारूक़ी साहब के नाना तुफ़ैल अहमद हज़ीं भी उम्दा शाइर थे सो फ़ारूक़ी साहब के शाइरी खूँन में ही थी तभी तो फ़ारूक़ी साहब ने ये मतला कहा :-

चमन में उसकी मेहनत उसका जीना याद रखते हैं

के पोधे अपने माली का पसीना याद रखते हैं

घर की फ़िज़ां शाइराना थी यहाँ तक कि घर की दीवारों के रोगन से भी शाइरी की महक आती थी और ऐसे माहौल में जब परवरिश होती है तो मिज़ाज का शाइराना होना वाजिब है।

अपनी फ़ारसी की पढाई के दौरान फ़ारूक़ी साहब को शाइरी की दो बुलंद मीनारों इकबाल और फ़ैज़अहमद फ़ैज़ के क़लाम ने बड़ा मुतासिर किया और इनकी तबीयत भी शाइराना होने लगी। इक़बाल के इस शे'र ने फ़ारूक़ी साहब को शाइरी का वो आशिक़ बना दिया जो दिल ही दिल में ग़ज़ल को चाहने तो लगा था मगर इज़हार -ए -मुहब्बत से लबों तक का सफ़र उससे तय नहीं हो पा रहा था।

यक़ीं मोहकम ,अमल पैहम ,मुहब्बत फ़ातहे -आलम

जिहादे-ज़िंदगानी में ये है मर्दों की शमशीरें

(यक़ीं मोहकम=पक्का विश्वास, अमलपैहम =निरंतर कर्म,फ़ातहे -आलम=विश्वविजयी )

1993 में अपनी तालीम मुकम्मल करने के बाद फ़ारूक़ी साहब ने उतरप्रदेश के ऑडिट महकमे में दो साल तक मुलाज़मत की और फिर अपनी मेहनत और लगन से 1995 में भारतीय पुलिस सेवा में चयनित हो गये और इन्हें कैडर मिला पंजाब इस तरह तीन दरियाओं के संगम वाले शहर से फ़ारूक़ी साहब फिर तीन दरियाओं के सूबे (कभी पांच दरिया होते थे मगर अभी तीन ही रह गये हैं ) पंजाब में आ गये।

1999 का एक वाक़या है फ़ारूक़ी साहब उस वक़्त जालंधरमें एस पी (हैडक्वार्टर ) थे मशहूर गायक हँसराज 'हँस" ने इन्हें ख़ुमार बाराबंकवी की एक ग़ज़ल सुनाई वो ग़ज़ल इनके ज़हन में घर कर गई। पुलिस की नौकरी में घर-बार के लिए वक़्त ना के बराबर होता है सो फ़ारूक़ी साहब रात को गश्त के दौरान अपनी शरीक -ए-हयात को भी साथ लेके जाते थे ताकि कम से कम कुछ गुफ़्तगू तो बीवी से हो जाए और ऐसी ही एक पेट्रोलिंग के वक़्त वो कुछ गुनगुनानें लगे उनके अन्दर के शाइर का जन्म हो चुका था उन्होंने अपनी पहली श्रोता अपनी बेगम को अपने मिसरे सुनाये ,अदब नवाज़ बीवी हो तो शौहर के शाइर होने के रस्ते भी साफ़ हो जाते हैं। हफीज़ जालंधरी के शहर की सड़कों पे गश्त के दौरान हुए ये मिसरे ग़ज़ल में तब्दील चुके थे तो इस तरह हुई फ़ारूक़ी साहब के शाइर बन ने की इब्तिदा और बेगम की मुहर लगने के बाद जो शे'र हुए वो यूँ थे :--

तेरा हसीन चेहरा ज़ुल्फों से है अयाँ यूँ

महताब बदलियों से जैसे निकल रहा है

शर्मो-हया सेतेरी नज़रों का उठना गिरना

जैसे कोई शराबी गिर-गिर संभल रहा है

(अयाँ=ज़ाहिर )

