सोमवार, 30 अप्रैल 2012

प्रियंका सिंह का आलेख - किशोरावस्था में विकास एवँ शिक्षा का महत्व

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प्रियंका सिंह (शोधकर्ती)

गृहविज्ञान संकाय,

वनस्थली विद्यापीठ,टोंक (राजस्थान)

बालक राष्ट्र कि धरोहर होते हैं। सुविख्यात अंग्रेजी कवि मिल्टन का कथन है कि - “यथा सूर्योदय होने पर ही दिवस होता है ” वैसे ही मानव का उदभव बालक से होता है। अत: प्रत्येक राष्ट्र का यह परम पुनीत कर्तव्य है। कि वह अपने अमूल बाल धन की सर्वाधिक सुरक्षा करे। परिवर्तन एक शाश्वत नियम है परिवर्तन के इस चक्र से हर समाज एवं व्यवस्था को गुजरना होता है आज भारतीय संस्कृति में त्याग, तपस्या, श्रम ,साधना, प्रेम, दया - भाव, बड़ों के प्रति आदर भाव, सदाचार, शालीनता आदि मूल्यों के आधार पर स्वार्थ, अशिष्ट, द्वेषभाव, हिंसा, संवेदनशीलता, असत्य, छल -कपट, जैसे मूल्यों का विकास होता है। इन सब का सर्वाधिक प्रभाव आज के किशोर बालक बालिकाओं में ज्यादा देखने को मिलता है। आधुनिक युग में किशोरों की विशेषताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये। वही शिक्षा किशोरों के लिये लाभप्रद होगी क्योंकि किशोरों के सम्पूर्ण विकास में शिक्षा का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा एक महत्वपूर्ण सामाजिक क्रिया है जिसका आयोजन छात्रों के संरक्षकों अध्यापकों विद्यालय समितियों और समाज के सदस्यों द्वारा किया जाता है ।इसका मानव जाति के बौद्धिक सावेंगिक सांस्कृतिक आर्थिक एव सामाजिक जीवन से निकट का सम्बन्ध है यह व्यक्ति को प्रकृति प्रदत शक्तियों का ज्ञान कराती है और इस प्रकार बालकों में सुखी एव उतरदायी व्याक्ति बनने की योग्यता लाती है।

‘एजुकेशन’ शब्द की उत्पति लैटिन भाषा के निम्नांकित शब्दों से मिलकर हुयी है

Educare - जिसका अर्थ विकसित करना या प्रकाश में लाना है।

इस वाक्य का आशय है कि ‘भीतर से वृद्वि’ की सूचना मिलना बालक में पहले से ही कुछ शक्तियाँ और क्षमतायें विद्यमान होती हैं। वह क्रियाशील रहता है उसे अपनी क्रिया और अनुभव के आधार पर स्वत: ज्ञान प्राप्ति के लिये स्वतन्त्र कर देना चाहिये इस कार्य में किसी भी प्रकार के बहारी प्रभाव को स्थान नहीं मिलना चाहिये वरन् स्वाभविेक वृद्धि और अन्तर्निहित शक्तियों के विकास को ही महत्व प्रदान किया जाना चाहिये।

किशोरावस्था के सम्बन्ध में यह परम्परागत विश्वास रहा है कि किशोरावस्था विकास की एक क्रान्तिक अवस्था है इस अवस्था के बालक को न बालक कह सकते हैं ओर न प्रौढ़ व्यक्ति ही कह सकते हैं इस अवस्था में बालक कें शारीरिक और मनोवैज्ञनिक गुणों में परिवर्तन प्रौढ़वस्था की दिशा में होते हैं। Adolescence शब्द के यदि शब्दिक अर्थ को देखा जाये तो स्पष्ट होता है कि Adolescence शब्द की उत्पति लैटिन भाषा के शब्द Adolescere से हुआ है जिसका अर्थ परिपक्वता की और बढना है।

जर्सील्ड़ (1978) के अनुसार किशोरावस्था वह अवस्था है जिसमें एक विकासशील व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वावस्था की और बढ़ता है।

इस अवस्था में बालक की जो जीवन शैली बन जाती है। वही जीवन शैली थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ जीवन पर्यन्त चलती रहती है बाल्यावस्था कि अपेक्षा किशोरावस्था में बालकों में बदलाव दिखाई देता है यह बदलाव मूलत: उनकी यौन परिपक्वता के कारण ही होता है सभी विकासत्मक अवस्थाओ में किशोरावस्था सर्वाधिक आनन्दमयी होती है। इसलिए इस अवस्था को सुनहरी अवस्था कहा जाता है।

