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अतुल कुमार रस्तोगी की कविताएँ

1. क्या करें, इस फ़िक्र में भगवान बैठे हैं

क्या करें, इस फ़िक्र में भगवान बैठे हैं।

क्या बनाया, क्या बने इंसान बैठे हैं।

 

राम को करते भ्रमित मारीच हर युग में,

स्वर्ण से लदकर सभी हैवान बैठे हैं।

 

मुल्क़ को तक़दीर भी कब तक बचाएगी,

आसनों पर गिद्ध धारे ध्यान बैठे हैं।

 

दर पे अब किस सर झुकाएँ,मन्नतें माँगे,

पत्थरों से हो गए भगवान बैठे हैं।

 

भीड़, भागमभाग, भारी शोर शहरों का,

पंगु जीवन, आदमी सुनसान बैठे हैं।

 

सब गुजरते जा रहे हैं पैर रख-रखकर,

सर बचाने का लिए अरमान बैठे हैं।

 

कृष्ण भी बनने लगे हैं कंस कलियुग में,

क्या लिखें अब सोच में रसखान बैठे हैं।

 

दिल से पत्थर फेंककर हर आसमाँ छिद जाए,

कितने इस भ्रम में गवाँकर जान बैठे हैं।

 

जंग जीवन जीतने की धुन सुना तू चल

लोग सर पकड़े लहू-लुहान बैठे हैं।

 

अब जले ये आशियाना या बुझे फिर लौ,

आग से हम खेलने की ठान बैठे हैं।

 

2. हरिद्वार

महादेव पैरों के नीचे पड़े हुए थे पग-पग पर,

कल-कल करती गंगा छल-छल जल करता चंचल पग धर ।

 

घंटों-घड़ियालों की ध्वनि से भरा हुआ आकाश मगन,

शिव बमभोले - शिव बमभोले गूँजे धरती गर्भ गगन,

 

महके अगरू, चंदन भीगे, फूलों की गम-गमक सघन,

धूप, दिये, आरती, थाल, जल-कलश, बेल, अर्पण -तर्पन ।

 

खील- बताशे, लड्डू -पेड़े, चाट -पकौड़े, पानीपूरी,

कुल्फी, शरबत, लीची का रस, शीतल जल, लस्सी रसचूरी,

 

टमटम - इक्के, रिक्शे -ताँगे, टैम्पो भागे दौड़े दूरी,

भीड़ -भड़क्का, कूड़ा -करकट, धूल -धूसरित घाट अघोरी ।

 

साधू मोटे पतले-दुबले, भिखमंगें निर्धन बीमारी,

दुर्बल काया कोई न देखे सरस काय पर नजर बिलौरी,

 

हरिद्वार की हरि-पौड़ी पर मन चंगा नंगा तन गोरी,

धोए काया, ढूँढे माया, मन दरिद्र तन स्वर्ण लदो री ।

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