इस ग़ज़ल के होने के बाद ग़ज़ल से अपनी मुहब्बत का इज़हार फ़ारूक़ी साहब कर चुके थे शायद ऐसा पहली मरतबा हुआ होगा जब कोई बेगम अपने शौहर के किसी और से मुहब्बत का इज़हार करने पर भी बेहद ख़ुश हुई हो। इस वक़्त फ़ारूक़ी साहब जो कुछ भी कहते उसका मशविरा अपने अज़ीज़ दोस्त मरहूम नैय्यर आकिल से ज़रूर करते। तब तक शाइरी के फ़न के एब और हुनर से पूरी तरह वे वाकिफ़ नहीं थे पर वक़्त के साथ-साथ शाइरी के तमाम दांव -पेच फ़ारूक़ी साहब की गिरफ़्त में आने लगे,पुलिस की नौकरी में मुल्ज़िम को गिरफ़्तार करने के हुनर का पूरा फ़ायदा उन्होंने शाइरी के गुरों को अपनी गिरफ़्त में करने में आज़माया। रिवायत की रस्सी को कभी वक़्त की धार काट नहीं सकती, शाइरी की बलंदी पे पहुँच कर अगर वहाँ ठहरना है तो इस रस्सी का साथ बेहद ज़रूरी है और इसी रस्सी को फ़ारूक़ी साहब ने भी कसके पकड़ लिया उनका क़लाम रिवायत के मीज़ान ( तराज़ू) से बा-आसानी तौला जा सकता है :--

ग़ज़ल की जब कहीं तौक़ीर जलने लगती है

तो फ़िक्र-- मीर- तक़ी -मीर जलने लगती है

क़लम ने की है हिफाज़त यूँ साफ़गोई की

ग़लत लिखूं तो ये शमशीर जलने लगती हैं

बना लूँ तुझ को मैं तक़दीर जब भी सोचा है

तो मुझ से ख़ुद मेरी तक़दीर जलने लगती है

************

मिले तुझ से कभी तो कह पाये हाल--दिल अपना

जहां पर होश वाजिब थे वहीं पर होश जाते थे

****

उसने नज़र मिला के झुका ली जो दफ़अतन

मैं डूबने से पहले किनारे पे गया

हमारे मीडिया और आज के दूषित वातावरण ने पुलिस की वो तस्वीर समाज के सामने पेश कर दी है जिसमें इंसानियत और इमानदारी के रंग धुंधले तो क्या दिखाई ही नहीं देते ऐसे में एक नई उम्मीद पैदा करता है। फैय्याज़ फ़ारूक़ी साहब का ये मतला जब भी कोई सरकारी मुलाज़िम सुनता है तो वो अपने ज़मीर के तहख़ाने में एकबार झाँक के ज़रूर देखता है :---

घर जो भरना हो तो रिश्वतसे भी भर जाता है

हाँ मगर इससे दुआओं का असर जाता है

इक अजब दौर के दस्तार बचानी मुश्किल

और उसको जो बचाता हूँ तो सर जाता है

शाइरी से फैय्याज़ साहब ने जब से नाता जोड़ा तब से अपनी फ़िक्र के परिंदे को उन्होंने चैन से नहीं बैठने दिया उस परिंदे ने न जाने कहाँ- कहाँ परवाज़ कर लफ़्ज़ों और ख़यालों के तिनके इक्कठे कियें और फिर ग़ज़ल के ख़ूबसूरत आशियाने बनाए। एक झलक उनके ऐसे ही एक आशियाने की :---