अघ्ययनों के आधार पर कहा गया है कि किशोरावस्था समस्याओं की आयु है। किशोरों की समस्यायें परिवार, विद्यालय, स्वाथ्य, मनोरंजन, भविष्य, व्यवसाय, विपरीत लिंग के लोगों आदि से सम्बधित हो सकती हैं। ये समस्यायें अर्थिक, व्यकितगत और सामाजिक आदि किसी भी स्तर की हो सकती हैं। किशोरावस्था को समस्याओ की आयु इसलिए कहा जाता है कि बालक अपने माता पिता सरंक्षकों और अध्यापको आदि के लिए एक समस्या होता है। अत: उसमें चिन्ता, उत्सुकता, अनिश्चितता और भ्रान्ति के लक्ष्ण उत्पन हो जाते हैं। किशोरावस्था के अन्त तक अधिकांश समस्यायें धन, सेक्स या शैक्षिक उपलब्धि के सम्बन्ध में ही होती हैं। किशोरावस्था में आयु बढ़ने के साथ - साथ किशोर अपनी समस्याओं का समाधान करना स्वयं सीखते जाते हैं। फलस्वरूप वे समय व्यतीत होने के साथ - साथ समायोजन में अच्छे और खुशहाल होते जाते हैं।

आज का अध्यापक यह प्रयत्न करता है कि छात्र स्वयं ही किसी बात का निरीक्षण करे उस पर विचार करे और तत्सम्बन्धी निष्कर्ष निकाले। अत: शिक्षा का अर्थ अग्रसर करना या मनुष्य के गुप्त गुणों को प्रकाश में लाना है अन्य शब्दों में शिक्षा मनुष्य की विविध शारीरिक मानसिक और नैतिक शक्तियों के उत्पादन और विकास की एक कला है।

इस प्रकार शिक्षा स्वाभाविक विकास के परिवर्तन में निहित होती है यह परिवर्तन शिक्षा के परिणाम के कारण उस परिवर्तन से भिन्नता रखता है जो शिक्षा के अभाव में हुआ होता है। एडिसन के अनुसार “शिक्षा मानव मस्तिष्क की प्रत्येक छिपी विशेषता और पूर्णता को प्रकाश में ला देती हैं जो ऐसी सहायता के बिना कभी भी प्रकट होने में समर्थ नहीं हो सकती थी” जीवन की सफलता दो बातों पर निर्भर होती है।

1. बालक की जन्मजात शक्तियों और क्षमताओं का विकास और

2. इस विकास द्धारा समाज की आवश्कताओं की पूर्ति की सीमा। अतएव शिक्षा को दो प्रकार के कार्यों का सम्पादन करना होता है - व्यक्ति के प्रति कार्य और समाज के प्रति कार्य।

आधुनिक शिक्षा की प्रमुख विशेषता उसकी सर्वग्रही पद्धति है आज हम शिक्षा के सिद्धातों और क्रियाओं का चयन सभी विचार धाराओं और गुणों के आधार पर करते हैं किसी एक विशेष विचार धारा की सीमा में अपने को बाँधते नहीं। शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों की विवेचना करने के पश्चात् हम शिक्षा के उद्देश्यों के सम्बन्ध में अपना विचार कर सकते हैं। हम शिक्षा के कुछ ठोस उद्देश्य प्रस्तुत कर रहे हैं।

शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित शक्तियों का विकास करना है।

1. उत्तम स्वास्थ्य

2. परिष्कृत रूचियाँ औंर धारणायें

3. तार्किक विचार शक्ति

4. सामाजिक दृष्टिकोण

5. तथ्यों की जानकारी और कौशल

6. नैतिक चरित्र।

ये सभी उद्देश्य परस्पर संबद्ध है हर उद्देश्य एक दूसरे पर निर्भर है और एक दूसरे का पूरक हैं। कोई भी एक उद्देश्य दूसरे पर शासन नहीं कर सकता। सतत् जागरूक प्रत्यनों द्धारा शिक्षक सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। जो स्वयं तथा दूसरों के जीवन को समृद्ध और सुखी बना सकता है।

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