शनिवार, 28 अप्रैल 2012

एक शख्सियत…........ डॉ. राहत इन्दौरी : विजेंद्र शर्मा का आलेख

डॉ. राहत इन्दौरी

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जब से तूने हल्की- हल्की बातें की

यार तबीयत भारी -भारी रहती है

एक शख्सियत…........ डॉ. राहत इन्दौरी

तक़रीबन बीस बरस पहले एक शे'र कहीं पढ़ा :---

हमारे सर की फटी टोपियों पे तन्ज़ न कर

हमारे ताज अजायब घरों में रखे है

और सुनते ही उत्सुकता हुई कि अपनी कौम का ये दर्द काग़ज़ के सीने पे उतारने वाला ये शाइर कौन है ,मालूम हुआ डॉ.राहत इन्दौरी ने कहा है ये शे'र , बस तब से राहत साहब को पढ़ना शुरू किया और आलम ये है कि आज तक उन्हें पढ़ना और रु-बरु सुनना मेरे नसीब के खाते में है।

राहत अरबी ज़ुबान का एक लफ़्ज़ है जिसका एक मआनी आराम भी है। निदा फाज़ली ने सच ही कहा है कि "राहत इन्दौरी ने इस आराम को बे-आराम बनाकर अपनी शाइरी की बुनियाद रखी है"।

राहत इन्दौरी का जन्म इंदौर में मरहूम रिफत उल्ला कुरैशी के यहाँ 01 जनवरी1950 में हुआ। बचपन से ही राहत साहब को पढ़ने -लिखने का शौक़ था। एक मुशायरे के सिलसिले में जाँ निसार अख्तर इंदौर आये हुए थे उस वक़्त राहत दसवीं जमात में थे। राहत साहब उनसे मिलने पहुंचे और कहा कि हुजूर, मैं शाइर बनना चाहता हूँ ,मैं क्या करूँ ? जाँ निसार अख्तर साहब ने कहा कि अच्छे शाइरों का क़लाम पढो ,सौ - दो सौ शे'र याद करो। इस पर पंद्रह बरस के राहत ने जवाब दिया ,हुज़ूर मुझे तो हज़ारों शे'र याद है। उस वक़्त जाँ निसार अख्तर ने सोचा भी नहीं होगा कि ये बच्चा एक दिन उनके साथ मंच से मुशायरे पढ़ेगा और दुनिया का मशहूर शाइर हो जाएगा।

राहत इन्दौरी ने एम्.ए उर्दू में किया , पी-एच.डी. की और फिर सोलह बरस तक इंदौर विश्वविद्यालय में उर्दू की तालीम दी। राहत इन्दौरी ने इसके साथ- साथ तक़रीबन दस बरसों तक उर्दू की त्रैमासिक पत्रिका "शाख़ें" का सम्पादन भी किया।

लुधियाना के एक मुशायरे में मेरी उनसे मुलाक़ात हुई ,उनसे वहाँ एक मतला सुना जिसे सुनकर लगा कि ये मतला उन्होंने सरहद की हिफ़ाज़त करने वाले जांबाज़ दस्ते यानी सीमा सुरक्षा बल के लिए ही कहा है ----

रात की धड़कन जब तक जारी रहती है

सोते नहीं हम ज़िम्मेदारी रहती है

कितना सटीक है ये मतला और इसी लिए इसे सीमा सुरक्षा बल ,बीकानेर सेक्टर की बहुत सी सीमा चौकियों पे लिखवाया गया ताकि जवान जब अपने फ़र्ज़ को अंजाम दे के पोस्ट पे आये तो उनके सामने ये पंक्तियाँ हो।

शाइरी से पहले राहत साहब मुसव्विर(चित्रकार ) थे और ये उनकी शाइरी में साफ़ झलकता है क्यूंकि एक चित्रकार और शाइर ही जानते हैं की रंग और लफ़्ज़ों से काग़ज़ से किस तरह गुफ़्तगू की जाती है।

राहत साहब की शाइरी मुशायरों की बेपनाह कामयाबी के बावजूद भी अदब से अलग नहीं हुई है। उनके ये मिसरे इसकी मिसाल है:---

सिर्फ़ खंजर ही नहीं आंखों में पानी चाहिए

ए ख़ुदा दुश्मन भी मुझको खानदानी चाहिए

मैंने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया

इक समन्दर कह रहा था मुझको पानी चाहिए

राहत साहब की शाइरी का एक मिज़ाज कलंदराना भी है। उनके ये अशआर इस बात की तस्दीक करते हैं :--

एक हुकुमत है जो इनाम भी दे सकती है

एक कलंदर है जो इनकार भी कर सकता है

ढूंढता फिरता है तू दैरो - हरम में जिसको

मूँद ले आँख तो दीदार भी कर सकता है

******

फ़क़ीर शाह कलंदर इमाम क्या क्या है

तुझे पता नहीं तेरा ग़ुलाम क्या क्या है

ज़मीं पे सात समन्दर सरों पे सात आकाश

मैं कुछ भी नहीं हूँ मगर एहतमाम क्या क्या है

राहत इन्दौरी ख़ूबियों का दूसरा नाम है तो उनमें ख़ामियाँ भी है। मुनव्वर राना ने सही कहा है कि "एक अच्छे शाइर में ख़ूबियों के साथ साथ ख़राबियाँ भी होनी चाहिए ,वरना फिर वह शाइर कहाँ रह जाएगा ,वह तो फिर फ़रिश्ता हो जाएगा और फरिश्तों को अल्लाह ने शाइरी के इनआम से महरूम रखा है "।