पड़े है चोट कभी दिल पे जो अना के ख़िलाफ़

चराग़ ज़ोर पकड़ता है तब हवा के ख़िलाफ़

भूला दूँ तुझ को ये मांगी है जब भी मैंने दुआ

दुआएं मांगी है फ़ौरन उसी दुआ के ख़िलाफ़

****

सो गया वो जिसे क़िस्सों का हुनर आता था

कौन अब आके बढ़ाएगा कहानी आगे

फैय्याज़ फ़ारूक़ी साहब बाक़ायदा फ़ारसी पढ़े हुए है उनके क़लाम में इसकी सिर्फ़ झलक ही नहीं दिखती बल्कि उनकी पूरी शाइरी फ़ारसी की रिदा में लिपटी नज़र आती है उनका क़लाम कारी (पाठक) का इम्तेहान भी लेता है मुनव्वर राना ने तो यहाँ तक कहा है कि फैय्याज़ फ़ारूक़ी की ग़ज़लें पढ़ते हुए अपनी कम इल्मी का एहसास होता है। फ़ारसी लफ़्ज़ों के अनूठे इस्तेमाल की वजह से उनका क़लाम न चाहकर भी आज की ग़ज़ल से एक सदी का फासला बना लेता है और उनकी ग़ज़लें यूँ लगती है जैसे हम दाग़ ,मोमिन और मीर के दौर की शाइरी से मुख़ातिब हैं। ज़ुबान और बयान के मुआमले में फ़ारूक़ी साहब पूरी दस्तरस (पहुँच) रखते हैं वे फ़ारसी और उर्दू के फ़ाज़िल तो है ही हिन्दी और पंजाबी से भी उनकी मुहब्बत जग ज़ाहिर है। ज़ुबान पे उनकी पकड़ किस दर्जा मेयारी है इसकी तस्दीक़ ये अशआर करते हैं :--

होंठ ख़ूनी,आँख तरकश ,ज़ुल्फ़ की लम्बी कमंद

हमने कुछ भी तो देखा बस दीवाने हो गये

सिर्फ़ रस्मी तौर पर मौसम पे की थी गुफ़्तगू

बस ज़रा सी बात के कितने फ़साने हो गये

(कमंद=रस्सी)

**

करो ज़ुल्म जी भर मगर सोच लेना

देखे कोई तो ख़ुदा देखता है

सँवरते हैं वो देखकर आइने को

सँवर जायेँ तो आईना देखता है

फैय्याज़ साहब की मुशायरों में शिरक़त बहुत कम है इसकी एक बड़ी वजह उनकी पुलिस की नौकरी भी है। आजकल सियासत,मज़हब,दैर- ओ-हरम पे सस्ती शाइरी कर के तालियों की चाह में कुछ मुशायरेबाज़ शाइरों ने सच में मुशायरों का मेयार गिरा दिया है, फ़ारूक़ी साहब की शाइरी इस तरह की शाइरी से कोसों दूर है उनका संजीदा क़लाम ग़ज़ल के असली पैकर का दीदार करवाता है। दो मिसरों की अख्तर-बख्तर लड़ाने से शे'र तो बन सकता है, उसमे मुशायरे में वाह वाह लूटने वाली घुटी भी मिलाई जा सकती है मगर उसमें रूहे-तहारत नहीं डाली जा सकती। आसमान काली घटाओं से कितना भी सियाह हो गया हो मगर जब बिजली कौंधती है तो ज़मीन वालों की नज़र अपने आप उस तरफ़ उठ जाती है फैयाज़ साहब का क़लाम ऐसा ही आकर्षण रखता है। उनके तख़लीक़ी जौहर का अन्दाज़ा आप उनकी इस ग़ज़ल से लगा सकते हैं जिसमें उन्होंने दीवारों से भी ग़ज़ल के पहलु निकाल लिए है :-

लोग मिलते हैं गले यूँ दिल- बेज़ार के साथ

जैसे दीवार मिली हो किसी दीवार के साथ

शहर में कुछ तो हैं इस बात पे दुश्मन मेरे

उसकी दीवार मिली है मेरी दीवार के साथ

यूँ सहारा मुझे देता है तसव्वुर उसका

जैसे दीवार हो गिरती हुई दीवार के साथ

छत के बारे में भी हम सोच ही लेते शायद

एक दीवार ही बन जाती जो दीवार के साथ

फैय्याज़ साहब की शाइरी पुरानी शराब की मांनिंद है नई बात को भी वे उसी तरह कहते है जैसे हमारे उस्ताद शाइर कहा करते थे। 12 -13 साल के अपने मुख़्तसर से शे'री सफ़र के बावजूद फ़ारूक़ी साहब इस राह के नए मुसाफ़िर नहीं लगते। इनकी तक़रीर-ओ-तहरीर से अयाँ (ज़ाहिर) है कि वे लहजा ,कहन , शेरियत के अलावा लफ़्ज़ों की दौलत से भी माला-माल है, मेरी इस बात की पैरवी उनके कुछ शे'र बा-ख़ूबी कर सकते हैं :--

हक़ के लिए मिटने का हुनर पूछने वालो

नेज़े पे उठा तुम ने मेरा सर नहीं देखा

जिन आँखों में"फैय्याज़" बसा खौफ़--ख़ुदा हो

दुनिया ने उन आँखों में कभी डर नहीं देखा

****

ख़ुद को बेच पाये तो रहे गुमनाम दुनिया में

अगर बोली लगा देते तो हम मशहूर हो जाते

छलकती मय तेरी आँखों की अक्सर देखकर सोचा

तेरी आँखों में रह सकते थे अगर अँगूर हो जाते

फैय्याज़ साहब का पहला मज़्मूआ-ए-क़लाम 2011 में "थोड़ा सा ...मैं" की शक्ल में मंज़रे-आम पे आया अभी उनकी दो किताबें छपने के लिए तैयार है मगर फ़ारूक़ी साहब इस मुआमले में बहुत तसल्ली से काम लेते हैं जल्दबाजी न तो उन्होंने शाइरी में की न ही अब अगली किताब के छपने को लेकर उन्हें कोई जल्दी है। फिलहाल फ़ारूक़ी साहब लुधियाना रेंज के डी.आई.जी है ।

बुनियादी तौर पे तो फैयाज़ साहब एक रूमानी शाइर है मगर उनके कहन में लफ़्ज़ों को बरतने का वो सलीक़ा है जिसमे पहुँच की तमाम हदों को तोड़कर मआनी लफ़्ज़ से पहले पहुँच जाते है।

हज़ारों रंग ये मौसम बदल डाले मगर फिर भी

मेरे दिलबर की मनमानी कहीं उस से भी आगे है

ज़मीने जीत कर कितनी ये दुनिया जीत लो लेकिन

फ़क़त इक दिल की सुल्तानी कहीं उस से भी आगे है

***

हटा के जब भी देखे दिल से तेरी याद के मौसम

खंडर लगता है दिल का ये मकाँ अच्छा नहीं लगता

अपनी रोज़-मर्रा की ज़िन्दगी में न जाने कैसे -कैसे केस उनकी नज़रों के सामने आते हैं दिल- दहला देने वाले न जाने कितने ही मंज़र उनकी आँखों ने देखें होंगे ,तभी तो ये कहने पे मजबूर हो जाते हैं वे :---

निगाहों में बसी "फैय्याज़ " जब हो बेकफ़न लाशें

तो फिर अपनी उम्मीदों का जहाँ अच्छा नहीं लगता

अपनी 17 -18 साल की पुलिस की नौकरी में इन्होने ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा है और जहां तक संभव हुआ फरियादी की इमदाद भी की होगी कुछ ऐसे पल भी आयें होंगे जब चाहकर भी किसी को इंसाफ़ की दहलीज़ तक नहीं पहुंचा पायें हो इस तरह के तमाम तजुर्बात इन्सान को पूरी तरह मांज देते हैं। अपने इर्द-गिर्द के माहौल और गुज़रे वाक़यात से फैयाज़ साहब ने अपने अन्दर के शाइर को तराशा बहुत है तभी तो उनके क़लाम में सूफीयाना रंग भी दिखाई देता है और ज़िन्दगी के न जाने कितने फ़लसफ़े उनके अशआर में गुंथे रहते हैं :---

जो कलंदर में झलकती है वही शान हूँ मैं

सल्तनत दिल है मेरी और यहाँ सुल्तान हूँ मैं

छटपटाता रहा सरमाये के पंजों में सदा

मुझको पहचानिए मुफलिस का गिरेबान हूँ मैं

***

ये धन किसी को सुकूँ आज तक दे पाया

मगर सुकून की धन में तलाश जारी है

***

पाने को उसको सिर्फ़ हरम जाना चाहिए

ज़ाहिद का लोगों ये भी भरम जाना चाहिए

गर ज़ुल्म देखकर उबाल आये उसमें तो

अपनी रगों में फिर लहू जम जाना चाहिए

कहीं न कहीं दोहे का ग़ज़ल से कोई रिश्ता ज़रूर है दोनों विधाओं में पूरी सदी की दास्तान दो मिसरों में बयानकरने का सलीक़ा है ,वैसे तो शाइर के लिए दोहा कहना मुश्किल काम नहीं है क्यूंकि उनकी दस्तरस में बहुत सी बहरें होती है मगर दोहा अपने तेवर कुछ अलग रखता है,फ़ारूक़ी साहब के एक दोहे का ज़िक्र यहां ज़रूर करना चाहूँगा :-