राहत साहब के शे'र मुशायरे में उनसे सुनना एक सुखद अनुभव होता है पर उनको पढ़ना भी सुकून देता है। आम बोलचाल के लफ़्ज़ों को राहत इन्दौरी एक मंझे हुए पतंगबाज़ की तरह अपने कहन की चरखी में ऐसे चढाते हैं कि उनके अशआर आसमान की बलंदियों में ऐसे पतंग की तरह उड़ते हैं जिनकी कोई काट नहीं होती। राहत साहब के कुछ शे'र इस बात का प्रमाण है :----

दोज़ख के इंतज़ाम में उलझा है रात दिन

दावा ये कर रहा है के जन्नत में जाएगा

एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे

वो अलग हट गया आंधी को इशारा करके

ख़्वाबों में जो बसी है दुनिया हसीन है

लेकिन नसीब में वही दो गज़ ज़मीन है

*****

मैं लाख कह दूँ आकाश हूं ज़मीं हूं मैं

मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूं मैं

अजीब लोग है मेरी तलाश में मुझको

वहाँ पे ढूंढ रहे है जहाँ नहीं हूं मैं

*****

तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो

मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

फूलों की दुकानें खोलो,ख़ुश्बू का व्यापार करो

इश्क़ ख़ता है तो, ये ख़ता एक बार नहीं, सौ बार करो

*****

हमसे पूछो के ग़ज़ल मांगती है कितना लहू

सब समझते हैं ये धंधा बड़े आराम का है

प्यास अगर मेरी बुझा दे तो मैं मानू वरना ,

तू समन्दर है तो होगा मेरे किस काम का है

*****

अगर ख़याल भी आए कि तुझको ख़त लिक्खूँ

तो घोंसलों से कबूतर निकलने लगते हैं

*****

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में

यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन

हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है

******

ज़िन्दगी क्या है खुद ही समझ जाओगे

बारिशों में पतंगें उड़ाया करो

*****

न जाने कौन सी मज़बूरियों का क़ैदी हो

वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो|

राहत इन्दौरी की अभी तक ये किताबें मंज़रे आम पे आ चुकी है :---

धूप धूप (उर्दू),1978 ,मेरे बाद (नागरी )1984 पांचवा दरवेश (उर्दू) 1993 ,मौजूद (नागरी )2005 नाराज़ (उर्दू और नागरी) , चाँद पागल है (नागरी ) 2011

राहत साहब ने पचास से अधिक फिल्मों के लिए गीत लिखे हैं जिसमे से मुख्य हैं :-प्रेम शक्ति ,सर ,जन्म ,खुद्दार , नाराज़, रामशस्त्र ,प्रेम -अगन ,हिमालय पुत्र , औज़ार ,आरज़ू ,गुंडाराज, दिल कितना नादान है, हमेशा, टक्कर, बेकाबू , तमन्ना ,हीरो हिन्दुस्तानी, दरार,याराना, इश्क, करीब ,खौफ़,मिशन कश्मीर , इन्तेहा, श.... ,मुना भाई एम् बी बी एस ,मर्डर, चेहरा ,मीनाक्षी ,जुर्म और बहुत से ग़ज़ल और म्यूजिक एल्बम भी।

राहत इन्दौरी को अनेको अदबी संस्थाओं ने नवाज़ा है जैसे :-ह्यूस्टन सिटी कौंसिल अवार्ड ,हालाक -ऐ- अदब -ऐ -जौक अवार्ड, अमेरिका, गहवार -ए -अदब ,फ्लोरिडा द्वारा सम्मान ,जेदा में भारतीय दूतावास द्वारा सम्मान, भारतीय दूतावास ,रियाद द्वारा सम्मान ,जंग अखबार कराची द्वारा सम्मान ,अदीब इंटर-नेशनल अवार्ड ,लुधियाना, कैफ़ी आज़मी अवार्ड ,वाराणसी ,दिल्ली सरकार द्वारा डॉ ज़ाकिर हुसैन अवार्ड ,प्रदेश रत्न सम्मान, भोपाल ,साहित्य सारस्वत सम्मान , प्रयाग,हक़ बनारसी अवार्ड ,बनारस , फानी ओ शकील अवार्ड ,बदायूं , निश्वर वाहिदी अवार्ड ,कानपुर ,मिर्ज़ा ग़ालिब अवार्ड ,झांसी .निशान- ऐ- एज़ाज़ ,बरेली।

ये सच है कि राहत इन्दौरी की शाइरी गैस से भरा हुआ वो गुब्बारा नहीं है जो पलक झपकते ही आसमान से बातें करने लगे। राहत इन्दौरी की शाइरी अगरबत्ती की ख़ुश्बू की तरह आहिस्ता -आहिस्ता फैलती है और हमारे दिल के दरवाज़े खोलकर हमारी रूह में उतर जाती है। आख़िर में राहत साहब के इसी मतले के साथ :---

ज़िन्दगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी

हम न होंगे तो यह दुनिया दर ब दर हो जाएगी

अगले हफ्ते फिर मिलते हैं किसी और शख्सियत के साथ तब तक..... अल्लाह हाफ़िज़।

 

--

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

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