ऊंची किसकी शान है ,ऊंची किसकी ज़ात

जब तक पंछी क़ैद में, पिंजरे की औक़ात।।

फैय्याज़ फ़ारूक़ी साहब की शाइरी जब काग़ज़ पे उतरती है तो यूँ लगता है जैसे ग़ज़ल ने कोई पाज़ेब पहन रखी हो और लफ़्ज़ काग़ज़ के फ़र्श पर छम-छम कर रहें हों। उनके शे'रों में ये सलाहियत भी है कि वो नक्काद और कारी दोनों से दाद -ओ -तहसीन हासिल कर लेते है मगर कहीं – कहीं उनकी शाइरी खवास की शाइरी नज़रआती है उनके कुछ अशआर आम आदमी से फ़ारसी के भारी-भरकम लफ़्ज़ों की वजह से थोडा फ़ासला कायम कर लेते हैं। फैय्याज़ फ़ारूक़ी जैसे माहिरे-फ़न और संजीदा फ़िक्र शाइर के क़लाम तक आम आदमी कैसे पहुंचे इसके लिए फ़ारूक़ी साहब को कुछ आम-बोलचाल के लफ़्ज़ों को भी अपनी ग़ज़लों की माला में पिरोना होगा ये मेरा कोई मशविरा नहीं उनसे गुज़ारिश है।

फैय्याज़ फ़ारूक़ी एक संवेदनशील पुलिस अफसर है उनके खूँन में अगर शाइरी है तो इसके साथ -साथ संवेदना भी उनकी रगों में दौड़ रहे लहू में घुली है। अवाम की नज़र में पुलिस और संवेदना का मेल भले बे-मेल हो मगरअपने शाइर होने के साथ पुलिस की नौकरी को फ़ारूक़ी साहब एक वरदान मानते हैं। उनका मानना है कि संवेदना के धरातल पे काम करके एक पुलिस अफसर की क़लम का छोटा सा इशारा बहुत से लोगों के बड़े-बड़े मसअले दूर कर सकता है। वे इस बात से भी इनकार नहीं करते की कुछ लोगों की वजह से पूरे महकमे की छवि ख़राब हो जाती है। कई बार बड़ी इमारतों के साये इतने बड़े हो जाते हैं कि छोटी इमारतें उसमे छिप जाती हैं। फ़ारूक़ी साहब की इस बात से भी हमें इतेफाक़ रखना चाहिए कि पुलिस को एक ना दिखने वाले अपराधी से जूझना होता है, अपराधी वहाँ कामयाब हो जाते हैं जहां पुलिस उस लम्हा होती नहीं है मगर ऐसी बहुत सी जगह होती है जहां पुलिस के सिर्फ़ एहसास भर से बहुत से अपराध नहीं भी होते हैं। फ़ारूक़ी साहब मानते हैं कि जब हमारी मदद को ख़ुदा किसी भी रूप में आ सकता है तो वो हमसे मदद लेने वाले के रूप में भी आ सकता है,आप किसी की फरियाद सुनकर उसकी मदद कर देते है तो आपको फिर किसी मंदिर,मस्जिद या गुरुद्वारे जाने की ज़रूरत नहीं है। मैं भी एक बेल्ट फ़ोर्स का अधिकारी हूँ वे मेरे सीनियर अफसर है उन्हें सेल्यूट करना मेरी ड्यूटी का एक हिस्सा है मगर ऐसे ज़िन्दा- दिल,इन्सान दोस्त , जांबाज़ अफसर को दिल से सेल्यूट करने का मन करता है। मेरा एक दोहा उनकी शख्सीयत के नाम :---

मंदिर से थाने लगे , मित्र सा थानेदार

फ़ारूक़ी सा हो अगर, ख़ाकी का किरदार।।

आख़िर में इसी दुआ के साथ कि फैय्याज़ फ़ारूक़ी साहब ख़ाकी लिबास में क़ानून की भी हिफ़ाज़त वैसे ही करते रहें जैसे ख़ाकसारी और कलंदर –सिफत मिज़ाज के साथ अदब की ख़िदमतकर रहें हैं। ..... आमीन

ये माना आज आसानी बहुत है

मगर कल ख़ाक भी छानी बहुत है

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

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भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन 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रचनाकार: एक शख्सियत…. फैय्याज़ फ़ारूक़ी : विजेंद्र शर्मा का आलेख
एक शख्सियत…. फैय्याज़ फ़ारूक़ी : विजेंद्र शर्मा का आलेख
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